लोकतंत्र का चौथा स्तंभ और बदलता परिदृश्य: भरोसे की कसौटी पर पत्रकारिता
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जांजगीर-चांपा/, छत्तीसगढ़
By ACGN 7647981711, 9303948009
सरपंच संघ बहनाडीह के ज्ञापन के बाद उठे सवाल, जवाबदेही, पहचान और सुरक्षा पर व्यापक चर्चा
जांजगीर चांपा ACGN:- लोकतंत्र में पत्रकारिता को चौथा स्तंभ इसलिए कहा जाता है क्योंकि वही शासन और जनता के बीच सेतु का कार्य करती है। वही बताती है कि योजनाएं जमीन पर किस हाल में हैं, कौन लाभान्वित हो रहा है और किसे अभी भी इंतजार है। वही यह भी दिखाती है कि आमजन की आवाज सत्ता के गलियारों तक किस रूप में पहुंच रही है। गांवों तक सूचना पहुंचाने वाली पत्रकारिता कभी जनविश्वास की सबसे मजबूत कड़ी मानी जाती थी, जहां एक खबर पूरे क्षेत्र की सोच और दिशा तय कर देती थी।

बदलते समय में तकनीक की सहज उपलब्धता और सोशल मीडिया के तीव्र विस्तार ने अभिव्यक्ति को व्यापक बनाया है। यह लोकतंत्र की ताकत है कि अब सूचना का प्रवाह तेज हुआ है, पर इसी तेजी के बीच जवाबदेही का सवाल भी उतनी ही मजबूती से खड़ा हुआ है। हाल ही में सरपंच संघ बहनाडीह द्वारा सौंपे गए लिखित ज्ञापन ने इसी विषय को केंद्र में ला दिया है। ज्ञापन में कहा गया है कि कुछ लोग स्वयं को पत्रकार बताकर पंचायत प्रतिनिधियों से संपर्क करते हैं, खबर चलाने की बात कहकर दबाव बनाते हैं या सूचना के अधिकार के प्रावधानों का आक्रामक उपयोग कर भय का वातावरण तैयार करते हैं। संघ की मांग है कि ऐसी किसी भी शिकायत की स्थिति में संबंधित व्यक्ति की पहचान, मान्यता और संस्थागत संबद्धता की निष्पक्ष जांच हो, ताकि सच्चाई सामने आ सके।

यदि इस पूरे विषय को पत्रकारिता की कसौटी पर देखा जाए तो सबसे पहले सवाल उठता है कि कौन व्यक्ति पत्रकार है और उसकी वैधानिक पहचान क्या है। क्या वह किसी पंजीकृत संस्थान से जुड़ा है, कब और किस परिस्थिति में उसने जानकारी एकत्र की, कहां से तथ्य जुटाए, क्यों वह विषय जनहित से जुड़ा है और कैसे उसकी प्रस्तुति संतुलित और प्रमाणिक है। यही बुनियादी सिद्धांत पत्रकारिता को अफवाह और दबाव की राजनीति से अलग करते हैं। जब इन मानकों का पालन होता है तो खबर समाज के लिए मार्गदर्शक बनती है, और जब इनसे समझौता होता है तो भ्रम और अविश्वास जन्म लेते हैं।
यह भी उतना ही महत्वपूर्ण पक्ष है कि वास्तविक और मैदानी स्तर पर कार्य करने वाले पत्रकार आज स्वयं को कई बार असुरक्षित महसूस करते हैं। राजनीतिक संरक्षण प्राप्त कुछ तत्वों द्वारा दबाव, धमकी या अनावश्यक हस्तक्षेप की शिकायतें समय-समय पर सामने आती रही हैं। शासन और प्रशासन के लिए यह भी जरूरी है कि वे पत्रकारों की सुरक्षा और गरिमा सुनिश्चित करें, क्योंकि भयमुक्त वातावरण में ही निष्पक्ष पत्रकारिता संभव है।
आर्थिक पक्ष भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। ग्रामीण और मैदानी क्षेत्रों में कार्य करने वाले अनेक पत्रकार सीमित संसाधनों में काम करते हैं। उन्हें नियमित वेतन, संस्थागत सुरक्षा या कानूनी सहयोग जैसी सुविधाएं अक्सर उपलब्ध नहीं होतीं। ऐसे में जब कुछ फर्जी पहचान वाले लोग या केवल चापलूसी के सहारे आगे बढ़ने वाले तत्व इस क्षेत्र में प्रवेश करते हैं, तो न केवल पेशे की साख प्रभावित होती है बल्कि ईमानदारी से काम करने वालों के सामने प्रतिस्पर्धा की असमान स्थिति भी खड़ी हो जाती है। पत्रकारिता केवल कार्यालयों के चक्कर लगाने या किसी एक पक्ष की प्रशंसा करने का माध्यम नहीं है, बल्कि तथ्य जुटाने, दोनों पक्षों को स्थान देने और समाज के हित-अहित को स्पष्ट रूप से सामने रखने की जिम्मेदारी है।
इस पूरे परिदृश्य में किसी व्यक्ति विशेष को कठघरे में खड़ा करना उद्देश्य नहीं है, बल्कि व्यवस्था को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाना समय की मांग है। यदि पहचान प्रक्रिया स्पष्ट हो, मान्यता प्रणाली मजबूत हो, शिकायतों की निष्पक्ष जांच हो और पत्रकारों की सुरक्षा व आर्थिक स्थिति पर भी ध्यान दिया जाए, तो स्थिति संतुलित हो सकती है। मीडिया संस्थानों को भी अपनी आंतरिक जवाबदेही तय करनी होगी, ताकि उनके नाम का दुरुपयोग न हो।
पत्रकारिता न तो किसी दल विशेष की चापलूसी है और न ही अनावश्यक विरोध का मंच। इसका मूल उद्देश्य है सत्य की खोज, जनहित का संरक्षण और मर्यादा के भीतर रहकर सवाल पूछने का साहस। जब यह संतुलन बना रहता है तो लोकतंत्र मजबूत होता है, और जब यह संतुलन बिगड़ता है तो खबर और अफवाह के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है।
आज जरूरत है कि चौथे स्तंभ की मजबूती के लिए शासन, प्रशासन, मीडिया संस्थान और स्वयं पत्रकार सामूहिक जिम्मेदारी निभाएं। भरोसा बना रहे, सच्चाई सामने आए और जनहित सर्वोपरि रहे, यही लोकतांत्रिक व्यवस्था की आधारशिला है।
प्रदीप मिश्रा
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