“योजना भी हमारी, पैसा भी हमारा… फिर फायदा रास्ते में किसका?”
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संपादकीय
BY ACGN 7647981711- 9303948009
अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ का साप्ताहिक विशेषांक
✍️ कलम की धार ✍️
“मोबाइल स्मार्ट, आदमी परेशान!”
गांव की चौपाल बदल गई है। पहले लोग चारपाई पर बैठकर मौसम और खेती की बात करते थे, अब हाथ में मोबाइल लेकर पूछते हैं “भैया, ये लिंक खुल क्यों नहीं रहा?” मोबाइल स्मार्ट हो गया, इंटरनेट तेज हो गया, सरकारी काम ऑनलाइन हो गया, बस एक आदमी अभी भी वहीं खड़ा है “अब इसमें करना क्या है?”
यही है आज की कलम की धार। यह किसी सरकार, पार्टी या व्यक्ति के खिलाफ नहीं, बल्कि उस बदलती व्यवस्था का आईना है जिसमें सुविधा भी है, हंसी भी है और कहीं-कहीं ऐसी उलझन भी है कि किसान खेत समझ लेता है, लेकिन मोबाइल की स्क्रीन नहीं।
OTP आया किसान गया!
किसान मिट्टी देखकर बता देता है कि फसल को पानी चाहिए या नहीं। लेकिन मोबाइल में OTP आए तो पास बैठे बच्चे से पूछता है “बेटा, ये कहां डालना है?” बच्चा कहता है “बाबा, स्क्रीन पर।” बाबा कहते हैं“स्क्रीन तो सामने है, पर OTP कहां है?”
हंसी आती है, लेकिन इसी हंसी में डिजिटल भारत का बड़ा सवाल छिपा है, जिस आदमी के नाम पर व्यवस्था बनाई गई, क्या व्यवस्था उसकी भाषा में भी बनाई गई?
खेत मेरा रिकॉर्ड किसका?
किसान ने खेत जोता, बीज डाला, खाद डाली और धान उगा दिया। अब बिक्री के समय रिकॉर्ड में गलती निकली तो किसान परेशान। वह शायद यही कहे “साहब, धान खेत में सही है, गलती कंप्यूटर में है, फिर सजा मुझे क्यों?”
डिजिटल रिकॉर्ड सुविधा हैं, लेकिन गलती सुधारने की राह भी उतनी ही आसान होनी चाहिए। वरना किसान मिट्टी का विशेषज्ञ और पोर्टल का विद्यार्थी बनकर रह जाएगा।
जमीन उधर – बेटी इधर!
मान लीजिए एक बेटी की शादी छत्तीसगढ़ में हो गई। उसके माता-पिता ओडिशा में रहते हैं और उन्होंने अपनी जमीन बेटी के नाम कर दी। जमीन उसके नाम है, जमीन पर फसल भी होती है, दस्तावेज भी उसके नाम हैं। लेकिन उसका वर्तमान निवास छत्तीसगढ़ है।
अब वह किसान सम्मान निधि, एग्रीस्टैक, किसान पंजीयन या खेती से जुड़ी किसी योजना का लाभ लेने जाती है तो अलग-अलग जगह निवास, आधार, मोबाइल, बैंक और दूसरे विवरणों का मिलान सामने आ सकता है। उन्होंने जमीन बेटी के नाम कर दी। जमीन ओडिशा में, खेती वहां और बेटी का घर छत्तीसगढ़ में। अब किसी डिजिटल सत्यापन में निवास और जमीन का सवाल सामने आया तो बेटी सोचे, “मैं आखिर किस राज्य की स्क्रीन में फिट होऊं?” कागज पर अधिकार साफ हो सकता है, लेकिन व्यवस्था का काम यही है कि ऐसी वास्तविक परिस्थितियों को समझे, न कि नागरिक को ही व्यवस्था की पहेली बुझाने भेज दे।जमीन वहां – बेटी यहां – फिर किसान कौन?
तब वह शायद यही पूछे “जमीन मेरी, कागज मेरे, फसल मेरी फिर मेरा किसान होना किस बॉक्स में साबित करूं?”
यहीं व्यवस्था को थोड़ा रुककर सोचना चाहिए।
आधार या वोटर आईडी व्यक्ति की पहचान से जुड़े महत्वपूर्ण दस्तावेज हैं, लेकिन क्या हर कृषि अधिकार को समझने के लिए व्यक्ति की पहचान के साथ-साथ उसकी भूमि, स्वामित्व और वास्तविक खेती को भी उतनी ही सहजता से देखा जा सकता है?
अगर जमीन का वैध दस्तावेज उसके नाम है और उस जमीन पर खेती भी हो रही है, तो अलग राज्य में विह या निवास बदल जाने से ऐसी महिला के लिए व्यवस्था इतनी जटिल क्यों हो कि वह हर दरवाजे पर यही समझाती फिरे कि “मैं यहां रहती हूं, लेकिन मेरी जमीन वहां है।”
देश एक है, नागरिक एक है, लेकिन सरकारी पोर्टल पर कभी-कभी ऐसा लगता है जैसे शादी के साथ महिला का पता ही नहीं, उसकी खेती भी राज्य की सीमा पार कर गई हो!
नाम अलग-अलग राज्यों में अलग व्यवस्था में दर्ज हो सकता है, लेकिन किसान की मेहनत तो राज्य की सीमा देखकर फसल नहीं उगाती।
पिता का मोबाइल पुराना – बच्चे को नया चाहिए!
पिता टूटा हुआ मोबाइल लेकर सरकारी मैसेज पढ़ रहे हैं और बच्चा कह रहा है “पापा, नया फोन चाहिए।” “क्यों?” “सबके पास है!” बस, यहीं से खेती का बजट और मोबाइल का बजट आमने-सामने आ जाते हैं।
मोबाइल सुविधा है, जरूरत है, लेकिन अगर बच्चे की दुनिया स्क्रीन में और माता-पिता की चिंता EMI में बदल जाए तो सवाल मोबाइल का नहीं, मोबाइल के मालिक कौन है, बच्चा या मोबाइल?
लिंक आया – पैसा गया!
मोबाइल में बैंक भी है और ठग का रास्ता भी। “KYC बंद हो जाएगी”, “खाता बंद हो जाएगा”, “इनाम मिला है” एक फोन, एक लिंक और कभी-कभी जिंदगी भर की कमाई खतरे में। ऐसी वित्तीय साइबर ठगी होने पर तुरंत 1930 पर शिकायत की जा सकती है; राष्ट्रीय साइबर अपराध पोर्टल भी ऑनलाइन शिकायत की सुविधा देता है और हेल्पलाइन 24×7 है। लेकिन गांव के उस बुजुर्ग को 1930 पता है या नहीं, यह भी डिजिटल भारत की परीक्षा है।
वीडियो पहले सच बाद में!
गांव में अब खबर पैदल नहीं चलती, मोबाइल पर दौड़ती है। किसी ने वीडियो भेजा, दूसरे ने पढ़े बिना आगे भेजा, तीसरे ने कहा “व्हाट्सऐप में आया है, मतलब सच होगा!” बस, गांव में सच से पहले अफवाह पहुंच गई। मोबाइल दोषी नहीं है। बिना जांचे आगे बढ़ाने वाली हमारी उंगली दोषी हो सकती है।
योजना मोबाइल में लाभार्थी कहां?
सरकार की योजना मोबाइल में दिखाई देती है। लेकिन गरीब आदमी पूछता है “मुझे मिलेगी कैसे?” यहीं योजना और लाभ के बीच का रास्ता शुरू होता है।उज्ज्वला जैसे कार्यक्रमों के आंकड़े बड़ी संख्या बताते हैं, लेकिन असली सवाल यह है कि कनेक्शन मिलने के बाद रसोई में उसका इस्तेमाल लगातार हो रहा है या नहीं। सरकारी पोर्टल पर 23 सितंबर 2026 तक PMUY के 10.56 करोड़ से अधिक कनेक्शन दर्ज हैं। क्योंकि योजना का असली हिसाब फाइल में नहीं, घर के चूल्हे पर दिखना चाहिए। पर कही कही से ऐसी जानकारी मिल रही है की लाभार्थियों ने अपने कार्ड और सिलेंडर बेच दिए है
UPI भी कमाल है!
जेब में पैसा नहीं, मोबाइल में पैसा। QR दिखा और पैसा चला गया।
अब 15 अक्टूबर 2026 से पात्र ₹2,000 से ऊपर के कुछ UPI व्यापारी लेन-देन पर 0.4% MDR की व्यवस्था लागू होगी। यह ग्राहक से लिया जाने वाला सरकारी “UPI टैक्स” नहीं, बल्कि पात्र व्यापारी लेन-देन पर MDR है; सामान्यतः ग्राहक से इसे सीधे वसूलने की व्यवस्था नहीं है। सरकार ने कहा है कि अधिकांश छोटे UPI भुगतान और व्यक्ति-से-व्यक्ति लेन-देन पहले की तरह मुफ्त रहेंगे। दुकानदार कैलकुलेटर देखकर बोले “QR कोड छोटा है साहब, हिसाब बड़ा हो गया!” लेकिन महंगाई का बोझ जनता पर
ATM भी अपना गणित पढ़ाता है
अपना पैसा निकालने ATM पहुंचे। मुफ्त लेन-देन की सीमा के बाद शुल्क की व्यवस्था है, जो बैंक, ATM और लेन-देन की स्थिति पर निर्भर करती है। आम आदमी की भाषा में“पैसा अपना, खाता अपना, लेकिन गणित बैंक का!”
बिस्कुट पर हिसाब- काजू पर सवाल!
गरीब आदमी बिस्कुट का पैकेट खरीदने से पहले कीमत देखता है। मां दाल का भाव देखती है। किसान खाद का हिसाब लगाता है। मजदूर अपनी दिनभर की मजदूरी गिनता है। और जब जनता को कहीं बड़ा सरकारी काफिला या महंगी सुविधा दिखाई देती है तो हंसी में एक सवाल निकल ही जाता है, “हम बिस्कुट में हिसाब लगाएं और साहब काजू में?”
बात बिस्कुट या काजू की नहीं है। बात है सार्वजनिक धन में मितव्ययिता और जवाबदेही की।
मुफ्त का चावल और बाजार में बोली?
गरीबों के लिए बनाया गया बीपीएल राशन कार्ड ताकि किसी जरूरतमंद के घर का चूल्हा न बुझे। शासन एक किलो चावल गरीब तक पहुंचाने में करीब ₹60 तक खर्च करता है, लेकिन अगर वही चावल राशन दुकान से अंगूठा लगाकर लिया जाए और फिर तुरंत किसी व्यापारी को ₹20–25 किलो में बेच दिया जाए, तो सवाल सिर्फ चावल का नहीं, सरकारी पैसे और योजना के मकसद का भी है।
कहीं-कहीं राशन कार्ड ₹3,000–₹3,500 में गिरवी रखने जैसी शिकायतें भी सुनने को मिलती हैं। शिकायत करने पर जवाब मिलता है “हितग्राही ने अंगूठा लगाया है, चावल उसी ने लिया है।” ठीक है, लेकिन अगर किसी को चावल चाहिए ही नहीं, तो फिर सवाल यह भी है कि बीपीएल कार्ड बनवाया क्यों, राशन लिया क्यों और सरकार का पैसा इस तरह बर्बाद होने दिया क्यों?
मुफ्त की योजना का मतलब यह नहीं कि उसकी कीमत शून्य हो गई। जनता का पैसा है, चावल एक किलो हो या हजार टन, हिसाब तो होना ही चाहिए।
अब जरूरत है सिर्फ अंगूठा मिलाने की नहीं, यह देखने की भी कि चावल गया कहां और योजना का लाभ मिला किसे।
मुफ्त योजना या आत्मनिर्भरता?
मुफ्त योजना गरीब हटे या गरीबी?
सरकार गरीबी दूर करने के लिए मुफ्त योजनाएं बनाती है, लेकिन असली सवाल यह है कि लाभ वास्तविक जरूरतमंद तक पहुंच रहा है या बीच में ही कोई दूसरा लाभार्थी बन जा रहा है? स्थानीय स्तर पर पैसे लेकर अपात्र लोगों को योजना का लाभ दिलाने और वास्तविक हितग्राही के छूट जाने जैसी शिकायतें अगर कहीं सही हैं, तो यह जांच का विषय है। आखिर वोट के लिए पात्रता और जरूरत से समझौता कब तक?
आज हर तरफ गरीबी कार्ड और बीपीएल कार्ड दिखाई देते हैं। देखकर कभी-कभी लगता है, गरीबी घट रही है या गरीबों की संख्या बढ़ रही है?
गरीबी हटानी है तो सिर्फ मुफ्त बांटने से काम नहीं चलेगा। ऐसी योजनाएं चाहिए जो गरीब के हाथ में राशन के साथ रोजगार, हुनर और आत्मनिर्भर बनने का साधन दें। क्योंकि मुफ्त की मदद पेट भर सकती है, लेकिन आत्मनिर्भरता जिंदगी बदल सकती है।
दीवार पर नशा मुक्ति,चौक पर दूसरी कहानी!
सुबह दीवार कहती है “नशा छोड़ो।” शाम को अगर उसी चौक पर शराब को लेकर विवाद, सार्वजनिक परेशानी या नियमों के उल्लंघन की शिकायत दिखाई दे तो आदमी दीवार को देखकर मुस्कुरा भी सकता है और सोच भी सकता है, “दीवार जाग रही है या व्यवस्था?”
नशामुक्ति पोस्टर से नहीं, जागरूकता, परिवार, इलाज, कानून और प्रभावी कार्रवाई सबसे मिलकर होगी।
फिर कहानी वापस किसान के पास लौटती है, किसान खेत में है, धान तैयार है,मोबाइल जेब में है,सिस्टम ऑनलाइन है, लेकिन किसान अभी भी किसी से पूछ रहा है, “भैया, ये काम ऑनलाइन कैसे होगा?” यहीं पूरी कहानी का असली रहस्य खुलता है, समस्या यह नहीं कि भारत डिजिटल हो रहा है, समस्या यह है कि डिजिटल होते भारत में आखिरी आदमी कितनी आसानी से साथ चल पा रहा है? मोबाइल स्मार्ट होना अच्छी बात है, UPI तेज होना अच्छी बात है, रिकॉर्ड ऑनलाइन होना अच्छी बात है, सरकारी योजनाएं डिजिटल होना भी अच्छी बात है।
लेकिन सुविधा तभी सुविधा है जब ग्रामीण किसान उसे समझ सके, बुजुर्ग उसे इस्तेमाल कर सके, महिला अपने अधिकार तक पहुंच सके, गरीब बिना किसी बिचौलिए के लाभ ले सके और बच्चा मोबाइल का इस्तेमाल करे, मोबाइल बच्चे का इस्तेमाल न करे।
सेवा का संकल्प या सिर्फ कार्यक्रम का संकल्प?
17 सितंबर से चल रहे सेवा संकल्प अभियान में प्रशासन जगह-जगह शिविर लगा रहा है। टेंट लग रहे हैं, कुर्सियां सज रही हैं, अधिकारी-कर्मचारी पहुंच रहे हैं और सरकारी खर्च भी हो रहा है और नेताओं का चेहरा चमक रहा है लेकिन गांव का आदमी पूछ रहा है, शिविर लगा या सच में सेवा मिली?
क्योंकि उसी गांव की सड़क आज भी कीचड़ से लथपथ है, नालियों में गंदगी जमा है और बरसात में आने-जाने वाले परेशान हैं। दूसरी तरफ योजनाओं का लाभ लेने के लिए दिव्यांग और जरूरतमंद लोग कभी समाज कल्याण कार्यालय के चक्कर लगाते हैं तो कभी जनप्रतिनिधियों के आगे-पीछे घूमते नजर आते हैं। फिर सवाल उठता है, अगर सेवा गांव तक पहुंच रही है, तो जरूरतमंद आज भी दरवाजे-दरवाजे क्यों घूम रहा है?
शिविर में एक-दो लोगों को लाभ मिल गया, फोटो भी खिंच गई और खबर भी बन गई, लेकिन जो बाकी लोग आवेदन लेकर लौट गए, उनका क्या? कहीं ऐसा तो नहीं कि शिविर में सेवा भी ‘पहले आओ, पहले पाओ’ वाली हो गई और बाकी जनता अगली बार की उम्मीद लेकर घर चली गई?
कहने को अभियान है, खर्च भी है, व्यवस्था भी है अब असली हिसाब यह होना चाहिए कि कितने लोगों की समस्या मौके पर हल हुई और कितने लोग फिर उसी समस्या के साथ वापस लौटे।
क्योंकि सेवा संकल्प की सबसे अच्छी रसीद कोई फोटो या मंच नहीं, बल्कि उस गरीब, दिव्यांग, किसान और जरूरतमंद के चेहरे की राहत है।
वरना गांव की भाषा में सवाल सीधा है “साहब, शिविर तो लग गया, अब हमारा काम कब होगा?”
भारत डिजिटल हो गया अब KYC के पीछे क्यों घूम रहा है?
कहते हैं भारत डिजिटल हो गया। मोबाइल से पैसा भेजिए, ऑनलाइन आवेदन कीजिए, रिकॉर्ड देखिए, योजना का लाभ लीजिए, लेकिन गांव का आदमी पूछता है “साहब, डिजिटल तो हो गया अब KYC कहां-कहां करानी है?”
एक योजना की KYC, दूसरी योजना की KYC, बैंक की अलग KYC, मोबाइल की अलग जानकारी, कभी दस्तावेज अपडेट, कभी आधार सत्यापन।
उधर लोगों को साइबर सुरक्षा के लिए बार-बार सावधान किया जाता है कि OTP, PIN और आधार जैसी संवेदनशील जानकारी अनजान व्यक्ति से साझा न करें। दूसरी तरफ कई सेवाओं में पहचान सत्यापन और दस्तावेजों की जरूरत पड़ती है।
यहीं आम आदमी का दिमाग थोड़ा घूम जाता है “आधार संभालकर भी रखूं और हर जगह दिखाऊं भी आखिर रखूं कहां?” और फिर वही पुराना दृश्य हाथ में आधार की फोटो कॉपी, जेब में मोबाइल, सामने KYC की लाइन और पीछे खड़ा आदमी पूछ रहा है “भैया, आज मेरी कौन-सी KYC है?”
शायद डिजिटल भारत का अगला कदम केवल यह नहीं होना चाहिए कि हर चीज ऑनलाइन हो जाए, बल्कि यह भी हो कि एक नागरिक को एक ही जानकारी बार-बार अलग-अलग जगह देने की जरूरत कम से कम पड़े और उसे साफ बताया जाए कि कौन-सी जानकारी क्यों और किसे देनी है।
क्योंकि आखिर में आदमी को डिजिटल बनाना है, दस्तावेजों का गठ्ठर लेकर डिजिटल दफ्तरों की लाइन में खड़ा नहीं रखना है।
असली डिजिटल भारत कहां मिलेगा?
डिजिटल भारत का असली प्रमाण किसी बड़े शहर की चमकदार स्क्रीन पर नहीं मिलेगा, वह मिलेगा उस किसान की उंगली में, जो बिना किसी के सहारे अपना रिकॉर्ड देख सके, उस बुजुर्ग के हाथ में, जो बिना डर के डिजिटल भुगतान कर सके, उस महिला के अधिकार में, जिसकी जमीन किसी दूसरे राज्य में हो फिर भी व्यवस्था उसे आसानी से समझ सके, उस बच्चे में, जो मोबाइल को खिलौना नहीं, साधन समझे, और उस नागरिक में, जो किसी फर्जी लिंक पर क्लिक करने से पहले सोचे और किसी झूठी खबर को आगे भेजने से पहले रुके।
सरकार की जिम्मेदारी व्यवस्था को सरल बनाना है। प्रशासन की जिम्मेदारी आखिरी व्यक्ति तक पहुंचना है। समाज की जिम्मेदारी जागरूक होना है। और नागरिक की जिम्मेदारी अपने अधिकार और अपनी सावधानी दोनों को समझना है।
क्योंकि अंत में सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि “मोबाइल स्मार्ट हुआ या नहीं?”
सवाल यह है, मोबाइल स्मार्ट हो गया सिस्टम डिजिटल हो गया, अब क्या आम आदमी की जिंदगी भी सचमुच आसान हुई?
अगर जवाब “हां” है तो डिजिटल भारत सफल है, अगर जवाब देने से पहले किसान को किसी और की तरफ देखना पड़ रहा है, तो शायद अभी कलम की धार को कुछ और सवाल पूछने बाकी हैं।
डिजिटल भारत की असली पहचान बड़े-बड़े सर्वर, ऐप और पोर्टल नहीं, बल्कि वह किसान है जो बिना परेशानी अपनी फसल बेच सके, वह बुजुर्ग है जो बिना भटके अपना काम करा सके और वह गरीब है जिसे अपने हक के लिए बार-बार KYC की लाइन में न लगना पड़े।
मोबाइल स्मार्ट हो गया है, अब व्यवस्था को भी इतनी स्मार्ट होना होगा कि आम आदमी की जिंदगी आसान हो, मुश्किल नहीं।
यही डिजिटल भारत की असली परीक्षा है और यही सवाल ‘कलम की धार’ छोड़कर जा रही है।
हक के लिए आवाज उठाना जरूरी है, मगर अपनी जिम्मेदारी निभाना भी जरूरी है, सरकार की गलती पर सवाल करें, पर अपनी गलती को भी आईना दिखाना जरूरी है, योजना का लाभ सही व्यक्ति तक पहुंचे, इसमें जनता की जागरूकता भी भागीदारी है,
क्योंकि बदलाव सिर्फ व्यवस्था से नहीं आता, जब जनता सुधरती है, तभी व्यवस्था भी सुधरती है।
✍️ प्रदीप मिश्रा / संपादक – अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़
अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़
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