शरद पूर्णिमा की चांदनी में आस्था और अमृत वर्षा का विश्वास -मुरमुंडा आश्रम के महंत श्री त्यागी जी महाराज
|
😊 कृपया इस न्यूज को शेयर करें😊
|
डोंगरगढ़, राजनांदगांव।
By ACGN 7647 98171193039 48009
शरद पूर्णिमा हिंदू सनातन परंपरा में विशेष महत्व रखने वाला पर्व है। आश्विन मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला यह पर्व चंद्रमा की शीतल चांदनी, माता लक्ष्मी की आराधना, भगवान श्रीकृष्ण की रासलीला और ‘अमृत वर्षा’ की धार्मिक मान्यता से जुड़ा हुआ है। इस अवसर पर श्रद्धालु रात्रि में जागरण, भजन-कीर्तन, पूजा-अर्चना, चंद्रमा को अर्घ्य और खीर का भोग लगाने जैसी परंपराओं का पालन करते हैं।
डोंगरगढ़ के समीप स्थित मुरमुंडा आश्रम के महंत श्री त्यागी जी महाराज ने शरद पूर्णिमा के धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्व के संबंध में जानकारी देते हुए बताया कि यह पूर्णिमा सनातन संस्कृति में अत्यंत पवित्र मानी गई है। उनके अनुसार शरद पूर्णिमा केवल चंद्रमा की पूजा का पर्व नहीं, बल्कि मनुष्य को अपने भीतर की चेतना, भक्ति और सकारात्मक ऊर्जा को जागृत करने का अवसर भी प्रदान करती है।

‘कोजागरी’ पूर्णिमा के नाम से भी प्रसिद्ध
महंत श्री त्यागी जी महाराज के अनुसार शरद पूर्णिमा को कई स्थानों पर कोजागरी पूर्णिमा भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस रात माता लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण करती हैं और यह देखती हैं कि कौन जागकर भगवान का स्मरण एवं भजन कर रहा है। इसी मान्यता के कारण इस रात जागरण की परंपरा चली आ रही है।
उन्होंने बताया कि शरद पूर्णिमा का संबंध भगवान श्रीकृष्ण की रासलीला से भी जोड़ा जाता है। ब्रज परंपरा में इस पूर्णिमा की विशेष महिमा बताई गई है और इसे रास पूर्णिमा के रूप में भी जाना जाता है।

चंद्रमा की किरणों को माना जाता है अमृतमयी
महंत श्री त्यागी जी महाराज ने बताया कि शरद पूर्णिमा की सबसे प्रमुख लोक-मान्यताओं में से एक ‘अमृत वर्षा’ है। धार्मिक विश्वास के अनुसार इस रात चंद्रमा की किरणों में विशेष शीतलता और अमृतमयी प्रभाव माना जाता है।
इसी विश्वास के चलते शरद पूर्णिमा की रात दूध और चावल से बनी खीर को चंद्रमा की रोशनी में रखने की परंपरा है। बाद में इसे भगवान को भोग लगाकर प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है।
हालांकि, इस मान्यता को धार्मिक और आध्यात्मिक विश्वास के रूप में देखा जाता है। वैज्ञानिक दृष्टि से चंद्रमा की किरणों से खीर में किसी विशेष ‘अमृत’ के बनने का प्रमाण नहीं है। इसलिए परंपरा निभाते समय स्वच्छता और खाद्य सुरक्षा का विशेष ध्यान रखना भी आवश्यक है।

कैसे करें शरद पूर्णिमा की पूजा?
महंत श्री त्यागी जी महाराज के अनुसार शरद पूर्णिमा के दिन श्रद्धालुओं को प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए। इसके बाद अपने इष्टदेव, भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी अथवा भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण कर पूजा-अर्चना करनी चाहिए।
संध्या के समय घर के पूजा स्थल को स्वच्छ कर दीप प्रज्वलित करें। माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु अथवा श्रीकृष्ण की विधि-विधान से पूजा करें। फल, मिष्ठान्न और विशेष रूप से खीर का भोग लगाया जा सकता है।
रात्रि में चंद्रमा को अर्घ्य देकर भगवान से सुख, शांति और समृद्धि की प्रार्थना की जाती है। सामर्थ्य के अनुसार भजन, मंत्र-जप, ध्यान और रात्रि जागरण करना भी इस पर्व की परंपरा का हिस्सा है।

दान और सेवा को भी बताया महत्वपूर्ण
महंत श्री त्यागी जी महाराज ने कहा कि सनातन धर्म में किसी भी धार्मिक पर्व का उद्देश्य केवल पूजा तक सीमित नहीं है। दान, सेवा और जरूरतमंद की सहायता भी पर्व की सार्थकता का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
शरद पूर्णिमा पर श्रद्धालु अपनी सामर्थ्य के अनुसार अन्न, वस्त्र अथवा अन्य उपयोगी सामग्री जरूरतमंदों को दान कर सकते हैं। उनका कहना है कि पूजा के साथ सेवा का भाव जुड़ जाए तो धार्मिक आयोजन का उद्देश्य और अधिक सार्थक हो जाता है।
देश के अलग-अलग क्षेत्रों में अलग परंपराएं
शरद पूर्णिमा पूरे देश में विभिन्न धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं के साथ मनाई जाती है। ब्रज क्षेत्र में इसका संबंध भगवान श्रीकृष्ण की रासलीला से है। गुजरात और महाराष्ट्र में कोजागरी पूर्णिमा के रूप में विशेष आयोजन होते हैं। ओडिशा में इसी पूर्णिमा से संबंधित कुमार पूर्णिमा की परंपरा भी प्रचलित है।
छत्तीसगढ़ में भी श्रद्धालु इस अवसर पर अपने-अपने धार्मिक विश्वास और पारिवारिक परंपराओं के अनुसार पूजा-अर्चना करते हैं।

खीर को चंद्रमा की रोशनी में रखने की परंपरा
महंत श्री त्यागी जी महाराज ने बताया कि शरद पूर्णिमा की रात खीर को चंद्रमा की रोशनी में रखने की परंपरा विशेष रूप से प्रसिद्ध है। धार्मिक मान्यता के अनुसार चंद्रमा की शीतल किरणों से यह प्रसाद अमृतमय हो जाता है।
हालांकि, वर्तमान समय में स्वास्थ्य और स्वच्छता को ध्यान में रखते हुए खीर को खुले में रखने के बजाय ढककर स्वच्छ स्थान पर रखना उचित है। लंबे समय तक कमरे के तापमान पर रखे दूध से बने खाद्य पदार्थ को सुरक्षित तरीके से संभालना जरूरी है।
कब मनाई जाती है शरद पूर्णिमा?
शरद पूर्णिमा आश्विन मास की पूर्णिमा तिथि को मनाई जाती है। अंग्रेजी कैलेंडर में इसकी तारीख प्रत्येक वर्ष अलग होती है। पूजा और व्रत के लिए संबंधित वर्ष के पंचांग में पूर्णिमा तिथि के प्रारंभ और समाप्ति का समय देखना उचित रहता है।
आस्था के साथ वैज्ञानिक सोच भी जरूरी
महंत श्री त्यागी जी महाराज ने कहा कि धार्मिक परंपराएं हमारी संस्कृति और आध्यात्मिक चेतना की धरोहर हैं। इनका पालन श्रद्धा और विश्वास के साथ किया जाना चाहिए। साथ ही वर्तमान समय में स्वास्थ्य, स्वच्छता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को भी साथ लेकर चलना आवश्यक है।
‘अमृत वर्षा’ की मान्यता को धार्मिक आस्था का विषय बताते हुए उन्होंने कहा कि इस पर्व का वास्तविक संदेश मनुष्य के भीतर शीतलता, शांति, भक्ति, सेवा और सद्भाव का भाव पैदा करना है।
शरद पूर्णिमा की उजली चांदनी भारतीय संस्कृति में आस्था और आध्यात्मिकता का सुंदर प्रतीक है। माता लक्ष्मी की आराधना, भगवान श्रीकृष्ण की रासलीला, चंद्रमा को अर्घ्य, खीर का भोग, जागरण और दान इन सभी परंपराओं के पीछे श्रद्धा और सकारात्मक जीवन का संदेश छिपा है।
मुरमुंडा आश्रम के महंत श्री त्यागी जी महाराज के अनुसार शरद पूर्णिमा का सार केवल ‘अमृत वर्षा’ की मान्यता में नहीं, बल्कि उस भावना में है जिसमें मनुष्य अपने जीवन से अंधकार को दूर कर भक्ति, सेवा और सद्भाव का प्रकाश फैलाता है।
पूर्णिमा का चंद्रमा जिस प्रकार बिना भेदभाव सभी पर अपनी शीतल रोशनी बरसाता है, उसी प्रकार मनुष्य को भी अपने जीवन में प्रेम, करुणा और मानवता का प्रकाश फैलाने का संकल्प लेना चाहिए। यही शरद पूर्णिमा की आध्यात्मिक भावना और सनातन परंपरा का मूल संदेश है।
|
Whatsapp बटन दबा कर इस न्यूज को शेयर जरूर करें |
Advertising Space
आणखी कथा
















































