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Anjor Chhattisgarh News

सच की तह तक

“खेती अब पेशा नहीं, संघर्ष बन चुकी है, किसान की टूटती उम्मीदों की सच्ची कहानी”,

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संपादकीय

अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ साप्ताहिक विशेषांक

✍️ ‘कलम की धार’ ✍️

By ACGN 7647981711, 9303948009

“कलम की धार” अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ का साप्ताहिक विशेषांक है, जो जनहित के मुद्दों को निष्पक्ष, निर्भीक और सच्चाई के साथ उठाता है, व्यवस्था को आईना दिखाता है और उन सवालों को सामने लाता है जिन पर अक्सर चुप्पी साध ली जाती है।“कलम की धार” केवल शब्दों का मंच नहीं, बल्कि समाज की उन सच्चाइयों को सामने लाने का प्रयास है जिन्हें अक्सर व्यवस्था की चमक, आंकड़ों की भाषा और भाषणों के शोर में दबा दिया जाता है। यह मंच निष्पक्षता, निर्भीकता और जनहित की पत्रकारिता के लिए समर्पित है। यहां सत्ता से सवाल भी होंगे, व्यवस्था का विश्लेषण भी होगा और गांव-गरीब-किसान की आवाज़ को शब्द भी मिलेंगे।हमारा उद्देश्य केवल समाचार प्रकाशित करना नहीं, बल्कि उन मुद्दों को उठाना है जिनसे आम लोगों का जीवन प्रभावित होता है। जब खेतों की मिट्टी दर्द बयां करने लगे, जब किसान अपनी ही जमीन पर अधिकार साबित करने मजबूर हो जाए, जब मेहनत करने वाला व्यक्ति सबसे ज्यादा परेशान दिखे, तब “कलम की धार” का मौन रहना भी अन्याय होगा।

आज का यह विशेष लेख केवल किसानों की समस्या नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का आईना है जहां मेहनत किसान करता है, जोखिम किसान उठाता है, लेकिन सबसे कमजोर भी वही किसान रह जाता है।

आज का विषय – “गांव का किसान टूट रहा है… और व्यवस्था अभी भी योजनाओं का जश्न मना रही है” सीमाओं में बंटा अन्नदाता, पोर्टलों में उलझी खेती और बाजार में हारता किसान आखिर कब सुनेगी व्यवस्था?

आलेख – प्रदीप मिश्रा

भारत को कृषि प्रधान देश कहा जाता है। जहां हर मंच पर किसान को “अन्नदाता” कहा जाता है। चुनाव आते ही किसान सम्मान, किसान हित और कृषि सुधारों की बातें तेज हो जाती हैं। लेकिन गांवों और खेतों की सच्चाई कुछ और ही कहानी कहती है।

आज देश का किसान केवल मौसम से नहीं लड़ रहा, वह सरकारी पोर्टलों से लड़ रहा है, रिकॉर्ड की गलतियों से लड़ रहा है,बाजार की लूट से लड़ रहा है,सीमावर्ती नियमों से लड़ रहा है, और बढ़ती लागत से लड़ रहा है।                                             सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जो किसान वास्तव में खेत में मेहनत करता है, वही सबसे ज्यादा परेशान है, जबकि प्रभावशाली लोग, बड़े किसान और व्यवस्था से जुड़े लोग अक्सर योजनाओं और सुविधाओं का लाभ आसानी से ले लेते हैं।

छोटा और मध्यम किसान सबसे ज्यादा संकट में क्यों?

भारत की खेती का बड़ा हिस्सा छोटे और मध्यम किसानों पर आधारित है,वे किसान जिनके पास थोड़ी जमीन है,जो खुद खेत में काम करते हैं,जो मजदूर भी हैं और मालिक भी सुबह खेत में मेहनत करने वाला यही किसान शाम को खाद-बीज के लिए लाइन में खड़ा दिखाई देता है,यही किसान तहसील और समिति के चक्कर काटता है,यही किसान पोर्टल की गलती से खरीदी से बाहर हो जाता है।

बड़ा किसान नुकसान झेल सकता है,लेकिन छोटा किसान एक सीजन खराब होने पर कर्ज में डूब जाता है। किसानों की समस्या है कि यदि गिरदावरी में नाम गलत हो जाए तो समस्या किसान की,यदि पोर्टल में डेटा अपडेट न हो तो समस्या किसान की, यदि खरीदी केंद्र में पंजीयन रुक जाए तो नुकसान किसान का

सवाल यह है कि क्या योजनाएं वास्तव में छोटे किसानों तक पहुंच रही हैं?

 योजनाएं कागजों में सफल, किसान जमीन पर परेशान

सरकारी फाइलों में सब कुछ व्यवस्थित दिखाई देता है। शासन की सभी योजनाएं सफल दिखाई देती हैं, लाखों किसानों को लाभ मिलने के आंकड़े जारी होते हैं, लेकिन इन सबके बाद गांवों की वास्तविकता अलग है।

गांवों में आज भी हजारों किसान यह नहीं जानते कि उनका रिकॉर्ड अपडेट है या नहीं, पंजीयन हुआ या नहीं, कौन-सा दस्तावेज जरूरी है, आवेदन कहां करना है। इसका फायदा दलाल जैसे लोग उठाते है

वर्तमान में डिजिटल व्यवस्था को सुविधा कहा गया था, लेकिन गांवों में यह कई किसानों के लिए नई परेशानी बन गई है, अब किसान खेत से ज्यादा पोर्टलों में उलझा दिखाई देता है, क्या तकनीक का उद्देश्य किसान को सशक्त बनाना था, या उसे नए बिचौलियों पर निर्भर करना?

खेती महंगी मुनाफा कम

वर्तमान में बढ़ती महंगाई के दौर में खेती की लागत लगातार बढ़ रही है,खाद महंगी, बीज महंगे, दवाइयां महंगी, डीजल महंगा, सिंचाई महंगी,मजदूरी महंगी, लेकिन किसान की उपज का दाम उसी अनुपात में नहीं बढ़ता।

इन सब के बीच सब्जी और दलहन उगाने वाले किसान सबसे ज्यादा परेशान है।

किसान खेत में इन खर्चों और दिन भर की मेहनत के बाद सब्जियों और अन्य फसलों को व्यापारियों की  जिस दर पर बेचता है, की उससे उसकी लागत भी नहीं निकल पाती उन्हीं फसलों शहर में वही व्यापारी ऊंचे रेट में बेचता है आज यदि बाजार के दर देखे तो हर सब्जी 40 रुपए से कम नहीं बिकती टमाटर 40 रुपये किलो बिकता है। जबकि व्यापारी उसे 2 से 5 रुपए किलो की दर से किसानों से खरीदता है 

विचारणीय यह है कि यदि उपभोक्ता महंगा खरीद रहा है तो किसान सस्ता क्यों बेच रहा है? इस बीच का पैसा आखिर किसकी जेब में जा रहा है?

व्यापारी और बिचौलिया किसान की मजबूरी समझते हैं, उन्हें पता है कि किसान के पास भंडारण नहीं है, उसे तुरंत पैसे चाहिए,किसान को फसल खराब होने का डर अलग इसी मजबूरी में किसान औने-पौने दामों में अपनी उपज बेच देता है। जिसका फायदा बड़े व्यापारी और बिचौलिए उठाते हैं यह  केवल आर्थिक नुकसान नहीं, बल्कि किसान की मेहनत का अपमान है।

आखिर क्यों कम हो रही है कृषि (खेती) से लोगों की रुचि ?

आज गांवों में सबसे बड़ी चिंता यह दिखाई देती है कि नई पीढ़ी खेती से दूर होती जा रही है, क्योंकि उसने अपने घरों में संघर्ष देखा है।

उसने देखा है कि मेहनत किसान सबसे ज्यादा करता है, लेकिन कमाई सबसे कम होती है, कृषि कार्य में खर्च लगातार बढ़ता जा रहा है, लेकिन मुनाफा कम होता जा रहा है। इसी कारण अब लोग खेती को सुरक्षित भविष्य नहीं मानते, कई किसान अपने बच्चों को खेती से दूर रखना चाहते हैं, यह स्थिति केवल आर्थिक संकट नहीं, बल्कि आने वाले समय के लिए बड़ा खतरा है।

आखिर क्यों किसान कर रहा है शहरों की ओर पलायन ?

जब लगातार मेहनत के बाद किसी कार्य में उचित लाभ न मिले लगातार घाटा हो,जब फसल का सही दाम न मिले, जब सरकारी नियम और पोर्टल परेशान करें…जब कर्ज बढ़ता जाए…तब अंततः किसान थक हार जाता है, और फिर वह गांव छोड़ देता है, आज हजारों किसान खेत छोड़कर शहरों की ओर मजदूरी करने जा रहे हैं,कोई निर्माण कार्य में मजदूर बन रहा है,कोई फैक्ट्री में काम कर रहा है,कोई दिहाड़ी मजदूरी कर रहा है, यह वही किसान है जिसने कभी अपने खेत में दूसरों को काम दिया था। वर्तमान की पीढ़ी विकास के इस दौर में डिजिटल जिंदगी जीने के लिए मोबाइल और बाइक में घूम रही है

सवाल यह है, क्या यह कृषि प्रधान देश की सबसे बड़ी विडंबना नहीं कि उसका अन्नदाता मजदूरी करने मजबूर हो जाए?

यदि खेती लाभकारी होती,यदि बाजार न्यायपूर्ण होता,यदि व्यवस्था किसान के साथ खड़ी होती,तो क्या किसान अपनी पुश्तैनी जमीन छोड़कर शहरों की धूल में मजदूरी करने जाता?

सीमावर्ती किसानों की सबसे बड़ी पीड़ा

आज विकास की इस दौड़ और डिजिटल भारत बनने पर कुछ किसानों के बीच यह समस्या देखने को मिल रही है,खासकर सीमावर्ती क्षेत्रों के किसानों की स्थिति सबसे ज्यादा दर्दनाक है, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, झारखंड और अन्य सीमावर्ती इलाकों में हजारों किसान ऐसे हैं नए राज्य बने व राज्यों के एवं जिलों के परिसीमन जो शासन द्वारा कराया जाता है जिससे किसान की जमीन पर असर दिखता है ऐसे में एक राज्य में रहने वाला किसान जिनकी कृषि भूमि एक राज्य में है, लेकिन वे अपने परिवार के साथ निवास दूसरे राज्य में करते हैं, विशेष कर ऐसी महिलाएं जिन्हें अपने माता-पिता से कुछ जमीन प्राप्त हुई है या हिस्से में मिली है और उनका विवाह दूसरे राज्य में हो गया है, लेकिन वे अपनी जमीन का लगान पटाते हैं,वहां खेती करते हैं, धान बोते हैं, फसल तैयार करते हैं, लेकिन जब उपार्जन केंद्र में धान बेचने पहुंचते हैं तो उन्हें कह दिया जाता है आप दूसरे राज्य के हैं।” आपका आधार कार्ड में दूसरे जगह का पता लिखा गया है यहां आपका खाता नहीं खुलेगा।”“आप यहां धान नहीं बेच सकते।”

अब सवाल यह है,जब जमीन उसके नाम पर है तो वह धान क्यों नहीं बेच सकता?

जब वह लगान पटाता है तो उसे खरीदी का अधिकार क्यों नहीं?

जब खेती वैध है तो किसान अवैध कैसे हो गया?

क्या खेत की मिट्टी अब निवास प्रमाण पत्र मांगने लगी है?

यह केवल प्रशासनिक समस्या नहीं, बल्कि किसानों के अधिकारों का विषय है।

 उपार्जन केंद्रों में सुधार की जरूरत

यदि किसी किसान की भूमि किसी उपार्जन केंद्र के अंतर्गत आती है, तो उसे उसी केंद्र में,धान बेचने का अधिकार मिले, KCC खाता खोलने की सुविधा मिले, खाद-बीज उपलब्ध कराया जाए, और सरकारी योजनाओं का लाभ भी मिले। किसान की पहचान उसकी खेती और भूमि से होनी चाहिए, केवल निवास से नहीं।

इसी तरह अलग-अलग जिलों में जमीन वाले किसानों की परेशानी भी देखने को अक्सर मिल जाती है, कई किसानों के पास अलग-अलग जिलों में थोड़ी-थोड़ी जमीन होती है, वे वर्षों से वहां खेती करते आ रहे हैं, लेकिन दूसरे जिले में धान बेचने जाते समय उन्हें कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है, कहीं पंजीयन नहीं होता, कहीं रिकॉर्ड अपडेट नहीं, कहीं खरीदी में प्रतिबंध, कहीं तकनीकी समस्या

इन सब में बड़ा किसान शायद रास्ता निकाल लेता है, लेकिन छोटा और मध्यम किसान नियमों के जाल में फंस जाता है।

क्या व्यवस्था वास्तव में किसान की स्थिति समझ रही है?

आज किसान केवल आर्थिक संकट में नहीं है, वह मानसिक दबाव में भी जी रहा है।

आज किसानों पर कर्ज का दबाव, फसल का डर, बाजार की चिंता,पोर्टल की परेशानी, गिरदावरी की चिंता और भविष्य की अनिश्चितता है

फिर भी मंचों से कहा जाता है “किसान देश की रीढ़ है।”

लेकिन सवाल यह है क्या इस रीढ़ को लगातार कमजोर नहीं किया जा रहा?

  अब केवल भाषण नहीं, जमीनी सुधार चाहिए

यदि वास्तव में किसान को बचाना है, तो ठोस और व्यावहारिक सुधार आवश्यक हैं किसानों की समस्याओं के समाधान के लिए शासन और प्रशासन को जमीनी स्तर पर गंभीरता से काम करने की आवश्यकता है।

राजस्व विभाग को गिरदावरी, भूमि रिकॉर्ड और सीमावर्ती किसानों की समस्याओं का त्वरित समाधान करना चाहिए। कृषि विभाग को समय पर खाद, बीज और दवाइयों की उपलब्धता सुनिश्चित करनी चाहिए तथा नकली बीज और दवाइयां बेचने वालों पर कठोर कार्रवाई करनी चाहिए।                   उपार्जन केंद्रों में जिस किसान की जहां जमीन हो, उसे वहीं धान बेचने की अनुमति मिलनी चाहिए, चाहे उसका निवास किसी भी राज्य या जिले में हो। छोटे और सीमावर्ती किसानों के KCC खाते सरल प्रक्रिया से खोले जाएं और उन्हें खाद-बीज की सुविधा भी मिले।                                    सीमावर्ती किसानों के लिए स्पष्ट नीति हो, जिस किसान की जहां जमीन हो, उसे वहीं धान बेचने का अधिकार मिले, उपार्जन केंद्र आधारित पंजीयन, किसान की भूमि जिस केंद्र के अंतर्गत आती हो, वहां किसान का पंजीयन अनिवार्य हो,                   KCC और खाद-बीज सुविधा मिले, भूमि के आधार पर सीमावर्ती किसानों को KCC और खाद-बीज की सुविधा मिले,                                               छोटे और मध्यम किसानों के लिए विशेष सहायता और सरल प्रक्रिया और अलग सहायता तंत्र बने।      बाजार में सुधार हो सब्जी और दलहन किसानों के लिए मूल्य सुरक्षा व्यवस्था लागू हो।                 गांव स्तर पर तकनीकी सहायता केंद्र हो, ताकि किसान पोर्टल और रिकॉर्ड की समस्याओं से न जूझे।                                                         खेती को लाभकारी बनाने की नीति बनाई जाए, कृषि लागत नियंत्रण और न्यूनतम लाभ सुनिश्चित करने पर गंभीर नीति बने।

तहसीलदार, पटवारी, कोटवार और ग्राम पंचायतों को गांवों में समय-समय पर किसानों की बैठक लेकर उनकी समस्याएं सुननी चाहिए और योजनाओं व रिकॉर्ड संबंधी जानकारी का अपडेट देना चाहिए।

रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार में लिप्त पाए जाने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों को केवल निलंबित नहीं, बल्कि सेवा से पृथक करने जैसी कठोर कार्रवाई हो ताकि भविष्य में कोई भी किसान के अधिकारों के साथ अन्याय करने का साहस न कर सके।

विशेष सूचना :

यह लेख किसानों की जमीनी समस्याओं, ग्रामीण परिस्थितियों और जनहित से जुड़े मुद्दों को शासन-प्रशासन तक पहुंचाने तथा जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से लिखा गया है। लेख में व्यक्त विचार सामाजिक एवं कृषि संबंधी वास्तविक परिस्थितियों के विश्लेषण पर आधारित हैं। इसका उद्देश्य किसी राजनीतिक दल, संस्था, अधिकारी या व्यक्ति विशेष पर आरोप-प्रत्यारोप करना नहीं, बल्कि किसानों की समस्याओं की ओर ध्यान आकर्षित करना है।

“कलम की धार” का अंतिम सवाल

जिस किसान की मेहनत से देश का हर घर चलता है…                                                        आखिर वही किसान सबसे ज्यादा परेशान क्यों है?क्यों उसे अपनी ही जमीन पर अधिकार साबित करना पड़ता है?

क्यों उसे अपनी ही फसल बेचने के लिए संघर्ष करना पड़ता है?

क्यों वह अंततः खेत छोड़कर शहरों की ओर मजदूरी करने मजबूर हो जाता है? क्योंकि शायद आज भी व्यवस्था खेत की मिट्टी को आंकड़ों में समझने की कोशिश कर रही है, और किसान की पीड़ा को फाइलों में माप रही है।

लेकिन याद रखिए जब किसान टूटता है, तब केवल एक व्यक्ति नहीं टूटता, देश की खाद्य सुरक्षा, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी कमजोर होता है।

 कलम की धड़कन

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“अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ — कलम की धार”

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