छत्तीसगढ़ : दक्षिण कोसल से आधुनिक राज्य तक की गौरवगाथा – भाग-1
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संपादकीय
अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ साप्ताहिक विशेषांक
✍️ ‘कलम की धार’ ✍️
By ACGN 7647981711, 9303948009
“कलम की धार” अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ की एक विशेष साप्ताहिक श्रृंखला है, जो हर रविवार पाठकों के लिए इतिहास, संस्कृति, विरासत, जनजीवन, पर्यावरण और समसामयिक विषयों पर शोधपरक एवं जनहित के मुद्दों को निष्पक्ष, निर्भीक और सच्चाई के साथ उठाता है, व्यवस्था को आईना दिखाता है और उन सवालों को सामने लाता है जिन पर अक्सर चुप्पी साध ली जाती है।“कलम की धार” केवल शब्दों का मंच नहीं, बल्कि समाज की उन सच्चाइयों को सामने लाने का प्रयास है जिन्हें अक्सर व्यवस्था की चमक, आंकड़ों की भाषा और भाषणों के शोर में दबा दिया जाता है। यह मंच निष्पक्षता, निर्भीकता और जनहित की पत्रकारिता के लिए समर्पित है। यहां सत्ता से सवाल भी होंगे, व्यवस्था का विश्लेषण भी होगा विश्लेषणात्मक आलोचनात्मक, सच को उजागर करता भ्रष्टाचार के खिलाफ जनहित कारी लेख प्रस्तुत करती है।
आज के इस विशेष श्रृंखला में हम आपको उस धरती की हजारों वर्षों पुरानी यात्रा पर लेकर चलेंगे, जिसे आज दुनिया छत्तीसगढ़ के नाम से जानती है। यह केवल एक राज्य नहीं, बल्कि सभ्यता, संस्कृति, संघर्ष, अध्यात्म, प्रकृति और जनजातीय गौरव का जीवंत इतिहास है। इस श्रृंखला के आगामी अंकों में हम छत्तीसगढ़ के उन अनछुए पहलुओं से भी आपको परिचित कराएंगे, जिनकी चर्चा सामान्यतः इतिहास की पुस्तकों में बहुत कम मिलती है।
5 भागों में प्रस्तुत होगी “छत्तीसगढ़ की संपूर्ण यात्रा”
आज का विषय – भाग–1 : प्राचीन छत्तीसगढ़ दक्षिण कोसल से शुरुआत तक
क्या वास्तव में छत्तीसगढ़ केवल 1 नवम्बर 2000 को बना राज्य है, या इसकी कहानी हजारों वर्ष पुरानी है?
लेखक : प्रदीप मिश्रा
जब भी छत्तीसगढ़ का नाम आता है, अधिकांश लोगों के मन में 1 नवम्बर 2000 की वह तारीख उभरती है, जब मध्यप्रदेश से अलग होकर भारत के 26वें राज्य के रूप में छत्तीसगढ़ अस्तित्व में आया। लेकिन क्या छत्तीसगढ़ की पहचान केवल 25-26 वर्षों पुरानी है? क्या इसकी कहानी सिर्फ एक प्रशासनिक राज्य बनने तक सीमित है? यदि ऐसा सोचते हैं तो यह छत्तीसगढ़ के विशाल इतिहास के साथ अन्याय होगा।
सच्चाई यह है कि छत्तीसगढ़ का इतिहास हजारों वर्षों पुराना है। यह वह भूमि है जहां प्राचीन सभ्यताओं के पदचिह्न मिलते हैं, जहां रामायण की स्मृतियां आज भी लोकगीतों में जीवित हैं, जहां जंगलों की गहराइयों में आज भी अनगिनत ऐतिहासिक रहस्य छिपे हुए हैं, और जहां की नदियां सदियों से संस्कृति और सभ्यता को सींचती आ रही हैं।
आज का छत्तीसगढ़ आधुनिक भारत का एक महत्वपूर्ण राज्य है, लेकिन इसका अतीत दक्षिण कोसल, दंडकारण्य, कल्चुरी साम्राज्य, हैहयवंशी शासन और आदिवासी संस्कृति की गौरवशाली परंपराओं से जुड़ा हुआ है।
दक्षिण कोसल : छत्तीसगढ़ का सबसे प्राचीन नाम
इतिहासकारों और प्राचीन ग्रंथों के अनुसार छत्तीसगढ़ का सबसे पुराना और व्यापक रूप से मान्य नाम दक्षिण कोसल था। रामायण, महाभारत, पुराणों और अनेक ऐतिहासिक अभिलेखों में दक्षिण कोसल का उल्लेख मिलता है।
प्राचीन भारत में कोसल एक अत्यंत समृद्ध और शक्तिशाली राज्य था। इसका उत्तरी भाग वर्तमान उत्तर प्रदेश के अयोध्या क्षेत्र तक फैला हुआ था, जबकि दक्षिणी भाग वर्तमान छत्तीसगढ़ के अधिकांश भूभाग को समाहित करता था। यही कारण है कि इस क्षेत्र को दक्षिण कोसल कहा गया।
इतिहासकार मानते हैं कि दक्षिण कोसल केवल राजनीतिक इकाई नहीं था, बल्कि यह संस्कृति, धर्म, व्यापार और ज्ञान का भी प्रमुख केंद्र था। यहां के नगरों और बस्तियों में विकसित सामाजिक जीवन के प्रमाण आज भी विभिन्न पुरातात्विक स्थलों पर मिलते हैं।
भगवान राम और छत्तीसगढ़ का संबंध
छत्तीसगढ़ की पहचान का सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक पक्ष भगवान श्रीराम से जुड़ा हुआ है। लोकमान्यताओं और प्राचीन परंपराओं के अनुसार भगवान राम की माता माता कौशल्या का जन्म वर्तमान रायपुर जिले के चंदखुरी क्षेत्र में हुआ था। यही कारण है कि छत्तीसगढ़ को भगवान राम का ननिहाल भी कहा जाता है।
आज चंदखुरी में स्थित कौशल्या माता मंदिर पूरे देश में श्रद्धा का केंद्र बन चुका है। यहां प्रतिवर्ष हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं। रामायण में वर्णित वनवास काल के दौरान भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण ने दंडकारण्य क्षेत्र में लंबा समय व्यतीत किया था। वर्तमान बस्तर, कांकेर, गरियाबंद, धमतरी और आसपास के अनेक क्षेत्रों को रामायण कालीन घटनाओं से जोड़कर देखा जाता है। छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में आज भी राम कथा केवल धार्मिक आस्था नहीं बल्कि लोकजीवन का हिस्सा है। यहां के लोकगीतों, लोकनाट्यों और परंपराओं में रामायण की छाप स्पष्ट दिखाई देती है।
दंडकारण्य : रहस्यमयी वनभूमि की कहानी
यदि छत्तीसगढ़ के इतिहास को समझना है तो दंडकारण्य को समझना आवश्यक है। दंडकारण्य केवल एक जंगल नहीं था, बल्कि यह हजारों वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ विशाल वन क्षेत्र था। इसका विस्तार वर्तमान छत्तीसगढ़, ओडिशा, महाराष्ट्र, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश तक माना जाता है। रामायण में दंडकारण्य का उल्लेख अनेक बार मिलता है। यही वह क्षेत्र था जहां ऋषि-मुनियों के आश्रम स्थित थे और जहां राक्षसों के अत्याचारों की कथाएं भी वर्णित हैं।
आज भी बस्तर के घने जंगलों में ऐसी अनेक जनश्रुतियां सुनने को मिलती हैं जो रामायण काल की स्मृतियों को जीवित रखे हुए हैं।
प्रकृति ने क्यों बनाया छत्तीसगढ़ को विशेष?
भारत के अधिकांश क्षेत्रों की तुलना में छत्तीसगढ़ को प्रकृति ने विशेष रूप से समृद्ध बनाया है।
आज राज्य का लगभग 44 प्रतिशत क्षेत्र वनाच्छादित है। घने जंगल, विशाल पर्वत श्रृंखलाएं, जलप्रपात, नदियां और जैव विविधता इस प्रदेश की पहचान हैं। महानदी, शिवनाथ, इंद्रावती, हसदेव, अरपा, पैरी, केलो और मांड जैसी नदियां इस धरती को जीवन देती हैं।
इन्हीं प्राकृतिक संसाधनों ने हजारों वर्षों से यहां मानव बस्तियों के विकास को संभव बनाया। यही कारण है कि प्राचीन काल से ही यह क्षेत्र सभ्यता और संस्कृति के लिए अनुकूल माना जाता रहा है।
क्या जंगलों में अभी भी छिपा है छत्तीसगढ़ का असली इतिहास?
यह प्रश्न आज भी इतिहासकारों और पुरातत्वविदों के लिए आकर्षण का विषय बना हुआ है। छत्तीसगढ़ के अनेक वन क्षेत्रों में आज भी ऐसे पुरातात्विक स्थल मौजूद हैं जिनका पूर्ण अध्ययन नहीं हो पाया है। रायगढ़ की सीताबेंगा गुफाएं, जोगीमारा गुफाएं, बस्तर के प्राचीन अवशेष, सिरपुर के पुरास्थल और अनेक अनखोजे स्थल यह संकेत देते हैं कि छत्तीसगढ़ का इतिहास अभी पूरी तरह सामने नहीं आया है। संभव है कि आने वाले वर्षों में यहां से ऐसे साक्ष्य प्राप्त हों जो भारतीय इतिहास की कई धारणाओं को नई दिशा दें।
छत्तीसगढ़ : केवल आदिवासी प्रदेश नहीं, बल्कि सभ्यताओं का संगम
अक्सर छत्तीसगढ़ को केवल आदिवासी प्रदेश के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, जबकि वास्तविकता इससे कहीं व्यापक है। यहां आदिवासी संस्कृति निस्संदेह सबसे महत्वपूर्ण पहचान है, लेकिन इसके साथ-साथ यह भूमि वैदिक परंपरा, बौद्ध धर्म, जैन धर्म, शैव परंपरा, वैष्णव संस्कृति और लोक आस्थाओं का भी संगम रही है। यही विविधता छत्तीसगढ़ को भारत के सबसे विशिष्ट सांस्कृतिक क्षेत्रों में शामिल करती है।
आधुनिक छत्तीसगढ़ और इतिहास के सामने खड़ी चुनौतियां
आज छत्तीसगढ़ खनिज संपदा के कारण देश के सबसे महत्वपूर्ण औद्योगिक राज्यों में शामिल है।कोयला, लौह अयस्क, बॉक्साइट, डोलोमाइट, टिन, लिथियम और यूरेनियम जैसे खनिज यहां प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं। लेकिन एक बड़ा प्रश्न भी हमारे सामने खड़ा है।
क्या विकास की दौड़ में हम अपने इतिहास, अपने जंगलों और अपनी सांस्कृतिक धरोहर को खोते जा रहे हैं?
क्या आने वाली पीढ़ियां उन पुरातात्विक स्थलों को देख पाएंगी जो आज भी जंगलों के बीच सुरक्षित हैं?
क्या आधुनिकता और विरासत के बीच संतुलन बना रहेगा?
इन्हीं प्रश्नों के उत्तर खोजने की कोशिश इस पूरी श्रृंखला में की जाएगी।
अभी तो यह शुरुआत है…
आज हमने केवल उस विशाल इतिहास के द्वार पर दस्तक दी है जिसे दुनिया छत्तीसगढ़ के नाम से जानती है।
लेकिन असली कहानी अभी शुरू भी नहीं हुई है।
अगले अंक में हम आपको लेकर चलेंगे उस समय में जब इतिहास की किताबें लिखी भी नहीं गई थीं। हम जानेंगे कि छत्तीसगढ़ में मानव सभ्यता के सबसे पुराने प्रमाण कहां मिले, सीताबेंगा और जोगीमारा गुफाएं क्यों पूरी दुनिया के इतिहासकारों को आकर्षित करती हैं, मौर्य साम्राज्य और सम्राट अशोक का इस क्षेत्र से क्या संबंध था, और कैसे दक्षिण कोसल धीरे-धीरे भारत की महान सांस्कृतिक शक्तियों में शामिल हुआ।
क्रमशः…
अगले अंक में पढ़िए
“प्रागैतिहासिक छत्तीसगढ़ से मौर्य साम्राज्य तक : जब जंगलों के बीच जन्म ले रही थी एक महान सभ्यता”
(जारी…)
प्रदीप मिश्रा (संपादक)। निष्पक्ष, निर्भीक और सच्ची खबर, हर खबर पर तिरछी नजर। जनहित के प्रति समर्पित पत्रकारिता के साथ देश में तेजी से बढ़ता विश्वसनीय वेब पोर्टल अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़।
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