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पंडो जनजाति की जमीन कथित रूप से गैर आदिवासी को बेचे जाने का मामला, प्रशासनिक प्रक्रिया पर गंभीर सवाल

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रायगढ़, छत्तीसगढ़

By ACGN 7647981711, 9303948009

संवाददाता
कापू के डूमरनारा गांव में विशेष पिछड़ी जनजाति की भूमि के हस्तांतरण में नियमों की अनदेखी के आरोप, रिकॉर्ड प्रक्रिया और नामांतरण पर उठी उंगली

रायगढ़ ACGN:- रायगढ़ जिले के कापू तहसील क्षेत्र के डूमरनारा गांव में विशेष पिछड़ी जनजाति पंडो समुदाय की भूमि के कथित अवैध हस्तांतरण का मामला सामने आने के बाद प्रशासनिक प्रक्रियाओं की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। ग्रामीणों के अनुसार इस पूरे प्रकरण में भूमि रिकॉर्ड, रजिस्ट्री और नामांतरण प्रक्रिया में कई स्तरों पर लापरवाही और संदिग्ध गतिविधियों की आशंका जताई जा रही है।
जानकारी के अनुसार यह भूमि मूल रूप से पंडो जनजाति की महिला रुधनी बेवा के नाम दर्ज थी, जो विशेष पिछड़ी जनजाति समूह में शामिल है और जिनकी भूमि सुरक्षा के लिए राज्य एवं केंद्र सरकार द्वारा विशेष प्रावधान किए गए हैं। आरोप है कि इस भूमि को पहले स्थानीय स्तर पर किसी अन्य व्यक्ति के नाम हस्तांतरित किया गया और उसके बाद इसे रायपुर निवासी एक व्यक्ति के नाम रजिस्ट्री कर दिया गया।
ग्रामीणों का कहना है कि इस पूरी प्रक्रिया में सबसे गंभीर बात यह है कि भूमि हस्तांतरण से पहले आवश्यक शासकीय अनुमति, विशेष रूप से कलेक्टर स्तर की पूर्व स्वीकृति नहीं ली गई, जबकि आदिवासी एवं विशेष पिछड़ी जनजाति की भूमि के हस्तांतरण के लिए यह अनिवार्य प्रक्रिया मानी जाती है।
सूत्रों के अनुसार रजिस्ट्री से पहले राजस्व रिकॉर्ड की जांच प्रक्रिया में भी गंभीर चूक सामने आई है। पटवारी स्तर पर खसरा रिकॉर्ड की अद्यतन स्थिति, भूमि स्वामित्व का स्पष्ट सत्यापन और जातिगत भूमि संरक्षण संबंधी प्रावधानों की जांच किए बिना ही दस्तावेज आगे बढ़ाए जाने के आरोप लगाए जा रहे हैं।
इसके बाद तहसील स्तर पर नामांतरण प्रक्रिया भी अत्यंत तेज गति से पूर्ण किए जाने की बात सामने आई है। बताया जा रहा है कि रजिस्ट्री के कुछ ही दिनों के भीतर नामांतरण नोटिस जारी कर दिया गया, जिससे यह आशंका और गहरी हो गई है कि पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव रहा।
प्रशासनिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो आदिवासी एवं विशेष पिछड़ी जनजातियों की भूमि के हस्तांतरण के लिए राजस्व संहिता के तहत कठोर नियम लागू हैं, जिनमें पूर्व अनुमति, विस्तृत जांच, जनजातीय सुरक्षा प्रावधानों की समीक्षा और सक्षम अधिकारी की स्वीकृति आवश्यक होती है। इसके बावजूद यदि बिना इन प्रक्रियाओं के रजिस्ट्री और नामांतरण हुए हैं, तो यह सीधे तौर पर प्रशासनिक निगरानी व्यवस्था पर प्रश्न खड़ा करता है।
ग्रामीणों का यह भी आरोप है कि इस पूरे क्षेत्र में एक संगठित दलाल तंत्र सक्रिय है, जो कमजोर वर्गों की भूमि की पहचान कर बाहरी व्यक्तियों के नाम पर रजिस्ट्री कराने में भूमिका निभाता है। यह तंत्र कथित रूप से राजस्व रिकॉर्ड की जानकारी का उपयोग कर दस्तावेजों को आगे बढ़ाने में मदद करता है।
इस मामले ने यह भी उजागर किया है कि विशेष पिछड़ी जनजातियों के संरक्षण के लिए चलाई जा रही योजनाओं और पीएम जनमन योजना जैसे कार्यक्रमों के बावजूद जमीनी स्तर पर भूमि अधिकारों की सुरक्षा चुनौतीपूर्ण बनी हुई है।
स्थानीय स्तर पर अब इस पूरे प्रकरण की उच्च स्तरीय जांच की मांग तेज हो गई है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि रजिस्ट्री और नामांतरण प्रक्रिया में किस स्तर पर चूक हुई और किन अधिकारियों की भूमिका संदिग्ध रही।
ग्रामीणों ने मांग की है कि यदि जांच में अनियमितता सिद्ध होती है तो पूरी रजिस्ट्री निरस्त कर दोषियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकी जा सके।

प्रदीप मिश्रा
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