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“एचआर की डिग्री, वित्त विभाग की कुर्सी पावर ट्रांसमिशन में प्रमोशन या पोस्टिंग का नया ‘मैनेजमेंट मॉडल’?”

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रायपुर। छत्तीसगढ़

रायपुर: छत्तीसगढ़ पावर ट्रांसमिशन कंपनी में हाल ही में हुए पदोन्नति आदेश अब प्रशंसा से ज्यादा प्रश्नों के घेरे में आ गए हैं। प्रशासनिक अधिकारी/सहायक प्रबंधक (एचआर) से वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी/प्रबंधक (एचआर) पद पर 14 अधिकारियों के प्रमोशन के बाद जारी की गई पोस्टिंग सूची ने विभागीय व्यवस्था और नियमों की व्याख्या को लेकर नई बहस खड़ी कर दी है।
मामला केवल पदोन्नति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसके बाद की गई पदस्थापना ने पूरे सिस्टम पर सवालिया निशान लगा दिया है। आरोपों के अनुसार पोस्टिंग ऐसे स्थानों पर की गई है, जहां संवर्गीय योग्यता, विभागीय संरचना और स्वीकृत पदों की स्पष्टता पर ही सवाल उठ रहे हैं।


छत्तीसगढ़ विद्युत सेवानिवृत्त कर्मचारी-अधिकारी संघ (महासंघ) ने इस पूरी प्रक्रिया पर कड़ा ऐतराज जताते हुए पावर ट्रांसमिशन कंपनी के चेयरमैन को पत्र लिखा है। संघ ने पोस्टिंग व्यवस्था को “विसंगतियों से भरी हुई प्रशासनिक पहेली” बताया है, जिसमें नियम कम और व्याख्याएं ज्यादा दिखाई दे रही हैं।
संघ के प्रदेश महामंत्री पुनारद राम साहू ने स्पष्ट कहा है कि जनरेशन कंपनी में एचआर संवर्ग के लिए स्वीकृत और रिक्त पद मौजूद होने के बावजूद कुछ अधिकारियों को वहां पदस्थ नहीं किया गया। इसके बजाय उन्हें ट्रांसमिशन कंपनी में ही बनाए रखने का निर्णय लिया गया,

जिस पर सवाल उठ रहा है कि जब मूल कंपनी में जगह थी, तो दूसरी कंपनी में पदस्थापना का आधार क्या रहा?

सबसे ज्यादा विवाद उस निर्णय को लेकर है जिसमें एचआर संवर्ग के अधिकारियों को वितरण कंपनी के वित्त विभाग में पदस्थ किया गया है। संघ का कहना है कि यह न केवल सेवा नियमों और भर्ती नियमों की मूल भावना के विपरीत है, बल्कि यह भी स्पष्ट नहीं करता कि एचआर संवर्ग के अधिकारी वित्त जैसे तकनीकी और विशिष्ट विभाग में किस आधार पर तैनात किए जा रहे हैं।
यही नहीं, संघ ने यह भी गंभीर प्रश्न उठाया है कि एक तरफ जनरेशन कंपनी में तकनीकी अभियंता एचआर जैसे प्रशासनिक कार्य देख रहे हैं, और दूसरी तरफ एचआर संवर्ग के योग्य अधिकारी वित्त विभाग में “नई जिम्मेदारियों का अनुभव” प्राप्त कर रहे हैं। इस पूरी व्यवस्था को संघ ने संवर्गीय ढांचे की स्पष्टता पर चोट बताया है।

छत्तीसगढ़ विद्युत सेवानिवृत्त कर्मचारी-अधिकारी संघ (महासंघ) ने इस पूरी प्रक्रिया को “विसंगतियों से भरी प्रशासनिक पहेली” बताते हुए पावर ट्रांसमिशन कंपनी के चेयरमैन को पत्र लिखकर आपत्ति जताई है। महासंघ के प्रदेश महामंत्री पुनारद राम साहू ने कहा कि जनरेशन कंपनी में एचआर संवर्ग के स्वीकृत एवं रिक्त पद उपलब्ध होने के बावजूद अधिकारियों को वहां पदस्थ नहीं किया गया, जबकि दूसरी कंपनियों और विभागों में समायोजन किया जा रहा है।

ऐसे में सवाल उठता है कि जब मूल कंपनी में रिक्तियां मौजूद हैं तो फिर दूसरी कंपनी या दूसरे संवर्ग में पदस्थापना का आधार क्या है?

संघ ने यह भी गंभीर मुद्दा उठाया है कि एक ओर तकनीकी अभियंताओं को एचआर और प्रशासनिक कार्यों में वर्षों से बैठाया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर एचआर संवर्ग के अधिकारियों को वित्त विभाग जैसी तकनीकी प्रकृति वाली शाखाओं में जिम्मेदारी दी जा रही है। विभागीय सूत्रों के अनुसार कई तकनीकी इंजीनियर लंबे समय से फील्ड कार्य छोड़ कार्यालयों में पदस्थ हैं, जबकि मैदानी कार्यों और तकनीकी निगरानी वाले पदों पर रिक्तियां बनी हुई हैं। इससे न केवल तकनीकी कार्य प्रभावित हो रहे हैं, बल्कि संवर्गीय संतुलन भी बिगड़ रहा है।
सूत्रों का कहना है कि जनरेशन, ट्रांसमिशन और अन्य विद्युत कंपनियों में कई अधिकारी वर्षों से एक ही पद और एक ही स्थान पर जमे हुए हैं। अन्य कंपनियों एवं इकाइयों में रिक्त पद होने के बावजूद उनका स्थानांतरण नहीं किया जा रहा।

विभाग के भीतर इसे लेकर यह चर्चा तेज है कि आखिर लंबे समय से जमे अधिकारियों को संरक्षण किस आधार पर मिल रहा है? क्या यह केवल प्रशासनिक सुविधा है या फिर इसके पीछे कोई आंतरिक ‘मैनेजमेंट मॉडल’ काम कर रहा है?

कर्मचारी संगठनों का आरोप है कि कुछ अधिकारी अपने प्रभाव और नेटवर्क के कारण वर्षों तक मनचाही पोस्टिंग पर बने रहते हैं, जबकि अन्य कर्मचारियों को नियमित रूप से स्थानांतरण का सामना करना पड़ता है। इससे विभाग के भीतर असंतोष की स्थिति बन रही है। संघ का कहना है कि यदि स्वीकृत पद, भर्ती नियम और संवर्गीय संरचना स्पष्ट हैं, तो फिर पोस्टिंग और जिम्मेदारियों के निर्धारण में बार-बार नियमों की “नई व्याख्या” क्यों की जा रही है?
पूरे मामले ने अब विद्युत कंपनियों की प्रशासनिक कार्यप्रणाली और मानव संसाधन प्रबंधन पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। कर्मचारी संगठनों ने मांग की है कि संवर्गीय नियमों के अनुरूप पारदर्शी पदस्थापना नीति बनाई जाए तथा वर्षों से एक ही स्थान पर जमे अधिकारियों की समीक्षा कर आवश्यक स्थानांतरण किए जाएं। फिलहाल कंपनी प्रबंधन की ओर से इस विवाद पर कोई विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन बढ़ते सवालों ने इस पदस्थापना सूची को एक सामान्य प्रशासनिक आदेश से कहीं अधिक बड़ा मुद्दा बना दिया है।
सेवानिवृत्त अधिकारी संघ का कहना है कि जब स्वीकृत पद, निर्धारित योग्यता और संवर्गीय नियम स्पष्ट हैं, तो फिर पोस्टिंग में इस तरह की “रचनात्मक व्याख्या” क्यों अपनाई जा रही है। उनका इशारा साफ है कि यह केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि व्यवस्था की उस खामोश परंपरा का हिस्सा है जिसमें नियमों को सुविधा अनुसार मोड़ा जाता है।
फिलहाल कंपनी प्रबंधन की ओर से इस पूरे मामले में कोई विस्तृत आधिकारिक सफाई सामने नहीं आई है, लेकिन कर्मचारी संगठनों के बढ़ते सवालों ने इस पोस्टिंग सूची को एक साधारण आदेश से बढ़ाकर विवादित प्रशासनिक उदाहरण में बदल दिया है।

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