काली हल्दी के रहस्य से खुलेंगे इलाज के नए रास्ते… आखिर सुरभि पांडेय के शोध को क्यों मिली पीएचडी की उपाधि?
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बिलासपुर, छत्तीसगढ़
By ACGN 7647981711, 9303948009
गुरु घासीदास विश्वविद्यालय ने रूरल टेक्नोलॉजी विभाग की शोधार्थी सुरभि पांडेय को पीएचडी की उपाधि प्रदान की। काली हल्दी और उसके एंडोफाइटिक कवकों पर आधारित उनका शोध भविष्य में नई एंटीबायोटिक और कैंसररोधी दवाओं के विकास में उपयोगी साबित हो सकता है।
बिलासपुर ACGN :- गुरु घासीदास विश्वविद्यालय, बिलासपुर के रूरल टेक्नोलॉजी विभाग की शोधार्थी कु. सुरभि पांडेय को उनके उत्कृष्ट शोध कार्य के लिए डॉक्टरेट (पीएचडी) की उपाधि प्रदान की गई है। उन्होंने अपना शोध कार्य विभाग के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. भास्कर चौरसिया के मार्गदर्शन में सफलतापूर्वक पूरा किया। उनके शोध का विषय “स्टडीज़ ऑन आइसोलेशन एंड आइडेंटिफिकेशन ऑफ एंडोफाइटिक फंगी एंड देयर बायोएक्टिव मॉलिक्यूल्स फ्रॉम कुरकुमा कैसीया रोबेक्स” रहा, जिसमें औषधीय पौधे कर्कुमा कैसीया (काली हल्दी) में पाए जाने वाले एंडोफाइटिक कवकों और उनके जैवसक्रिय अणुओं का वैज्ञानिक अध्ययन किया गया।

जांजगीर-चांपा जिले की निवासी सुरभि पांडेय ने अपने शोध प्रस्तुतीकरण के दौरान बताया कि काली हल्दी एक अत्यंत महत्वपूर्ण औषधीय पौधा है, जिसका उपयोग वर्षों से पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों में किया जाता रहा है। उनके शोध का उद्देश्य काली हल्दी के पत्तों और प्रकंद (राइजोम) से एंडोफाइटिक कवकों को पृथक करना, उनकी पहचान करना तथा उनके द्वारा उत्पादित जैवसक्रिय यौगिकों का विश्लेषण करना था। अध्ययन के दौरान कुल 22 एंडोफाइटिक कवकीय आइसोलेट प्राप्त किए गए, जिनकी पहचान आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों मॉर्फोलॉजिकल अध्ययन और MALDI-TOF विश्लेषण के माध्यम से की गई।
बिलासपुर ACGN :- शोध के दौरान चयनित कवकों की एंजाइम उत्पादन क्षमता और रोगाणुरोधी (Antimicrobial) गुणों का परीक्षण किया गया। इसके अलावा पौधों और कवकीय अर्क का GC-MS विश्लेषण कर अनेक महत्वपूर्ण जैवसक्रिय यौगिकों की पहचान की गई। इन यौगिकों की संभावित औषधीय उपयोगिता का मूल्यांकन HER2 प्रोटीन के विरुद्ध मॉलिक्यूलर डॉकिंग तकनीक के माध्यम से किया गया, जिसमें कई यौगिकों ने प्रभावी बाइंडिंग क्षमता प्रदर्शित की। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह शोध भविष्य में नई एंटीबायोटिक, कैंसररोधी दवाओं तथा जैव-प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

सुरभि पांडेय ने बताया कि एंडोफाइटिक कवक पौधों के ऊतकों के भीतर बिना किसी नुकसान के रहते हैं और अल्कलॉइड, टेरपेनोइड तथा फिनोलिक यौगिकों जैसे बहुमूल्य जैवसक्रिय अणुओं के प्रमुख स्रोत होते हैं। इन यौगिकों का उपयोग कैंसर, संक्रमण और अन्य गंभीर बीमारियों के उपचार के लिए नई दवाओं के विकास में किया जा सकता है। उनका शोध चिकित्सा, कृषि और जैव-प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भविष्य के अनुसंधानों के लिए भी नई संभावनाएं खोलता है।
सुरभि की इस उपलब्धि पर उनके माता-पिता ने भी गर्व व्यक्त किया। उनकी माता श्रीमती पुष्पा पांडेय शिक्षिका हैं, जबकि पिता श्री विजय पांडेय ने भी उनकी शिक्षा और शोध यात्रा में निरंतर सहयोग दिया। पीएचडी मूल्यांकन के लिए आए बाह्य परीक्षकों ने सुरभि के शोध प्रस्तुतीकरण की सराहना करते हुए कहा कि यह शोध भविष्य में वैज्ञानिक अनुसंधान और औषधि विकास के क्षेत्र में अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो सकता है।

सुरभि पांडेय की यह उपलब्धि न केवल गुरु घासीदास विश्वविद्यालय बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ के लिए गौरव का विषय है। उनका शोध यह दर्शाता है कि भारत की पारंपरिक औषधीय वनस्पतियों में छिपे वैज्ञानिक रहस्यों को आधुनिक तकनीकों के माध्यम से समझकर मानव स्वास्थ्य और चिकित्सा विज्ञान को नई दिशा दी जा सकती है।
प्रदीप मिश्रा
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