“रायपुर छूटा, कुनकुरी पहुंच गए गजराज! विष्णु भैया, जंगल चाहिए, सिर्फ आश्वासन नहीं!”
|
😊 कृपया इस न्यूज को शेयर करें😊
|
संपादकीय
By ACGN 7647981711, 9303948009
अब हाथी भी अस्पताल पहुंचने लगे! गजराज बोले – सरकार, जंगल नहीं तो कम से कम हमारे लिए एक वार्ड ही बनवा दो!

कहते हैं, जब इंसान की परेशानी बढ़ती है तो वह अस्पताल पहुंचता है। लेकिन अब सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो देखकर लगता है कि जंगल के राजा भी अपनी फरियाद लेकर अस्पताल का रास्ता पकड़ने लगे हैं!
सोशल मीडिया के एक फेसबुक अकाउंट से प्रसारित वीडियो में दावा किया जा रहा है कि कुनकुरी के मिशन अस्पताल में एक हाथी पहुंच गया। हालांकि, अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ इस वीडियो और घटना की स्वतंत्र पुष्टि नहीं करता। वीडियो की सत्यता और घटना की वास्तविक परिस्थितियों की पुष्टि संबंधित प्रशासन से होना बाकी है।
लेकिन साहब, जरा व्यंग्य की नजर से सोचिए! अगर गजराज सचमुच अस्पताल के दरवाजे तक पहुंच गए हों, तो उनके मन में भी कोई सवाल तो उठा ही होगा!
“सरकार जी! सुना है आप विकास कर रहे हैं। सड़कें बन रही हैं, खदानें खुल रही हैं, उद्योग लग रहे हैं, जंगलों की जमीन पर नई-नई योजनाएं आ रही हैं। बहुत अच्छी बात है! लेकिन एक छोटा-सा सवाल हमारा भी है-इस विकास में हमारे रहने का इंतजाम कहां है?
पहले जंगल हमारा घर था, अब वहां इंसानी गतिविधियां बढ़ रही हैं। इधर जाएं तो बस्ती, उधर जाएं तो सड़क, कहीं खदान तो कहीं उद्योग! आखिर हम जाएं तो जाएं कहां? अब क्या अपने बच्चों का इलाज कराने के लिए अस्पताल भी नहीं आ सकते?”
और अगर गजराज अस्पताल के भीतर पहुंचकर डॉक्टर साहब से पूछ बैठें –“डॉक्टर साहब, जंगल कटने से हमें जो मानसिक तनाव हुआ है, उसकी कोई दवा है क्या?” तो बेचारे डॉक्टर भी सोच में पड़ जाएंगे कि मरीज का इलाज करें या उस व्यवस्था की बीमारी का, जिसमें जंगल और इंसान के बीच की दूरी लगातार घटती जा रही है!
सरकार जी, हाथियों के लिए भी कुछ जगह छोड़ दीजिए!
यह व्यंग्य किसी व्यक्ति या सरकार का मजाक उड़ाने के लिए नहीं, बल्कि एक गंभीर सवाल उठाने के लिए है। छत्तीसगढ़ के कई क्षेत्रों में मानव-हाथी संघर्ष चिंता का विषय रहा है। जंगलों का क्षरण, प्राकृतिक आवास में बदलाव और हाथियों के पारंपरिक आवागमन मार्गों पर दबाव इस समस्या को और जटिल बना सकते हैं।
अब जरा कल्पना कीजिए, अगर गजराज भी ज्ञापन देने लगें, तो उनकी मांगें क्या होंगी?
जंगल काटने से पहले हमारी भी राय ले लो!
खदानें खोलो, उद्योग लगाओ, लेकिन हमारे घर का हिसाब भी रखो!
सड़क बनाओ, मगर हमारे आने-जाने का रास्ता मत मिटाओ!
और हां, अस्पताल के बाहर एक बोर्ड भी लगा दो – “यहां इंसानों के साथ-साथ जंगल की समस्याओं पर भी ध्यान दिया जाता है!”
हंसी अपनी जगह है, लेकिन सवाल गंभीर है। विकास जरूरी है, रोजगार जरूरी है, उद्योग भी जरूरी हैं। मगर वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास और उनके सुरक्षित गलियारे भी उतने ही जरूरी हैं। हाथियों को बस्तियों में आने से रोकने के लिए केवल शोर मचाना पर्याप्त नहीं; उनके आवास, आवागमन मार्ग और प्रभावित ग्रामीणों की सुरक्षा के लिए प्रभावी कदम उठाने होंगे।
विष्णुदेव साय जी के गृह ग्राम कुनकुरी से जुड़े इस वायरल वीडियो की सच्चाई की पुष्टि भले ही अभी बाकी हो, लेकिन सवाल पूरे वनांचल का है, अगर जंगल ही सिकुड़ते जाएंगे, तो गजराज आखिर जाएंगे कहां?
कहीं ऐसा न हो कि कल हाथी भी सरकार से कहें, “साहब, इंसानों के लिए अस्पताल, स्कूल और मकान तो बनवा दिए; अब जंगल के बाशिंदों के लिए भी कोई ठिकाना तय कर दीजिए। आखिर यह धरती सिर्फ इंसानों की तो नहीं!”
अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ द्वारा व्यंग्य के माध्यम से जनहित के सवाल उठाने की एक कोशिश।
नोट: यह लेख सोशल मीडिया पर प्रसारित वीडियो के संदर्भ में व्यंग्यात्मक टिप्पणी है। वीडियो में दिखाई गई घटना, स्थान और परिस्थितियों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं की गई है।
|
Whatsapp बटन दबा कर इस न्यूज को शेयर जरूर करें |
Advertising Space
















































