कलम को सम्मान, पत्रकार को सुरक्षा और सहारा, तभी मजबूत होगा लोकतंत्र
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संपादकीय
By ACGN 7647981711, 9303948009
जनता की आवाज शासन तक पहुंचाने वाले पत्रकार को सम्मान, सुरक्षा और सहयोग मिले, तभी लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मजबूती से खड़ा रह सकेगा।
लोकतंत्र के चार प्रमुख स्तंभ होते है विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और मीडिया ये एक-दूसरे के पूरक हैं। विधायिका कानून बनाती है, कार्यपालिका व्यवस्था चलाती है, न्यायपालिका न्याय सुनिश्चित करती है और मीडिया इन सभी के कामकाज पर नजर रखते हुए जनता की आवाज शासन-प्रशासन तक पहुंचाता है। लेकिन आज एक गंभीर सवाल सामने खड़ा है लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की नींव आखिर मजबूत कौन करेगा?
यह सवाल विशेष रूप से उन छोटे और स्थानीय पत्रकारों के लिए है, जो किसी बड़े कार्यालय में बैठकर खबर का इंतजार नहीं करते। अपनी बाइक का पेट्रोल, मोबाइल-इंटरनेट, यात्रा, वाहन की मरम्मत और अन्य खर्च स्वयं उठाकर वे गांव, मोहल्ले और घटनास्थल तक पहुंचते हैं। धूप हो, बारिश हो या कड़ाके की ठंड,जनता की सड़क, बिजली, पानी, अस्पताल, शिक्षा, भ्रष्टाचार और अन्य समस्याओं को सामने लाने के लिए वे लगातार मैदान में सक्रिय रहते हैं।
पत्रकारिता केवल खबर लिख देने का नाम नहीं है। इसके पीछे समय, मेहनत, संसाधन और कई बार जोखिम भी जुड़ा होता है। एक छोटी-सी खबर के लिए पत्रकार को कई किलोमीटर जाना पड़ सकता है, संबंधित लोगों से जानकारी जुटानी पड़ सकती है, अधिकारियों का पक्ष लेना पड़ सकता है और फिर तथ्यों की जांच कर खबर तैयार करनी पड़ती है।
पत्रकार का पक्ष केवल सत्य और जनहित होना चाहिए
हर खबर के दो पक्ष होते हैं पक्ष और विपक्ष। पत्रकार का धर्म किसी एक पक्ष के साथ खड़ा होना नहीं, बल्कि दोनों पक्षों को सामने रखकर तथ्य जनता तक पहुंचाना है। लेकिन जैसे ही किसी खबर में किसी की कमी उजागर होती है, संबंधित पक्ष नाराज हो जाता है। कभी नेता नाराज होते हैं, कभी अधिकारी, कभी प्रभावशाली व्यक्ति और कभी विपक्ष। यहीं से पत्रकारिता की असली परीक्षा शुरू होती है।
जो पत्रकार निष्पक्ष होकर सवाल पूछता है, उसे आलोचना भी सहनी पड़ती है। जो भ्रष्टाचार उजागर करता है, उसके सामने दबाव आ सकता है। जो जनता की समस्या उठाता है, उसे कई बार यह सुनना पड़ता है कि खबर क्यों प्रकाशित की गई।
लेकिन पत्रकार का काम किसी को खुश करना नहीं, बल्कि सच को सामने लाना और जनता की आवाज को शासन-प्रशासन तक पहुंचाना है।
पत्रकार की सुरक्षा पर भी हो गंभीर विचार
देश में पत्रकारों पर हमले और पत्रकारों की हत्या जैसी घटनाएं समय-समय पर सामने आती रही हैं। ऐसे में जिस पत्रकार से निष्पक्ष और निर्भीक रहने की अपेक्षा की जाती है, उसकी सुरक्षा और आर्थिक स्थिति पर भी गंभीरता से विचार होना चाहिए।
पत्रकार भी इसी समाज का हिस्सा है। वह भी पेट्रोल खरीदता है, वाहन चलाता है, मोबाइल और इंटरनेट का खर्च उठाता है, परिवार पालता है और महंगाई का सामना करता है। स्थानीय पत्रकारिता में आय अक्सर निश्चित नहीं होती, जबकि काम और जिम्मेदारी लगातार बनी रहती है।
कई स्थानीय पत्रकारों के सामने यह भी चुनौती रहती है कि खबरों के साथ विज्ञापन जुटाने की अपेक्षा की जाती है। जनप्रतिनिधियों, अधिकारियों और संस्थानों के पास विज्ञापन के लिए जाना पड़ता है। कई बार मिलने वाली राशि भी इतनी नहीं होती कि उससे पत्रकारिता की वास्तविक लागत और मेहनत पूरी हो सके।
खर्च पत्रकार का, जोखिम पत्रकार का, खबर की जिम्मेदारी पत्रकार की फिर उसके परिवार की चिंता कौन करेगा?
सोशल मीडिया ने बढ़ाए अवसर, लेकिन चुनौतियां भी बढ़ीं
सोशल मीडिया और वेब पोर्टलों के विस्तार ने सूचना के क्षेत्र को व्यापक बनाया है। मोबाइल हाथ में आते ही खबर लोगों तक कुछ ही क्षणों में पहुंच सकती है। यह लोकतंत्र के लिए बड़ा अवसर है, लेकिन इसके साथ जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी है।
बिना तथ्य जांचे खबर प्रकाशित करना, पक्षपातपूर्ण सामग्री फैलाना, व्यक्तिगत आरोप लगाना या पत्रकारिता के नाम पर किसी पर अनुचित दबाव बनाना पूरी पत्रकारिता को नुकसान पहुंचाता है।
इसलिए पत्रकारिता की पहचान केवल किसी कार्ड, सामाजिक माध्यम की प्रोफाइल या वेब पेज से नहीं, बल्कि उसके निरंतर कार्य, विश्वसनीयता, तथ्यपरकता और जनहित में योगदान से होनी चाहिए।
जो पत्रकार वर्षों से पक्ष और विपक्ष दोनों को समान अवसर देते हुए निष्पक्षता, निर्भीकता और जिम्मेदारी के साथ समाचार प्रकाशित कर रहे हैं, उनकी पहचान और प्रोत्साहन जरूरी है। वहीं पत्रकारिता की आड़ में गलत सूचना, ब्लैकमेलिंग या अनुचित दबाव का सहारा लेने वालों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए।
इससे वास्तविक और जिम्मेदार पत्रकारिता की विश्वसनीयता मजबूत होगी।
जनप्रतिनिधि पत्रकार को विरोधी नहीं, लोकतंत्र का साथी समझें
जनप्रतिनिधियों से भी एक विनम्र अपील है पत्रकार को अपना विरोधी न समझें। आलोचना लोकतंत्र की दुश्मन नहीं है। बल्कि सही आलोचना व्यवस्था को सुधारने का अवसर देती है। यदि पत्रकार किसी सड़क की खराब स्थिति, अस्पताल की समस्या, स्कूल की कमी, भ्रष्टाचार या जनता की परेशानी को सामने लाता है तो उस खबर को व्यक्तिगत विरोध के रूप में लेने के बजाय समाधान की दिशा में पहला कदम माना जाना चाहिए।
एक जिम्मेदार पत्रकार सत्ता के पक्ष में भी खबर करता है और विपक्ष की बात भी जनता तक पहुंचाता है। उपलब्धि हो तो उसका समाचार प्रकाशित करता है और कमी हो तो सवाल भी उठाता है।
यही निष्पक्ष पत्रकारिता है।
आम जनता भी पत्रकार की मेहनत को समझे
आम जनता से भी आग्रह है कि जब कोई पत्रकार आपकी समस्या उठाकर शासन-प्रशासन तक पहुंचाता है तो उसकी मेहनत को समझें।
जब वह सड़क पर खड़ा होकर आपकी समस्या दर्ज करता है, जब वह किसी अधिकारी के पास आपकी शिकायत लेकर पहुंचता है, जब वह अस्पताल की अव्यवस्था सामने लाता है या जब वह किसी गांव की समस्या को समाचार के माध्यम से शासन तक पहुंचाता है, तब वह केवल अपना काम नहीं कर रहा होता, वह आपकी आवाज को आगे बढ़ाने का काम कर रहा होता है। ऐसे पत्रकारों का सहयोग, सम्मान और हौसला बढ़ाना समाज की जिम्मेदारी भी है।
मीडिया संस्थानों से भी एक जरूरी सवाल
मैदान में काम करने वाले छोटे और स्थानीय पत्रकार को केवल खबर और विज्ञापन का साधन नहीं समझा जाना चाहिए। उसके समय, श्रम, संसाधन, जोखिम और आर्थिक संघर्ष का भी उचित मूल्य होना चाहिए। यदि मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है तो इस स्तंभ को मजबूत बनाने के लिए मैदान में काम करने वाले पत्रकारों को भी मजबूत करना होगा।
अंततः सवाल पत्रकार का नहीं, लोकतंत्र का है पत्रकार न किसी नेता का स्थायी समर्थक है, न किसी अधिकारी का विरोधी और न किसी विपक्ष का प्रवक्ता। उसका वास्तविक पक्ष सत्य, निष्पक्षता और जनहित और विश्वसनीयता होना चाहिए।
उसे सम्मान चाहिए, सुरक्षा चाहिए और उसके श्रम का उचित मूल्य चाहिए, किसी की कृपा नहीं।
क्योंकि जब सड़क पर खड़ा पत्रकार आपकी समस्या कैमरे में दर्ज करता है, जब वह अधिकारी के दरवाजे पर सवाल लेकर पहुंचता है, जब वह नेता से जवाब मांगता है और जब वह भ्रष्टाचार की खबर सामने लाता है, तब वह केवल अपना काम नहीं कर रहा होता,वह लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की जिम्मेदारी निभा रहा होता है।
शासन-प्रशासन ऐसे विश्वसनीय पत्रकारों को पहचानें। जनप्रतिनिधि उनका सम्मान और सहयोग करें। आम जनता उनकी हौसला-अफजाई करे और मीडिया संस्थान उनके श्रम को उचित महत्व दें।
क्योंकि कलम को स्वतंत्र रखना है तो कलम चलाने वाले हाथ को भी मजबूत रखना होगा।
पत्रकार सुरक्षित होगा, सम्मानित होगा और आर्थिक रूप से सक्षम होगा,तभी वह बिना भय और दबाव के जनता की आवाज बनकर खड़ा रह सकेगा। यही मजबूत मीडिया है, यही मजबूत लोकतंत्र है।
प्रदीप मिश्रा
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