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“एसआईआर : कमजोर पर वार, लोकतंत्र पर सवाल”

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विशेष आलेख

लेखक : राजेंद्र शर्मा

भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में शायद पहली बार ऐसा हुआ है कि देश की 23 विपक्षी राजनीतिक पार्टियों को संयुक्त रूप से सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाकर लोकतंत्र की रक्षा की गुहार लगानी पड़ी है। यह केवल एक कानूनी पहल नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति गहरी चिंता का प्रतीक है। विपक्षी दलों ने अपने संयुक्त पत्र में कहा है कि यदि सर्वोच्च न्यायालय से भी न्याय नहीं मिला, तो लोकतंत्र की रक्षा के लिए शायद कोई अन्य संवैधानिक मंच शेष नहीं बचेगा।

यह स्थिति अपने आप में कई गंभीर प्रश्न खड़े करती है। जिन दलों ने यह पत्र लिखा है, वे संसद में भले ही संख्या के आधार पर विपक्ष में हों, लेकिन देश के करोड़ों मतदाताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। ऐसे में उनकी यह चिंता केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता से जुड़ा विषय बन जाती है।

चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल

विपक्षी दलों ने सबसे गंभीर प्रश्न भारत निर्वाचन आयोग की भूमिका को लेकर उठाया है। संविधान निर्माताओं ने चुनाव आयोग को स्वतंत्र एवं निष्पक्ष संस्था के रूप में स्थापित किया था, ताकि वह लोकतंत्र के सबसे महत्वपूर्ण पर्व—चुनाव—को निष्पक्ष तरीके से संपन्न करा सके।

लेकिन विपक्ष का आरोप है कि आयोग अब अपनी संवैधानिक निष्पक्षता से दूर होकर सत्ता पक्ष के अनुकूल कार्य करता दिखाई दे रहा है। विपक्ष ने इस संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय के अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ मामले का उल्लेख किया है, जिसमें न्यायालय ने मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए प्रधानमंत्री, नेता प्रतिपक्ष और भारत के मुख्य न्यायाधीश की समिति का प्रावधान किया था।

बाद में संसद द्वारा पारित नए कानून में मुख्य न्यायाधीश को इस समिति से हटाकर उनकी जगह केंद्रीय मंत्री को शामिल कर दिया गया। आलोचकों का कहना है कि इससे नियुक्ति प्रक्रिया पर कार्यपालिका का प्रभाव बढ़ गया और चुनाव आयोग की स्वतंत्रता कमजोर हुई।

एसआईआर क्या है और विवाद क्यों?

विशेष सघन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) का उद्देश्य आधिकारिक रूप से मतदाता सूची को अद्यतन और शुद्ध बनाना बताया गया। लेकिन विपक्ष और अनेक सामाजिक संगठनों का कहना है कि इसकी प्रक्रिया ऐसी बनाई गई, जिससे बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटने का खतरा पैदा हुआ।

बिहार में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले इस प्रक्रिया की शुरुआत की गई। आलोचकों का कहना है कि इतने कम समय में मतदाता सूची का व्यापक पुनरीक्षण कराना व्यावहारिक नहीं था। इसके अतिरिक्त नागरिकता से जुड़े दस्तावेजों की मांग ने यह आशंका भी पैदा की कि यह प्रक्रिया अप्रत्यक्ष रूप से नागरिकता की जांच जैसी बनती जा रही है।

विदेशी मतदाताओं का दावा और वास्तविकता

एसआईआर के समर्थन में यह तर्क दिया गया कि इससे मतदाता सूची में शामिल कथित “विदेशियों” की पहचान होगी। लेकिन आलोचकों का कहना है कि प्रक्रिया पूरी होने के बाद भी चुनाव आयोग यह स्पष्ट नहीं कर सका कि वास्तव में कितने विदेशी नागरिक मतदाता सूची में पाए गए।

इसके बावजूद इस प्रक्रिया को बिहार के बाद कई अन्य राज्यों तक विस्तारित किया गया और इसे देशव्यापी अभियान का रूप दिया गया।

सबसे अधिक असर किन पर?

लेख के अनुसार, एसआईआर का सबसे अधिक प्रभाव समाज के आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर वर्गों पर पड़ा। इनमें भूमिहीन मजदूर, गरीब परिवार, महिलाएं, दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक, प्रवासी मजदूर तथा कम शिक्षित लोग प्रमुख रूप से शामिल बताए गए हैं।

इन वर्गों के पास आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध न होने या समय पर प्रक्रिया पूरी न कर पाने के कारण बड़ी संख्या में उनके नाम मतदाता सूची से हटने की आशंका जताई गई।

लेख में दावा किया गया है कि बिहार में लगभग 65 लाख नाम मतदाता सूची से हटाए गए। इनमें मृतकों और दोहरी प्रविष्टियों वाले नाम अलग करने के बाद भी बड़ी संख्या में ऐसे मतदाता थे, जो जीवित होने के बावजूद सूची से बाहर हो गए।

बंगाल में विवाद और गहरा हुआ

लेख के अनुसार पश्चिम बंगाल में यह विवाद और अधिक गंभीर रूप लेता दिखाई दिया। यहां चुनाव आयोग ने बड़ी संख्या में मतदाताओं को “तार्किक विसंगति” नामक श्रेणी में रखा।

लेखक के अनुसार प्रारंभ में एक करोड़ से अधिक मतदाता इस श्रेणी में आ गए, जिनमें बाद में कमी जरूर आई, लेकिन लाखों मतदाता लंबे समय तक अनिश्चितता में बने रहे।

लेख में आरोप लगाया गया है कि अनेक मतदाता न्यायालय में अपील करने के बावजूद मतदान के समय तक अंतिम निर्णय प्राप्त नहीं कर सके और इस कारण मतदान के अधिकार से वंचित रह गए।

क्या यह केवल मतदाता सूची का मामला है?

लेखक का कहना है कि यदि मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया केवल तकनीकी सुधार तक सीमित रहती तो विवाद इतना बड़ा नहीं होता। लेकिन जब यही सूची विभिन्न सरकारी योजनाओं, नागरिक सुविधाओं और पहचान से जुड़ने लगती है, तब इसके दूरगामी परिणाम सामने आते हैं।

लेख में दावा किया गया है कि कुछ राज्यों में मतदाता सूची से हटे लोगों को सरकारी योजनाओं के लाभ से भी बाहर किए जाने की आशंकाएं सामने आई हैं। यदि ऐसा होता है तो यह केवल मतदान के अधिकार का नहीं, बल्कि नागरिक अधिकारों का भी प्रश्न बन सकता है।

अन्य राज्यों में भी विस्तार

लेख में कहा गया है कि बिहार और पश्चिम बंगाल के बाद यह प्रक्रिया ओडिशा, तेलंगाना, सिक्किम सहित कई राज्यों तक पहुंची। लेखक के अनुसार विभिन्न राज्यों में लाखों नाम हटाए जाने के दावे सामने आए हैं।

हालांकि इन आंकड़ों और दावों पर अलग-अलग पक्षों की अलग-अलग राय है तथा इनकी स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक मानी जाती है।

लोकतंत्र पर प्रभाव

लेखक का तर्क है कि यदि बड़ी संख्या में मतदाता चुनाव से पहले ही मताधिकार से वंचित हो जाते हैं, विशेषकर वे जो सामाजिक और आर्थिक रूप से पहले से कमजोर हैं, तो लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व प्रभावित होगा।

उनका कहना है कि लोकतंत्र केवल चुनाव कराने का नाम नहीं, बल्कि प्रत्येक पात्र नागरिक को मतदान का समान अवसर उपलब्ध कराने का नाम है। यदि बड़ी संख्या में नागरिक मतदान से बाहर हो जाते हैं तो लोकतांत्रिक व्यवस्था की मूल भावना प्रभावित होती है।

सर्वोच्च न्यायालय से अपेक्षा

लेख के अंत में लेखक ने कहा है कि विपक्षी दलों ने सर्वोच्च न्यायालय से एसआईआर प्रक्रिया पर रोक लगाने तथा चुनाव आयोग की भूमिका की समीक्षा करने का आग्रह किया है।

लेखक यह प्रश्न उठाते हैं कि क्या सर्वोच्च न्यायालय इस चुनौती को स्वीकार करते हुए लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा करेगा या नहीं। उनके अनुसार आने वाले समय में न्यायपालिका का रुख केवल इस विवाद का ही नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की दिशा का भी महत्वपूर्ण संकेतक होगा।

(यह लेख वरिष्ठ पत्रकार एवं साप्ताहिक पत्रिका ‘लोकलहर’ के संपादक राजेंद्र शर्मा के विचारों पर आधारित है। इसमें व्यक्त मत लेखक के निजी विचार हैं।)

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