शिक्षक दिवस तो हर साल आता है… मगर क्या हम गुरु का अर्थ भी याद रखते हैं?
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कोरबा, छत्तीसगढ़
By ACGN 7647981711, 9303948009
5 सितंबर सिर्फ उत्सव का दिन नहीं, उस गुरु-परंपरा को याद करने का दिन है जिसने पीढ़ियों को गढ़ा
कोरबा ACGN:- आज 5 सितंबर है। पूरे देश में स्कूलों से लेकर शिक्षण संस्थानों तक शिक्षक दिवस बड़े उत्साह और धूमधाम से मनाया जा रहा है। बच्चे अपने शिक्षकों को फूल दे रहे हैं, सम्मान समारोह हो रहे हैं, सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं और गुरु-शिष्य के रिश्ते को याद किया जा रहा है।
लेकिन शिक्षक दिवस की इस चकाचौंध के बीच एक पल ठहरकर यह समझना भी जरूरी है कि आखिर शिक्षक दिवस क्यों मनाया जाता है? इसका उद्देश्य क्या है? और क्या हम वास्तव में इस दिन के अर्थ को समझते हैं?
5 सितंबर ही क्यों मनाया जाता है शिक्षक दिवस?
भारत में हर वर्ष 5 सितंबर को शिक्षक दिवस मनाया जाता है। यह दिन देश के महान दार्शनिक, शिक्षाविद् और भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जयंती है। डॉ. राधाकृष्णन का शिक्षा के प्रति गहरा समर्पण था। जब उनके विद्यार्थियों और प्रशंसकों ने उनका जन्मदिन मनाने की इच्छा व्यक्त की, तो उन्होंने अपने जन्मदिन को व्यक्तिगत उत्सव के रूप में मनाने के बजाय शिक्षकों के सम्मान के दिन के रूप में मनाने की इच्छा जताई। तभी से 5 सितंबर भारत में शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।
इसलिए यह दिन केवल किसी व्यक्ति की जयंती नहीं है।
यह भारत की गुरु-शिष्य परंपरा और शिक्षा के प्रति सम्मान का प्रतीक है।
शिक्षक दिवस का असली अर्थ क्या है?
शिक्षक दिवस का अर्थ केवल शिक्षक को फूल देना, उपहार देना या मंच पर सम्मानित करना नहीं है। इस दिन का असली अर्थ है, हम यह स्वीकार करें कि हमारे जीवन में ज्ञान, संस्कार और दिशा देने वाले शिक्षक का कितना बड़ा योगदान है। एक शिक्षक केवल किताब के अक्षर नहीं पढ़ाता। वह बच्चे को समाज में जीना सिखाता है। वह सही और गलत का फर्क समझाता है। वह असफलता के बाद फिर उठना सिखाता है। और कई बार वह उस बच्चे में भी संभावना देख लेता है, जिसे पूरी दुनिया कमजोर समझ चुकी होती है।
कभी गुरु केवल पढ़ाता नहीं था, जीवन गढ़ता था
हमारे पुराने समय की शिक्षा व्यवस्था में शिक्षक को सिर्फ नौकरी करने वाला व्यक्ति नहीं माना जाता था। गांव में शिक्षक का सामाजिक सम्मान अलग हुआ करता था। बच्चा स्कूल में गलती करता तो शिक्षक उसे डांटता था। पढ़ाई में कमजोर होता तो अतिरिक्त समय देता था। किताब नहीं होती तो मदद करता था।
और विद्यार्थी गलत दिशा में जाता दिखाई देता तो उसे रोकने का प्रयास करता था। उस समय शिक्षक की डांट में भी अपनापन होता था। क्योंकि विद्यार्थी उसके लिए केवल एक नाम या रोल नंबर नहीं, बल्कि भविष्य की एक जिम्मेदारी था।
आज शिक्षक बदल गया या समय ने शिक्षक को बदल दिया?
आज सवाल यह नहीं है कि पुराने शिक्षक अच्छे थे और आज के शिक्षक खराब हैं। सवाल यह है कि समय ने शिक्षक की भूमिका को कितना बदल दिया है। आज शिक्षक के पास तकनीक है। स्मार्ट क्लास है। इंटरनेट है। डिजिटल सामग्री है। लेकिन उसके साथ सरकारी योजनाओं का काम, ऑनलाइन रिकॉर्ड, पोर्टल, सर्वे, चुनाव ड्यूटी और अनेक गैर-शैक्षणिक जिम्मेदारियां भी हैं। जिस शिक्षक को कक्षा में बच्चे के साथ होना चाहिए, उसका समय कई बार कागज और कंप्यूटर के बीच बंट जाता है।
इसलिए व्यवस्था से एक सीधा सवाल है, जिस हाथ में बच्चों का भविष्य सौंपा गया है, उस हाथ में किताब ज्यादा होनी चाहिए या सरकारी फाइल?
लेकिन शिक्षक की जिम्मेदारी भी छोटी नहीं है
व्यवस्था की अपनी परेशानियां हैं, लेकिन शिक्षक होना केवल नौकरी नहीं है। कक्षा में बैठा हर बच्चा अपने घर से एक उम्मीद लेकर आता है। किसी के पिता मजदूर हैं, किसी की मां खेतों में काम करती है। किसी के माता-पिता आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद फीस, किताब और स्कूल ड्रेस की व्यवस्था करते हैं।
उनकी उम्मीद होती है “हमारा बच्चा हमसे बेहतर जिंदगी जिए।”
और उस उम्मीद का सबसे पहला चेहरा शिक्षक होता है।
इसलिए शिक्षक को अपने आप से पूछना होगा, क्या मैं केवल पाठ्यक्रम पूरा कर रहा हूं या किसी बच्चे का भविष्य भी बना रहा हूं?
एक शिक्षक की एक बात जिंदगी बदल सकती है
बच्चे का मन मिट्टी की तरह होता है, उसे जैसा आकार मिलेगा, वह वैसा ही ढल सकता है, शिक्षक की एक छोटी-सी प्रशंसा किसी बच्चे में आत्मविश्वास पैदा कर सकती है, और शिक्षक की एक कठोर टिप्पणी किसी बच्चे को वर्षों तक भीतर से तोड़ भी सकती है, इसलिए आज के शिक्षक को ज्ञान के साथ संवेदनशीलता भी चाहिए।
कमजोर विद्यार्थी को पीछे छोड़ना आसान है, उसका हाथ पकड़कर आगे लाना शिक्षक की असली परीक्षा है।
अब अभिभावकों को भी आईना देखना होगा
हम शिक्षा की पूरी जिम्मेदारी स्कूल और शिक्षक पर डालकर मुक्त नहीं हो सकते, घर बच्चे का पहला विद्यालय है, माता-पिता उसके पहले शिक्षक हैं, आज हम बच्चों से पूछते हैं,“कितने नंबर आए?”
लेकिन शायद हमें पूछना चाहिए, “आज तुमने क्या सीखा?”
हम पूछते हैं, “कौन प्रथम आया?” लेकिन यह नहीं पूछते, “तुम्हें किस विषय में परेशानी हो रही है?”
दूसरे बच्चे के 95 प्रतिशत अंक देखकर अपने बच्चे को ताना देना शिक्षा नहीं है,हर बच्चा अलग है।
किसी की ताकत गणित है, किसी की भाषा, किसी की कला, किसी की खेल प्रतिभा, किसी की रचनात्मकता, बच्चे की तुलना दूसरे से नहीं, उसके कल से होनी चाहिए।
बच्चों के हाथ में मोबाइल है, मगर दिशा किसके हाथ में है?
आज का विद्यार्थी पहले के विद्यार्थियों से बिल्कुल अलग दुनिया में बड़ा हो रहा है, उसके हाथ में मोबाइल है, इंटरनेट है, सोशल मीडिया है, वीडियो गेम हैं, जानकारी का अथाह भंडार है, लेकिन जानकारी और ज्ञान एक नहीं होते।
इंटरनेट बता सकता है कि दुनिया में क्या हो रहा है।
लेकिन क्या सही है और क्या गलत यह विवेक शिक्षक और परिवार को मिलकर सिखाना होगा।
मोबाइल आधुनिक शिक्षा का साधन बन सकता है, लेकिन यदि वही बच्चे का पूरा संसार बन जाए तो चिंता का विषय है।
विद्यार्थी शिक्षक का सम्मान केवल एक दिन न करें
आज विद्यार्थी अपने शिक्षक को फूल देंगे, शुभकामनाएं देंगे, कार्यक्रम करेंगे, यह अच्छी परंपरा है।
लेकिन शिक्षक का वास्तविक सम्मान तब होगा जब विद्यार्थी उनकी अच्छी बातों को अपने जीवन में उतारेगा।
शिक्षक दिवस पर पैर छूना आसान है, शिक्षक की सीख को जीवन में उतारना कठिन है।
लेकिन यही असली सम्मान है।
अंक जरूरी हैं, लेकिन जिंदगी सिर्फ अंकों से नहीं चलती
आज शिक्षा की दौड़ में अंक महत्वपूर्ण हो गए हैं, अच्छे अंक जरूरी हैं, प्रतियोगिता भी है।
लेकिन क्या 95 प्रतिशत अंक यह गारंटी देते हैं कि बच्चा अच्छा इंसान भी बनेगा? नहीं।
शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी पाना नहीं होना चाहिए।
शिक्षा का उद्देश्य होना चाहिए, ज्ञान, चरित्र, अनुशासन, संवेदना और जिम्मेदारी।
क्योंकि डिग्री किसी व्यक्ति को योग्य बना सकती है, लेकिन चरित्र ही उसे सम्मान के योग्य बनाता है।
सच्चा गुरु वह है जो विद्यार्थी के आगे निकलने पर गर्व करे
सच्चे शिक्षक की खुशी इस बात में नहीं होती कि विद्यार्थी हमेशा उसके पीछे रहे, उसकी सबसे बड़ी खुशी तब होती है जब उसका विद्यार्थी उससे आगे निकल जाए।
जब कोई विद्यार्थी डॉक्टर बने, इंजीनियर बने, अधिकारी बने, वैज्ञानिक बने, खिलाड़ी बने या समाज के लिए कुछ बड़ा करे तो शिक्षक गर्व से कह सके “यह मेरा विद्यार्थी है।”
यही गुरु-शिष्य रिश्ते की सबसे सुंदर तस्वीर है।
शिक्षा व्यवस्था को भी बदलना होगा
शिक्षक से हम बहुत उम्मीद करते हैं, लेकिन व्यवस्था को भी शिक्षक के लिए बेहतर माहौल देना होगा।
शिक्षक को अनावश्यक गैर-शैक्षणिक कार्यों से जितना संभव हो मुक्त करना होगा।
स्कूलों में पर्याप्त संसाधन देने होंगे, शिक्षकों का प्रशिक्षण मजबूत करना होगा और सबसे महत्वपूर्ण शिक्षक को केवल सरकारी कर्मचारी नहीं, राष्ट्र निर्माता समझना होगा।
क्योंकि एक शिक्षक आज जिस बच्चे को पढ़ा रहा है, वही बच्चा कल देश की दिशा तय करेगा।
आज का सबसे बड़ा सवाल – हम कैसी पीढ़ी तैयार कर रहे हैं?
हम ऐसे विद्यार्थी तैयार कर रहे हैं जो परीक्षा में अच्छे अंक लाएं?
या ऐसे नागरिक जो देश और समाज के लिए जिम्मेदार बनें?
हम चाहते हैं कि बच्चा अंग्रेजी बोले, कंप्यूटर चलाए और बड़ी नौकरी करे, यह जरूरी है।
लेकिन क्या हम यह भी चाहते हैं कि वह बुजुर्गों का सम्मान करे?
गरीब की मदद करे? प्रकृति की रक्षा करे? झूठ और भ्रष्टाचार से दूर रहे? देश और समाज के प्रति जिम्मेदार बने?
अगर इन सवालों का जवाब हां है तो फिर शिक्षा में संस्कार को वापस केंद्र में लाना होगा।
शिक्षक, विद्यार्थी और अभिभावक – तीनों को एक संकल्प लेना होगा
शिक्षक संकल्प लें कि वे हर बच्चे में संभावना तलाशेंगे, विद्यार्थी संकल्प लें कि वे ज्ञान के साथ अनुशासन और संस्कार भी अपनाएंगे।
अभिभावक संकल्प लें कि वे बच्चों पर अपनी अधूरी इच्छाओं का बोझ नहीं डालेंगे, बल्कि उनकी प्रतिभा को समझेंगे और शिक्षा व्यवस्था संकल्प ले कि शिक्षक को पढ़ाने के लिए पर्याप्त समय और स्वतंत्रता मिले, इन चारों के बिना शिक्षा अधूरी है।
कल फिर स्कूल खुलेगा वहीं से असली शिक्षक दिवस शुरू होगा
आज मंच सजेगा, तालियां बजेंगी, फूल दिए जाएंगे, फोटो खिंचेंगे।
सोशल मीडिया पर शुभकामनाएं लिखी जाएंगी।
लेकिन कल जब शिक्षक फिर कक्षा में जाएगा और बच्चे उसके सामने बैठेंगे, तभी असली शिक्षक दिवस शुरू होगा।
वहां न कैमरा होगा, न मंच होगा, न तालियां होंगी।
सिर्फ एक शिक्षक होगा, और उसके सामने बैठा होगा,देश का आने वाला कल।
गुरु को फिर से गुरु बनाना होगा
हमें ऐसा शिक्षक चाहिए जो केवल पाठ्यक्रम न पढ़ाए, बल्कि जीवन पढ़ाए।
ऐसा विद्यार्थी चाहिए जो केवल डिग्री न पाए, बल्कि इंसान बने।
ऐसे अभिभावक चाहिए जो केवल अंक न देखें, बल्कि बच्चे के मन को समझें और ऐसी शिक्षा व्यवस्था चाहिए जो शिक्षक को फाइलों में नहीं, कक्षा में देखे।
क्योंकि देश का भविष्य किसी बड़ी इमारत में नहीं बनता, वह स्कूल की एक छोटी-सी कक्षा में बनता है।
जहां शिक्षक सामने खड़ा होता है, और उसके सामने बैठा होता है भारत का आने वाला कल।
आज शिक्षक दिवस पर सिर्फ शुभकामना नहीं, आत्ममंथन करें
आज हम सभी शिक्षकों को प्रणाम करें।
लेकिन साथ ही खुद से एक सवाल भी पूछें, क्या हम शिक्षक का सम्मान सिर्फ एक दिन कर रहे हैं, या उसकी भूमिका को पूरे वर्ष समझने और निभाने के लिए तैयार हैं?
अगर शिक्षक ईमानदारी से अपना धर्म निभाएगा, विद्यार्थी मेहनत और अनुशासन से आगे बढ़ेगा, अभिभावक समझ और सहयोग के साथ बच्चे के साथ खड़े होंगे और व्यवस्था शिक्षक को उसका सम्मान और समय देगी तो निश्चित रूप से हमारी शिक्षा केवल डिग्री नहीं देगी, वह बेहतर इंसान और बेहतर राष्ट्र बनाएगी।
यही शिक्षक दिवस की सच्ची भावना है यही गुरु को सच्ची श्रद्धांजलि है और यही आने वाली पीढ़ी के प्रति हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी भी।
गुरु का सम्मान केवल एक दिन नहीं
शिक्षक दिवस हमें सिर्फ शिक्षकों को शुभकामनाएं देने का अवसर नहीं देता, बल्कि यह सोचने का अवसर देता है कि हमारे जीवन में गुरु का स्थान कितना महत्वपूर्ण है। एक सच्चा शिक्षक केवल किताबों का ज्ञान नहीं देता, वह जीवन जीने की समझ, सही और गलत में अंतर करने की दृष्टि और संघर्षों से लड़ने का साहस देता है।
आज जरूरत है कि शिक्षक अपने भीतर के गुरु को जीवित रखें, विद्यार्थी अपने गुरु का सम्मान केवल एक दिन नहीं बल्कि जीवनभर करें और अभिभावक शिक्षा को केवल अंकों की दौड़ न बनाएं। क्योंकि एक अच्छा शिक्षक एक विद्यार्थी का भविष्य बदल सकता है और एक संस्कारी विद्यार्थी पूरे समाज का भविष्य बदल सकता है।
सभी गुरुजनों को शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं और सादर नमन।
प्रदीप मिश्रा
अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ (ACGN)
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