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सच की तह तक

जहां कभी खौफ था, वहां फिर जली आस्था की लौ, 21 साल बाद खुले मंदिर के द्वार

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जगदलपुर, छत्तीसगढ़

By ACGN – 7647981711, 9303948009

बदलते बस्तर की तस्वीर देखने पहुंचे दिल्ली के 43 इंफ्लुएंसर्स ने सुकमा से पूवर्ती तक देखा बस्तर का बदला हुआ चेहरा, पूर्व नक्सलियों से संवाद से लेकर केरलापेंदा के श्रीराम मंदिर और हिडमा के परिवार से मुलाकात तक का सफर

बस्तर ACGN:- बस्तर की पहचान लंबे समय तक नक्सल हिंसा, जंगलों और सुरक्षा चुनौतियों से जुड़ी खबरों के जरिए देश के सामने आती रही है। लेकिन अब इसी बस्तर में सुरक्षा, विकास, पुनर्वास और सामान्य जनजीवन से जुड़ी तस्वीरें भी सामने आ रही हैं। इसी बदलाव को करीब से समझने के लिए दिल्ली से आए 43 इंफ्लुएंसर्स ने 30 सितंबर को सुकमा से जगरगुंडा, केरलापेंदा होते हुए पूवर्ती तक का दौरा किया।


करीब 13 घंटे से अधिक चले इस सफर में दल ने उन इलाकों को करीब से देखा, जिनका नाम कभी नक्सल हिंसा की घटनाओं के कारण सुर्खियों में रहा। सुकमा के पुनर्वास केंद्र में आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा में लौटे पूर्व नक्सलियों से बातचीत से लेकर पुलिस अधिकारियों से सुरक्षा और विकास की जानकारी लेने तक, इस यात्रा में बस्तर के अतीत और वर्तमान दोनों को समझने का प्रयास किया गया।


सुबह सुकमा पहुंचने के बाद इंफ्लुएंसर्स ने पुनर्वास केंद्र का दौरा किया। यहां उन्होंने हिंसा का रास्ता छोड़कर सामान्य जीवन की ओर लौटे पूर्व नक्सलियों से बातचीत की। आत्मसमर्पण के बाद उनके जीवन में आए बदलाव और सामान्य जिंदगी की ओर लौटने के अनुभवों को भी समझा।


इसके बाद दल ने सुकमा के पुलिस अधीक्षक से मुलाकात की और क्षेत्र में सुरक्षा, शांति, प्रशासनिक पहुंच तथा विकास से जुड़े प्रयासों की जानकारी ली। सुकमा के साइंस पार्क का भी भ्रमण किया गया, जहां जंगल और संघर्ष की छवि से अलग शिक्षा, विज्ञान और आधुनिक गतिविधियों से जुड़ी तस्वीर देखने को मिली।


इसके बाद दल जगरगुंडा की ओर रवाना हुआ। रास्ते में उस क्षेत्र के बारे में जानकारी दी गई, जिसे स्थानीय स्तर पर ‘खूनी सड़क’ के नाम से भी जाना जाता है। जगरगुंडा क्षेत्र वर्ष 2010 के ताड़मेटला हमले की स्मृतियों से भी जुड़ा है। 6 अप्रैल 2010 को हुए इस हमले में 76 सीआरपीएफ जवानों की जान गई थी। इंफ्लुएंसर्स ने इस क्षेत्र की सुरक्षा चुनौतियों और उस दौर की घटनाओं के बारे में जानकारी ली।


जगरगुंडा के बाद दल केरलापेंदा पहुंचा। यहां ग्रामीणों से बातचीत कर क्षेत्र में आए बदलावों को समझने का प्रयास किया गया। इस दौरान केरलापेंदा का श्रीराम मंदिर यात्रा का एक खास पड़ाव रहा। जानकारी के अनुसार माओवादी प्रभाव के दौर में करीब 21 वर्षों तक मंदिर में पूजा-अर्चना बंद रही थी। ग्रामीणों के अनुसार वर्ष 2003 के आसपास मंदिर बंद रखने और पूजा नहीं करने का फरमान जारी किया गया था।
अप्रैल 2024 में परिस्थितियां बदलीं और सुरक्षा बलों तथा ग्रामीणों के सहयोग से मंदिर की सफाई कर दोबारा पूजा-अर्चना शुरू की गई। मंदिर में भगवान श्रीराम, माता सीता और भगवान लक्ष्मण की संगमरमर की प्रतिमाएं स्थापित हैं। वर्षों तक बंद रहे मंदिर में फिर पूजा और धार्मिक गतिविधियां शुरू होना इस क्षेत्र में सामान्य जीवन की वापसी का एक महत्वपूर्ण स्थानीय उदाहरण माना जा रहा है।
रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2025 में केरलापेंदा से 9 सहित कुल 16 माओवादियों के आत्मसमर्पण के बाद गांव को माओवादी मुक्त घोषित किया गया था। इंफ्लुएंसर्स ने ग्रामीणों से बातचीत के दौरान इस बदलाव और मौजूदा परिस्थितियों के बारे में भी जानकारी ली।
इसके बाद दल पूवर्ती की ओर रवाना हुआ। कई घंटे की यात्रा के बाद रात में पूवर्ती पहुंचने पर इंफ्लुएंसर्स ने नक्सली कमांडर हिडमा के बड़े भाई, भाभी और भतीजे से मुलाकात की। परिवार से गांव की मौजूदा परिस्थितियों, स्थानीय जीवन और क्षेत्र में आए बदलावों को लेकर बातचीत की गई।
पूवर्ती की यह मुलाकात इसलिए भी अलग रही क्योंकि यहां दल ने नक्सल हिंसा से जुड़े एक चर्चित नाम के पैतृक गांव में उसके परिवार के सदस्यों से सीधे संवाद किया। बातचीत का फोकस केवल अतीत की घटनाओं पर नहीं रहा, बल्कि गांव में वर्तमान जीवन और वहां हो रहे बदलावों को समझने पर भी रहा।
दिल्ली से आए इंफ्लुएंसर्स की यह यात्रा बस्तर के कई अलग-अलग पहलुओं को एक साथ सामने लाती है। एक तरफ जगरगुंडा में 76 जवानों की शहादत की स्मृतियां हैं, तो दूसरी तरफ सुकमा के पुनर्वास केंद्र में हिंसा छोड़कर सामान्य जीवन की ओर लौटे लोग हैं। एक तरफ अतीत में भय के कारण बंद रहा केरलापेंदा का मंदिर है, तो दूसरी तरफ अब वहां फिर सुनाई देती पूजा की घंटियां हैं। इसी तरह पूवर्ती में एक संवेदनशील पारिवारिक मुलाकात ने बस्तर की जटिल सामाजिक परिस्थितियों को करीब से समझने का अवसर दिया।
इस पूरे सफर में इंफ्लुएंसर्स ने बस्तर को केवल पर्यटन या प्राकृतिक सौंदर्य के नजरिए से नहीं देखा, बल्कि उन गांवों और इलाकों तक पहुंचकर लोगों से बातचीत की, जिनका अतीत संघर्ष से जुड़ा रहा है। यात्रा के दौरान सामने आई तस्वीरों में सुरक्षा, पुनर्वास, ग्रामीण संवाद और सामान्य जनजीवन की वापसी जैसे पहलू प्रमुख रहे।
सुकमा से जगरगुंडा, केरलापेंदा से पूवर्ती तक का यह सफर बस्तर के उस वर्तमान को सामने लाता है, जहां अतीत की हिंसक घटनाओं की यादें अभी भी मौजूद हैं, लेकिन उनके बीच सामान्य जीवन, संवाद और विकास से जुड़ी गतिविधियों के उदाहरण भी दिखाई दे रहे हैं।
रात करीब 11 बजे दंतेवाड़ा पहुंचने तक 43 इंफ्लुएंसर्स के इस दल के सामने बस्तर की कई तस्वीरें थीं—पुनर्वास केंद्र में मुख्यधारा में लौटे लोग, शहादत से जुड़ी स्मृतियां, ग्रामीणों से संवाद, 21 वर्षों बाद दोबारा पूजा वाला श्रीराम मंदिर और पूवर्ती में हुई संवेदनशील मुलाकात। यही अलग-अलग तस्वीरें मिलकर बस्तर के बदलते वर्तमान की एक तस्वीर पेश करती हैं।

प्रदीप मिश्रा
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