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सच की तह तक

आज़ादी, योजनाएँ और बढ़ता भार – क्या आत्मनिर्भर हो पाया नागरिक?

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संपादकीय

अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ साप्ताहिक विशेषांक

✍️ ‘कलम की धार’ ✍️

By ACGN 7647981711, 9303948009

जनहित, तथ्य और साहस का साप्ताहिक मंच-जहाँ सच कहा जाता है, सवाल पूछे जाते हैं, और कीमत जानकर भी कलम नहीं रुकती।

कभी यह देश सोने की चिड़िया कहलाता था। फिर अंग्रेजों की गुलामी आई। आज़ादी मिली तो उम्मीद जगी कि अब हर घर समृद्ध होगा। योजनाएं बनीं, विकास के दावे हुए, डिजिटल दौर आया, टैक्स की व्यवस्था बदली, सुविधाएं बढ़ीं। लेकिन इन सबके बीच आम आदमी कहाँ खड़ा है?

क्या वह सच में आत्मनिर्भर हो रहा है, या योजनाओं और टैक्स के बीच उलझता जा रहा है?

क्या विकास का लाभ सीधे उसके हाथ में पहुंच रहा है, या बीच के रास्तों में कहीं कम हो जा रहा है?

क्या रोजगार पर उतनी ही चर्चा है जितनी अन्य मुद्दों पर?

इन्हीं सवालों को सरल, सहज और साफ शब्दों में समझने का यह प्रयास है ताकि हर पाठक पढ़ते हुए अपने जीवन की झलक देख सके और सोच सके कि हम किस दिशा में बढ़ रहे हैं। यह आम आदमी की थकान, आक्रोश और अधूरी उम्मीदों को शब्द देता है,
ताकि शासन पढ़े, प्रशासन देखे और व्यवस्था अपने ही आईने से नज़र न चुराए।

आज का विषय – सोने की चिड़िया से आज के भारत तक की यात्रा, गुलामी, योजनाएं, टैक्स व्यवस्था और आत्मनिर्भरता के सपने के बीच आम नागरिक की वास्तविक स्थिति।

आलेख – प्रदीप मिश्रा 

कभी हमारे देश को सोने की चिड़िया कहा जाता था। यह सिर्फ कहावत नहीं थी, यह उस समय की सच्चाई थी। भारत की मिट्टी उपजाऊ थी, हाथों में हुनर था, व्यापार दूर-दूर तक फैला था। गांव आत्मनिर्भर थे। किसान अनाज उगाता था, कारीगर औजार बनाता था, बुनकर कपड़ा बुनता था, व्यापारी सामान लेकर दूसरे देशों तक जाता था। जीवन सरल था, पर सम्मान से भरा था। लोग मेहनत करते थे और उसका फल उनके ही घर में दिखाई देता था।
फिर समय बदला। बाहर से व्यापारी आए। व्यापार के बहाने धीरे-धीरे शासन अपने हाथ में ले लिया। ईस्ट इंडिया कंपनी आई और देखते-देखते देश की बागडोर अंग्रेजों के हाथ में चली गई। लगान बढ़ा, कर बढ़े, उद्योग टूटे, कारीगर बेरोजगार हुए। संसाधन लूटे गए, उद्योग तोड़े गए, कर बढ़ाए गए। किसान पर लगान, नमक पर कर, हर सांस पर नियंत्रण। फिर आया ब्रिटिश शासन, और भारत गुलाम हो गया। मेहनत यहां होती थी, चिड़िया के पंख काट दिए गए।भारत की संपत्ति बाहर जाने लगी। मेहनत यहां की, फायदा बाहर का। सोने की चिड़िया के पंख धीरे-धीरे कमजोर होते गए।
जब 1947 में आज़ादी मिली तो उम्मीद जगी कि अब सब बदलेगा। देश अपने पैरों पर खड़ा होगा। देश आजाद हुआ सरकारें बनीं, योजनाएं बनीं, बड़े-बड़े बांध बने, कारखाने लगे, सड़कें बनीं। यह सब जरूरी भी था। देश को आगे बढ़ना था। जनता ने भरोसा किया, टैक्स दिया, और विकास की राह पर चल पड़ी।

योजनाओं का दौर। : लेकिन समय के साथ एक नई तस्वीर उभरने लगी।  विकास के साथ योजनाओं की भरमार होने लगी। हर समस्या के समाधान में एक नई योजना। हर चुनाव में नए वादे। हर साल नई घोषणाएं।हर समस्या का समाधान एक नई योजना में खोजा जाने लगा। गरीबों के लिए योजना, किसानों के लिए योजना, युवाओं के लिए योजना, महिलाओं के लिए योजना। कागज पर सब सुंदर दिखता है। नाम आकर्षक होते हैं। उद्घाटन भव्य होता है। मंच सजता है, नेता आते हैं, बटन दबता है, ताली बजती है, फोटो खिंचती है। करोड़ों का आयोजन, लाखों की सजावट, लंबा काफिला, पेट्रोल-डीजल का खर्च, सुरक्षा का घेरा। सवाल यह नहीं कि विकास क्यों हो रहा है,

सवाल यह है कि विकास का प्रदर्शन इतना महंगा क्यों है?

योजनाएं बड़ी, दलाल बड़े, पर आम आदमी वहीं का वहीं- आम आदमी टीवी पर देखता है और सोचता है अब शायद मेरी जिंदगी बदलेगी। पर जब वह जमीन पर जाता है, तो कहानी थोड़ी अलग दिखती है। योजना कागज से निकलती है, बजट स्वीकृत होता है, पैसा जारी होता है। इस बीच किसी योजना का लाभ लेने के लिए फॉर्म भरना होता है। दस्तावेज जमा करने होते हैं। दफ्तर के चक्कर लगाने पड़ते हैं। कभी फाइल आगे नहीं बढ़ती, कभी कोई कागज अधूरा बता दिया जाता है। यहीं से बीच में एक नया चेहरा दिखाई देता है  “मदद करने वाला”। लेकिन जब वह लाभार्थी तक पहुंचता है, तो बीच में कई हाथ लग चुके होते हैं। फॉर्म भरने से लेकर मंजूरी तक, हर मोड़ पर कोई “मददगार” खड़ा मिल जाता है। दलालों की परतें योजना को पतला कर देती हैं। योजनाएं बड़ी, दलाल बड़े, पर आम आदमी वहीं का वहीं। वह कहता है, “चिंता मत करो, काम हो जाएगा।” बदले में कुछ लेता है। योजना का पैसा कागज पर जितना होता है, हाथ में उतना नहीं आता।

आम आदमी सोचता है  सरकार ने तो मदद भेजी होगी, फिर मेरे हिस्से में कम क्यों आया?

योजनाएं जरूरी हैं, इसमें कोई शक नहीं। समाज के कमजोर वर्ग को सहारा मिलना चाहिए। पर अगर सहारा स्थायी समाधान न बन पाए, तो समस्या बनी रहती है। अगर किसी युवा को हर महीने थोड़ी सहायता मिले, पर रोजगार न मिले, तो वह हर महीने उसी सहायता का इंतजार करेगा। लेकिन अगर उसे काम मिल जाए, हुनर मिल जाए, बाजार मिल जाए, तो वह अपने पैरों पर खड़ा हो जाएगा।

डिजिटल भारत : इन सबके बीच आज हमारा देश डिजिटल हो रहा है। मोबाइल से बैंकिंग, ऑनलाइन आवेदन, डिजिटल पहचान ये सब सुविधाएं हैं। पर गांव का वह बुजुर्ग जो स्मार्टफोन ठीक से नहीं चला पाता, उसके लिए यह सुविधा भी एक नई चुनौती बन जाती है। उसे फिर किसी की मदद लेनी पड़ती है। और मदद के साथ कभी-कभी खर्च भी जुड़ जाता है।

टैक्स जरूरी है अब बात करते हैं टैक्स की देश को चलाने के लिए, सेना के लिए, सड़क के लिए, शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए टैक्स चाहिए। पर अगर टैक्स देने वाला ही परेशान हो जाए, बचत न कर पाए, अपने बच्चों का भविष्य सुरक्षित न कर पाए, तो विकास का स्वाद उसके लिए फीका हो जाता है। टैक्स किसी भी देश की रीढ़ होता है। सरकार सड़क बनाती है, अस्पताल चलाती है, सेना रखती है, स्कूल खोलती है यह सब टैक्स से चलता है। इसलिए टैक्स देना गलत नहीं है। यह नागरिक का कर्तव्य है।
लेकिन आम आदमी की नजर से देखिए। महीने की शुरुआत में तनख्वाह आती है। पहले ही आयकर कट जाता है। फिर बिजली बिल, पानी बिल, मोबाइल बिल, हर बिल में टैक्स जुड़ा होता है। बाजार से सामान खरीदो, जीएसटी जुड़ा है। पेट्रोल भरो, उसमें भी बड़ा हिस्सा टैक्स का है। वाहन खरीदो तो रोड टैक्स, रजिस्ट्रेशन शुल्क, बीमा। सड़क पर चलो तो टोल टैक्स। घर बनाओ तो हर ईंट, हर सीमेंट पर टैक्स। इलाज कराओ तो दवा पर टैक्स।
आम आदमी सोचता है मैं देश के लिए दे रहा हूं। लेकिन जब उसे सरकारी अस्पताल में लंबी लाइन मिलती है, स्कूल में शिक्षक की कमी दिखती है, नौकरी के लिए वर्षों इंतजार करना पड़ता है, तब उसके मन में सवाल उठता है 

क्या मेरे दिए टैक्स का सही उपयोग हो रहा है?
यह सवाल गलत नहीं है। यह एक जागरूक नागरिक का सवाल है।

आज की राजनीति: राजनीति जनसेवा कही जाती है। नेता चुनाव के समय सादगी दिखाते हैं। अपनी संपत्ति का विवरण देते हैं। शपथपत्र में सीमित संपत्ति लिखी जाती है। पांच साल बाद तस्वीर बदल जाती है। बड़े घर, नई गाड़ियां, जमीनें, बढ़ती संपत्ति। जनता भरोसा करती है और उन्हें चुनती है। पांच साल बाद जब उनकी संपत्ति बढ़ी हुई दिखाई देती है,

जनता पूछती है यह बढ़ोतरी कैसे हुई? क्या पद छोड़ते ही संपत्ति की पारदर्शी जांच नहीं होनी चाहिए? अगर राजनीति सेवा है तो सेवा में सादगी और जवाबदेही क्यों नहीं?

जनता के मन में प्रश्न उठता है। यह स्वाभाविक है। अगर कोई भी जनप्रतिनिधि पारदर्शिता से काम करे, समय-समय पर अपनी आय और संपत्ति का स्पष्ट हिसाब दे, तो भरोसा और मजबूत होगा।

इस बीच समाज में बहसें भी बदल गई हैं। जाति पर चर्चा, धर्म पर बहस, आरोप-प्रत्यारोप, सोशल मीडिया की लड़ाइयां। लेकिन रोजगार पर राष्ट्रीय बहस कम ही दिखती है। जबकि सच्चाई यह है कि अगर युवा के पास काम होगा, तो वह विवाद में नहीं, विकास में लगेगा। खाली जेब और खाली समय मिलकर समाज को अस्थिर करते हैं।
आज समाज में बहसें बहुत हैं। टीवी चैनलों पर रोज नई बहस। इस बीच समाज में बहसें भी बदल गई हैं। जाति पर चर्चा, धर्म पर बहस, आरोप-प्रत्यारोप, सोशल मीडिया की लड़ाइयां। सोशल मीडिया पर तीखी चर्चाएं। लेकिन रोजगार पर राष्ट्रीय बहस कम ही दिखती है। खाली जेब और खाली समय मिलकर समाज को अस्थिर करते हैं। पर रोजगार की चर्चा उतनी जोर से नहीं होती जितनी होनी चाहिए। जबकि सच्चाई यह है कि अगर युवा के पास काम होगा, तो वह विवाद में नहीं, विकास में लगेगा। सम्मानजनक काम होगा, तो उसका ध्यान अपने परिवार, अपने भविष्य और अपने सपनों पर रहेगा। खाली समय और खाली जेब मिलकर निराशा पैदा करते हैं।आत्मनिर्भर भारत का सपना तभी साकार होगा जब योजनाएं लोगों को सहारा देकर खड़ा करें, बैठा न रखें। मुफ्त सुविधा जरूरतमंद को राहत देती है, पर स्थायी समाधान रोजगार देता है। अगर हर जिले में स्थानीय उद्योग बढ़ें, कृषि से जुड़े प्रोसेसिंग केंद्र खुलें, युवाओं को कौशल के साथ बाजार मिले, तो वे नौकरी खोजने वाले नहीं, नौकरी देने वाले बनेंगे।

देश में संसाधनों की कमी नहीं है। छत्तीसगढ़ जैसे छोटे राज्य प्राकृतिक संपदा से भरपूर हैं। छत्तीसगढ़  जिसे कभी धान का कटोरा कहा गया, संसाधनों से भरी है। पर अगर वहां का युवा सिर्फ सरकारी नौकरी की तैयारी में उम्र गुजार दे, तो यह संसाधनों का सही उपयोग नहीं है।  छत्तीसगढ़ में खेती, खनिज, वन सब कुछ है। जरूरत है सही दिशा देने की। अगर स्थानीय स्तर पर उद्योग बढ़ें, छोटे व्यवसाय को बढ़ावा मिले, युवाओं को प्रशिक्षण के साथ बाजार भी मिले, तो वे बाहर भटकने के बजाय अपने ही क्षेत्र में काम कर सकेंगे। योजनाएं तभी सफल मानी जाएंगी जब वे आत्मसम्मान और आत्मनिर्भरता बढ़ाएं।
आत्मनिर्भर भारत का सपना तभी पूरा होगा जब नागरिक आत्मनिर्भर होगा। मुफ्त सुविधा राहत दे सकती है, पर स्थायी समाधान नहीं। अगर योजनाओं का लक्ष्य सिर्फ लाभ देना नहीं, बल्कि लोगों को खड़ा करना हो, तो परिणाम बदल सकते हैं।
समाधान कठिन नहीं हैं, बस ईमानदारी और इच्छाशक्ति चाहिए।
पहला समाधान है पारदर्शिता। हर योजना का स्पष्ट हिसाब जनता के सामने हो। कितना बजट आया, कहां खर्च हुआ, कितने लोगों को लाभ मिला। जब जानकारी खुली होगी, तो बीच के रास्ते खुद कम हो जाएंगे।

दूसरा समाधान है रोजगार पर फोकस। हर योजना के साथ रोजगार सृजन की शर्त जुड़ी हो। अगर किसी क्षेत्र में विकास हो रहा है, तो वहां स्थानीय लोगों को काम मिले।

तीसरा समाधान है सादगी। सरकारी कार्यक्रम जरूरी हों, पर अनावश्यक दिखावे से बचा जाए। जितना पैसा सजावट पर खर्च होता है, उतना किसी स्कूल या अस्पताल पर भी लग सकता है।

चौथा समाधान है शिक्षा और कौशल। स्कूल और कॉलेज में ऐसी शिक्षा दी जाए जो बाजार से जुड़ी हो। युवा डिग्री के साथ हुनर भी लेकर निकले।

पांचवां समाधान है जवाबदेही। जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों की जिम्मेदारी तय हो। पद छोड़ने के बाद भी उनके कार्यकाल का मूल्यांकन हो।

छठा समाधान है नागरिक जागरूकता। जब तक नागरिक सवाल नहीं पूछेगा, सुधार अधूरा रहेगा। सवाल करना विरोध नहीं, लोकतंत्र की ताकत है।

देश बदल रहा है, यह सच है। सड़कें बनी हैं, तकनीक आई है, सुविधाएं बढ़ी हैं। लेकिन साथ ही यह भी सच है कि आम आदमी अभी भी संघर्ष कर रहा है। वह टैक्स देता है, मेहनत करता है, सपने देखता है। उसे जरूरत है भरोसे की  कि उसकी मेहनत बेकार नहीं जा रही।

सोने की चिड़िया की कहानी हमें यह याद दिलाती है कि असली ताकत जनता में होती है। अंग्रेजों की गुलामी ने सिखाया कि आर्थिक कमजोरी हमें कमजोर बना देती है। आज अगर हम सच में मजबूत बनना चाहते हैं, तो नागरिक को मजबूत करना होगा।

जब हर व्यक्ति को सम्मानजनक काम मिलेगा, जब योजनाएं सीधे उसके हाथ तक पहुंचेंगी, जब टैक्स का उपयोग स्पष्ट दिखेगा, जब राजनीति सेवा का रूप लेगी,  तब देश सच में आत्मनिर्भर कहलाएगा।

यह लेख किसी व्यक्ति, संस्था या दल की बुराई करने के लिए नहीं है। यह सिर्फ एक सच्चाई का आईना दिखाने का प्रयास है। समाज में जो दिख रहा है, जो आम आदमी महसूस कर रहा है, उसी को सरल शब्दों में रखने की कोशिश है। उद्देश्य किसी पर आरोप लगाना नहीं, बल्कि विचार करना है  कि हम सब मिलकर व्यवस्था को और बेहतर कैसे बना सकते हैं।

क्योंकि देश हमारा है, जिम्मेदारी भी हमारी है।
और अगर हम सच को समझकर आगे बढ़ेंगे,
तो सोने की चिड़िया सिर्फ इतिहास नहीं, भविष्य भी बन सकती है।

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