भोजली में उमड़ा गांव, मितान रिश्तों से जुड़ा अमोरा
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जांजगीर-चांपा, छत्तीसगढ़
By ACGN – 7647981711, 9303948009
संवाददाता :- अरविन्द तिवारी
लोकगीतों और पारंपरिक रीति-रिवाजों के बीच हुआ भोजली विसर्जन, एक-दूसरे को भोजली देकर जीवनभर मित्रता निभाने का लिया संकल्प
जांजगीर-चांपा ACGN:- छत्तीसगढ़ की लोक परंपरा और संस्कृति से जुड़े भोजली पर्व का उत्साह रविवार को ग्राम अमोरा (महन्त) में भी देखने को मिला। नवागढ़ विकासखंड अंतर्गत मां शंवरीन दाई की पावन धरा कहे जाने वाले अमोरा गांव में रक्षाबंधन के दूसरे दिन मनाए जाने वाले इस पारंपरिक लोकपर्व पर सुबह से ही उत्सव जैसा माहौल रहा। शाम होते-होते महिलाओं, युवतियों और ग्रामीणों की मौजूदगी में भोजली विसर्जन का कार्यक्रम धूमधाम और सौहार्दपूर्ण वातावरण में संपन्न हुआ।
गांव के लम्बरदार परिवार की ओर से कामधेनु सेना के छत्तीसगढ़ प्रदेश सचिव योगेश तिवारी ने गांव के सभी देवी-देवताओं के आवाहन और विधिवत पूजा-अर्चना के लिए सुबह ही लखेश बैगा को श्रीफल, पुष्प और अगरबत्ती सौंपकर धार्मिक अनुष्ठान की शुरुआत कराई। इसके बाद शाम को महिलाओं और युवतियों ने रक्षाबंधन के अवसर पर अपने घरों में बोई गई भोजली की टोकनियों को सिर पर रखा और पारंपरिक लोकगीत गाते हुए पूरे गांव का भ्रमण किया।
भोजली की टोकनियां लेकर ग्रामीण देवरहा तालाब के तट पर पहुंचे, जहां गांव के बैगा द्वारा विधि-विधान से पूजा-अर्चना कराई गई। इसके बाद श्रद्धालुओं ने अपनी-अपनी भोजली का तालाब में विसर्जन किया। इस दौरान पारंपरिक वाद्य यंत्रों और भोजली लोकगीतों से पूरा वातावरण भक्तिमय और उल्लासपूर्ण बना रहा।
भोजली विसर्जन के बाद लोगों ने एक-दूसरे को भोजली देकर पर्व की शुभकामनाएं दीं और आपसी प्रेम, मित्रता तथा भाईचारे को जीवनभर बनाए रखने का संकल्प लिया। मान्यता के अनुसार भोजली केवल एक लोकपर्व नहीं बल्कि छत्तीसगढ़ की सामाजिक एकता और रिश्तों को मजबूत करने वाली परंपरा भी है। हमउम्र लोग एक-दूसरे के कान में भोजली रखकर मितान बनने और जीवनभर दोस्ती निभाने का संकल्प लेते हैं। इसके बाद दोस्ती का यह रिश्ता इतना आत्मीय माना जाता है कि एक-दूसरे को नाम से संबोधित करने के बजाय ‘मितान’ कहकर बुलाने की परंपरा है।
ग्रामीणों ने भोजली विसर्जन के दौरान सुख-समृद्धि, खुशहाली और अच्छी फसल की कामना की। विसर्जन स्थल पर स्थानीय नागरिकों के साथ बड़ी संख्या में महिलाएं, युवा और बच्चे मौजूद रहे। कार्यक्रम शांतिपूर्ण और सौहार्दपूर्ण वातावरण में संपन्न हुआ।
इस अवसर पर गांव के युवा सरपंच राकेश कश्यप, चंद्रहास साहू, भूपेन्द्र यादव, पद्मा कश्यप, भारती साहू, आशु साहू, आरती साहू, गीतांजली कश्यप, आकांक्षा कश्यप, निखिल साहू, लाला मरावी, सीताराम कश्यप सहित बड़ी संख्या में गणमान्य नागरिक और ग्रामीण उपस्थित रहे।
गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ में भोजली पर्व का विशेष सांस्कृतिक महत्व है। अच्छी फसल और खुशहाली की कामना को लेकर लोग अपने घरों में छोटी-छोटी टोकनियों में भोजली बोते हैं। इसके बाद बच्चियां और महिलाएं इन भोजली की टोकरियों को सिर पर रखकर बाजे-गाजे के साथ नदी या तालाब तक पहुंचती हैं। इस दौरान पारंपरिक गीत ‘देवी गंगा देवी गंगा, लहर तुरंगा, हमर भोजली दाई के भीजे आठो अंगा’ जैसे लोकगीतों की गूंज सुनाई देती है।
गांव और नगर का भ्रमण करने के बाद भोजली को नदी अथवा तालाब में पूजा-पाठ के साथ विसर्जित किया जाता है। इसके बाद लोग एक-दूसरे को भोजली देकर बड़ों का आशीर्वाद लेते हैं और हमउम्र लोग मित्रता को जीवनभर निभाने का संकल्प लेते हैं। छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में आज भी यह परंपरा पूरे उत्साह और आत्मीयता के साथ जीवंत है। हालांकि शहरों में आधुनिक जीवनशैली के चलते यह परंपरा पहले की अपेक्षा कम दिखाई देती है, लेकिन गांवों में भोजली आज भी लोकसंस्कृति, आपसी भाईचारे और पारंपरिक रिश्तों को जोड़ने वाले पर्व के रूप में उत्साहपूर्वक मनाई जाती है।
प्रदीप मिश्रा
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