करोड़ों खर्च, फिर भी प्यासे गांव… आखिर नल-जल योजना की राह में कहां अटक गया विकास?
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कोरबा, छत्तीसगढ़
By ACGN – 7647981711, 9303948009
कोरबा मुख्यालय से लगे गांवों में अधूरी टंकियां, असफल बोरवेल, रिसती पाइपलाइन और बदहाल सड़कें; ग्रामीणों व जनप्रतिनिधियों ने उठाए गंभीर सवाल, तकनीकी जांच और जवाबदेही की मांग
कोरबा ACGN :- केंद्र और राज्य सरकार की महत्वाकांक्षी नल-जल योजना का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों के हर घर तक स्वच्छ पेयजल पहुंचाना था। इसके लिए करोड़ों रुपये खर्च कर पानी की टंकियां बनाई गईं, पाइपलाइन बिछाई गई और जलापूर्ति व्यवस्था विकसित की गई। लेकिन अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ की साप्ताहिक विशेष श्रृंखला “जन की नब्ज” के तहत जब हमारी टीम कोरबा जिला मुख्यालय से लगे गांवों में पहुंची, तो कई स्थानों पर तस्वीर सरकारी दावों से बिल्कुल अलग दिखाई दी।

जिला मुख्यालय से लगे समीपवर्ती ग्रामपंचायत जामबहार, सोनपुरी और चुहिया गांवों में ग्रामीणों ने बताया कि आज भी अनेक घरों तक नियमित पेयजल नहीं पहुंच रहा है। कहीं बोरवेल असफल हो गए, कहीं पाइपलाइन लीकेज के कारण जलापूर्ति शुरू नहीं हो सकी, तो कहीं करोड़ों रुपये की लागत से बनी पानी की टंकियां अधूरी अवस्था में खड़ी हैं। ग्रामीणों का कहना है कि जब करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी लोगों को पानी के लिए संघर्ष करना पड़े, तो योजना के क्रियान्वयन पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

जामबहार में ग्रामीणों का कहना है कि बोरवेल सफल नहीं होने के कारण पूरी योजना आज तक शुरू ही नहीं हो सकी। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या निर्माण कार्य प्रारंभ करने से पहले जलस्रोत का वैज्ञानिक परीक्षण कराया गया था? यदि कराया गया था तो योजना शुरू क्यों नहीं हो सकी, और यदि नहीं कराया गया तो इसकी जवाबदेही किसकी है?

ग्रामीणों ने निर्माण कार्य की गुणवत्ता पर भी प्रश्नचिह्न लगाए हैं। उनका कहना है कि कई स्थानों पर पाइपलाइन में लीकेज है, जिसके कारण पानी गांव तक नहीं पहुंच पा रहा। कुछ ग्रामीणों का यह भी दावा है कि निर्माण कार्य कई स्तरों पर कराया गया, जिससे गुणवत्ता प्रभावित हुई। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है तथा संबंधित विभाग का पक्ष प्राप्त होना शेष है।

चुहिया गांव में बनी पानी की टंकी भी कई सवाल खड़े कर रही है। ग्रामीणों के अनुसार टंकी का निर्माण अभी तक पूरी तरह पूरा नहीं हुआ है। सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम नहीं होने के कारण छोटे-छोटे बच्चे उस पर चढ़कर खेलते दिखाई देते हैं। कई स्थानों पर स्कूलों के समीप भी ऐसी संरचनाएं बनी हैं। ग्रामीणों का कहना है कि यदि भविष्य में कोई दुर्घटना होती है तो उसकी जिम्मेदारी किसकी होगी?

पाइपलाइन बिछाने के दौरान गांवों की सड़कें जगह-जगह खोद दी गईं, लेकिन कई स्थानों पर उनकी मरम्मत अब तक नहीं कराई गई। बरसात में यही सड़कें ग्रामीणों के लिए परेशानी का कारण बन रही हैं। लोगों का कहना है कि विकास कार्यों के साथ सार्वजनिक सुविधाओं की बहाली भी उतनी ही आवश्यक है।

ग्रामीणों का कहना है कि बरसात के दिनों में किसी तरह पानी की व्यवस्था हो जाती है, लेकिन गर्मी शुरू होते ही गांवों में जल संकट गहरा जाता है। ऐसे समय में नल-जल योजना ही सबसे बड़ी उम्मीद थी, लेकिन कई गांवों में यह उम्मीद आज भी अधूरी दिखाई दे रही है।
जानकारी के अनुसार शासन योजना का संचालन ग्राम पंचायतों को सौंपने और जल उपयोग शुल्क लेने की तैयारी कर रहा है। इस पर जनप्रतिनिधियों ने सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि जब नियमित जलापूर्ति ही सुनिश्चित नहीं है, तब ग्रामीणों से जल कर या उपयोग शुल्क लेने की बात किस आधार पर की जा रही है?
जनप्रतिनिधियों का कहना है कि यदि अंततः योजना का संचालन ग्राम पंचायतों को ही करना था, तो उन्हें शुरुआत से ही इसकी निगरानी और संचालन में शामिल किया जाना चाहिए था। स्थानीय स्तर पर समस्याओं की जानकारी होने के कारण कई कमियों का समय रहते समाधान किया जा सकता था।

कुछ जनप्रतिनिधियों ने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा की “दूध की मलाई खाने वाले तो मलाई खाकर चले गए, अब बची हुई समस्याओं और लोगों के आक्रोश का सामना करने की जिम्मेदारी पंचायतों पर डाली जा रही है।” ग्रामीणों का कहना है कि “अब जब कई जगह कमियां और तकनीकी समस्याएं सामने आ रही हैं, तब उनका समाधान करने की जिम्मेदारी पंचायतों पर डाली जा रही है। पहले अधूरे निर्माण पूरे किए जाएं, पाइपलाइन की लीकेज सुधारी जाए, असफल बोरवेलों का समाधान निकाला जाए और उसके बाद ही योजना पंचायतों को सौंपी जाए।”
ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों ने पूरे मामले की उच्चस्तरीय तकनीकी जांच की मांग की है। उनका कहना है कि जिन स्थानों पर पर्याप्त जलस्रोत उपलब्ध नहीं थे, वहां निर्माण की स्वीकृति किन आधारों पर दी गई, इसकी समीक्षा होनी चाहिए। साथ ही अधूरे निर्माण, पाइपलाइन की गुणवत्ता और सुरक्षा मानकों की निष्पक्ष जांच कर आवश्यक सुधारात्मक कार्रवाई की जानी चाहिए।
यह रिपोर्ट फिलहाल कोरबा जिला मुख्यालय से लगे कुछ गांवों की जमीनी स्थिति पर आधारित है। यदि संबंधित विभाग इस संबंध में अपना पक्ष या स्पष्टीकरण उपलब्ध कराता है तो अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित करेगा।
अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ का उद्देश्य किसी व्यक्ति, अधिकारी, जनप्रतिनिधि या विभाग पर आरोप लगाना नहीं, बल्कि जनहित से जुड़े मुद्दों की निष्पक्ष और तथ्यात्मक पड़ताल करना है, ताकि शासन-प्रशासन तक वास्तविक स्थिति पहुंचे और आवश्यक सुधार की दिशा में प्रभावी कदम उठाए जा सकें।
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👉 जुड़े रहिए अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ की साप्ताहिक विशेष श्रृंखला “जन की नब्ज” के साथ, जो प्रत्येक शनिवार प्रकाशित होती है। अगले अंक में हमारी टीम कोरबा जिले के अन्य गांवों का दौरा कर नल-जल योजना, सड़क, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल तथा ग्रामीण विकास कार्यों की जमीनी हकीकत आपके सामने लाएगी।
प्रदीप मिश्रा
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