सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी नहीं मिला हक, नगर सैनिक पूछ रहे, आखिर न्याय की लड़ाई किससे?
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रायपुर, छत्तीसगढ़
By ACGN 7647981711, 9303948009
सेवा में समर्पित हजारों नगर सैनिक सुविधाओं और अधिकारों की मांग को लेकर फिर उठाने लगे आवाज, आदेश के पालन में देरी से बढ़ रहा असंतोष
रायपुर ACGN:- छत्तीसगढ़ के हजारों नगर सैनिक (होमगार्ड) एक बार फिर अपने अधिकारों और सुविधाओं को लेकर चिंतित नजर आ रहे हैं। नगर सैनिकों का आरोप है कि सर्वोच्च न्यायालय के स्पष्ट निर्देश के बाद भी राज्य सरकार द्वारा आदेश का प्रभावी क्रियान्वयन नहीं किया जा रहा है, जिससे प्रदेशभर के नगर सैनिकों में नाराजगी और निराशा का माहौल है।

नगर सैनिकों का कहना है कि वे वर्षों से शासकीय सेवाओं में पूरी निष्ठा और जिम्मेदारी के साथ अपनी ड्यूटी निभा रहे हैं। आपदा प्रबंधन, वीआईपी सुरक्षा, चुनाव ड्यूटी सहित कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों में नगर सैनिकों की भूमिका बेहद अहम रहती है। इसके बावजूद उन्हें नियमित कर्मचारियों के समान सुविधाएं और अधिकार नहीं मिल पा रहे हैं।
नगर सैनिकों के अनुसार उन्हें उम्मीद थी कि न्यायालय के आदेश के बाद शासन उनकी मांगों पर शीघ्र निर्णय लेगा, लेकिन निर्धारित समय सीमा बीत जाने के बाद भी स्थिति में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया है। इससे नगर सैनिकों में असंतोष बढ़ता जा रहा है।
गौरतलब है कि 13 फरवरी 2026 को सर्वोच्च न्यायालय ने राज्य सरकार द्वारा दायर विशेष अनुमति याचिका (SLP) को खारिज करते हुए उच्च न्यायालय के आदेश को बरकरार रखा था। साथ ही तीन माह के भीतर आदेश का पालन करने के निर्देश दिए गए थे।
नगर सैनिकों का कहना है कि गृह विभाग द्वारा 12 मार्च 2026 को जारी पत्र में भी सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का उल्लेख करते हुए सेवा शर्तों एवं सुविधाओं में संशोधन के लिए विधिक राय मांगी गई थी। इससे यह स्पष्ट होता है कि शासन को न्यायालय के आदेश की जानकारी थी, बावजूद इसके अंतिम निर्णय और अधिसूचना जारी नहीं हो सकी।
अब नगर सैनिकों के बीच यह सवाल उठ रहा है कि जब सर्वोच्च न्यायालय का आदेश और तय समय सीमा दोनों मौजूद हैं, तो फिर क्रियान्वयन में देरी क्यों हो रही है।
नगर सैनिकों ने सरकार से जल्द निर्णय लेकर उनके अधिकारों और सुविधाओं को लागू करने की मांग की है। उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि जल्द समाधान नहीं किया गया तो वे अपने हक की लड़ाई के लिए पुनः न्यायालय की शरण लेने को मजबूर होंगे।
प्रदीप मिश्रा (प्रधान संपादक)
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