छत्तीसगढ़ के पांच शक्तिपीठों का होगा कायाकल्प, आस्था के साथ खुलेंगे रोजगार और विकास के नए द्वार!
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रायपुर, छत्तीसगढ़
By ACGN – 7647981711, 9303948009
मां बम्लेश्वरी से मां दंतेश्वरी तक पांच शक्तिपीठों को जोड़ने की तैयारी, धार्मिक पर्यटन से रोजगार और विकास की उम्मीद; अब नजर जमीन पर उतरती योजनाओं पर।
रायपुर ACGN:- छत्तीसगढ़ की पहचान केवल जंगल, पहाड़, नदियों और प्राकृतिक सुंदरता से नहीं, बल्कि यहां की समृद्ध धार्मिक आस्था, प्राचीन मंदिरों और सांस्कृतिक परंपराओं से भी है। प्रदेश के पांच प्रमुख शक्तिपीठों को जोड़कर धार्मिक पर्यटन को नई दिशा देने की योजना इसी विरासत को आगे बढ़ाने की एक महत्वपूर्ण पहल है। सरकार की मंशा है कि श्रद्धालुओं को बेहतर सुविधाएं मिलें, पर्यटन को बढ़ावा मिले और स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा हों। लेकिन इस महत्वाकांक्षी योजना की असली सफलता तभी सामने आएगी, जब घोषणाएं धरातल पर दिखाई देंगी और श्रद्धालुओं को सुविधाओं का वास्तविक लाभ मिलेगा।
छत्तीसगढ़ सरकार की शक्तिपीठ परियोजना के अंतर्गत रतनपुर की मां महामाया, डोंगरगढ़ की मां बम्लेश्वरी, दंतेवाड़ा की मां दंतेश्वरी, सूरजपुर के कुदरगढ़ धाम की मां बागेश्वरी और सक्ती जिले के चंद्रपुर स्थित मां चंद्रहासिनी मंदिर को धार्मिक पर्यटन सर्किट के रूप में विकसित करने की योजना है। लगभग एक हजार किलोमीटर लंबे प्रस्तावित आध्यात्मिक पर्यटन मार्ग की परिकल्पना प्रदेश के प्रमुख देवी स्थलों को बेहतर सड़क संपर्क और आवश्यक सुविधाओं से जोड़ने पर केंद्रित है। वित्तीय वर्ष 2026-27 के बजट में छत्तीसगढ़ आस्था पथ योजना के लिए पांच करोड़ रुपये के प्रावधान का उल्लेख किया गया है। हालांकि, संपूर्ण परियोजना की लागत, निर्माण की समयसीमा और प्रत्येक स्थल पर होने वाले कार्यों की वर्तमान स्थिति की आधिकारिक पुष्टि जरूरी है।
पांच शक्तिपीठ, पांच पहचान और आस्था की एक डोर

राजनांदगांव जिले के डोंगरगढ़ में स्थित मां बम्लेश्वरी मंदिर ऊंची पहाड़ी पर विराजमान है। यहां नवरात्रि के दौरान देशभर से श्रद्धालु पहुंचते हैं। पहाड़ी पर स्थित मंदिर तक पहुंचने के लिए सीढ़ियों और रोप-वे जैसी सुविधाओं का महत्व विशेष है। बेहतर यात्री प्रबंधन, सुरक्षा, स्वच्छता और विश्राम की सुविधाएं श्रद्धालुओं की यात्रा को अधिक सुगम बना सकती हैं।

बिलासपुर जिले के रतनपुर में स्थित मां महामाया मंदिर प्रदेश के प्राचीन और प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों में शामिल है। कलचुरी इतिहास से जुड़ा यह मंदिर धार्मिक आस्था के साथ ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत का भी महत्वपूर्ण केंद्र है। केंद्र सरकार की तीर्थस्थल विकास योजना प्रसाद (PRASHAD) के अंतर्गत मंदिर के समग्र विकास के लिए लगभग 200 करोड़ रुपये की कार्ययोजना तैयार कर भेजे जाने का उल्लेख है। प्रस्ताव की स्वीकृति, वित्तीय मंजूरी और कार्य प्रारंभ होने की स्थिति को आधिकारिक रूप से स्पष्ट किया जाना आवश्यक है।

बस्तर अंचल के दंतेवाड़ा में मां दंतेश्वरी मंदिर स्थानीय जनजातीय परंपराओं और धार्मिक आस्था का विशिष्ट संगम है। बस्तर दशहरा के दौरान इस मंदिर का महत्व और बढ़ जाता है। यहां विकास के साथ स्थानीय परंपराओं, आदिवासी संस्कृति और धार्मिक रीति-रिवाजों का संरक्षण भी उतना ही जरूरी है, ताकि आधुनिक सुविधाओं के विस्तार में क्षेत्र की मौलिक पहचान प्रभावित न हो।

सूरजपुर जिले के ओड़गी विकासखंड में स्थित कुदरगढ़ धाम की मां बागेश्वरी मंदिर पहाड़ियों और घने जंगलों के बीच श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। दुर्गम रास्तों और प्राकृतिक परिवेश के कारण यहां सुरक्षित पहुंच मार्ग, पेयजल, स्वच्छता, प्रकाश व्यवस्था तथा आपातकालीन सहायता की सुविधाएं विशेष महत्व रखती हैं। विकास के दौरान जंगल और पर्यावरण की सुरक्षा को भी प्राथमिकता देनी होगी।

सक्ती जिले के चंद्रपुर में महानदी के तट पर स्थित मां चंद्रहासिनी मंदिर धार्मिक पर्यटन के साथ प्राकृतिक सौंदर्य के लिए भी जाना जाता है। यहां श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए सुव्यवस्थित पार्किंग, स्वच्छता, सुरक्षित आवागमन और भीड़ प्रबंधन की व्यवस्था पर्यटन अनुभव को बेहतर बना सकती है।
सिर्फ मंदिरों का सौंदर्यीकरण नहीं, रोजगार का भी बने रास्ता
शक्तिपीठ परियोजना का उद्देश्य केवल मंदिरों की सुंदरता बढ़ाना नहीं होना चाहिए। इन धार्मिक स्थलों के आसपास स्थानीय युवाओं को रोजगार, महिला स्व-सहायता समूहों को आजीविका, स्थानीय हस्तशिल्प को बाजार और छोटे व्यवसायियों को नए अवसर मिल सकते हैं। होम-स्टे, स्थानीय भोजन, परिवहन, प्रसाद, पूजा सामग्री और मार्गदर्शक सेवाओं के माध्यम से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल सकती है।
इसके लिए जरूरी है कि स्थानीय लोगों को प्रशिक्षण दिया जाए और विकास कार्यों में उनकी भागीदारी सुनिश्चित हो। श्रद्धालुओं के लिए स्वच्छ पेयजल, आधुनिक शौचालय, विश्राम स्थल, सुरक्षा व्यवस्था, सीसीटीवी निगरानी, प्राथमिक चिकित्सा, डिजिटल सूचना केंद्र और सुव्यवस्थित पार्किंग जैसी सुविधाएं विकसित की जाएं। जहां भौगोलिक परिस्थितियां अनुकूल हों, वहीं रोप-वे और अन्य विशेष सुविधाओं पर पर्यावरणीय तथा तकनीकी आकलन के बाद निर्णय लिया जाए।
केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं के बीच समन्वय, स्वीकृत राशि का पारदर्शी उपयोग तथा निर्माण कार्यों की नियमित निगरानी भी आवश्यक है। प्रत्येक शक्तिपीठ के लिए स्पष्ट कार्ययोजना, बजट, जिम्मेदार विभाग और समयसीमा सार्वजनिक होने से जनता को यह समझने में मदद मिलेगी कि परियोजना किस चरण में है और उसका लाभ कब तक मिल सकेगा।
छत्तीसगढ़ की शक्तिपीठ परियोजना धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक विरासत और स्थानीय रोजगार को एक साथ आगे बढ़ाने का अवसर है। अब आवश्यकता है कि बजट प्रावधानों और प्रस्तावों को समयबद्ध कार्यों में बदला जाए, खर्च और प्रगति की जानकारी सार्वजनिक हो तथा पांचों शक्तिपीठों पर श्रद्धालुओं को वास्तविक सुविधाएं मिलें। विकास ऐसा हो, जिससे आस्था मजबूत हो, संस्कृति सुरक्षित रहे, पर्यावरण का संतुलन बना रहे और स्थानीय परिवारों की आमदनी भी बढ़े। तभी शक्तिपीठ सर्किट छत्तीसगढ़ की पहचान और पर्यटन अर्थव्यवस्था के लिए सार्थक साबित होगा।
प्रदीप मिश्रा संपादक
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