मुख्यमंत्री की सख्ती के कुछ घंटे बाद ही स्वास्थ्य व्यवस्था की खुली पोल! अस्पताल में ताला, गेट पर प्रसव और नवजात की मौत
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सूरजपुर, छत्तीसगढ़
By ACGN – 7647981711, 9303948009
संवाददाता :- संतोष यादव सूरजपुर
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल ने स्वास्थ्य विभाग की समीक्षा बैठक में लापरवाही पर सख्त निर्देश दिए थे। इसके कुछ ही घंटों बाद गणेशपुर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में प्रसव पीड़ा से तड़पती महिला को कथित तौर पर इलाज नहीं मिला। अस्पताल के गेट पर प्रसव के बाद नवजात की मौत, ग्रामीणों का आक्रोश और प्रभारी चिकित्सक व एएनएम निलंबित। सवाल – क्या जवाबदेही केवल कर्मचारियों तक सीमित रहेगी या पूरे सिस्टम की जांच होगी?

सूरजपुर ACGN:- छत्तीसगढ़ में स्वास्थ्य व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल की मौजूदगी में कल हुई समीक्षा बैठक में स्वास्थ्य विभाग को स्पष्ट निर्देश दिए गए थे कि स्वास्थ्य सेवाओं में लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

लेकिन इन निर्देशों के कुछ ही घंटों बाद सूरजपुर जिले के रामानुजनगर विकासखंड अंतर्गत गणेशपुर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र से सामने आई घटना ने स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

यहां प्रसव पीड़ा से परेशान गर्भवती महिला को परिजन रात करीब 11 बजे अस्पताल लेकर पहुंचे, लेकिन आरोप है कि स्वास्थ्य केंद्र के मुख्य गेट पर ताला लगा था और तत्काल चिकित्सा सहायता के लिए कोई स्वास्थ्यकर्मी उपलब्ध नहीं हुआ। मजबूरी में महिला ने अस्पताल के गेट के सामने ही बच्चे को जन्म दिया। जन्म के कुछ ही देर बाद नवजात की मौत हो गई। महिला की हालत गंभीर होने पर उसे सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र रामानुजनगर ले जाया गया, जहां उसका उपचार जारी है।
समीक्षा बैठक में सख्त निर्देश, फिर भी जमीनी हकीकत पर सवाल!

सबसे गंभीर सवाल यह है कि जब प्रदेश के मुखिया स्वास्थ्य विभाग को लापरवाही रोकने और स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के निर्देश दे रहे थे, तब ग्रामीण क्षेत्रों में संचालित स्वास्थ्य केंद्रों की वास्तविक स्थिति की निगरानी आखिर कैसे हो रही है? क्या अधिकारियों तक समीक्षा बैठकों के निर्देश केवल कागजों तक सीमित रह जाते हैं? क्या ग्रामीणों को आपातकालीन स्थिति में इलाज पाने के लिए अस्पताल के दरवाजे पर भटकना पड़ेगा?

गणेशपुर की यह घटना केवल एक स्वास्थ्य केंद्र की व्यवस्था पर सवाल नहीं उठाती, बल्कि ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं की निगरानी, रात्रिकालीन ड्यूटी और आपातकालीन प्रसव सुविधाओं की उपलब्धता की गंभीर समीक्षा की जरूरत भी सामने लाती है। मीडिया द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही और कर्मचारियों की अनुपस्थिति के मामलों को कई बार उजागर किया जाता रहा है, लेकिन आरोप है कि विभाग अक्सर इन शिकायतों पर प्रभावी कार्रवाई करने के बजाय अपने कर्मचारियों का बचाव करता है। कई गांवों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र खुले होने के बावजूद ग्रामीणों का कहना है कि वे अक्सर बंद मिलते हैं या वहां कर्मचारी उपलब्ध नहीं रहते। ऐसे में समय पर इलाज न मिलने के कारण ग्रामीण झोलाछाप डॉक्टरों के पास जाने को मजबूर होते हैं, जिससे उनके स्वास्थ्य पर गंभीर खतरा बना रहता है। कई बार ऐसी लापरवाही लोगों को गंभीर स्थितियों तक भी पहुंचा देती है।
रायगढ़ जिले से मरीजों को गलत इंजेक्शन लगाए जाने की खबरें भी सामने आ चुकी हैं। इसके अलावा रायगढ़ जिले में स्वास्थ्य कर्मचारियों द्वारा निजी क्लीनिक संचालित किए जाने की शिकायतें भी सामने आई थीं। बताया गया कि इस संबंध में सीएम पोर्टल पर शिकायत दर्ज कराई गई थी और शिकायतकर्ता के पास वीडियो साक्ष्य भी मौजूद थे, फिर भी कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। यदि व्यापक स्थिति पर नजर डालें तो स्वास्थ्य विभाग में कई डॉक्टरों के निजी क्लीनिकों पर अधिक समय बिताने और निर्धारित समय पर सरकारी अस्पतालों में उपस्थित नहीं मिलने की शिकायतें भी सामने आती रहती हैं। ऐसे मामलों की निष्पक्ष जांच कर समयबद्ध कार्रवाई की जानी चाहिए, ताकि सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित न हों।
नवजात की मौत के बाद भड़का ग्रामीणों का आक्रोश

प्राप्त जानकारी के अनुसार, पवनपुर तलवापारा निवासी महिला को प्रसव पीड़ा होने पर परिजन गणेशपुर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र लेकर पहुंचे थे। परिजनों का आरोप है कि अस्पताल बंद होने के कारण उन्हें समय पर चिकित्सा सहायता नहीं मिली। इसी दौरान अस्पताल के गेट के सामने प्रसव हो गया और कुछ ही देर बाद नवजात की मौत हो गई।
घटना के बाद परिजनों और ग्रामीणों में भारी आक्रोश फैल गया। ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्र पहुंचकर विरोध प्रदर्शन करने लगे। आक्रोशित लोगों ने अस्पताल के गेट पर ताला लगाकर अपनी नाराजगी जताई और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की। ग्रामीणों का सवाल था कि जब जरूरत के समय अस्पताल ही बंद मिलेगा, तो ग्रामीणों को स्वास्थ्य सुविधाएं आखिर कहां से मिलेंगी?
सीएमएचओ की कार्रवाई: प्रभारी चिकित्सक और एएनएम निलंबित

मामले की गंभीरता को देखते हुए सूरजपुर के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमएचओ) प्रशांत सिंह ने गणेशपुर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के प्रभारी चिकित्सक राजेश पटेल और एएनएम प्रमिला गिरी को निलंबित कर दिया। कार्रवाई और जांच के आश्वासन के बाद प्रदर्शन समाप्त होने की जानकारी सामने आई है।


हालांकि, दो कर्मचारियों का निलंबन अपने आप में पूरी घटना का जवाब नहीं है। यह भी स्पष्ट होना जरूरी है कि घटना वाली रात ड्यूटी पर कौन-कौन तैनात था, स्वास्थ्य केंद्र बंद क्यों था, आपातकालीन प्रसव के लिए वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं मिली और जिम्मेदार अधिकारियों ने ड्यूटी व्यवस्था की निगरानी कैसे की।
नवजात की मौत के चिकित्सकीय कारण और घटना में संभावित लापरवाही की भूमिका निष्पक्ष जांच से स्पष्ट होनी चाहिए। जांच पूरी होने से पहले किसी एक व्यक्ति को मौत के लिए अंतिम रूप से जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा, लेकिन सामने आए आरोपों की गंभीरता को देखते हुए जवाबदेही तय करना बेहद जरूरी है।
स्वास्थ्य मंत्री और जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही पर भी सवाल
इस घटना ने क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों और स्वास्थ्य विभाग के नेतृत्व की जिम्मेदारी पर भी सवाल खड़े किए हैं। स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल और स्थानीय जनप्रतिनिधियों से अपेक्षा है कि वे ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों की वास्तविक स्थिति की समीक्षा कराएं और सुनिश्चित करें कि रात के समय भी आपातकालीन मरीजों को आवश्यक चिकित्सा सहायता मिल सके।
सरकार बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए प्रयासों और योजनाओं की बात करती है, लेकिन जमीनी स्तर पर यदि प्रसव पीड़ा से जूझती महिला को अस्पताल में ही इलाज नहीं मिल पाता, तो व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। क्या जिले के दूसरे प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में भी रात्रिकालीन ड्यूटी और प्रसव सुविधाओं की जांच होगी? क्या केवल घटना के बाद निलंबन होगा, या भविष्य में ऐसी स्थिति रोकने के लिए ठोस कदम भी उठाए जाएंगे?
अब जांच के साथ व्यवस्था में सुधार भी जरूरी
गणेशपुर की घटना के बाद स्वास्थ्य विभाग को उस रात की ड्यूटी व्यवस्था, कर्मचारियों की उपस्थिति, अस्पताल बंद रहने की परिस्थितियों और महिला को समय पर उपचार उपलब्ध नहीं हो पाने के कारणों की निष्पक्ष एवं समयबद्ध जांच करनी चाहिए। जांच के निष्कर्ष सार्वजनिक किए जाने चाहिए और यदि किसी स्तर पर लापरवाही प्रमाणित होती है, तो नियमानुसार जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।
इसके साथ ही जिले के सभी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में रात्रिकालीन सेवाओं, प्रसव सुविधाओं, आपातकालीन चिकित्सा सहायता और अधिकारियों की निगरानी व्यवस्था की समीक्षा जरूरी है। ग्रामीणों को केवल आश्वासन नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें प्रसव पीड़ा से जूझती महिला को अस्पताल के गेट पर असहाय न होना पड़े। मीडिया द्वारा उजागर की गई शिकायतों पर भी स्वास्थ्य विभाग को निष्पक्ष जांच करानी चाहिए, ताकि लापरवाही के मामलों में कर्मचारियों को बचाने के बजाय वास्तविक जिम्मेदारों पर कार्रवाई हो सके। ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्यकर्मियों की नियमित उपस्थिति सुनिश्चित करना और झोलाछाप डॉक्टरों पर निर्भरता कम करना विभाग की प्राथमिकता होनी चाहिए।
सबसे बड़ा सवाल यही है, मुख्यमंत्री के सख्त निर्देशों के बाद भी यदि अस्पताल में ताला लगा मिलता है, तो स्वास्थ्य विभाग की निगरानी व्यवस्था आखिर किस काम की है? क्या जिम्मेदारी केवल दो कर्मचारियों के निलंबन तक सीमित रहेगी, या पूरे सिस्टम की जवाबदेही भी तय होगी? इस घटना की निष्पक्ष जांच और ठोस सुधार ही पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने तथा भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने की दिशा में वास्तविक कदम होंगे।

प्रदीप मिश्रा
निष्पक्ष, निर्भीक और सच्ची खबर, हर खबर पर तिरछी नजर और जनहित के प्रति समर्पित पत्रकारिता के साथ देश में तेजी से बढ़ता विश्वसनीय वेब पोर्टल अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़।
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