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ज्ञानभारतम् मिशन में मिली ऐतिहासिक धरोहर, दुर्लभ पांडुलिपियों का सर्वे जारी

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रायपुर, छत्तीसगढ़

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संवाददाता अनादि पांडेय


पूर्व संभागायुक्त डॉ. संजय अलंग द्वारा सौंपे गए महत्वपूर्ण दस्तावेज, छत्तीसगढ़ के इतिहास और नामकरण पर नई जानकारी सामने आई

रायपुर जिले में ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण की दिशा में ज्ञानभारतम् मिशन के तहत पांडुलिपियों का सर्वेक्षण लगातार जारी है। कलेक्टर डॉ. गौरव सिंह के निर्देश पर चल रहे इस अभियान में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि उस समय सामने आई जब पूर्व संभागायुक्त एवं सेवानिवृत्त आईएएस डॉ. संजय अलंग द्वारा कई दुर्लभ और ऐतिहासिक महत्व की पांडुलिपियां उपलब्ध कराई गईं।
इन पांडुलिपियों में कोरिया रियासत की प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़े दस्तावेज, छत्तीसगढ़ के नामकरण का ऐतिहासिक आधार तथा विभिन्न कालखंडों के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन की झलक मिलती है।

डॉ. अलंग के अनुसार ‘कोशल’ नाम की उत्पत्ति उस समय मानी जाती है जब शासक जबलपुर मार्ग से चिल्पी घाटी पार करते थे, जिसके एक ओर क्षेत्र को महाकौशल और दूसरी ओर कोसल कहा जाता था। वहीं ‘छत्तीसगढ़’ नाम का उद्भव इस क्षेत्र में स्थित 36 प्राचीन गढ़ों के कारण हुआ, जो उस समय की जमींदारी व्यवस्था और स्थानीय शासन प्रणाली को दर्शाता है।
पांडुलिपियों में यह भी उल्लेख मिलता है कि उस काल में अनेक छोटी-छोटी जमींदारियाँ अस्तित्व में थीं, जो कलचुरी और गोंड शासकों के अधीन रहकर सैन्य और आर्थिक सहयोग प्रदान करती थीं। साथ ही गौटिया पद्धति से जुड़े अभिलेख भी इस सर्वेक्षण में प्राप्त हुए हैं, जो उस समय के ग्रामीण प्रशासन की झलक प्रस्तुत करते हैं।
इसके अलावा 18वीं शताब्दी में मराठा शासन के विस्तार और भोंसले शासकों द्वारा नागपुर से छत्तीसगढ़ पर स्थापित शासन व्यवस्था से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारियां भी इन पांडुलिपियों के माध्यम से सामने आई हैं। डॉ. अलंग ने इन ऐतिहासिक दस्तावेजों के जरिए उस दौर के सामाजिक, पारिवारिक और जनजीवन के विविध पहलुओं को भी उजागर किया।
संग्रहण और संरक्षण की दिशा में पांडुलिपियों का डिजिटलीकरण भी किया जा रहा है। विशेष रूप से कोरिया रियासत से संबंधित Electricity Act 1941 की पांडुलिपि को सफलतापूर्वक स्कैन कर डिजिटल रूप में सुरक्षित किया गया है। यह पहल आने वाली पीढ़ियों के लिए ऐतिहासिक धरोहर को संरक्षित रखने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

प्रदीप मिश्रा
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