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खनन प्रभावित वन भूमि का वैज्ञानिक तरीके से होगा पुनरुद्धार

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कोरबा, छत्तीसगढ़

By ACGN – 7647981711, 9303948009

वन मंत्री केदार कश्यप ने ली उच्चस्तरीय बैठक, स्थानीय प्रजातियों के रोपण, मृदा संरक्षण और वन्यजीवों के आवास पर विशेष जोर

कोरबा ACGN:- खनिज संसाधनों के उपयोग के बाद खनन से प्रभावित वन भूमि को उसकी प्राकृतिक पहचान लौटाने के लिए अब केवल पौधरोपण तक सीमित रहने के बजाय वैज्ञानिक तरीके से संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करने पर जोर दिया जाएगा। वन एवं जलवायु परिवर्तन, परिवहन, सहकारिता एवं संसदीय कार्य मंत्री केदार कश्यप ने शुक्रवार को एनटीपीसी के प्रशासनिक भवन में सार्वजनिक एवं निजी उपक्रमों के प्रतिनिधियों तथा वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों की उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक लेकर खनन एवं औद्योगिक परियोजनाओं से प्रभावित वन भूमि के पुनरुद्धार को लेकर आवश्यक दिशा-निर्देश दिए।


बैठक में वन संरक्षण एवं संवर्धन अधिनियम के प्रावधानों तथा स्वीकृत शर्तों के अनुरूप वन भूमि के पुनरुद्धार और पुनर्स्थापना की विस्तृत समीक्षा की गई। इस अवसर पर कटघोरा विधायक प्रेमचंद पटेल, प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं वन बल प्रमुख अरुण कुमार पांडे, प्रधान मुख्य वन संरक्षक लैंड मैनेजमेंट सुनील मिश्रा सहित पावर ग्रिड कॉरपोरेशन, हिंडालको, एसईसीएल, एनटीपीसी, बालको, अडानी सहित प्रमुख सार्वजनिक एवं निजी औद्योगिक तथा खनन उपक्रमों के वरिष्ठ अधिकारी और वन विभाग के उच्चाधिकारी मौजूद रहे।
वन मंत्री केदार कश्यप ने कहा कि प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग और पर्यावरण संरक्षण एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं, बल्कि दोनों के बीच संतुलन बनाकर विकास को आगे बढ़ाना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि विकास के लिए खनिज संसाधनों का उपयोग जरूरी है, लेकिन उससे प्रकृति को हुई क्षति की भरपाई करना और प्रभावित वन भूमि को दोबारा स्वस्थ स्वरूप देना भी उतनी ही महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।
उन्होंने प्रधान मुख्य वन संरक्षक द्वारा जारी तकनीकी एवं व्यावहारिक दिशा-निर्देशों का संबंधित कंपनियों और अधिकारियों से शत-प्रतिशत पालन सुनिश्चित करने को कहा। मंत्री ने स्पष्ट किया कि वन भूमि को केवल जमीन का टुकड़ा समझकर नहीं देखा जा सकता। यह जैव विविधता, वन्यजीवों, जल स्रोतों और स्थानीय समुदायों के जीवन से जुड़ा महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन है। इसलिए खनन एवं औद्योगिक गतिविधियों के बाद इसके पुनरुद्धार में दूरगामी पर्यावरणीय दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है।
बैठक में औद्योगिक एवं खनन कंपनियों को अपने कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व मद का प्रभावी और संवेदनशील उपयोग करने के निर्देश भी दिए गए। वन मंत्री ने कहा कि खनन प्रभावित क्षेत्रों में रहने वाले ग्रामीणों और स्थानीय समुदायों के आर्थिक, शैक्षणिक एवं सामाजिक विकास से जुड़े कार्यों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। ऐसे कार्य किए जाएं जिनसे स्थानीय लोगों के जीवन स्तर में वास्तविक और सकारात्मक बदलाव दिखाई दे तथा विकास का लाभ प्रभावित क्षेत्रों के लोगों तक पहुंच सके।
बैठक में अधिकारियों और कंपनियों को निर्देशित किया गया कि वन भूमि के पुनरुद्धार को केवल औपचारिक प्रक्रिया या कागजी अनुपालन तक सीमित नहीं रखा जाए। पुनर्स्थापना एवं पुनरुद्धार के प्रत्येक कार्य में वैज्ञानिक वानिकी सिद्धांतों, स्थानीय पारिस्थितिकी और संबंधित क्षेत्र की प्राकृतिक विशेषताओं को आधार बनाया जाए।
खनन प्रभावित क्षेत्रों में केवल तेजी से बढ़ने वाली प्रजातियों का एकरूप पौधरोपण करने के बजाय स्थानीय एवं देशज प्रजातियों को प्राथमिकता देने पर विशेष जोर दिया गया। पौधों का चयन क्षेत्र की जलवायु, मृदा, स्थल की प्रकृति, जल उपलब्धता और स्थानीय वन संरचना के अनुरूप करने के निर्देश दिए गए, ताकि पौधे लंबे समय में स्थायी वन का रूप ले सकें और प्राकृतिक पुनरुत्पादन को भी बढ़ावा मिले।
प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं वन बल प्रमुख अरुण कुमार पांडे ने कहा कि वैज्ञानिक पुनरुद्धार का दायरा केवल ओवरबर्डन डंप तक सीमित नहीं रहना चाहिए। खनन के दौरान खोदे गए और प्रभावित पूरे क्षेत्र में भूमि सुधार, मृदा संरक्षण तथा पौधरोपण का कार्य वैज्ञानिक वानिकी तकनीकों के अनुसार किया जाना चाहिए। उन्होंने मृदा की स्थिरता बनाए रखने, भू-क्षरण रोकने और खनन के बाद भूमि को दोबारा वन विकास के योग्य बनाने के लिए स्थल आधारित तकनीकों के इस्तेमाल पर विशेष जोर दिया।
बैठक में छत्तीसगढ़ राज्य वन विकास निगम की रोपण योजनाओं की भी समीक्षा की गई। निगम को निर्देशित किया गया कि वह केवल तेजी से बढ़ने वाली प्रजातियों पर निर्भर न रहे, बल्कि क्षेत्र की पारिस्थितिकीय आवश्यकताओं के अनुसार स्थानीय और देशज प्रजातियों को प्राथमिकता दे। अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि वन विकास का उद्देश्य केवल पौधों की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि विविधता से भरपूर, स्वस्थ और लंबे समय तक टिकाऊ वन तैयार करना होना चाहिए।
वन एवं वन्यजीव संरक्षण को एक-दूसरे से जुड़ा विषय बताते हुए बैठक में खनन प्रभावित क्षेत्रों में वन्यजीवों के आवास संरक्षण पर भी विशेष ध्यान देने के निर्देश दिए गए। वन्यजीवों के सुरक्षित आवागमन, उनके आवास और प्रजनन के लिए अनुकूल परिस्थितियां विकसित करने तथा पुनरुद्धार योजनाओं को स्थानीय जैव विविधता के अनुरूप तैयार करने पर जोर दिया गया।
वन विभाग के मैदानी अमले को पुनरुद्धार कार्यों की निगरानी के लिए जवाबदेह बनाने के निर्देश भी दिए गए। संबंधित वन मंडलाधिकारियों और उनके अधीनस्थ अधिकारियों को नियमित रूप से क्षेत्र का भ्रमण कर पुनरुद्धार कार्यों की वास्तविक स्थिति देखने तथा निरीक्षण की जानकारी विभागीय अभिलेखों में दर्ज करने को कहा गया। पौधों की उत्तरजीविता, भूमि की स्थिति, कार्यों की गुणवत्ता और निर्धारित वैज्ञानिक मानकों के पालन की नियमित समीक्षा करने के निर्देश दिए गए।
बैठक में इस बात पर विशेष जोर दिया गया कि खनन के बाद वन भूमि की बहाली केवल कागजों में पूर्ण दिखाई देने वाली प्रक्रिया नहीं होनी चाहिए, बल्कि उसका परिणाम धरातल पर स्पष्ट नजर आना चाहिए। स्थानीय प्रजातियों की स्थापना, मृदा संरक्षण, जैव विविधता संवर्धन, वन्यजीव संरक्षण और स्थानीय समुदायों के हितों को साथ लेकर चलने वाली समग्र व्यवस्था के माध्यम से खनन प्रभावित क्षेत्रों को दोबारा स्वस्थ एवं टिकाऊ पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में विकसित करने की दिशा में काम करने पर जोर दिया गया।
प्रदीप मिश्रा
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