क्या लोकतंत्र में अपंग बनाने की भी इजाजत है? पेलेट गन पर बड़ा सवाल, आंखों में छर्रे, जिंदगी में अंधेरा : पेलेट गन की मार का दर्दनाक सच
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नई दिल्ली, भारत
By ACGN – 7647981711, 9303948009
संवाददाता :- संजय पराते
आंखों में छर्रे, जिंदगी में अंधेरा : पेलेट गन की मार का दर्दनाक सच
पेलेट गन के इस्तेमाल पर उठता बड़ा संवैधानिक सवाल, स्थायी चोट और विकलांगता के अधिकारों पर गंभीर बहस
लेख – मुरलीधरन
नई दिल्ली ACGN:- आधुनिक लोकतंत्र में सरकार के सामने कानून-व्यवस्था बनाए रखने और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करने की दोहरी जिम्मेदारी होती है। इसी संदर्भ में भीड़ नियंत्रण के लिए इस्तेमाल होने वाली पेलेट गन को लेकर एक गंभीर सवाल सामने आता है कि क्या ऐसा हथियार, जिसके इस्तेमाल से आंखों की रोशनी जाने, शरीर में स्थायी चोट लगने और जीवनभर की विकलांगता का खतरा रहता है, लोकतांत्रिक पुलिसिंग का उचित साधन माना जा सकता है? यह सवाल केवल कानून-व्यवस्था या पुलिस कार्रवाई तक सीमित नहीं है, बल्कि संविधान, मानवाधिकार और विकलांग व्यक्तियों की गरिमा से भी सीधे जुड़ता है।
सजा के पुराने तरीकों से आधुनिक राज्य तक
इतिहास में सत्ता और शासन के नाम पर लोगों को शारीरिक रूप से अपंग बनाने की घटनाएं नई नहीं हैं। पुराने दौर में अपराध और विद्रोह के लिए आंखें फोड़ने, हाथ-पैर काटने अथवा शरीर को स्थायी रूप से विकृत करने जैसी सजाएं दी जाती थीं। इनका उद्देश्य केवल दर्द देना नहीं, बल्कि शरीर पर सत्ता की स्थायी छाप छोड़ना भी था।
दार्शनिक मिशेल फूको ने अपनी चर्चित पुस्तक डिसीप्लिन एंड पनिश में बताया कि आधुनिक राज्य व्यवस्था के विकास के साथ प्रत्यक्ष शारीरिक दंड के स्थान पर निगरानी, अनुशासन और संस्थागत नियंत्रण ने जगह बनाई। लेकिन बाद के अध्ययनों में यह सवाल उठाया गया कि क्या आधुनिक राज्य ने वास्तव में शरीर को दंडित करने की प्रवृत्ति पूरी तरह छोड़ दी है।
‘अपंग बनाने का अधिकार’ और आधुनिक सत्ता
जसबीर के. पुआर की पुस्तक द राइट टू मेम यानी अपंग बनाने का अधिकार आधुनिक सत्ता के इसी पहलू पर सवाल उठाती है। उनके विश्लेषण के अनुसार, आधुनिक राज्य सीधे तौर पर शरीर काटने जैसी सजा भले न दे, लेकिन युद्ध, कब्जे और सुरक्षा व्यवस्था के नाम पर ऐसे बल का इस्तेमाल कर सकता है, जिसके परिणामस्वरूप लोग स्थायी रूप से घायल और अपंग हो जाते हैं।
इस दृष्टिकोण से सवाल केवल यह नहीं रह जाता कि किसी कार्रवाई में कितने लोग मारे गए, बल्कि यह भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि कितने लोग ऐसी चोटों के साथ जीवित रह गए, जिन्होंने उनकी पूरी जिंदगी बदल दी।
युद्धों से मिली विकलांगता की भयावह विरासत
दुनिया के कई युद्धों ने पीढ़ियों को विकलांगता के साथ जीवन जीने के लिए मजबूर किया है। वियतनाम युद्ध में एजेंट ऑरेंज के इस्तेमाल से लंबे समय तक स्वास्थ्य संबंधी गंभीर प्रभावों की चर्चा होती रही। वहीं वियतनाम, कंबोडिया, लाओस, अफगानिस्तान और अंगोला जैसे देशों में बारूदी सुरंगों ने युद्ध समाप्त होने के बाद भी नागरिकों के जीवन को प्रभावित किया।
इन्हीं अनुभवों ने ऐसे हथियारों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नियंत्रण की मांग को मजबूत किया। एंटी-पर्सनल माइन बैन कन्वेंशन इसी चिंता का एक महत्वपूर्ण परिणाम है। हालांकि भारत सहित कुछ प्रमुख देशों ने इस कन्वेंशन पर हस्ताक्षर या इसकी पुष्टि नहीं की है।
भारत में पेलेट गन का सवाल
भारत में पेलेट गन का इस्तेमाल विशेष रूप से जम्मू-कश्मीर में लंबे समय से विवाद का विषय रहा है। इन्हें भीड़ नियंत्रण के लिए पारंपरिक गोलियों की तुलना में कम घातक विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया गया, लेकिन इनके इस्तेमाल से आंखों और शरीर के अन्य हिस्सों में गंभीर चोटों की अनेक घटनाएं सामने आईं।
2016 के दौरान कश्मीर में पेलेट गन से घायल हुए लोगों के आंकड़ों ने इस बहस को और गंभीर बनाया। तत्कालीन जम्मू-कश्मीर सरकार की ओर से विधानसभा में बताए गए आंकड़ों के अनुसार, 8 जुलाई 2016 से 27 फरवरी 2017 के बीच हजारों लोग पेलेट से घायल हुए थे और बड़ी संख्या में लोगों की आंखों को चोट पहुंची थी।
इंशा मुश्ताक की कहानी
पेलेट गन से होने वाली चोटों की चर्चा केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है। कश्मीर की किशोरी इंशा मुश्ताक का मामला इसका दर्दनाक उदाहरण बना। विरोध-प्रदर्शन के दौरान पेलेट उनकी आंखों में लगी और उनकी दृष्टि चली गई। पढ़ाई और भविष्य को लेकर उनके सामने नई चुनौतियां खड़ी हो गईं।
लंबे समय बाद उन्हें मुआवजा मिला, लेकिन मुआवजे की राशि किसी व्यक्ति की खोई हुई दृष्टि, बदला हुआ भविष्य और मानसिक पीड़ा को पूरी तरह वापस नहीं ला सकती।
हिबा निसार जैसी घटनाएं उठाती हैं सवाल
एक अन्य चर्चित मामला छोटी बच्ची हिबा निसार का रहा, जिसे घर के भीतर रहते हुए पेलेट से आंख में चोट लगी। ऐसे मामलों ने यह सवाल उठाया कि भीड़ नियंत्रण के लिए इस्तेमाल होने वाला ऐसा हथियार आखिर किस हद तक सुरक्षित माना जा सकता है, जब उसके छर्रे यह तय नहीं कर सकते कि सामने मौजूद व्यक्ति प्रदर्शनकारी है, राहगीर है, बच्चा है या कोई बुजुर्ग।
पैलेट किसी में अंतर नहीं करते
सामान्य गोली की तुलना में पेलेट कारतूस से कई छोटे छर्रे एक साथ निकलते हैं और एक बड़े क्षेत्र में फैलते हैं। फायर किए जाने के बाद यह तय करना संभव नहीं होता कि छर्रा किस व्यक्ति के शरीर के किस हिस्से पर लगेगा।
यही इसकी सबसे बड़ी चिंता मानी जाती है। आंख, चेहरा, सिर अथवा शरीर के किसी अन्य हिस्से पर लगी चोट स्थायी नुकसान का कारण बन सकती है। इसलिए पेलेट गन को केवल इस आधार पर सुरक्षित नहीं माना जा सकता कि इसका उद्देश्य जान लेना नहीं है।
‘कम घातक’ का अर्थ ‘सुरक्षित’ नहीं
पेलेट गन के समर्थन में अक्सर ‘कम घातक’ या ‘गैर-प्राणघातक’ जैसे शब्द इस्तेमाल किए जाते हैं। लेकिन किसी हथियार से मृत्यु की संभावना कम होना यह साबित नहीं करता कि वह पूरी तरह सुरक्षित है।
यदि किसी हथियार से अंधापन, गंभीर आंखों की चोट, तंत्रिका संबंधी नुकसान अथवा स्थायी विकलांगता हो सकती है, तो उसके प्रभाव को केवल मौतों की संख्या के आधार पर नहीं मापा जा सकता।
विकलांगता भी व्यक्ति के जीवन पर उतना ही गहरा प्रभाव डाल सकती है। शिक्षा छूट सकती है, रोजगार प्रभावित हो सकता है, परिवार पर आर्थिक बोझ बढ़ सकता है और व्यक्ति को जीवनभर पुनर्वास तथा सहायक साधनों की आवश्यकता पड़ सकती है।
विकलांगता पैदा करने वाला राज्य?
भारत का विकलांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम, 2016 और संयुक्त राष्ट्र के विकलांग व्यक्तियों के अधिकार संबंधी अभिसमय का उद्देश्य सम्मान, समानता, समावेशन और भेदभाव से सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
ऐसे में एक गंभीर विरोधाभास सामने आता है। राज्य एक तरफ विकलांगता को रोकने, बाधाओं को दूर करने और दिव्यांगजनों को समान अवसर देने की बात करता है, वहीं दूसरी तरफ यदि उसकी सुरक्षा व्यवस्था ऐसे हथियारों का इस्तेमाल करती है, जिनसे स्थायी विकलांगता का जोखिम हो, तो यह नीति और कार्रवाई के बीच टकराव पैदा करता है।
संविधान के सामने भी बड़ा सवाल
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करता है। न्यायिक व्याख्याओं में गरिमा के साथ जीवन को भी इसके दायरे में महत्वपूर्ण माना गया है। वहीं अनुच्छेद 14 समानता और अनुच्छेद 19 नागरिकों की कुछ मौलिक स्वतंत्रताओं की रक्षा करता है।
राज्य को सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने का अधिकार और जिम्मेदारी है, लेकिन किसी भी बल प्रयोग को आवश्यकता, वैधता और आनुपातिकता की कसौटी पर खरा उतरना चाहिए। यही वह बिंदु है जहां पेलेट गन के इस्तेमाल को लेकर गंभीर संवैधानिक बहस शुरू होती है।
20 जुलाई की घटना ने बहस को फिर किया तेज
20 जुलाई 2026 को नई दिल्ली में प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कार्रवाई के दौरान पेलेट गन और अन्य साधनों के इस्तेमाल को लेकर उठे सवालों ने इस बहस को फिर सामने ला दिया है। इस घटना के संदर्भ में सवाल यह है कि क्या भीड़ नियंत्रण के लिए ऐसी व्यवस्था अपनाई जानी चाहिए, जिसमें किसी व्यक्ति के जीवनभर के लिए घायल या विकलांग हो जाने का जोखिम मौजूद हो।
इस विषय पर अधिकार संगठनों और नागरिक समूहों की ओर से भी चिंता जताई गई है। विकलांगता अधिकारों से जुड़े संगठनों का तर्क है कि बहस केवल अत्यधिक बल प्रयोग तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि यह भी देखा जाना चाहिए कि किसी कार्रवाई के बाद घायल व्यक्ति को जीवनभर किन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है।
उत्तर प्रदेश के ‘ऑपरेशन लंगड़ा’ पर भी सवाल
भारत में स्थायी चोट पहुंचाने वाली पुलिस कार्रवाई की चर्चा केवल पेलेट गन तक सीमित नहीं है। उत्तर प्रदेश में पुलिस मुठभेड़ों के दौरान संदिग्ध अपराधियों के पैरों में गोली लगने की घटनाओं को लेकर भी बहस होती रही है।
पुलिस के आंकड़ों के अनुसार, 2017 के बाद हजारों मुठभेड़ों में बड़ी संख्या में लोगों के पैरों में गोली लगने की बात सामने आई है। हालांकि इन मामलों की परिस्थितियां पेलेट गन से अलग हैं, लेकिन दोनों घटनाक्रम एक व्यापक सवाल जरूर उठाते हैं कि कानून लागू करने के दौरान स्थायी शारीरिक नुकसान को किस सीमा तक स्वीकार किया जा सकता है।
न्यायपालिका और बल प्रयोग की सीमा
पेलेट गन पर रोक लगाने की मांग से जुड़े मामलों में न्यायपालिका के सामने भी यह प्रश्न आया है कि क्या पूर्ण प्रतिबंध के बजाय इनके इस्तेमाल के लिए स्पष्ट प्रोटोकॉल बनाया जा सकता है।
लेकिन आलोचकों का सवाल है कि यदि किसी हथियार की बनावट ही ऐसी है कि उसके इस्तेमाल से अनिश्चित दिशा में अनेक छर्रे फैलते हैं और गंभीर चोट का जोखिम बना रहता है, तो केवल नियम और प्रोटोकॉल उस मूल समस्या का कितना समाधान कर सकते हैं।
संयुक्त राष्ट्र के दिशा-निर्देशों का संदर्भ
संयुक्त राष्ट्र की ओर से कानून लागू करने में कम घातक हथियारों के इस्तेमाल के संबंध में आवश्यकता, वैधता और आनुपातिकता पर जोर दिया गया है। दिशा-निर्देशों में ऐसे बहु-प्रक्षेप्य हथियारों के इस्तेमाल को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की गई है और धातु के छर्रों वाले शॉटगन जैसे हथियारों से बचने की बात कही गई है।
इससे यह बहस और महत्वपूर्ण हो जाती है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में भीड़ नियंत्रण के लिए ऐसे साधनों का चयन किस आधार पर किया जाना चाहिए, जिनसे नागरिकों को स्थायी नुकसान होने की आशंका हो।

विकलांगता केवल शरीर की चोट नहीं
पेलेट गन से घायल व्यक्ति के लिए समस्या केवल अस्पताल और उपचार तक सीमित नहीं रहती। आंखों की रोशनी चले जाने के बाद पढ़ाई, नौकरी, आवागमन और सामाजिक जीवन प्रभावित हो सकता है। परिवार को आर्थिक और मानसिक दबाव का सामना करना पड़ सकता है।
कई पीड़ितों को ब्रेल, सहायक उपकरण, पुनर्वास और लगातार चिकित्सा सहायता की जरूरत पड़ सकती है। यानी कुछ सेकंड की पुलिस कार्रवाई का प्रभाव कई दशकों तक किसी व्यक्ति के जीवन में बना रह सकता है।
क्या लोकतांत्रिक पुलिसिंग में इसका स्थान है?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि लोकतांत्रिक सरकार को नागरिकों की सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था के साथ-साथ नागरिकों की गरिमा और मौलिक अधिकारों की भी रक्षा करनी होती है। यदि किसी हथियार का इस्तेमाल लोगों को स्थायी रूप से अंधा या विकलांग बना सकता है, तो उसके इस्तेमाल की आवश्यकता और औचित्य पर गंभीरता से विचार होना चाहिए।
कानून-व्यवस्था बनाए रखना जरूरी है, लेकिन इसके लिए अपनाए गए साधन भी संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप होने चाहिए।
बहस का केंद्र होना चाहिए मानव गरिमा
पेलेट गन पर बहस को केवल सरकार बनाम प्रदर्शनकारी या पुलिस बनाम नागरिक के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। असली सवाल मानव गरिमा का है। किसी व्यक्ति की आंखों की रोशनी, शारीरिक क्षमता, शिक्षा और भविष्य को एक ऐसी कार्रवाई के कारण हमेशा के लिए बदल देना, जिसका उद्देश्य भीड़ को नियंत्रित करना था, निश्चित रूप से गंभीर सार्वजनिक विमर्श का विषय है।
इसलिए यह सवाल लगातार सामने रहेगा कि क्या ऐसे हथियारों को केवल ‘कम घातक’ कहकर स्वीकार किया जा सकता है, या फिर उनके कारण होने वाली स्थायी विकलांगता को भी राज्य की जवाबदेही के केंद्र में रखा जाना चाहिए।
क्या अपंग बनाना कभी स्वीकार्य हो सकता है?
पेलेट गन को लेकर बहस का मूल प्रश्न यही है, क्या किसी लोकतांत्रिक राज्य को कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए ऐसे हथियार का इस्तेमाल करना चाहिए, जिसका संभावित परिणाम किसी नागरिक का अंधा होना या जीवनभर के लिए विकलांग हो जाना हो?
यह केवल पुलिसिंग का सवाल नहीं है। यह संविधान, मानवाधिकार, विकलांग व्यक्तियों की गरिमा और राज्य की जवाबदेही का सवाल है। यदि लोकतंत्र का उद्देश्य नागरिकों को सम्मान और समानता के साथ जीवन जीने का अधिकार देना है, तो ऐसी नीतियों और हथियारों पर गंभीर पुनर्विचार जरूरी है, जिनसे स्थायी विकलांगता पैदा होने का खतरा बना रहता है।

लेखक : मुरलीधरन
लेखक परिचय : मुरलीधरन विकलांगों के अधिकारों के लिए राष्ट्रीय मंच (एनपीआरडी) के महासचिव हैं। संजय पराते अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं।
संपर्क : 94242-31650
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