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शासकीय भूमि फिर हुई शासन के नाम दर्ज, राजस्व न्यायालय के आदेश के बाद पूरे प्रकरण पर उठे गंभीर सवाल

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रायगढ़, छत्तीसगढ़

By ACGN 7647981711, 9303948009

संवाददाता :- संजय जेठवानी

एसीबी कार्रवाई से जुड़े भूमि प्रकरण में नया मोड़, अभिलेख सुधार के बाद दस्तावेजों और पूरी प्रक्रिया की निष्पक्ष जांच की मांग तेज

रायगढ़ ACGN:- धरमजयगढ़ के ग्राम अमलीटीकरा स्थित भूमि प्रकरण में राजस्व न्यायालय के आदेश के बाद एक बार फिर पूरे मामले ने नया मोड़ ले लिया है। जिस भूमि प्रकरण में पूर्व में एंटी करप्शन ब्यूरो (एसीबी) द्वारा रिश्वत संबंधी कार्रवाई करते हुए एक कर्मचारी को गिरफ्तार किया गया था, उसी प्रकरण में अब राजस्व विभाग की ओर से संबंधित भूमि को पुनः शासकीय भूमि के रूप में दर्ज कर दिया गया है। इसके बाद पूरे मामले में कई गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं और लोगों के बीच इस प्रकरण की निष्पक्ष एवं व्यापक जांच की मांग तेज हो गई है।

जानकारी के अनुसार तहसीलदार धरमजयगढ़ हितेश साहू द्वारा राजस्व न्यायालय के आदेश का पालन करते हुए ग्राम अमलीटीकरा के खसरा क्रमांक 334, 348/2, 349/2, 355/2 तथा 357/2 को ऑनलाइन राजस्व अभिलेख में पुनः शासकीय भूमि के रूप में दर्ज किया गया है। राजस्व न्यायालय ने पूर्व में किए गए नामांतरण को निरस्त करते हुए उक्त भूमि शासन के नाम दर्ज करने का आदेश पारित किया था।

राजस्व अभिलेखों में सुधार के बाद अब सबसे बड़ा प्रश्न यह उठ रहा है कि यदि संबंधित भूमि मूल रूप से शासकीय थी, तो वह निजी व्यक्ति फुलेश्वरी के नाम किस प्रक्रिया और किन दस्तावेजों के आधार पर दर्ज हुई। इसके बाद उसी भूमि का विक्रय कैसे हुआ तथा नामांतरण की प्रक्रिया किस आधार पर पूरी की गई। राजस्व न्यायालय के आदेश के बाद इन सभी बिंदुओं पर लोगों की निगाहें टिक गई हैं।

राजस्व आदेश में उल्लेखित तथ्यों के बाद यह भी चर्चा का विषय बना हुआ है कि अभिलेखों में परिवर्तन किस स्तर पर किया गया, संबंधित दस्तावेज किसके द्वारा तैयार किए गए तथा पूरी प्रक्रिया में किन-किन अधिकारियों, कर्मचारियों अथवा अन्य संबंधित पक्षों की भूमिका रही। स्थानीय नागरिकों का मानना है कि केवल राजस्व रिकॉर्ड में सुधार कर देना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच कर वास्तविक तथ्यों को सार्वजनिक किया जाना भी आवश्यक है।

क्षेत्र में यह सवाल भी लगातार उठ रहा है कि यदि जांच में यह सामने आता है कि शासकीय भूमि को निजी दर्शाने के लिए कूटरचित अथवा फर्जी दस्तावेजों का उपयोग किया गया, तो उन दस्तावेजों को तैयार करने, प्रस्तुत करने या उनके आधार पर कार्रवाई कराने वाले सभी संबंधित व्यक्तियों की जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए। साथ ही यदि किसी अधिकारी या कर्मचारी की भूमिका जांच में सामने आती है तो उनके विरुद्ध भी नियमानुसार कार्रवाई किए जाने की मांग की जा रही है।

राजस्व न्यायालय द्वारा नामांतरण निरस्त किए जाने और भूमि को पुनः शासन के नाम दर्ज करने के बाद अब लोगों की नजर पुलिस एवं अन्य जांच एजेंसियों की आगामी कार्रवाई पर है। क्षेत्र में यह चर्चा भी है कि यदि जांच में पर्याप्त साक्ष्य प्राप्त होते हैं तो भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) तथा अन्य लागू विधिक प्रावधानों के तहत आवश्यक आपराधिक कार्रवाई की जा सकती है। हालांकि ऐसी किसी भी कार्रवाई का निर्णय संबंधित जांच एजेंसियों द्वारा उपलब्ध साक्ष्यों एवं विधिक प्रक्रिया के आधार पर ही किया जाएगा।

फिलहाल यह मामला केवल एक नामांतरण निरस्तीकरण तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि शासकीय भूमि की सुरक्षा, राजस्व अभिलेखों की विश्वसनीयता, प्रशासनिक पारदर्शिता तथा जवाबदेही से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय बन चुका है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि राजस्व विभाग द्वारा अभिलेख सुधार की कार्रवाई के बाद जांच एजेंसियां पूरे प्रकरण की तह तक पहुंचकर सभी तथ्यों की निष्पक्ष जांच करती हैं या मामला केवल रिकॉर्ड सुधार तक ही सीमित रह जाता है।

प्रदीप मिश्रा

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