दिल्ली में गूंजा छत्तीसगढ़ का पंडवानी सुर, लोक संगीत सम्मेलन में सजी भारत की लोक संस्कृति
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गंजाम, ओडिशा
By ACGN – 7647981711, 9303948009
संवाददाता :- अनिल कुमार चौधरी, गंजाम
अन्वेषा कला केंद्र और इंडिया हैबिटेट सेंटर की संयुक्त पहल, तीजन बाई को श्रद्धांजलि के साथ हुआ दो दिवसीय लोक संगीत सम्मेलन
गंजाम, ACGN:- भारत की समृद्ध लोक कला, लोक संगीत और लोक परंपराओं के संरक्षण एवं प्रचार-प्रसार की दिशा में अन्वेषा कला केंद्र और इंडिया हैबिटेट सेंटर की संयुक्त पहल पर नई दिल्ली में दो दिवसीय ‘आईएचसी लोक संगीत सम्मेलन-2026’ का आयोजन किया गया। 8 और 9 अगस्त को इंडिया हैबिटेट सेंटर के स्टीन सभागार में आयोजित इस सांस्कृतिक आयोजन में देश की दो प्राचीन और विशिष्ट लोक कला परंपराओं—छत्तीसगढ़ की पंडवानी और केरल की पुल्लुवन पट्टू—ने दर्शकों को अपनी सांस्कृतिक विरासत से परिचित कराया।

सम्मेलन की पहली शाम छत्तीसगढ़ की महान पंडवानी कलाकार एवं पद्म विभूषण से सम्मानित तीजन बाई की स्मृति को समर्पित रही। तीजन बाई ने पंडवानी जैसी लोकगाथा परंपरा को देश ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए प्रसिद्ध पंडवानी कलाकार प्रभा यादव ने अपने सहयोगी कलाकारों और पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ पंडवानी की प्रस्तुति दी। प्रस्तुति के दौरान सभागार में छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति और महाभारत की लोकगाथा का प्रभावशाली रंग देखने को मिला।

उद्घाटन समारोह में इंडिया हैबिटेट सेंटर के निदेशक प्रोफेसर डॉ. के.जी. सुरेश, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के सलाहकार एवं कैबिनेट मंत्री दर्जे के वरिष्ठ पत्रकार आर. कृष्ण दास तथा धरसींवा विधायक और छत्तीसगढ़ के लोकप्रिय फिल्म अभिनेता अनुज शर्मा सहित अनेक गणमान्य लोग मौजूद रहे। उनकी उपस्थिति ने देश की पारंपरिक लोक कलाओं के प्रति बढ़ती राष्ट्रीय रुचि को भी सामने रखा।
सम्मेलन के दूसरे दिन 9 अगस्त को केरल की प्राचीन आध्यात्मिक एवं लोक परंपरा पुल्लुवन पट्टू की प्रस्तुति हुई। नाग पूजा और मंदिर परंपराओं से जुड़ी इस विशिष्ट संगीत शैली को श्री शंकरन मेमोरियल पुल्लुवन पट्टू कला समिति के सत्यनारायण पी. के नेतृत्व में कलाकारों ने प्रस्तुत किया। इस प्रस्तुति के माध्यम से दर्शकों को दक्षिण भारत की एक ऐसी लोक परंपरा से परिचित होने का अवसर मिला, जिसकी अपनी विशिष्ट धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान है।
अन्वेषा कला केंद्र की संपादक अन्वेषा ब्रह्मा ने कहा कि भारतीय लोक कला और लोककथाएं केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं हैं, बल्कि इनमें समाज का इतिहास, दर्शन, जीवन पद्धति और सामूहिक स्मृतियां जीवित रहती हैं। लोक संगीत सम्मेलन के माध्यम से ऐसी परंपराओं को राष्ट्रीय मंच उपलब्ध कराने और राजधानी के दर्शकों को भारत की सांस्कृतिक विविधता से परिचित कराने का प्रयास किया जा रहा है।
इंडिया हैबिटेट सेंटर के निदेशक डॉ. के.जी. सुरेश ने भी भारतीय लोक कलाओं को देश की महत्वपूर्ण सांस्कृतिक संपदा बताते हुए कहा कि लोक परंपराओं ने हमारी विरासत, मूल्यों और जीवन दर्शन को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाया है। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन भारत की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की समृद्धि को सामने लाने के साथ देश के अलग-अलग क्षेत्रों के लोक कलाकारों को व्यापक मंच प्रदान करते हैं।
आयोजकों के अनुसार, सेंटर फॉर इंक्वायरी आर्ट्स पिछले 25 वर्षों से भारत की शास्त्रीय और लोक कलाओं के संरक्षण, प्रचार एवं दस्तावेजीकरण के क्षेत्र में निरंतर कार्य कर रहा है। विभिन्न सांस्कृतिक उत्सवों, प्रदर्शनियों, आदान-प्रदान कार्यक्रमों और शैक्षणिक पहलों के माध्यम से देश की विविध लोक एवं शास्त्रीय कला परंपराओं को राष्ट्रीय मंच तक पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है।
नई दिल्ली में आयोजित यह सम्मेलन इस दृष्टि से भी महत्वपूर्ण रहा कि एक ही मंच पर छत्तीसगढ़ की पंडवानी और केरल की पुल्लुवन पट्टू जैसी अलग-अलग सांस्कृतिक परंपराओं को स्थान मिला। इससे भारत की सांस्कृतिक विविधता में छिपी एकता और लोक कलाओं की समृद्ध विरासत को समझने का अवसर मिला। सम्मेलन ने यह संदेश भी दिया कि आधुनिक दौर में लोक कलाओं को जीवित रखने के लिए उनके कलाकारों को मंच, सम्मान और नई पीढ़ी तक उनकी परंपराओं को पहुंचाने की निरंतर आवश्यकता है।
प्रदीप मिश्रा
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