“खनिजों से चमकता छत्तीसगढ़, फिर क्यों खोती जा रही है उसकी असली पहचान?”
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संपादकीय
अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ का साप्ताहिक विशेषांक
✍️ कलम की धार ✍️
एक ऐसी कलम, जो विकास के शोर में दबती आवाजों को सामने लाती है, समाज को आईना दिखाती है और जनहित के सवालों पर सोचने को मजबूर करती है।

जंगल की संपदा लुटती रही, संस्कृति पीछे छूटती रही, कहीं खनिजों से समृद्ध छत्तीसगढ़ अपनी असली पहचान तो नहीं खो रहा?
महुआ, तेंदूपत्ता और लाख से जीवन चलाने वाले ग्रामीणों के सामने रोजगार और जमीन के सवाल; दूसरी ओर मोबाइल में उलझती नई पीढ़ी – क्या हम अपनी आने वाली पीढ़ियों के हाथों से उनकी विरासत छीन रहे हैं?
लेखक: प्रदीप मिश्रा
आज का विषय: जंगल बचेगा, तभी वनांचल की आजीविका, संस्कृति और पहचान बचेगी!
एक पल आंखें बंद करके उस छत्तीसगढ़ की कल्पना कीजिए, जहां सुबह महुआ के पेड़ों के नीचे ग्रामीणों की चहल-पहल होती थी, जंगलों से तेंदूपत्ता, लाख, चार, चिरौंजी, इमली और शहद जुटाकर परिवार अपनी आजीविका चलाते थे। गांवों में मांदर की थाप गूंजती थी, बुजुर्ग बच्चों को लोककथाएं सुनाते थे और त्योहारों में पूरा समाज एक साथ खड़ा दिखाई देता था। आज सवाल है, क्या बदलते समय के साथ यह जीवनशैली कमजोर पड़ रही है, और क्या विकास की दौड़ में हम उस विरासत को भूलते जा रहे हैं जिसने छत्तीसगढ़ को विशिष्ट पहचान दी?
छत्तीसगढ़ केवल खनिजों का भंडार नहीं, संस्कृति की जीवित धरती है
छत्तीसगढ़ की पहचान कोयले, लौह अयस्क और उद्योगों तक सीमित नहीं है। इसकी पहचान जंगलों, नदियों, पहाड़ों, लोककलाओं और यहां के मेहनतकश ग्रामीणों से भी है। गोंड, माड़िया, मुरिया, अबूझमाड़िया, बैगा, उरांव, कंवर, भतरा, हल्बा, कमार, बिरहोर, पहाड़ी कोरवा, पंडो, भुंजिया और अनेक अन्य जनजातीय समुदायों की अपनी परंपराएं और सांस्कृतिक विशेषताएं हैं। इन समुदायों की भाषाओं और बोलियों में भी विविधता है। गोंडी, हल्बी, कुड़ुख, भतरी और अन्य स्थानीय भाषाएं-बोलियां पीढ़ियों का ज्ञान और जीवन का अनुभव अपने भीतर समेटे हुए हैं। हर समुदाय की परंपरा एक जैसी नहीं है; यही विविधता छत्तीसगढ़ की असली ताकत है। यदि इन भाषाओं में बसने वाली कहानियां और ज्ञान अगली पीढ़ी तक नहीं पहुंचे, तो इस विरासत को कौन संभालेगा?
वन उपज केवल जंगल की पैदावार नहीं, ग्रामीण परिवारों की आर्थिक ताकत है
महुआ, तेंदूपत्ता, लाख, चार-चिरौंजी, इमली, साल बीज, हर्रा, बहेड़ा, गोंद, शहद और बांस जैसी वन उपज अनेक ग्रामीण परिवारों की आजीविका का आधार बन सकती है। उचित मूल्य, भंडारण, प्रसंस्करण और बाजार की सुविधा मिले तो गांवों में रोजगार के नए अवसर पैदा हो सकते हैं। लेकिन यदि ग्रामीणों को अपनी मेहनत का उचित मूल्य न मिले, बाजार दूर हो और उन्हें केवल कच्चा माल बेचने तक सीमित रहना पड़े, तो जंगल की संपदा से मिलने वाला लाभ सीमित रह जाता है। जब वन उपज से ग्रामीणों की आर्थिक स्थिति मजबूत हो सकती है, तो गांवों में ही संग्रहण केंद्र, प्रसंस्करण इकाइयां और उचित मूल्य की व्यवस्था क्यों न विकसित की जाए?
खनिज निकल रहे हैं, लेकिन स्थानीय युवाओं के हिस्से में क्या आ रहा है?
छत्तीसगढ़ देश की ऊर्जा और औद्योगिक जरूरतों में महत्वपूर्ण योगदान देता है। खनन और उद्योग रोजगार तथा कारोबार के अवसर भी पैदा कर सकते हैं, लेकिन यह देखना जरूरी है कि प्रभावित गांवों के युवाओं को कितने अवसर मिल रहे हैं। यदि स्थानीय परिवारों की जमीन और आजीविका प्रभावित हो, लेकिन युवाओं को पर्याप्त प्रशिक्षण, स्थायी रोजगार और बेहतर भविष्य के अवसर न मिलें, तो विकास का लाभ अधूरा महसूस हो सकता है। जिस धरती से संपदा निकलती है, वहां के युवाओं को भी उस समृद्धि में सम्मानजनक हिस्सेदारी कैसे मिलेगी?
जमीन के सौदे, नई बसाहट और ग्रामीणों के अधिकार – जवाब कौन देगा?
सड़कें, खदानें और उद्योग आने के साथ अलग-अलग क्षेत्रों से लोग बसने और कारोबार करने पहुंचते हैं। यह अपने आप में गलत नहीं है। लेकिन जहां जमीन की खरीद-बिक्री तेजी से बढ़े, वहां स्थानीय लोगों के अधिकारों और कानूनी सुरक्षा का ध्यान रखना जरूरी है। यदि कहीं कम कीमत पर जमीन खरीदने, ग्रामीणों पर दबाव बनाने, शराब या अन्य प्रलोभनों के जरिए सौदे प्रभावित करने अथवा नियमों के विरुद्ध निर्माण की शिकायतें आती हैं, तो उनकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। किसी व्यक्ति को केवल बाहरी होने के कारण दोषी ठहराना उचित नहीं, लेकिन स्थानीय ग्रामीणों के अधिकारों का उल्लंघन भी अनदेखा नहीं किया जा सकता। क्या प्रशासन समय रहते भूमि संबंधी शिकायतों की जांच कर यह सुनिश्चित करेगा कि कोई ग्रामीण जानकारी की कमी या मजबूरी में अपना भविष्य न गंवा बैठे?
नवदुर्गा की आराधना भी, अपनी परंपराओं का सम्मान भी – यही है सांस्कृतिक विविधता
छत्तीसगढ़ के अनेक आदिवासी परिवार और समुदाय नवरात्रि, नवदुर्गा तथा अन्य पर्व भी मनाते हैं। साथ ही, उनकी अपनी स्थानीय आस्थाएं, देवी-देवताओं की परंपराएं, प्रकृति से जुड़े अनुष्ठान और सामुदायिक उत्सव भी हैं। इन परंपराओं को एक ही रूप में देखना सही नहीं होगा, क्योंकि अलग-अलग क्षेत्रों और समुदायों की मान्यताएं अलग हो सकती हैं। इस विविधता का सबसे अनोखा उदाहरण है बस्तर का दशहरा। यहां दशहरा लगभग 75 दिनों तक चलने वाली विशिष्ट परंपरा है, जिसमें मां दंतेश्वरी, स्थानीय देवी-देवताओं, रथ परंपरा और सामुदायिक सहभागिता का विशेष महत्व है। यहां सामान्य दशहरे की तरह रावण का पुतला जलाना मुख्य परंपरा नहीं है। यह पर्व बताता है कि त्योहार केवल उत्सव नहीं, बल्कि इतिहास, आस्था और सामूहिक पहचान के जीवित दस्तावेज होते हैं। यदि हम बस्तर दशहरे जैसी परंपराओं को समझे बिना केवल आधुनिकता की चमक देखते रहेंगे, तो अपनी संस्कृति की गहराई को कैसे पहचानेंगे?
हरेली, छेरछेरा, करमा और स्थानीय पर्व – क्या नई पीढ़ी इनके अर्थ जानती है?
छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक दुनिया में हरेली, छेरछेरा, करमा, सरहुल और अनेक स्थानीय पर्वों का महत्व है। इनका स्वरूप और महत्व अलग-अलग समुदायों तथा क्षेत्रों में भिन्न हो सकता है। कहीं खेती और प्रकृति से जुड़ी परंपराएं हैं, कहीं सामुदायिक एकता और लोकनृत्य का महत्व है, तो कहीं स्थानीय देवी-देवताओं के प्रति श्रद्धा जीवन का केंद्र है। समस्या यह नहीं कि नई पीढ़ी नए त्योहार मनाती है या आधुनिक जीवन अपनाती है। चिंता तब होती है जब बच्चे अपने ही गांव के त्योहारों, गीतों और परंपराओं के बारे में जानने से वंचित रह जाएं। यदि घर के बच्चों को अपनी संस्कृति का अर्थ ही नहीं बताया जाएगा, तो वे उसे आगे कैसे बढ़ाएंगे?
मोबाइल हाथ में है, लेकिन क्या अपनी भाषा और पहचान दिल में बची है?
मोबाइल और सोशल मीडिया ने शिक्षा, जानकारी और रोजगार के नए रास्ते खोले हैं। इनसे दूर रहना समाधान नहीं है। लेकिन यदि स्क्रीन पर घंटों समय बीतने लगे और परिवार, बुजुर्गों, स्थानीय भाषा, लोकगीतों तथा गांव की परंपराओं से संवाद कम हो जाए, तो पीढ़ियों के बीच दूरी बढ़ सकती है। यही तकनीक अपनी संस्कृति बचाने का माध्यम भी बन सकती है। युवा गोंडी, हल्बी, कुड़ुख और स्थानीय बोलियों में गीत रिकॉर्ड कर सकते हैं, बुजुर्गों की कहानियां सुरक्षित कर सकते हैं और लोककलाओं को दुनिया तक पहुंचा सकते हैं। जिस मोबाइल से दुनिया देखी जा सकती है, उसी से अपनी संस्कृति की कहानी अगली पीढ़ी तक क्यों नहीं पहुंचाई जा सकती?
जब बुजुर्गों की कहानियां खामोश होंगी, तो ज्ञान कौन सिखाएगा?
जंगल के पेड़ों की पहचान, मौसम के संकेत, वन उपज जुटाने के पारंपरिक तरीके, लोकगीत और समुदाय का इतिहास – इनमें से बहुत-सा ज्ञान बुजुर्गों के अनुभवों में जीवित है। यदि यह ज्ञान बच्चों तक नहीं पहुंचा, तो उसका बड़ा हिस्सा धीरे-धीरे खो सकता है। गांवों में बुजुर्गों और युवाओं के संवाद कार्यक्रम हों, स्थानीय भाषा में कहानियां लिखी और रिकॉर्ड की जाएं, लोककलाकारों को अवसर मिले तथा स्कूलों में क्षेत्रीय संस्कृति को उचित स्थान दिया जाए। यदि आज हम अपने बुजुर्गों से उनकी विरासत नहीं सीखेंगे, तो कल अपनी ही पहचान खोजने कहां जाएंगे?
जंगल उजड़ेगा तो वन्यजीवों के साथ ग्रामीण भी संकट में आएंगे
जंगल केवल पेड़ नहीं, वन्यजीवों का घर और अनेक ग्रामीण परिवारों की आजीविका का आधार है। खनन, सड़क, रेल लाइन और भूमि उपयोग में बदलाव से कुछ क्षेत्रों में प्राकृतिक आवास और वन्यजीवों के रास्तों पर दबाव पड़ सकता है। छत्तीसगढ़ में हाथी-मानव संघर्ष भी गंभीर चिंता का विषय है। जरूरत है कि विकास परियोजनाओं में पर्यावरणीय प्रभाव का वैज्ञानिक आकलन हो, हाथियों के गलियारों की सुरक्षा की जाए और प्रभावित ग्रामीणों को समय पर चेतावनी तथा उचित सहायता मिले। यदि जंगल और गांव दोनों संकट में हैं, तो क्या विकास की योजना ऐसी नहीं होनी चाहिए जो दोनों के भविष्य को सुरक्षित रखे?
समाधान क्या है – केवल चिंता नहीं, ठोस कदम जरूरी हैं
वन उपज का उचित मूल्य: महुआ, तेंदूपत्ता, लाख, चार, इमली और अन्य उत्पादों के संग्रहण, प्रसंस्करण और विपणन की व्यवस्था गांवों के पास हो। स्थानीय रोजगार: युवाओं को कौशल प्रशिक्षण, अप्रेंटिसशिप और पारदर्शी भर्ती के अवसर मिलें।
जमीन के अधिकार: भूमि सौदों और निर्माण संबंधी शिकायतों की जांच हो तथा लागू कानूनों का पालन सुनिश्चित किया जाए।
भाषा और संस्कृति: स्थानीय भाषाओं, लोकगीतों, त्योहारों और पारंपरिक ज्ञान को स्कूलों तथा सामुदायिक कार्यक्रमों में स्थान मिले।
डिजिटल संरक्षण: युवा सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी कला, भाषा और परंपराओं को सुरक्षित कर आगे बढ़ाएं।
प्रकृति की सुरक्षा: जंगलों, जल स्रोतों और वन्यजीव गलियारों का संरक्षण हो तथा प्रभावित परिवारों की आजीविका पर ध्यान दिया जाए।
इन प्रयासों से आधुनिकता और परंपरा को एक-दूसरे का विरोधी बनाए बिना दोनों को साथ आगे बढ़ाया जा सकता है। क्या छत्तीसगढ़ ऐसा रास्ता नहीं अपना सकता जिसमें खनिज संपदा से विकास हो, वनांचल में रोजगार बढ़े और स्थानीय संस्कृति भी जीवित रहे?
खनिजों की चमक से बड़ा सवाल – हम अपनी आने वाली पीढ़ी को क्या सौंप रहे हैं?
छत्तीसगढ़ को उद्योग चाहिए, रोजगार चाहिए, शिक्षा और तकनीक चाहिए। लेकिन इसके साथ जंगल, वन उपज, स्थानीय भाषाएं, लोकगीत, बस्तर दशहरा जैसी परंपराएं और ग्रामीणों के अधिकार भी सुरक्षित रहने चाहिए। आदिवासी समाज को आधुनिकता से दूर रखने की नहीं, बल्कि आधुनिक अवसरों में बराबर भागीदारी देने की जरूरत है। नई पीढ़ी मोबाइल चलाए, अच्छी शिक्षा पाए और दुनिया में आगे बढ़े, लेकिन अपनी मातृभाषा, इतिहास और संस्कृति पर भी गर्व करे।
यदि कल महुआ के पेड़ तो रह जाएं, लेकिन उनसे जुड़ी आजीविका कमजोर पड़ जाए; त्योहार तो मनाए जाएं, लेकिन उनका अर्थ कोई न जाने; और बच्चे दुनिया से जुड़ें, लेकिन अपने गांव की कहानी भूल जाएं – तो क्या हम इसे सच्ची प्रगति कह पाएंगे?
जंगल काटने वाले भी पौधे लगा रहे हैं लेकिन क्या हरियाली सचमुच लौट रही है?
वनांचलों में साल, सरई, महुआ, बीजा, हर्रा, बहेड़ा, आंवला, चार, इमली, पीपल और बरगद जैसे मूल्यवान वृक्ष काटे जा रहे हैं। इनकी जगह वृक्षारोपण के दावे होते हैं, लेकिन सवाल है – क्या प्राकृतिक जंगलों की भरपाई केवल पौधे गिनाने से हो जाएगी?
पिछले कुछ वर्षों से ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान खूब चला। पौधे लगे, तस्वीरें खिंचीं, प्रचार हुआ और आंकड़े बने। लेकिन पौधा लगाने के बाद उसे पानी कौन दे रहा है? उसकी रखवाली कौन कर रहा है? कहीं ऐसा तो नहीं कि तस्वीरों में हरियाली दिखाने वाले पौधे कुछ महीनों बाद जमीन पर सूखकर दम तोड़ रहे हों? पौधा लगाना पुण्य है, लेकिन उसे मरने के लिए छोड़ देना किस जिम्मेदारी का नाम है? पौधों की मृत्यु दर के प्रमाणित आंकड़े सामने आएं और उनकी देखभाल के लिए जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही भी तय हो।
दूसरी ओर, खदानों और उद्योगों से निकलने वाली राखड़ जमीन में डाली जा रही है। क्या उसकी गुणवत्ता, मिट्टी की उर्वरता और भूजल पर पड़ने वाले प्रभाव की नियमित वैज्ञानिक जांच हो रही है?
शासन-प्रशासन और उद्योगों से सीधा सवाल है, प्राकृतिक जंगल काटने का हिसाब कौन देगा, लगाए गए पौधों के जीवित रहने का प्रमाण कौन देगा और राखड़ से प्रभावित जमीन की जवाबदेही कौन लेगा?
याद रखिए, जंगल काटने के बाद पौधों की गिनती दिखाना पर्यावरण संरक्षण नहीं है। असली परीक्षा तब है, जब वर्षों बाद उसी जगह पेड़ खड़े हों, पक्षियों की आवाजें गूंजें और ग्रामीणों की आजीविका फिर से फलने-फूलने लगे।
विकास का अर्थ केवल धरती के नीचे छिपी संपदा निकालना नहीं है। विकास वह भी है जिसमें धरती पर रहने वाला ग्रामीण सम्मान से जी सके, उसकी मेहनत का उचित मूल्य मिले, उसके बच्चों को अवसर मिलें और उसकी संस्कृति अगली पीढ़ी तक पहुंचे।
जंगल बचेगा तो आजीविका बचेगी। भाषा बचेगी तो पहचान बचेगी। संस्कृति बचेगी तो इतिहास जीवित रहेगा। और स्थानीय लोग मजबूत होंगे, तभी छत्तीसगढ़ की समृद्धि वास्तव में सबकी समृद्धि बनेगी।
अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ की जनजागरूकता अपील
आइए, वनांचल के ग्रामीणों की आजीविका, जमीन और वन अधिकारों, स्थानीय रोजगार, प्रकृति संरक्षण तथा आदिवासी संस्कृति के संरक्षण को जनचर्चा का विषय बनाएं। अपनी भाषा बोलें, बुजुर्गों से सीखें, लोकगीत और परंपराएं सुरक्षित करें तथा नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़े रखें।
जहां जमीन या पर्यावरण संबंधी अनियमितता की शिकायत हो, वहां प्रमाण के आधार पर निष्पक्ष जांच की मांग करें। किसी समुदाय पर बिना प्रमाण आरोप लगाने के बजाय कानून और जनहित के साथ खड़े हों।
कलम की धार – जंगल बचेगा तो जीवन बचेगा, संस्कृति बचेगी तो पहचान बचेगी और अपनी जड़ों से जुड़ी पीढ़ी ही छत्तीसगढ़ का भविष्य संवारेगी।जनहित, जनजागरूकता और सामाजिक सरोकारों के लिए प्रतिबद्ध।
प्रदीप मिश्रा(संपादक)
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