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सच की तह तक

राखड़ डैम से निकलती राख… फिर गायब! सड़क किनारे ढेर खोल रहे बड़े खेल का राज?

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कोरबा, छत्तीसगढ़

By ACGN 7647981711, 9303948009
संवाददाता :- प्रदीप मिश्रा

90 लाख की पेनल्टी के बाद भी सवाल जिंदा NTPC से लेकर CSEB के राखड़ डैम तक आखिर राख जा कहां रही है?

कोरबा ACGN:- कोरबा में बिजली उत्पादन के साथ निकलने वाली फ्लाई ऐश अब सिर्फ राख नहीं रही, बल्कि यह एक ऐसा सवाल बन गई है जिसका जवाब कई जगहों पर दिखाई नहीं दे रहा। राखड़ डैम से राख निकलती है, ट्रकों में भरकर रवाना होती है और फिर उसके अंतिम ठिकाने का हिसाब कहां गुम हो जाता है?
कोरबा-कटघोरा मार्ग पर सड़क किनारे जगह-जगह दिखाई दे रहे राख के ढेर इस पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े कर रहे हैं। विशेषकर धनरास राखड़ क्षेत्र से निकलने वाले मार्गों पर फ्लाई ऐश के परिवहन वाले वाहनों की आवाजाही होती है। एनटीपीसी के साथ सीएसईबी से भी बड़ी मात्रा में राख निकलती है।
लेकिन रहस्य यही है राख निकलने से लेकर उसके अंतिम उपयोग या निस्तारण तक आखिर निगरानी कौन कर रहा है?


          90 लाख की पेनल्टी ने खोला राख का राज
हाल ही में छुरीखुर्द के पास सरकारी जमीन पर बड़ी मात्रा में फ्लाई ऐश डंप किए जाने का मामला सामने आया। जानकारी के अनुसार करीब 200 ट्रकों से लगभग 6 हजार टन राख निर्धारित स्थल तक पहुंचने के बजाय रास्ते में ही डंप कर दी गई।
मामले की जानकारी मिलने के बाद पर्यावरण विभाग की टीम मौके पर पहुंची। जांच के दौरान राख से लदे चार वाहन भी पकड़े गए। पर्यावरणीय नियमों के उल्लंघन को गंभीर मानते हुए विभाग ने एनटीपीसी पर 90 लाख रुपये की पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति लगाई।
यानी सवाल केवल राख के डंप होने का नहीं था, बल्कि यह भी था कि राख को निर्धारित स्थान तक पहुंचाने की व्यवस्था आखिर विफल कैसे हुई?


     राखड़ डैम से राख निकली तो क्या जिम्मेदारी भी खत्म?
यही इस पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल है। क्या राखड़ डैम से फ्लाई ऐश निकालकर परिवहन एजेंसी के हवाले कर देने के बाद बिजली संयंत्र प्रबंधन की जिम्मेदारी समाप्त हो जाती है?
अगर नहीं, तो फिर यह सुनिश्चित कौन करता है कि राख जिस स्थान के लिए रवाना हुई है, वहीं पहुंचे? हर वाहन में कितनी राख भरी गई? वाहन कहां से निकला? किस रास्ते से गया?
कहां पहुंचा? और सबसे महत्वपूर्ण, जिस जगह के लिए राख भेजी गई थी, वहां वास्तव में कितनी राख पहुंची?
इन सवालों का जवाब यदि रिकॉर्ड में है तो सड़क किनारे राख के ढेर क्यों दिखाई दे रहे हैं?


     NTPC के बाद अब CSEB की राख पर भी नजर
मामला केवल एनटीपीसी तक सीमित नहीं होना चाहिए।
कोरबा में सीएसईबी के बिजलीघरों से भी बड़ी मात्रा में फ्लाई ऐश निकलती है। सीएसईबी के नवागांव झाबू और पंडरीपानी क्षेत्र में राखड़ डैम हैं।
अब सवाल उठना स्वाभाविक है, इन राखड़ डैम से रोजाना या निर्धारित अवधि में कितनी राख बाहर निकल रही है? कितनी राख किस एजेंसी को दी जा रही है? कहां ले जाई जा रही है?
किस परियोजना में उसका उपयोग हो रहा है? और डैम से निकलने वाली राख तथा अंतिम उपयोग स्थल पर पहुंचने वाली राख का मिलान कौन कर रहा है?
यह जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए, क्योंकि जब एक ओर सड़क किनारे राख दिखाई देती है और दूसरी ओर बड़ी मात्रा में राखड़ डैम से बाहर भेजी जाती है, तो दोनों के बीच की कड़ी की जांच जरूरी हो जाती है।

वहीं नवागांव झाबू में राख उड़ने से ग्रामीणों और स्कूली बच्चों को परेशानी की शिकायतें भी सामने आ चुकी हैं।
यानी समस्या सिर्फ राख को बाहर निकालने तक सीमित नहीं है।
राखड़ डैम की सुरक्षा, राख का परिवहन, सड़क किनारे फैलती राख और अंतिम निस्तारण पूरी व्यवस्था की निगरानी जरूरी है।


        सड़क किनारे राख, क्या यह सिर्फ संयोग है?
कोरबा-कटघोरा मार्ग पर यदि राख के ढेर दिखाई दे रहे हैं तो सबसे पहले यह पता लगना चाहिए कि यह राख आई कहां से?
क्या यह परिवहन के दौरान वाहनों से गिरी?
क्या किसी स्थान पर जानबूझकर डंप की गई?
या किसी अधिकृत परिवहन के बाद अनधिकृत जगह पर उतार दी गई?
इन सवालों का जवाब केवल मौके की जांच से नहीं, बल्कि वाहनों की ट्रैकिंग, वजन पर्ची, लोडिंग रिकॉर्ड और अंतिम डिलीवरी रिकॉर्ड को मिलाकर ही सामने आ सकता है।
अगर 200 ट्रक राख रास्ते में डंप हो सकती है तो बाकी परिवहन कितना सुरक्षित?
छुरीखुर्द की घटना ने व्यवस्था की निगरानी पर सबसे बड़ा प्रश्न खड़ा कर दिया है।
यदि करीब 200 ट्रकों से हजारों टन राख निर्धारित स्थल तक पहुंचने के बजाय सरकारी जमीन पर डंप हो सकती है, तो यह जांच जरूरी है कि जिले में राख का परिवहन कितना पारदर्शी है।
क्या हर वाहन जीपीएस से ट्रैक होता है?
क्या लोडिंग और अनलोडिंग के समय वजन दर्ज होता है?
क्या अंतिम स्थल पर पहुंचने के बाद राख की मात्रा का सत्यापन होता है?
क्या भुगतान वास्तविक डिलीवरी के आधार पर होता है?
और अगर किसी वाहन ने बीच रास्ते में राख उतार दी तो उसकी पहचान और कार्रवाई की व्यवस्था क्या है?
       90 लाख की पेनल्टी के बाद अब अगला सवाल
एनटीपीसी पर 90 लाख रुपये की पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति लगना कार्रवाई जरूर है, लेकिन इससे कई नए सवाल भी पैदा हुए हैं।
यदि परिवहन एजेंसी ने नियम तोड़े तो उसकी जवाबदेही क्या तय हुई?
यदि राख रास्ते में डंप हुई तो निगरानी करने वाली व्यवस्था कहां थी?
यदि एनटीपीसी को पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति भरनी पड़ी तो क्या संबंधित एजेंसी से इसकी वसूली होगी? और सबसे अहम क्या अब एनटीपीसी ही नहीं, बल्कि सीएसईबी के राखड़ डैम से निकलने वाली राख के परिवहन और अंतिम निस्तारण की भी जांच होगी?
जनता रखे नजर, राख डंप करते दिखे तो करें शिकायत
फ्लाई ऐश को कहीं भी खुले में डंप करना पर्यावरण और आम लोगों के लिए गंभीर समस्या पैदा कर सकता है।
इसलिए आम जनता से अपील है कि यदि देर रात या दिन के किसी भी समय कोई वाहन सड़क किनारे, खेत, सरकारी जमीन या किसी अन्य स्थान पर राख डंप करता दिखाई दे, तो वाहन का नंबर, स्थान और समय नोट करें। संभव हो तो फोटो या वीडियो लेकर तत्काल पर्यावरण विभाग और स्थानीय प्रशासन को सूचना दें।
एक वाहन की पहचान से यह पता लगाया जा सकता है कि राख कहां से निकली थी और उसे कहां जाना था।


     रहस्य अभी बाकी है,राख आखिर जा कहां रही है?
छुरीखुर्द की कार्रवाई ने एक घटना का खुलासा किया है, लेकिन कोरबा की राख की पूरी कहानी अभी सामने आना बाकी है।
धनरास से निकलने वाली राख कहां जा रही है?
सीएसईबी के नवागांव झाबू और पंडरीपानी राखड़ डैम से निकलने वाली राख का अंतिम ठिकाना क्या है?
कोरबा-कटघोरा मार्ग के किनारे दिखाई दे रहे राख के ढेर किसकी कहानी बता रहे हैं? और सबसे बड़ा सवाल
राख का सफर डैम से शुरू होता है… लेकिन खत्म कहां होता है?
अब जरूरत है कि पर्यावरण विभाग और प्रशासन केवल शिकायत या घटना के बाद कार्रवाई न करें, बल्कि एनटीपीसी और सीएसईबी दोनों की राख के उत्पादन से लेकर अंतिम उपयोग/निस्तारण तक पूरी चेन का रिकॉर्ड और भौतिक सत्यापन करें।
क्योंकि राख गायब नहीं होती, वह कहीं न कहीं जाती है।
बस सवाल इतना है कि उसका ठिकाना रिकॉर्ड में है या सड़क किनारे पड़े राख के ढेरों में?


प्रदीप मिश्रा
अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ (ACGN)
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