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महिला आरक्षण पर भ्रम फैलाने का आरोप, कांग्रेस जिलाध्यक्ष शशि सिंह ने भाजपा की मंशा पर उठाए सवाल

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सूरजपुर, छत्तीसगढ़

By ACGN 7647981711, 9303948009

संवाददाता सौरभ साहू

नारी शक्ति वंदन अधिनियम पर सियासत तेज, कांग्रेस ने कहा महिला आरक्षण के मुद्दे को राजनीतिक उपकरण बना रही भाजपा

सूरजपुर जिले में महिला आरक्षण को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। कांग्रेस जिलाध्यक्ष शशि सिंह ने भारतीय जनता पार्टी पर आरोप लगाया है कि वह महिला आरक्षण के नाम पर पूरे देश में भ्रम फैलाने का प्रयास कर रही है। उन्होंने जारी बयान में कहा कि भाजपा महिला आरक्षण के मुद्दे को वास्तविक रूप से लागू करने के बजाय इसे राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रही है, जबकि कांग्रेस पार्टी हमेशा से महिला आरक्षण की प्रबल समर्थक रही है।
शशि सिंह ने कहा कि भाजपा यह प्रचारित कर रही है कि कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने महिला आरक्षण बिल का समर्थन नहीं किया, जबकि यह पूरी तरह भ्रामक और तथ्यहीन है। उनके अनुसार वास्तविक स्थिति इससे बिल्कुल अलग है और जनता को भ्रमित करने के लिए इस प्रकार के दावे किए जा रहे हैं।
उन्होंने कहा कि महिला आरक्षण बिल जिसे नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 और 106वां संविधान संशोधन कहा जाता है, संसद के दोनों सदनों से पारित हो चुका है और इस पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के हस्ताक्षर भी हो चुके हैं। इसके साथ ही यह विधेयक कानून का रूप ले चुका है। उन्होंने कहा कि जब यह कानून पहले ही पारित हो चुका है तो यह कहना कि विपक्ष के कारण महिला आरक्षण लागू नहीं हो पाया, पूरी तरह गलत है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि इस कानून को लागू करने की प्रक्रिया भविष्य की जनगणना और परिसीमन से जुड़ी होने के कारण तत्काल प्रभाव से लागू नहीं हो पा रही है।
कांग्रेस जिलाध्यक्ष ने 16 अप्रैल 2026 को संसद में प्रस्तुत 131वें संविधान संशोधन विधेयक को लेकर भी भाजपा पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि इस विधेयक को महिला आरक्षण के नाम पर पेश किया गया, जबकि इसका मुख्य उद्देश्य परिसीमन से जुड़े प्रावधानों को आगे बढ़ाना था। उन्होंने बताया कि इस विधेयक में लोकसभा की सीटों को बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव रखा गया था, जिसमें 815 सीटें राज्यों के लिए और 35 सीटें केंद्र शासित प्रदेशों के लिए निर्धारित करने की बात कही गई थी। साथ ही परिसीमन के लिए 2011 की जनगणना को आधार बनाने का प्रस्ताव भी शामिल था। शशि सिंह के अनुसार कई राज्यों ने इस प्रस्ताव पर आपत्ति जताई, क्योंकि उनका मानना था कि पुराने आंकड़ों के आधार पर परिसीमन करना उचित नहीं है।
अपने बयान में उन्होंने कांग्रेस के ऐतिहासिक योगदान का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि महिलाओं को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने की दिशा में कांग्रेस ने हमेशा महत्वपूर्ण पहल की है। उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी का उदाहरण देते हुए कहा कि वर्ष 1989 में पंचायतों और नगर पालिकाओं में महिलाओं के लिए एक तिहाई आरक्षण का प्रस्ताव लाया गया था। बाद में पी.वी. नरसिम्हा राव के कार्यकाल में 1993 में यह व्यवस्था कानून के रूप में लागू हुई। इसके बाद डॉ. मनमोहन सिंह के कार्यकाल में संसद और विधानसभाओं में महिला आरक्षण का विधेयक लाया गया, जो वर्ष 2010 में राज्यसभा से पारित हुआ था। उन्होंने कहा कि इन्हीं प्रयासों का परिणाम है कि आज देशभर में पंचायतों और नगर निकायों में लाखों महिला जनप्रतिनिधि सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।
शशि सिंह ने कहा कि जब देश में नई जनगणना की प्रक्रिया शुरू होने वाली है और जातिगत जनगणना की भी चर्चा चल रही है, तो ऐसे समय में 2011 के पुराने आंकड़ों के आधार पर परिसीमन कराना तर्कसंगत नहीं है। उन्होंने सवाल उठाया कि सरकार नई जनगणना के आंकड़ों का इंतजार क्यों नहीं करना चाहती। उनके अनुसार परिसीमन जैसी महत्वपूर्ण प्रक्रिया अद्यतन आंकड़ों के आधार पर ही होनी चाहिए ताकि सभी राज्यों और क्षेत्रों के साथ न्याय हो सके।
उन्होंने यह भी कहा कि यदि सरकार वास्तव में महिला आरक्षण लागू करना चाहती है तो इसे परिसीमन से जोड़ने की आवश्यकता नहीं है। वर्तमान लोकसभा और विधानसभाओं की सीटों में ही 33 प्रतिशत आरक्षण लागू किया जा सकता है और इसके लिए किसी अतिरिक्त परिसीमन की जरूरत नहीं है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस सहित सभी विपक्षी दल इस प्रस्ताव के समर्थन में हैं और सरकार चाहे तो इसे तत्काल प्रभाव से लागू कर सकती है।
कांग्रेस जिलाध्यक्ष ने आरोप लगाया कि भाजपा महिला आरक्षण को एक मुखौटे की तरह इस्तेमाल कर परिसीमन से जुड़े अपने एजेंडे को आगे बढ़ाना चाहती है। उन्होंने कहा कि महिला आरक्षण को परिसीमन से जोड़ देने से इसकी प्रक्रिया अनावश्यक रूप से लंबी हो जाती है। यदि सरकार की मंशा साफ होती तो वह कानून में संशोधन कर इसे तुरंत लागू कर सकती थी।
महिला आरक्षण का मुद्दा लंबे समय से देश की राजनीति में चर्चा का विषय रहा है और इसे महिलाओं के राजनीतिक सशक्तिकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जाता है। हालांकि इसे लागू करने की प्रक्रिया और उससे जुड़े राजनीतिक विवाद लगातार इस विषय को राजनीतिक मंचों पर चर्चा का केंद्र बनाए हुए हैं। जनता की अपेक्षा है कि इस मुद्दे पर राजनीतिक दल आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर उठकर ठोस निर्णय लें ताकि महिलाओं को जल्द से जल्द इसका लाभ मिल सके।
फिलहाल महिला आरक्षण को लेकर कांग्रेस और भाजपा के बीच जारी यह राजनीतिक बहस इस बात का संकेत है कि यह मुद्दा केवल कानून तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे व्यापक राजनीतिक और प्रशासनिक पहलू भी जुड़े हुए हैं। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि महिला आरक्षण का वास्तविक लाभ देश की महिलाओं तक कब पहुंचेगा।

प्रदीप मिश्रा
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