पंडवानी की अमर साधिका डॉ. तीजन बाई को अंतिम विदाई, मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय और संस्कृति मंत्री राजेश अग्रवाल ने दी श्रद्धांजलि
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रायपुर, छत्तीसगढ़
By ACGN 7647981711, 9303948009
संवाददाता :- सौरभ साहू
गनियारी में उमड़ा जनसैलाब, लोककला की महान विभूति को नम आंखों से दी गई अंतिम विदाई
रायपुर ACGN:- छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान को विश्व पटल पर स्थापित करने वाली पंडवानी की महान साधिका एवं पद्म विभूषण से सम्मानित स्वर्गीय डॉ. तीजन बाई को मंगलवार को उनके पैतृक गांव गनियारी में हजारों लोगों ने नम आंखों से अंतिम विदाई दी। अंतिम दर्शन एवं श्रद्धांजलि सभा में मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय, पर्यटन, संस्कृति, धार्मिक न्यास एवं धर्मस्व मंत्री श्री राजेश अग्रवाल सहित अनेक मंत्री, विधायक, जनप्रतिनिधि, साहित्यकार, कलाकार और प्रदेशभर से पहुंचे श्रद्धालुओं ने उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।

मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय ने डॉ. तीजन बाई के पार्थिव शरीर पर पुष्पचक्र अर्पित कर श्रद्धासुमन अर्पित किए। उन्होंने कहा कि डॉ. तीजन बाई केवल छत्तीसगढ़ की नहीं, बल्कि पूरे भारत की सांस्कृतिक धरोहर थीं। अपनी अद्भुत कला साधना, संघर्ष और समर्पण के बल पर उन्होंने पंडवानी जैसी लोक परंपरा को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई। उनका निधन कला और संस्कृति जगत के लिए अपूरणीय क्षति है, जिसकी भरपाई संभव नहीं है।
पर्यटन, संस्कृति, धार्मिक न्यास एवं धर्मस्व मंत्री श्री राजेश अग्रवाल ने श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि डॉ. तीजन बाई ने छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति को वैश्विक पहचान दिलाई। उनकी बुलंद आवाज, प्रभावशाली अभिनय और महाभारत की जीवंत प्रस्तुति ने पंडवानी को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। उनका संपूर्ण जीवन लोककला के संरक्षण और संवर्धन के लिए समर्पित रहा, जिसे आने वाली पीढ़ियां सदैव स्मरण रखेंगी।

गनियारी में आयोजित शोक सभा में प्रदेशभर से आए कलाकारों, संस्कृति प्रेमियों और ग्रामीणों ने भावुक वातावरण में अपनी प्रिय लोकगायिका को अंतिम विदाई दी। अनेक कलाकारों ने पंडवानी और लोकगीतों की प्रस्तुति देकर उन्हें संगीतमय श्रद्धांजलि अर्पित की तथा उनके कला जीवन को याद किया।
स्वर्गीय डॉ. तीजन बाई का जन्म 24 अप्रैल 1956 को दुर्ग जिले के गनियारी गांव में हुआ था। साधारण परिवार से निकलकर उन्होंने कम उम्र में ही पंडवानी गायन को अपना जीवन बना लिया। उन्होंने परंपरागत शैली से अलग कपालिक शैली में खड़े होकर पंडवानी प्रस्तुत की और अपनी दमदार आवाज, अभिनय तथा भावाभिव्यक्ति से इस लोककला को नई पहचान दिलाई। प्रख्यात रंगकर्मी हबीब तनवीर के मार्गदर्शन में उन्हें राष्ट्रीय पहचान मिली और बाद में उन्होंने 17 से अधिक देशों में प्रस्तुति देकर छत्तीसगढ़ की संस्कृति का विश्वभर में गौरव बढ़ाया।
अपनी अनुपम कला साधना के लिए उन्हें पद्मश्री, संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, पद्मभूषण, जापान का प्रतिष्ठित फुकुओका पुरस्कार तथा देश का दूसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण सहित अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से सम्मानित किया गया। वे केवल एक लोक कलाकार नहीं, बल्कि भारतीय लोकसंस्कृति की जीवंत पहचान थीं।
राज्य सरकार द्वारा रायपुर के महंत घासीदास संग्रहालय परिसर स्थित मुक्ताकाशी मंच पर भी श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित किया गया, जहां मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय और संस्कृति मंत्री श्री राजेश अग्रवाल की उपस्थिति में प्रदेशभर के कलाकारों ने संगीतमय श्रद्धांजलि अर्पित कर उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व को नमन किया।
इस अवसर पर संस्कृति मंत्री श्री राजेश अग्रवाल ने कहा कि डॉ. तीजन बाई भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी अमर आवाज, उनकी कला साधना और पंडवानी की अनुपम परंपरा सदियों तक जीवित रहेगी। छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत में उनका नाम सदैव स्वर्ण अक्षरों में अंकित रहेगा।
प्रदीप मिश्रा
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