“छत्तीसगढ़ की गौरव गाथा भाग-5 : अतीत का गौरव, वर्तमान का विकास और भविष्य का संकल्प”
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संपादकीय
अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ का साप्ताहिक विशेषांक
✍️ ‘कलम की धार’ ✍️
By ACGN 7647981711, 9303948009
छत्तीसगढ़ की गौरव गाथा : भाग – 5
“कलम की धार” अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ की साप्ताहिक विशेष श्रृंखला है, जो हर रविवार इतिहास, संस्कृति, विरासत और जनहित के मुद्दों को निष्पक्ष, निर्भीक और तथ्यपरक पत्रकारिता के साथ प्रस्तुत करती है। कलम की धार उन कहानियों को सामने लाने का प्रयास है, जो समय के साथ कहीं पीछे छूट जाती हैं। यह लिखती है संघर्ष, साहस, बलिदान और अपनी मिट्टी की पहचान की गाथा।
छत्तीसगढ़ केवल एक राज्य नहीं, बल्कि हजारों वर्षों की संस्कृति, संघर्ष, परंपरा और गौरव की पहचान है। इसकी मिट्टी में प्राचीन सभ्यताओं की गूंज, जनजातीय विरासत की खुशबू और विकास की नई उड़ान समाहित है। कलम की धार के इस विशेष अंक में हम जानेंगे स्वतंत्रता के बाद छत्तीसगढ़ की यात्रा, मध्यप्रदेश का हिस्सा रहने से लेकर पृथक राज्य निर्माण तक का संघर्ष, राज्य निर्माण में योगदान देने वाले प्रमुख नेताओं की भूमिका, 2000 से अब तक की विकास गाथा और बदलते दौर में अपनी ऐतिहासिक धरोहर को बचाने की जिम्मेदारी।
यह केवल इतिहास नहीं, बल्कि अपनी पहचान को समझने और आने वाली पीढ़ियों के लिए गौरव सहेजने का प्रयास है।
आज का विषय – छत्तीसगढ़ की गौरव गाथा — संघर्ष और निर्माण से लेकर वर्तमान तक की कहानी।
आलेख – प्रदीप मिश्रा
स्वतंत्रता से राज्य निर्माण तक और विकास की यात्रा : क्या हम अपनी जड़ों को बचा पा रहे हैं?
छत्तीसगढ़… यह नाम केवल भारत के नक्शे पर एक राज्य की पहचान नहीं है, बल्कि हजारों वर्षों की सभ्यता, संस्कृति, संघर्ष, परंपरा और गौरव की कहानी है। यह वह भूमि है जहां इतिहास की प्राचीन धरोहरें भी हैं और आधुनिक विकास की नई उड़ान भी है नदियों, जंगलों, पहाड़ों और मेहनतकश लोगों की यह धरती सदियों से अपनी अलग पहचान रखती आई है। यहां की लोक संस्कृति, जनजातीय परंपराएं, लोकगीत, नृत्य और जीवन शैली छत्तीसगढ़ को देश के अन्य क्षेत्रों से अलग बनाती है। छत्तीसगढ़ की कहानी केवल राज्य बनने की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस संघर्ष की कहानी है जिसमें एक क्षेत्र ने अपनी पहचान, अपने अधिकार और अपने विकास के लिए लंबी यात्रा तय की।
प्राचीन पहचान से आधुनिक राज्य तक
छत्तीसगढ़ का इतिहास बहुत पुराना है। यहां की धरती ने अनेक सभ्यताओं को जन्म दिया। सिरपुर जैसी प्राचीन नगरी ने शिक्षा, कला और संस्कृति के क्षेत्र में देश और दुनिया में अपनी पहचान बनाई। रामगढ़ की गुफाएं, प्राचीन मंदिर, पुरातात्विक स्थल और बस्तर की समृद्ध संस्कृति आज भी छत्तीसगढ़ की गौरवशाली विरासत की गवाही देते हैं। लेकिन आधुनिक इतिहास में छत्तीसगढ़ की सबसे महत्वपूर्ण यात्रा शुरू हुई स्वतंत्रता के बाद।
स्वतंत्रता के बाद छत्तीसगढ़ की स्थिति
वर्ष 1947 में भारत स्वतंत्र हुआ। आजादी के बाद छत्तीसगढ़ तत्कालीन मध्यप्रदेश राज्य का हिस्सा बना। उस समय छत्तीसगढ़ प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर क्षेत्र था। यहां कोयला, लौह अयस्क, बॉक्साइट, वन संपदा, जल संसाधन और कृषि की अपार संभावनाएं थीं। इसके बावजूद धीरे-धीरे लोगों में यह भावना विकसित होने लगी कि क्षेत्र की अपनी अलग पहचान और जरूरतों के अनुसार विकास नहीं हो पा रहा है। प्रशासनिक दूरी, क्षेत्रीय असंतुलन और स्थानीय समस्याओं के कारण अलग राज्य की मांग धीरे-धीरे मजबूत होने लगी। छत्तीसगढ़ के लोग मानते थे कि यदि यहां की अपनी अलग सरकार और प्रशासन होगा तो स्थानीय संसाधनों का उपयोग यहां के लोगों के हित में बेहतर तरीके से हो सकेगा।
पृथक छत्तीसगढ़ राज्य आंदोलन
इन सबके बीच अलग छत्तीसगढ़ राज्य की मांग कोई अचानक उठी आवाज नहीं थी। यह वर्षों की सामाजिक चेतना और जनभावना का परिणाम था। छत्तीसगढ़ी भाषा, लोककला, संस्कृति और क्षेत्रीय पहचान ने इस आंदोलन को मजबूती दी। 1960 के दशक से यह मांग संगठित रूप लेने लगी और 1970-80 के दशक में आंदोलन ने व्यापक रूप प्राप्त किया।
आंदोलन के प्रमुख चेहरे
छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण की यात्रा में कई महान व्यक्तित्वों का योगदान रहा।
स्व. श्री बिसाहू दास महंत का छत्तीसगढ़ को पृथक राज्य बनाने के आंदोलन में महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है। वे उन शुरुआती नेताओं में शामिल थे जिन्होंने छत्तीसगढ़ की अलग पहचान, क्षेत्रीय विकास और स्थानीय हितों की आवाज को राजनीतिक मंच पर मजबूती दी।
स्वर्गीय बिसाहू दास महंत ने यह बात लगातार उठाई कि छत्तीसगढ़ प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध होने के बावजूद विकास के मामले में अपेक्षित स्थान नहीं पा रहा है। उन्होंने छत्तीसगढ़ की भाषा, संस्कृति, परंपरा और यहां के लोगों की अलग सामाजिक पहचान को महत्व देते हुए अलग राज्य की आवश्यकता पर जोर दिया।
वे मध्यप्रदेश की राजनीति में प्रभावशाली भूमिका में रहे और सरकार व संगठन के स्तर पर छत्तीसगढ़ के हितों की पैरवी करते रहे। उनके विचारों में यह भावना प्रमुख थी कि यदि छत्तीसगढ़ का प्रशासन अलग होगा तो यहां के खनिज, वन और जल संसाधनों का बेहतर उपयोग स्थानीय जनता के विकास के लिए किया जा सकेगा।
स्व.श्री डॉ. खूबचंद बघेल को पृथक छत्तीसगढ़ आंदोलन के प्रमुख प्रेरणास्रोतों में माना जाता है। उन्होंने छत्तीसगढ़ की अलग पहचान, संस्कृति और अधिकारों के लिए आवाज उठाई।
स्व. श्री ठाकुर प्यारेलाल सिंह ने किसानों, मजदूरों और आम जनता के अधिकारों के लिए संघर्ष किया। उनके सामाजिक आंदोलनों ने छत्तीसगढ़ में जागरूकता पैदा की।
स्व. श्री चंदूलाल चंद्राकर ने राष्ट्रीय स्तर पर छत्तीसगढ़ की आवाज को मजबूती दी और अलग राज्य की मांग को राजनीतिक मंचों तक पहुंचाया।
स्व. श्री विद्याचरण शुक्ल की भी छत्तीसगढ़ के विकास और अलग राज्य की भावना को मजबूती देने में महत्वपूर्ण भूमिका रही। राष्ट्रीय राजनीति में प्रभावशाली स्थान रखने वाले श्री शुक्ल ने छत्तीसगढ़ की समस्याओं, क्षेत्रीय असंतुलन और यहां के संसाधनों के बेहतर उपयोग की आवश्यकता को समय-समय पर उठाया। उन्होंने छत्तीसगढ़ की अलग सांस्कृतिक पहचान और क्षेत्र के विकास की जरूरतों को समझते हुए स्थानीय हितों को प्राथमिकता देने की बात कही। उनके प्रयासों से छत्तीसगढ़ की आवाज राष्ट्रीय राजनीतिक मंच तक पहुंची।
स्व.श्री श्यामाचरण शुक्ल छत्तीसगढ़ की राजनीति के प्रमुख स्तंभों में रहे। उन्होंने मुख्यमंत्री के रूप में भी प्रदेश का नेतृत्व किया और क्षेत्र के विकास, सिंचाई, कृषि, शिक्षा तथा आधारभूत सुविधाओं के विस्तार पर कार्य किया। छत्तीसगढ़ की अलग पहचान और यहां के लोगों की आकांक्षाओं को वे समझते थे। उनके कार्यकाल और राजनीतिक भूमिका ने छत्तीसगढ़ के विकास की नींव को मजबूत किया तथा पृथक राज्य की भावना को आगे बढ़ाने में सहयोग दिया।
छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण की यात्रा किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि अनेक नेताओं, सामाजिक संगठनों और जनता के लंबे संघर्ष का परिणाम थी, जिसमें इन वरिष्ठ नेताओं का योगदान भी महत्वपूर्ण अध्याय है। इस आंदोलन को जन-जन तक पहुंचाने में साहित्यकारों और सामाजिक संगठनों की भी बड़ी भूमिका रही। छत्तीसगढ़ी भाषा, लोक संस्कृति और परंपराओं को लेकर जागरूकता ने इस आंदोलन को केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक आंदोलन बना दिया। अनेक साहित्यकारों, समाजसेवियों और जनप्रतिनिधियों ने छत्तीसगढ़ी अस्मिता को मजबूत किया। 1990 के दशक में पृथक राज्य की मांग ने व्यापक जनसमर्थन प्राप्त किया। यह आंदोलन केवल राजनीतिक नहीं था, बल्कि अपनी पहचान और विकास के अधिकार की लड़ाई थी। विभिन्न राजनीतिक दलों और संगठनों के प्रयासों के बाद केंद्र सरकार ने इस मांग पर गंभीरता से विचार किया।अंततः प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार ने छत्तीसगढ़ को पृथक राज्य घोषित किया और अटल बिहारी वाजपेयी छत्तीसगढ़ के निर्माता बने
छत्तीसगढ़ राज्य का निर्माण
जननायको और समाजसेवियों के लंबे संघर्ष और जनभावनाओं के बाद भारत सरकार ने छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण का निर्णय लिया।
तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के कार्यकाल में संसद ने छत्तीसगढ़ राज्य पुनर्गठन विधेयक पारित किया।
इसके बाद 1 नवंबर 2000 को छत्तीसगढ़ भारत का 26वां राज्य बना। और रायपुर को राजधानी बनाया गया और प्रदेश ने विकास की नई यात्रा शुरू की।
छत्तीसगढ़ राज्य के पहले मुख्यमंत्री : स्व.श्री अजीत प्रमोद जोगी (2000-2003)
छत्तीसगढ़ राज्य गठन के बाद स्वर्गीय श्री अजीत जोगी प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री बने। उस समय उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती थी, नए राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था तैयार करना। प्रशासनिक अनुभव रखने वाले अधिकारी होने के कारण उन्होंने नवगठित राज्य की मजबूत नींव रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके कार्यकाल में नए राज्य के लिए प्रशासनिक ढांचे, मंत्रालय, विभागों और शासन व्यवस्था को व्यवस्थित करने का कार्य किया गया।
उन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, सिंचाई और ग्रामीण विकास जैसे क्षेत्रों में प्रारंभिक योजनाओं को गति दी तथा छत्तीसगढ़ को एक अलग प्रशासनिक पहचान देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए। उनका कार्यकाल नए राज्य के निर्माण और व्यवस्था स्थापित करने के दौर के रूप में याद किया जाता है।
यह समय छत्तीसगढ़ के लिए अपनी पहचान बनाने और भविष्य की दिशा तय करने का समय था।
दूसरे मुख्यमंत्री के रूप में डॉ. रमन सिंह सरकार (2003-2018)
वर्ष 2003 में डॉ. रमन सिंह मुख्यमंत्री बने और लगभग 15 वर्षों तक प्रदेश का नेतृत्व किया। उनके कार्यकाल में छत्तीसगढ़ ने कई क्षेत्रों में बदलाव देखा। गरीब परिवारों के लिए सार्वजनिक वितरण प्रणाली को मजबूत किया गया। सस्ती दर पर चावल योजना ने प्रदेश को देशभर में पहचान दिलाई, किसानों के लिए समर्थन मूल्य, बोनस, सिंचाई विस्तार और कृषि विकास पर जोर दिया गया, सड़क, बिजली, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार हुआ। नया रायपुर (अटल नगर) के विकास की शुरुआत भी इसी दौर में हुई।
हालांकि नक्सल समस्या बड़ी चुनौती बनी रही और सरकार को सुरक्षा के साथ विकास पर भी काम करना पड़ा।
तीसरे मुख्यमंत्री के रूप में भूपेश बघेल सरकार (2018-2023)
वर्ष 2018 में श्री भूपेश बघेल तीसरे मुख्यमंत्री बने।उनके कार्यकाल में किसानों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर विशेष ध्यान दिया गया। किसान कर्जमाफी, धान खरीदी व्यवस्था को मजबूत करना और गोधन न्याय योजना जैसी योजनाएं शुरू की गईं। नरवा, गरवा, घुरवा, बाड़ी योजना के माध्यम से ग्रामीण संसाधनों और आजीविका को बढ़ावा देने का प्रयास किया गया। छत्तीसगढ़ की संस्कृति, त्योहारों और परंपराओं को प्रोत्साहित किया गया।
इस कार्यकाल के लगभग दो वर्ष कोरोना महामारी से प्रभावित रहे, जिससे विकास कार्यों पर असर पड़ा।
चौथे मुख्यमंत्री के रूप में विष्णु देव साय सरकार (2023 से वर्तमान)
वर्ष 2023 में श्री विष्णु देव साय मुख्यमंत्री बने।उनकी सरकार ने सुशासन, पारदर्शिता, प्रशासनिक सुधार और जनकल्याण को प्राथमिकता दी। किसान, महिला, युवा और गरीब वर्गों के लिए योजनाओं को आगे बढ़ाया गया। बस्तर और आदिवासी क्षेत्रों में सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के माध्यम से विकास और विश्वास बहाली पर जोर दिया जा रहा है।
2000 से 2026 तक छत्तीसगढ़ : तब और अब
सबसे पहले जब छत्तीसगढ़ राज्यक गठन हैहुआ तब राज्य बनने के समय छत्तीसगढ़ में 16 जिले थे, आज वर्तमान में 33 जिले हैं। वही गठन के बाद से अब संभाग 3 से बढ़कर 5 हो गए। अनुविभाग 58 से 117 और तहसील 96 से बढ़कर 251 हो गई। तीन और जिले बढ़ने की संभावनाएं है जिससे 36 जिलों के साथ छत्तीसगढ़ विकास की ओर अग्रसर होगा
साथ ही कृषि क्षेत्र में बड़ा विस्तार हुआ। जहां वर्ष 2000 में केवल एक कृषि महाविद्यालय था, वहीं अब 37 कृषि महाविद्यालय हैं।
स्वास्थ्य क्षेत्र में एक मेडिकल कॉलेज से बढ़कर 16 मेडिकल कॉलेज हो गए।
शिक्षा के क्षेत्र में साक्षरता दर 64.6 प्रतिशत से बढ़कर 78 प्रतिशत से अधिक हुई।
बिजली उत्पादन क्षमता 4186 मेगावॉट से बढ़कर 30 हजार मेगावॉट से अधिक हुई।
गांवों तक बिजली पहुंची, सड़कें बढ़ीं, उद्योगों का विस्तार हुआ और प्रदेश ने विकास की नई पहचान बनाई।
विकास के साथ विरासत बचाने की जिम्मेदारी : छत्तीसगढ़ की प्राकृतिक संपदा और भविष्य की चुनौती
छत्तीसगढ़ ने पिछले 25 वर्षों में विकास की लंबी यात्रा तय की है। सड़क, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य और उद्योग के क्षेत्र में प्रदेश ने तेजी से प्रगति की है। खनिज संपदा से भरपूर छत्तीसगढ़ देश के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है, लेकिन विकास के साथ अपनी प्राकृतिक विरासत, पर्यावरण और स्थानीय लोगों के अधिकारों को सुरक्षित रखना भी उतना ही आवश्यक है।
छत्तीसगढ़ की पहचान केवल उद्योग और खदानों से नहीं, बल्कि यहां के घने जंगलों, नदियों, पहाड़ों, वन्यजीवों और जनजातीय संस्कृति से भी है। प्रदेश में कोयला, लौह अयस्क, यूरेनियम, लिथियम, बॉक्साइट, चूना पत्थर, टिन अयस्क, डोलोमाइट, सोना सहित अनेक खनिज पाए जाते हैं। बस्तर क्षेत्र में लौह अयस्क और टिन अयस्क, कोरबा क्षेत्र में कोयला, बलौदाबाजार क्षेत्र में चूना पत्थर, सरगुजा क्षेत्र में बॉक्साइट जैसे खनिज प्रदेश की आर्थिक शक्ति हैं। हाल के वर्षों में महासमुंद क्षेत्र में हीरे की संभावनाओं और खनिज संपदा की चर्चा ने भी प्रदेश का ध्यान आकर्षित किया है।
खनन और उद्योगों ने रोजगार, राजस्व और आर्थिक विकास को गति दी है, लेकिन इसके साथ पर्यावरण संरक्षण की चुनौती भी सामने आई है। जंगलों की कटाई, पहाड़ों का उत्खनन, जल स्रोतों पर प्रभाव और वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास में बदलाव जैसी चिंताएं समय-समय पर सामने आती रही हैं।
आज छत्तीसगढ़ में बड़े उद्योगों और खनन परियोजनाओं के लिए प्रदेश के बाहर से भी बड़ी संख्या में कंपनी के साथ कर्मचारी और विशेषज्ञ आते हैं। वहीं दूसरी ओर कई स्थानीय युवा, विशेषकर खनन क्षेत्रों के आसपास रहने वाले लोग, रोजगार के बेहतर अवसरों की प्रतीक्षा करते दिखाई देते हैं। यह एक महत्वपूर्ण विषय है जिस पर शासन और प्रशासन को गंभीरता से विचार करना होगा कि प्रदेश की संपदा से सबसे पहले यहां के मूल निवासियों और स्थानीय युवाओं को अधिकतम लाभ मिले।
विकास का सही अर्थ केवल खनन बढ़ाना नहीं, बल्कि ऐसा संतुलित विकास होना चाहिए जिसमें उद्योग भी आगे बढ़ें, रोजगार भी पैदा हों और पर्यावरण भी सुरक्षित रहे। स्थानीय युवाओं को कौशल प्रशिक्षण, तकनीकी शिक्षा और रोजगार में प्राथमिकता देकर उन्हें विकास की मुख्यधारा से जोड़ना आवश्यक है।
छत्तीसगढ़ की असली ताकत यहां की धरती के नीचे छिपे खनिजों के साथ-साथ धरती के ऊपर मौजूद जंगल, संस्कृति और परंपराएं भी हैं। यदि हम अपनी नदियों, पहाड़ों और वन संपदा को बचाकर विकास करेंगे तो आने वाली पीढ़ियां भी इस गौरवशाली विरासत को महसूस कर सकेंगी।
विकास और विरासत का संतुलन ही सच्चे अर्थों में छत्तीसगढ़ की गौरव गाथा को आगे बढ़ाएगा। विकास की इस यात्रा के बीच एक सवाल भी जरूरी है क्या हम अपनी जड़ों को संभाल रहे हैं? छत्तीसगढ़ केवल उद्योग, सड़क और भवनों का नाम नहीं है। छत्तीसगढ़ वह भूमि है जहां सिरपुर की सभ्यता है, रामगढ़ की गुफाएं हैं, बस्तर की कला है, जनजातीय परंपराएं हैं और लोक संस्कृति की अमूल्य विरासत है। हमारी पुरानी धरोहरें केवल पत्थर और इमारतें नहीं हैं, बल्कि हमारे पूर्वजों की पहचान हैं। यदि हमने इन्हें नहीं बचाया तो आने वाली पीढ़ियां छत्तीसगढ़ को केवल किताबों में पढ़ेंगी। हमें ऐसा विकास चाहिए जिसमें आधुनिकता भी हो और अपनी मिट्टी की खुशबू भी।
क्या विकास और उद्योगों के विस्तार के साथ बाहर से आने वाले लोगों की बढ़ती संख्या का असर छत्तीसगढ़ की स्थानीय संस्कृति, भाषा, परंपरा और सामाजिक मूल्यों पर भी पड़ रहा है?
क्या यह सुनिश्चित नहीं किया जाना चाहिए कि प्रदेश की खनिज संपदा और उद्योगों से सबसे पहले यहां के मूल निवासी, स्थानीय युवा और आने वाली पीढ़ियां लाभान्वित हों, ताकि विकास के साथ छत्तीसगढ़ की पहचान और संस्कार भी सुरक्षित रहें?
विकास और संरक्षण के बीच संतुलन : प्रशासन के लिए एक बड़ी जिम्मेदारी
छत्तीसगढ़ की जल, जंगल और जमीन यहां की पहचान, संस्कृति और जीवन का आधार रही है। प्रदेश में विकास के लिए उद्योग, खनन और अधोसंरचना जरूरी हैं, लेकिन यह भी सुनिश्चित करना होगा कि विकास की दौड़ में प्राकृतिक संसाधनों का केवल दोहन न हो।
खनन और औद्योगिक गतिविधियों को लेकर कई क्षेत्रों में स्थानीय लोगों की चिंताएं और आंदोलन सामने आते रहे हैं। ग्रामीणों और आदिवासी समुदायों की यह अपेक्षा है कि उनकी जमीन, जंगल और परंपरागत जीवनशैली सुरक्षित रहे।
शासन-प्रशासन की जिम्मेदारी है कि ऐसा विकास मॉडल तैयार किया जाए जिसमें छत्तीसगढ़ की खनिज संपदा का उपयोग प्रदेश की प्रगति के लिए हो, लेकिन पर्यावरण, जल स्रोतों और वन संपदा को नुकसान न पहुंचे। साथ ही उद्योगों में स्थानीय युवाओं को रोजगार के अवसर मिलें और कौशल विकास के माध्यम से उन्हें आत्मनिर्भर बनाया जाए।
छत्तीसगढ़ का विकास भी जरूरी है और छत्तीसगढ़ की आत्मा, यहां के जंगल, संस्कृति और प्रकृति को बचाना भी उतना ही जरूरी है। सही मायने में वही विकास सफल होगा जिसमें जल, जंगल, जमीन, रोजगार और पर्यावरण सभी का संतुलन बना रहे।
छत्तीसगढ़ की यात्रा संघर्ष से निर्माण तक की यात्रा है। यह उस जनभावना की कहानी है जिसने एक राज्य को जन्म दिया। यह उन लोगों की कहानी है जिन्होंने पहचान के लिए आवाज उठाई और यह हम सभी की जिम्मेदारी है कि विकास के साथ अपनी संस्कृति, इतिहास और विरासत को भी सुरक्षित रखें। क्योंकि जो समाज अपनी जड़ों को मजबूत रखता है, वही भविष्य की ऊंचाइयों तक पहुंचता है।
समापन : छत्तीसगढ़ की गौरव गाथा — अतीत से भविष्य तक की अनवरत यात्रा
छत्तीसगढ़ की गौरव गाथा की यह पांच भागों की यात्रा केवल इतिहास के पन्नों को पलटने का प्रयास नहीं, बल्कि अपनी मिट्टी, संस्कृति, संघर्ष और पहचान को समझने का एक छोटा सा प्रयास रहा है।
प्राचीन सभ्यताओं, ऐतिहासिक धरोहरों, जनजातीय परंपराओं और लोक संस्कृति से लेकर स्वतंत्रता के बाद की यात्रा, पृथक राज्य निर्माण के संघर्ष और 1 नवंबर 2000 को नए राज्य के रूप में छत्तीसगढ़ के उदय तक — यह सफर संघर्ष, संकल्प और निर्माण की कहानी रहा है।
इस यात्रा में हमने जाना कि छत्तीसगढ़ केवल खनिज संपदा से समृद्ध प्रदेश नहीं, बल्कि महान परंपराओं, वीर सपूतों, लोककलाओं और मेहनतकश जनता की धरती है। राज्य निर्माण के पीछे अनेक महापुरुषों, सामाजिक चिंतकों, जनप्रतिनिधियों और आम जनता का योगदान रहा, जिनके प्रयासों से छत्तीसगढ़ ने अपनी अलग पहचान बनाई।
पिछले 25 वर्षों में छत्तीसगढ़ ने शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, बिजली, उद्योग, सड़क और प्रशासन के क्षेत्र में लंबा सफर तय किया है। लेकिन विकास की इस यात्रा के साथ अपनी जल, जंगल, जमीन, संस्कृति और ऐतिहासिक धरोहरों को बचाने की जिम्मेदारी भी हमारी ही है।
क्योंकि कोई भी प्रदेश केवल बड़ी इमारतों, उद्योगों और सड़कों से महान नहीं बनता, बल्कि अपनी जड़ों को संभालकर आगे बढ़ने से महान बनता है। छत्तीसगढ़ की असली ताकत यहां की संस्कृति, यहां के लोग, यहां की प्रकृति और यहां की आत्मीयता है।
छत्तीसगढ़ की गौरव गाथा का यह भाग-5 समापन नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत है।
क्योंकि इतिहास कभी समाप्त नहीं होता, वह आने वाली पीढ़ियों के कार्यों और उपलब्धियों के साथ आगे बढ़ता रहता है।
आने वाले समय में भी अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ की “कलम की धार” के माध्यम से छत्तीसगढ़ की संस्कृति, इतिहास, विरासत और विकास की कहानियां निरंतर आप तक पहुंचती रहेंगी।
आइए संकल्प लें — विकास भी हो, विरासत भी बचे; आधुनिक छत्तीसगढ़ भी बने और अपनी पहचान भी अमर रहे।
“छत्तीसगढ़ की गौरव गाथा : पांच भागों में जाना हमने अपना अतीत और वर्तमान, अब भविष्य की दिशा तय करना हमारी जिम्मेदारी”
जय छत्तीसगढ़।
छत्तीसगढ़ की गौरव गाथा समाप्त नहीं होती, यह हर छत्तीसगढ़िया के हृदय में आगे बढ़ती रहेगी।
प्रदीप मिश्रा
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