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पितृ पक्ष : जिस जड़ को हम भूल गए, उसी पर खड़ा है हमारा वर्तमान

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अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ का साप्ताहिक विशेषांक

✍️ कलम की धार ✍️

अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ ‘कलम की धार’ हर सप्ताह लाती है निष्पक्ष, निर्भीक, सत्ता और जनता से सवाल करता आलोचनात्मक, विश्लेषणात्मक एवं जागरूकता का लेख।

आलेख – प्रदीप मिश्रा

अपने पूर्वजों को याद करने के लिए इस सप्ताह कलम की धार लेकर आई है एक विशेष प्रस्तुति। इस विशेष लेख में हम जानेंगे कि पितृ पक्ष क्या है, कब मनाया जाता है, कितने दिनों तक चलता है और इसे मनाने के पीछे हमारी धार्मिक, सांस्कृतिक और पारिवारिक मान्यताएं क्या हैं। साथ ही हम यह भी समझने की कोशिश करेंगे कि बदलते समय में क्या हम अपने पूर्वजों और अपनी जड़ों को उतना ही याद रख पा रहे हैं, जितना हमारी परंपरा हमसे अपेक्षा करती है।

आज का विषय – “पितृ पक्ष : अपनी जड़ों, अपने पूर्वजों और अपनी विरासत को याद करने का समय”

आइए, सबसे पहले समझते हैं, पितृ पक्ष आखिर है क्या और हमारी परंपरा में इसका इतना महत्व क्यों माना गया है?

यहीं से शुरू होती है कलम की धार की यह विशेष यात्रा – अपने अतीत को याद करने और अपनी जड़ों को पहचानने की।

क्या हमें अपने पिता का नाम याद है, दादा का भी याद है, लेकिन क्या हम अपने परदादा को जानते हैं? और उनके पहले कौन था?

पितृ पक्ष क्या है?

सनातन परंपरा में पितृ पक्ष वह विशेष समय है, जो हमारे दिवंगत माता-पिता, दादा-दादी और पूर्वजों के स्मरण, श्रद्धा और तर्पण के लिए समर्पित माना जाता है। इस दौरान श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान, दान और जरूरतमंदों को भोजन कराने जैसी परंपराएं निभाई जाती हैं। भारत सरकार के पर्यटन पोर्टल के अनुसार भी पितृ पक्ष पूर्वजों को श्रद्धांजलि देने के लिए समर्पित 16 दिनों की हिंदू परंपरा है।

पितृ पक्ष कब और कितने दिनों का होता है?

पितृ पक्ष सामान्यतः भाद्रपद पूर्णिमा के बाद से आश्विन अमावस्या, यानी सर्वपितृ अमावस्या तक माना जाता है और परंपरागत रूप से इसे 16 श्राद्धों का पक्ष कहा जाता है। पंचांग की गणना और क्षेत्रीय परंपराओं के कारण इसकी तिथियों में थोड़ा अंतर हो सकता है। 2026 में सर्वपितृ अमावस्या 10 अक्टूबर को है।

इसे क्यों मनाया जाता है?

सनातन मान्यता में मनुष्य पर अपने पूर्वजों के प्रति पितृ ऋण माना गया है। पितृ पक्ष इसी ऋण के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और अपनी पिछली पीढ़ियों को श्रद्धापूर्वक याद करने का अवसर है। मान्यता के अनुसार तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान जैसे कर्मों से पितरों की शांति और उनके आशीर्वाद की कामना की जाती है। पितृ पक्ष का अर्थ केवल कर्मकांड नहीं है। यह हमें यह याद दिलाने का अवसर भी है कि हमारी पहचान केवल हमारे आज से नहीं बनी, बल्कि हमारे पीछे खड़ी कई पीढ़ियों के जीवन, संस्कार, संघर्ष और त्याग से बनी है।

एक सवाल, जिसका जवाब शायद हमारे पास नहीं

जरा एक पल के लिए अपने आप से पूछिए, आपका नाम क्या है, आपके पिता का नाम क्या है, आपके दादा का नाम क्या था और आपके परदादा का नाम क्या था? पिता का नाम तो शायद हर कोई बता देगा, दादा का नाम भी घर के किसी बुजुर्ग से पूछकर मिल जाएगा, लेकिन जैसे ही सवाल परदादा के बाद की पीढ़ी पर पहुंचता है, बहुत से घरों में अचानक खामोशी छा जाती है। हम अपनी पहचान को अपने नाम तक सीमित कर चुके हैं, जबकि उस नाम के पीछे न जाने कितनी पीढ़ियों की मेहनत, संघर्ष, त्याग और जीवन की पूरी कहानी छिपी हुई है।

पितृ पक्ष आखिर हमें क्या याद दिलाता है?

पितृ पक्ष को सामान्य तौर पर श्राद्ध और तर्पण की परंपरा से जोड़कर देखा जाता है। इस अवधि में परिवार अपने दिवंगत माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी और अन्य पूर्वजों का श्रद्धापूर्वक स्मरण करता है। अपनी-अपनी परंपरा और मान्यता के अनुसार लोग तर्पण, श्राद्ध, पिंडदान, दान और भोजन जैसी विधियां करते हैं। लेकिन यदि हम इसके भीतर छिपे भाव को देखें तो पितृ पक्ष हमें केवल एक धार्मिक प्रक्रिया पूरी करने के लिए नहीं रोकता, बल्कि वह हमें कुछ समय के लिए अपने अतीत की ओर देखने के लिए कहता है। जिसे देखा नहीं, उसे भी याद किया जा सकता है

हममें से बहुत से लोगों ने अपने परदादा को देखा तक नहीं होगा। उनके चेहरे की कोई तस्वीर भी शायद घर में न हो, उनकी आवाज सुनने का अवसर भी नहीं मिला होगा और उनके जीवन की पूरी कहानी भी किसी को मालूम नहीं होगी। फिर भी वे हमारे परिवार की उस कड़ी का हिस्सा हैं, जिसके बिना आज की पीढ़ी की कहानी पूरी नहीं होती। यही पितृ स्मरण का एक गहरा भाव है, जिसे हमने अपनी आंखों से नहीं देखा, उसके अस्तित्व को भी स्वीकार करना और उसके प्रति कृतज्ञ होना।

पिता के बाद दादा, दादा के बाद परदादा क्यों भूल गए?

यह सवाल किसी एक परिवार का नहीं, बदलते समाज का सवाल है। संयुक्त परिवार धीरे-धीरे छोटे परिवारों में बदल गए। रोजगार और शिक्षा के कारण लोग गांव से शहर और एक शहर से दूसरे शहर चले गए। परिवारों की पुरानी बातें अब रोजमर्रा की बातचीत का हिस्सा कम होती चली गईं। बुजुर्गों के पास बैठकर घंटों पुरानी कहानियां सुनने की परंपरा कमजोर हुई और मोबाइल की छोटी स्क्रीन ने बातचीत का बहुत सा समय अपने भीतर समेट लिया। नतीजा यह हुआ कि जिस परिवार की स्मृतियां कभी कई पीढ़ियों तक मौखिक रूप से चलती थीं, आज वही स्मृतियां एक पीढ़ी के बाद धुंधली पड़ने लगी हैं।

तीन पीढ़ियां ही क्यों, जहां तक स्मृति जाए वहां तक क्यों नहीं?

धार्मिक कर्मकांड की विधियां अलग-अलग परंपराओं में अलग हो सकती हैं, इसलिए पितृ कर्म के लिए एक ही नियम सभी परिवारों पर लागू करना उचित नहीं होगा। लेकिन अगर सवाल अपने परिवार की जड़ों को जानने का है तो उसकी कोई छोटी सीमा क्यों होनी चाहिए? पिता से दादा, दादा से परदादा, परदादा से उनके पिता और फिर उससे भी पीछे, जहां तक विश्वसनीय जानकारी मिल सके, वहां तक अपने वंश की कहानी खोजी जा सकती है। जहां जानकारी समाप्त हो जाए, वहां यह लिख देना भी अपने आप में महत्वपूर्ण है कि “यहां से हमारी जानकारी समाप्त हो जाती है।” शायद आने वाली पीढ़ी वहीं से खोज को आगे बढ़ाएगी।

वंश-वृक्ष सिर्फ नाम नहीं,एक पूरा इतिहास है

कागज पर पिता, दादा और परदादा के नाम लिख देना वंश-वृक्ष की शुरुआत हो सकती है, लेकिन परिवार की असली कहानी उससे कहीं बड़ी होती है। यदि जानकारी मिले तो यह भी लिखा जाना चाहिए कि हमारे पूर्वज किस गांव में रहते थे, उनका जीवन कैसा था, वे क्या काम करते थे, किन परिस्थितियों से गुजरे, परिवार कब और क्यों दूसरी जगह आया, उनके माता-पिता कौन थे और उन्होंने अपने बच्चों के लिए क्या संघर्ष किया। किसी पूर्वज के जीवन की एक छोटी-सी कहानी भी आने वाली पीढ़ी के लिए अमूल्य विरासत बन सकती है।

पुरानी तस्वीरें बोलती नहीं, लेकिन बहुत कुछ कहती हैं

घर के किसी पुराने संदूक में रखी तस्वीर शायद आज किसी के लिए सिर्फ एक पुराना कागज हो, लेकिन वही तस्वीर आने वाली पीढ़ी के लिए परिवार की सबसे बड़ी धरोहर बन सकती है। तस्वीर के पीछे नाम और तारीख लिख दीजिए। अगर संभव हो तो उसमें मौजूद लोगों की पहचान लिखिए। पुराने दस्तावेज, जमीन के कागज, विवाह की तस्वीरें, परिवार के पुराने पत्र और बुजुर्गों की लिखावट,इन सबको संभालकर रखिए। समय बीतने के साथ इन चीजों का आर्थिक मूल्य भले न हो, लेकिन भावनात्मक और ऐतिहासिक मूल्य बहुत बढ़ सकता है।

घर के बुजुर्ग परिवार की जीवित किताब हैं

हम अक्सर बुजुर्गों को यह सोचकर सुनना टाल देते हैं कि वे वही पुरानी बातें बार-बार बताते हैं। लेकिन शायद हमें यह समझना चाहिए कि उनके पास जो कहानी है, वह इंटरनेट पर नहीं मिलेगी। उनसे पूछिए कि हमारे दादा के पिता कौन थे, हमारा परिवार किस गांव से आया, पहले लोग क्या करते थे, पुराने समय में परिवार की स्थिति कैसी थी और किन लोगों ने कठिन समय में परिवार को संभाला। उनकी बातों को लिखिए या उनकी अनुमति से रिकॉर्ड कीजिए। आज हमें यह सामान्य बातचीत लगेगी, लेकिन कल यही बातचीत हमारे परिवार का इतिहास बन सकती है।

महिलाओं के बिना वंश की कहानी अधूरी है

वंश की चर्चा करते समय अक्सर केवल पिता, दादा और परदादा के नाम गिनाए जाते हैं, जबकि परिवार की कहानी मां, दादी, नानी और परदादी के बिना कभी पूरी नहीं हो सकती। उन महिलाओं ने परिवार को जन्म दिया, बच्चों को पाला, अभावों में घर संभाला और कई बार अपने हिस्से की इच्छाओं को परिवार के भविष्य के लिए छोड़ दिया। इसलिए परिवार का इतिहास बनाते समय मातृ पक्ष और महिला पूर्वजों के नाम भी उतने ही सम्मान से दर्ज किए जाने चाहिए। आखिर हमारी जड़ें केवल एक दिशा में नहीं फैलतीं।

तर्पण की बूंद में छिपी स्मृति

जब कोई व्यक्ति अपने पूर्वजों के नाम से जल अर्पित करता है तो वह जल केवल हाथ से गिरती हुई बूंद नहीं रह जाता। उस क्षण के साथ कोई नाम जुड़ा होता है, कोई स्मृति जुड़ी होती है और कभी-कभी ऐसी कहानी जुड़ी होती है जिसे हमने वर्षों से नहीं सुना। जल धरती में चला जाता है, लेकिन उस क्षण पैदा हुई स्मृति मन में रह सकती है। धार्मिक आस्था इसे पितरों के प्रति अर्पण मानती है, जबकि मानवीय दृष्टि से यह किसी खोए हुए रिश्ते को याद करने और उसके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर भी हो सकता है।

आस्था अपनी जगह, विज्ञान अपनी जगह

धार्मिक विश्वासों में पितृ पक्ष और श्राद्ध का आध्यात्मिक महत्व है। अनेक लोग मानते हैं कि विधिपूर्वक किया गया तर्पण और श्राद्ध पितरों को संतुष्टि देता है तथा उनका आशीर्वाद परिवार को प्राप्त होता है। वहीं आधुनिक विज्ञान के पास इस बात का प्रमाण नहीं है कि जल या भोजन किसी अलौकिक माध्यम से मृत व्यक्ति तक भौतिक रूप से पहुंचता है। इसलिए जागरूक समाज के लिए जरूरी है कि आस्था का सम्मान करते हुए वैज्ञानिक प्रमाण और धार्मिक विश्वास के बीच अंतर को भी समझा जाए। दोनों को एक ही प्रमाण की कसौटी पर खड़ा करना आवश्यक नहीं है।

लेकिन स्मृति का विज्ञान क्या कहता है?

मनुष्य के जीवन में स्मृतियों की भूमिका बहुत गहरी होती है। किसी प्रिय व्यक्ति को याद करना, उसके बारे में परिवार के लोगों से बात करना, उसके जीवन की अच्छी बातों को आगे बढ़ाना और उसके जाने के बाद भी उसके प्रभाव को अपने व्यवहार में जीवित रखना मनुष्य की भावनात्मक दुनिया का हिस्सा है। इस अर्थ में पितृ पक्ष परिवार को एक साथ बैठने, बीते लोगों को याद करने और अपनी पारिवारिक कहानी को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का अवसर दे सकता है।

क्या मृतकों को याद करना ही पर्याप्त है?

यहां पितृ पक्ष हमसे एक और कठिन सवाल पूछता है, जिन माता-पिता की तस्वीर के सामने हम श्रद्धा से खड़े होते हैं, क्या उनके जीवित रहते हमने उन्हें उतना समय दिया था? क्या उनके साथ बैठकर उनकी बातें सुनी थीं? क्या उनके अकेलेपन को समझा था? क्या उनके इलाज, जरूरत और सम्मान की चिंता की थी? मृत माता-पिता के नाम पर श्रद्धा करना अपनी जगह है, लेकिन जीवित माता-पिता की सेवा और सम्मान शायद हमारे सामने मौजूद सबसे प्रत्यक्ष जिम्मेदारी है।

श्रद्धा दिखावे की मोहताज क्यों हो?

पितृ स्मरण के नाम पर आर्थिक सामर्थ्य से अधिक खर्च करना या दिखावे की प्रतिस्पर्धा में शामिल होना इस भावना को कमजोर कर सकता है। जिसके पास साधन हैं वह अपनी परंपरा के अनुसार विधि कर सकता है, लेकिन जिसके पास साधन कम हैं उसे कर्ज या दबाव में आने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। श्रद्धा मन की भावना है। किसी जरूरतमंद को भोजन कराना, किसी बुजुर्ग की सहायता करना, किसी गरीब बच्चे की पढ़ाई में सहयोग करना या किसी असहाय व्यक्ति का हाथ पकड़ना भी किसी प्रिय पूर्वज की स्मृति को मानवीय कर्म से जोड़ने का रास्ता हो सकता है।

एक भूखे की थाली और एक बुजुर्ग की मुस्कान

हम मृत व्यक्ति को भोजन नहीं करा सकते, लेकिन उनकी स्मृति में किसी जीवित भूखे व्यक्ति की थाली भर सकते हैं। हम उस व्यक्ति से बात नहीं कर सकते जो इस दुनिया में नहीं है, लेकिन उनके नाम पर किसी अकेले बुजुर्ग के पास बैठ सकते हैं। हम अपने पूर्वजों के लिए जो भावना रखते हैं, अगर उसका एक हिस्सा भी समाज के जरूरतमंद लोगों तक पहुंच जाए तो स्मरण केवल एक रस्म नहीं रहेगा, बल्कि मानवता से जुड़ा हुआ कार्य बन जाएगा।

पूर्वजों की विरासत केवल जमीन और संपत्ति नहीं

हम अक्सर विरासत का अर्थ खेत, मकान, जमीन, पैसा या दूसरी संपत्ति समझते हैं। लेकिन किसी परिवार की सबसे बड़ी विरासत उसके संस्कार भी हो सकते हैं। मेहनत की आदत, ईमानदारी, दूसरों की मदद करना, संकट में परिवार के साथ खड़ा रहना, बुजुर्गों का सम्मान करना और कठिन परिस्थितियों में हिम्मत न हारना, ये ऐसी संपत्तियां हैं जिन्हें कोई रजिस्ट्री या दस्तावेज अपने नाम नहीं कर सकता। इन्हें केवल व्यवहार के माध्यम से अगली पीढ़ी तक पहुंचाया जा सकता है।

पूर्वजों से मिला संसार हम आगे क्या देकर जाएंगे?

पितृ पक्ष हमें पीछे देखने के साथ आगे देखने की जिम्मेदारी भी देता है। हमारे पूर्वजों ने हमें जमीन, घर, खेत, जंगल, पानी और एक समाज दिया। अब हमारी बारी है कि हम अगली पीढ़ी के लिए क्या छोड़ रहे हैं। अगर हम पेड़ काटकर, पानी बर्बाद करके, हवा प्रदूषित करके और प्रकृति को नुकसान पहुंचाकर आगे बढ़ेंगे तो आने वाली पीढ़ी हमारे बारे में क्या सोचेगी? शायद पूर्वजों के प्रति सच्ची जिम्मेदारी केवल उन्हें याद करना नहीं, बल्कि उनके बाद मिली दुनिया को सुरक्षित रखना भी है।

एक दिन हमारी तस्वीर भी दीवार पर होगी

आज हम अपने पूर्वजों को याद कर रहे हैं। कल हमारे बच्चे हमें याद करेंगे। आज हम किसी दादा की तस्वीर के सामने खड़े हैं, कल कोई हमारे नाम की तस्वीर के सामने खड़ा होगा। उस दिन हमारे पास जमा की गई संपत्ति से ज्यादा महत्वपूर्ण यह होगा कि हमने अपने पीछे कैसी याद छोड़ी। क्या हमारे बच्चे हमें केवल नाम से जानेंगे या हमारी कहानी भी जानते होंगे? क्या वे कह पाएंगे कि हमारे माता-पिता ने परिवार और समाज के लिए कुछ अच्छा किया था?

हम भी किसी की आने वाली स्मृति हैं

यह विचार मनुष्य को भीतर तक बदल सकता है कि हम केवल अपने वर्तमान के लिए नहीं जी रहे। हमारे हर कर्म की एक स्मृति बन सकती है। जिस तरह आज हम अपने पूर्वजों के संघर्ष से अपना वर्तमान जोड़ते हैं, उसी तरह हमारी आने वाली पीढ़ी अपने वर्तमान को हमारे निर्णयों से जोड़ेगी। इसलिए हमें ऐसा जीवन जीने की कोशिश करनी चाहिए जिसे याद करते समय हमारे बच्चों को शर्म नहीं, बल्कि सीख और सम्मान मिले।

इस पितृ पक्ष एक नई परंपरा शुरू कीजिए

इस बार श्राद्ध और तर्पण के साथ अपने घर में एक और काम शुरू कीजिए। परिवार की एक कॉपी बनाइए और उसका नाम रखिए, “हमारे परिवार की कहानी।” उसमें जितनी पीढ़ियों के नाम मालूम हों, लिखिए। जहां जानकारी न हो, वहां खाली स्थान छोड़ दीजिए। फिर परिवार के सबसे बुजुर्ग व्यक्ति से पूछकर उस खाली जगह को भरने की कोशिश कीजिए। उनके पास भी जवाब न हो तो पुराने रिश्तेदारों से पूछिए। शायद कोई ऐसा नाम मिल जाए जिसे आपका परिवार लगभग भूल चुका था।

जहां स्मृति खत्म हो,वहीं से खोज शुरू होती है

वंश-वृक्ष बनाते समय यदि पांचवीं पीढ़ी का नाम मिल जाए तो छठी की तलाश कीजिए। छठी मिले तो सातवीं के बारे में पूछिए। हर जानकारी प्रमाणित हो, यह जरूरी है, लेकिन हर जानकारी को जांचने की कोशिश जरूर होनी चाहिए। पुराने दस्तावेज, गांव के रिकॉर्ड, परिवार की पुरानी किताबें, रिश्तेदारों की जानकारी और बुजुर्गों की स्मृतियां इस खोज में मदद कर सकती हैं। और अगर किसी जगह कोई जानकारी न मिले तो उसे छिपाने की जरूरत नहीं,लिख दीजिए कि यहां से जानकारी उपलब्ध नहीं है। भविष्य में कोई और वहीं से आगे बढ़ेगा।

क्योंकि हमारी कहानी जन्म प्रमाणपत्र से शुरू नहीं होती

हमारी व्यक्तिगत पहचान भले ही हमारे जन्म के साथ दर्ज होती हो, लेकिन हमारी पारिवारिक कहानी उससे बहुत पहले शुरू हो चुकी होती है। हमारे भीतर जो संस्कार हैं, जिन परंपराओं को हम निभाते हैं, जिन भाषाओं और बोलियों में हम बोलते हैं, जिन गांवों और शहरों से हमारा संबंध है और जिन रिश्तों ने हमें आकार दिया है, इन सबके पीछे समय की लंबी यात्रा है। हम उस यात्रा की अंतिम मंजिल नहीं, बल्कि एक चलती हुई कड़ी हैं।

यही पितृ पक्ष का सबसे बड़ा प्रश्न है

क्या हम केवल अपने बाद आने वालों के लिए संपत्ति छोड़ेंगे या अपनी कहानी भी छोड़ेंगे? क्या हमारे बच्चे अपने परदादा का नाम जानेंगे? क्या उन्हें पता होगा कि उनका परिवार कहां से आया? क्या वे उन लोगों को याद करेंगे जिनकी मेहनत से उनका आज बना? या फिर हमारी अगली पीढ़ी भी तीन नामों के बाद रुक जाएगी और कहेगी “उसके आगे हमें कुछ मालूम नहीं।”

 पितरों का स्मरण केवल एक स्थान गया तक सीमित नहीं

गया जी जाकर पिंडदान करना श्रद्धा और परंपरा का महत्वपूर्ण कर्म माना जाता है, लेकिन पितरों का स्मरण केवल गया जी तक सीमित नहीं है। कुछ धार्मिक मान्यताओं में प्रयागराज संगम, काशी विश्वनाथ वाराणसी, बद्रीनाथ धाम, पुष्कर और अंत में गया जी को पिंडदान एवं पितृकर्म से जुड़े प्रमुख तीर्थ माना गया है। मान्यता है कि इन तीर्थों की यात्रा और विधिपूर्वक किए गए पितृकर्म से पूर्वजों की आत्मा की शांति और मोक्ष की कामना की जाती है।

हमारा शरीर भी पंचतत्वों से बना माना गया है और यही पंचतत्व हमें जीवन के उस सत्य की याद दिलाते हैं कि शरीर नश्वर है, लेकिन वंश, संस्कार और स्मृतियां पीढ़ियों तक चलती हैं।

इसलिए गया जी में पिंडदान कर देना अंत नहीं, बल्कि अपनी परंपरा और पूर्वजों के प्रति श्रद्धा की एक कड़ी है। पितृ पक्ष हमें अवसर देता है कि हम अपने पिता, दादा, परदादा और उनसे पहले की पीढ़ियों को याद करें, उनका नाम अपनी अगली पीढ़ी तक पहुंचाएं और श्रद्धापूर्वक तर्पण करें। क्योंकि पूर्वज केवल हमारे अतीत नहीं हैं, उनकी विरासत ही हमारे वर्तमान की जड़ है और हमारी आने वाली पीढ़ियों की पहचान भी।

जड़ें जितनी गहरी, पहचान उतनी मजबूत

पेड़ की ऊंचाई देख सकते है पर उसकी जड़ें दिखाई नहीं देतीं, लेकिन पेड़ का अस्तित्व उन्हीं जड़ों पर टिका होता है। इंसान भी कुछ ऐसा ही है। हमारी उपलब्धियां हमें दिखाई देती हैं, लेकिन उन उपलब्धियों के पीछे कई पीढ़ियों का संघर्ष अक्सर दिखाई नहीं देता। पितृ पक्ष हमें उसी अदृश्य हिस्से की ओर देखने का अवसर देता है। यह हमें बताता है कि हम अकेले नहीं हैं; हमारे पीछे एक पूरा परिवार, एक इतिहास और कई पीढ़ियों की कहानी खड़ी है।

अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ की अपील : इस बार केवल तर्पण नहीं, स्मृति भी बचाइए

इस पितृ पक्ष अपने पूर्वजों के नाम खोजिए। पिता और दादा के बाद परदादा को याद कीजिए। परदादा के बाद उनके पिता का नाम जानने की कोशिश कीजिए। जहां तक जानकारी मिले, वहां तक अपने वंश-वृक्ष को बढ़ाइए। मातृ पक्ष और महिला पूर्वजों को भी उसमें सम्मानपूर्वक स्थान दीजिए। अपने बुजुर्गों की बातें सुनिए, उनकी तस्वीरें और पुराने दस्तावेज सुरक्षित कीजिए और परिवार की कहानी अगली पीढ़ी तक पहुंचाइए, और सबसे जरूरी बात, जो माता-पिता और बुजुर्ग आज हमारे बीच हैं, उनके पास बैठिए। उनका हाथ पकड़िए। उनकी बात सुनिए। क्योंकि कल जब तस्वीर के सामने दीपक जलाना पड़े, उससे पहले आज जीवित व्यक्ति के चेहरे पर मुस्कान लाने का अवसर हमारे पास है।

किसी पूर्वज का नाम याद नहीं है तो खोजिए। किसी की कहानी नहीं मालूम है तो पूछिए। किसी की तस्वीर नहीं है तो उसकी स्मृति लिखिए। वंश-वृक्ष अधूरा है तो उसे पूरा करने की कोशिश कीजिए।

क्योंकि हम किसी एक दिन की संतान नहीं हैं। हम कई पीढ़ियों की चलती हुई कहानी हैं और शायद पितृ पक्ष की सबसे गहरी पुकार यही है, “अपनी जड़ों को मत भूलिए, क्योंकि जिस जड़ को आप भूल गए हैं, उसी पर आपका आज खड़ा है।”

प्रदीप मिश्रा

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