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जमीन आपके नाम, अधिकार पंचायत के पास – फिर तहसील के चक्कर क्यों काट रहे हैं ग्रामीण?

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कोरबा, छत्तीसगढ़

By ACGN – 7647981711, 9303948009

विशेष रिपोर्ट

30 अप्रैल 2025 को राजपत्र में संशोधन कर ग्राम पंचायतों को मिला था अविवादित नामांतरण और खाता विभाजन का अधिकार, लेकिन डेढ़ साल बाद भी कोरबा में केवल 48 आवेदन। अब शासन ने कलेक्टरों और जिला पंचायत सीईओ को प्रचार-प्रसार, प्रशिक्षण और शत-प्रतिशत निराकरण के निर्देश दिए।

कोरबा ACGN:- छत्तीसगढ़ शासन ने ग्रामीणों को जमीन संबंधी राजस्व कार्यों के लिए तहसील कार्यालयों के चक्कर लगाने से राहत देने की दिशा में 30 अप्रैल 2025 को एक महत्वपूर्ण कदम उठाया था। इस दिन छत्तीसगढ़ असाधारण राजपत्र क्रमांक 396-अ में संशोधन प्रकाशित कर ग्राम पंचायतों को अविवादित नामांतरण और खाता विभाजन से जुड़े कार्यों के लिए अधिकृत किया गया था। इस व्यवस्था का उद्देश्य ग्रामीणों को उनकी ग्राम पंचायत में ही सुविधा उपलब्ध कराना और अनावश्यक भागदौड़ से बचाना था।

लेकिन शासन के इस महत्वपूर्ण निर्णय के बावजूद जमीनी स्तर पर इसकी जानकारी आम ग्रामीणों तक कितनी पहुंची, यह सवाल अब सामने आने लगा है। पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग ने 2 नवंबर 2026 को जारी विभागीय पत्र के माध्यम से कलेक्टरों और जिला पंचायतों के मुख्य कार्यपालन अधिकारियों को इस व्यवस्था का व्यापक प्रचार-प्रसार कराने, सरपंचों एवं पंचायत सचिवों को राजस्व अमले के माध्यम से प्रशिक्षण दिलाने तथा प्राप्त आवेदनों का शत-प्रतिशत निराकरण सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं।


कोरबा में केवल 48 आवेदन, कई जिलों में स्थिति कमजोर
विभागीय पत्र के अनुसार कोरबा जिले की ग्राम पंचायतों में अब तक अविवादित नामांतरण के केवल 48 आवेदन प्राप्त हुए हैं। सुकमा और नारायणपुर में एक-एक, बीजापुर और सक्ती में 9-9, बेमेतरा में 17, दंतेवाड़ा में 29 तथा सरगुजा में 27 आवेदन दर्ज किए गए हैं। वहीं दूसरी ओर रायगढ़, राजनांदगांव, दुर्ग और जशपुर जैसे जिलों में प्रतिमाह 500 से अधिक आवेदन मिलने की जानकारी विभाग ने दी है।


ये आंकड़े साफ बताते हैं कि जहां कुछ जिलों में ग्रामीण इस सुविधा का लाभ उठा रहे हैं, वहीं कई जिलों में अभी भी लोगों तक इसकी जानकारी नहीं पहुंच पाई है। सवाल यह है कि जब शासन ने ग्रामीणों की सुविधा के लिए पंचायतों को अधिकार दे दिए हैं, तो फिर कोरबा जैसे जिले में आवेदन की संख्या इतनी कम क्यों है?
आखिर पंचायत को क्या अधिकार मिला है?
छत्तीसगढ़ शासन के 30 अप्रैल 2025 के राजपत्र संशोधन के अनुसार ग्राम पंचायतों को अविवादित नामांतरण और खाता विभाजन से जुड़े कार्यों के लिए अधिकृत किया गया है। सरल शब्दों में समझें तो यदि किसी जमीन के मालिकाना हक को लेकर परिवार या अन्य पक्षों के बीच कोई विवाद नहीं है, तो संबंधित व्यक्ति अपनी ग्राम पंचायत में जाकर इस सुविधा के तहत आवेदन कर सकता है।
जमीन खरीदने, विरासत में मिलने या परिवार में बंटवारे के बाद नामांतरण और खाता विभाजन की जरूरत पड़ती है। ऐसी स्थिति में अविवादित प्रकरणों के लिए ग्रामीण ग्राम पंचायत से संपर्क कर सकते हैं। हालांकि विवादित जमीन के मामले इस व्यवस्था के अंतर्गत नहीं आएंगे। आवेदन की पात्रता, जरूरी दस्तावेज और निर्धारित प्रक्रिया की जानकारी संबंधित ग्राम पंचायत से प्राप्त की जा सकती है।
         अब पंचायत सचिवों की जिम्मेदारी भी होगी तय!
विभाग ने सरपंचों और पंचायत सचिवों को राजस्व अमले के माध्यम से प्रशिक्षण देने तथा गांव-गांव तक इस सुविधा का प्रचार करने के निर्देश दिए हैं। लेकिन केवल प्रशिक्षण और सरकारी आदेश जारी करने से व्यवस्था नहीं सुधरेगी। इसके लिए पंचायत स्तर पर जिम्मेदारी और जवाबदेही भी तय करनी होगी।
पंचायत सचिवों को अपने निर्धारित पंचायत सचिवालय में नियमित रूप से उपस्थित रहना चाहिए, ताकि ग्रामीणों को आवेदन देने, जरूरी दस्तावेजों की जानकारी लेने और अपनी समस्याएं बताने के लिए इधर-उधर भटकना न पड़े। प्रत्येक पंचायत में नामांतरण और खाता विभाजन से संबंधित आवेदनों का पंजीयन हो तथा प्राप्त आवेदनों पर नियमानुसार कार्रवाई कर समय पर निराकरण सुनिश्चित किया जाए।
जिला प्रशासन को भी पंचायत सचिवों की उपस्थिति, प्रशिक्षण और इस व्यवस्था के क्रियान्वयन की नियमित निगरानी करनी चाहिए। आखिर जब शासन ने अधिकार सौंपे हैं, तो उनका लाभ जनता तक पहुंचाने की जिम्मेदारी भी संबंधित अधिकारियों और पंचायत प्रतिनिधियों की ही है।
     जनता भी जागरूक बने, अपने अधिकार का लाभ उठाए
ग्रामीणों से अपील है कि यदि उन्हें जमीन का अविवादित नामांतरण या खाता विभाजन कराना है, तो सबसे पहले अपने ग्राम पंचायत के सरपंच या सचिव से संपर्क करें। इस सुविधा की जानकारी लें, जरूरी दस्तावेजों के बारे में पूछें और पात्र होने पर आवेदन प्रस्तुत करें।
यदि पंचायत में इस संबंध में जानकारी नहीं दी जाती या पंचायत सचिवालय में सचिव नियमित रूप से उपलब्ध नहीं रहते, तो इसकी शिकायत संबंधित जनपद पंचायत अथवा जिला पंचायत में की जा सकती है। ग्रामीणों को भी चाहिए कि वे अपने अधिकारों के प्रति जागरूक रहें और इस सुविधा की जानकारी दूसरे लोगों तक भी पहुंचाएं।
       अब सवाल प्रशासन से भी और पंचायतों से भी!
जब शासन ने 30 अप्रैल 2025 को ही ग्राम पंचायतों को अविवादित नामांतरण और खाता विभाजन का अधिकार दे दिया था, तो फिर डेढ़ साल बाद भी ग्रामीणों को इसकी पूरी जानकारी क्यों नहीं मिल पाई? कोरबा जिले में अब तक केवल 48 आवेदन ही क्यों आए? क्या पंचायत स्तर पर इसका पर्याप्त प्रचार-प्रसार नहीं किया गया? क्या सरपंच और पंचायत सचिव ग्रामीणों को इस अधिकार की जानकारी दे रहे हैं? क्या पंचायत सचिव अपने निर्धारित सचिवालय में नियमित बैठ रहे हैं? और क्या जिला प्रशासन इस पूरी व्यवस्था की प्रभावी निगरानी कर रहा है?
यह भी समझना जरूरी है कि शासन का अधिकार देना और आम जनता को उस अधिकार का लाभ मिलना, दोनों अलग-अलग बातें हैं। यदि सरकारी योजनाओं और सुविधाओं की जानकारी लोगों तक नहीं पहुंचेगी, तो कागजों पर बनी व्यवस्था का जमीनी लाभ आखिर किसे मिलेगा?
          अब आदेश नहीं, जमीन पर परिणाम चाहिए!
सरकार का उद्देश्य तभी पूरा होगा, जब ग्रामीणों को छोटी-छोटी राजस्व संबंधी प्रक्रियाओं के लिए अनावश्यक रूप से तहसील कार्यालयों के चक्कर न लगाने पड़ें। ग्राम पंचायत सचिवालय केवल सरकारी भवन बनकर न रह जाए, बल्कि ग्रामीणों की समस्याओं के समाधान का केंद्र बने। इसके लिए पंचायत सचिवों की नियमित उपस्थिति, सरपंचों की सक्रियता, राजस्व अमले का सहयोग और जिला प्रशासन की जवाबदेही बेहद जरूरी है।
याद रखिए, अविवादित जमीन के नामांतरण और खाता विभाजन की सुविधा के संबंध में अपनी ग्राम पंचायत में जानकारी लेना आपका अधिकार है। जागरूक बनिए, अपने अधिकार का लाभ उठाइए और दूसरों को भी इसकी जानकारी दीजिए। क्योंकि अधिकार तभी सार्थक होते हैं, जब उनका लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचता है।


प्रदीप मिश्रा [संपादक]
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