अडानी ग्रुप के कोरबा विद्युत परियोजना पर किसानों ने खोला मोर्चा, “उचित मुआवजा नहीं तो जमीन नहीं”
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कोरबा, छत्तीसगढ़
By ACGN 7647981711, 9303948009
संवाददाता :-
पताढ़ी क्षेत्र के लगभग 60 किसानों ने करीब 220 एकड़ भूमि देने से किया इंकार, वर्ष 2013 के भू-अधिग्रहण कानून के तहत मुआवजे की मांग
कोरबा ACGN:- कोरबा जिले के पटाढ़ी क्षेत्र में अडानी समूह की प्रस्तावित कोरबा ताप विद्युत परियोजना के लिए किए जा रहे भू-अर्जन को लेकर किसानों का विरोध खुलकर सामने आ गया है। प्रभावित किसानों का आरोप है कि उन्हें भूमि अधिग्रहण, पुनर्वासन एवं पुनर्स्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 के अनुरूप मुआवजा नहीं दिया जा रहा है। इसी कारण क्षेत्र के लगभग 60 किसानों ने करीब 220 एकड़ भूमि परियोजना के लिए देने से इनकार कर दिया है।

किसानों का कहना है कि परियोजना से जुड़े अधिकारियों द्वारा वर्ष 2007 की प्रक्रिया के आधार पर मुआवजा तय करने की बात कही जा रही है, जबकि वर्ष 2013 में लागू कानून के अनुसार उन्हें वर्तमान परिस्थितियों के अनुरूप उचित प्रतिकर मिलना चाहिए। किसानों का आरोप है कि पहले निर्धारित लगभग 13 हजार रुपये प्रति डिसमिल की दर को चार गुना कर लगभग 52 हजार रुपये प्रति डिसमिल देने का प्रस्ताव रखा जा रहा है, जबकि वर्तमान बाजार मूल्य लगभग 50 हजार रुपये प्रति डिसमिल बताया जा रहा है। किसानों का कहना है कि इसी आधार पर उन्हें लगभग 2 लाख रुपये प्रति डिसमिल का प्रतिकर मिलना चाहिए।

प्रभावित किसानों ने जिला कलेक्टर को ज्ञापन सौंपकर आरोप लगाया है कि उचित मुआवजा दिए बिना सहमति पत्र पर हस्ताक्षर कराने का प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि वे अपनी पुश्तैनी भूमि किसी भी कीमत पर तब तक नहीं देंगे, जब तक उन्हें कानून के अनुरूप उचित प्रतिकर नहीं मिल जाता। ज्ञापन की प्रतिलिपि उद्योग एवं वाणिज्य मंत्री, सांसद, स्थानीय विधायक तथा पुलिस अधीक्षक को भी भेजी गई है।

किसानों ने चेतावनी दी है कि यदि उचित मुआवजा दिए बिना भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई या किसी प्रकार का दबाव बनाया गया, तो वे लोकतांत्रिक तरीके से व्यापक आंदोलन करेंगे। प्रभावित किसानों का कहना है कि यह केवल जमीन का नहीं बल्कि उनके भविष्य, आजीविका और आने वाली पीढ़ियों के अधिकार का प्रश्न है।
अब इस मामले में जिला प्रशासन, परियोजना प्रबंधन और संबंधित विभागों के रुख पर सभी की नजरें टिकी हैं। यदि किसानों और परियोजना प्रबंधन के बीच सहमति नहीं बनती है, तो आने वाले दिनों में यह विवाद और गहरा सकता है।
प्रदीप मिश्रा
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