नमस्कार 🙏 हमारे न्यूज पोर्टल - मे आपका स्वागत हैं ,यहाँ आपको हमेशा ताजा खबरों से रूबरू कराया जाएगा , खबर ओर विज्ञापन के लिए संपर्क करे +91 7647981711 ,हमारे यूट्यूब चैनल को सबस्क्राइब करें, साथ मे हमारे फेसबुक को लाइक जरूर करें , पेट्रोल की टंकी से संसद तक… सवालों का यह सफर आखिर कहां रुकेगा? – Anjor Chhattisgarh News

Anjor Chhattisgarh News

सच की तह तक

पेट्रोल की टंकी से संसद तक… सवालों का यह सफर आखिर कहां रुकेगा?

😊 कृपया इस न्यूज को शेयर करें😊

नागरिक परिक्रमा

नई दिल्ली, भारत

By ACGN – 7647981711, 9303948009

इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल से उपभोक्ता की जेब और खेतों के भविष्य तक, फिर छात्र आंदोलन से सत्ता की जवाबदेही तकअलग-अलग दिखाई देने वाले सवालों के पीछे आखिर कौन-सी बड़ी तस्वीर छिपी है?

लेखक संजय पराते

कहानी पेट्रोल पंप से शुरू होती है, लेकिन उसका रास्ता बहुत दूर तक जाता है। एक आम आदमी अपनी गाड़ी में पेट्रोल भरवाते हुए कीमत देखता है और जेब का हिसाब लगाता है। फिर सवाल उठता है कि ईंधन की कीमत इतनी क्यों है, वाहन का वास्तविक खर्च कितना बढ़ा है और जिस ईंधन को सस्ता या वैकल्पिक बताया गया था, उसका लाभ आखिर उपभोक्ता की जिंदगी में दिखाई क्यों नहीं देता। यही सवाल जब पेट्रोल की टंकी से निकलकर खेत तक पहुंचता है तो गन्ना, मक्का, पानी, जमीन और खाद्य सुरक्षा सामने आ जाते हैं। खेत से आगे बढ़ने पर इथेनॉल का बाजार और उससे जुड़े कारोबारी हित दिखाई देते हैं। और फिर यह पूरी कहानी सत्ता की चौखट पर आकर खड़ी हो जाती है। दूसरी तरफ देश का युवा शिक्षा, परीक्षा, रोजगार और भविष्य को लेकर सड़क पर उतरता है। पहली नजर में दोनों घटनाएं अलग दिखाई देती हैं, लेकिन इनके भीतर एक साझा प्रश्न लगातार सुनाई देता है जनता सवाल पूछ रही है, जवाब कौन देगा?

पहला सवाल : पेट्रोल सस्ता हुआ या खर्च का गणित बदल गया?

कहानी पेट्रोल पंप से शुरू होती है। गाड़ी में ईंधन भरवाने वाला आम आदमी मीटर पर बढ़ते आंकड़े देखता है और मन ही मन अपनी जेब का हिसाब लगाता है। उसे बताया गया कि वैकल्पिक ईंधन से पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता घटेगी, ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी और आने वाले समय में इसका लाभ उपभोक्ताओं तक पहुंचेगा। लेकिन सड़क पर चलने वाले नागरिक का सवाल कुछ और है, यदि ईंधन में इथेनॉल की मात्रा बढ़ रही है और वाहन के माइलेज पर उसका असर पड़ता है, तो समान दूरी तय करने में वास्तविक खर्च कितना बढ़ रहा है? पंप पर एक लीटर की कीमत दिखाई देती है, लेकिन उपभोक्ता की असली लागत उस दूरी से तय होती है जो वाहन उस एक लीटर में तय करता है। इसलिए सवाल केवल पेट्रोल की कीमत का नहीं है, सवाल यह है कि एक किलोमीटर की यात्रा अब आम आदमी को कितनी महंगी पड़ रही है।


दूसरा सवाल : एक लीटर ईंधन के पीछे कितने किलोमीटर का हिसाब है?

इथेनॉल-मिश्रित ईंधन की बहस को केवल कीमत तक सीमित कर देना पूरी तस्वीर को अधूरा छोड़ देना होगा। यदि किसी वाहन का माइलेज प्रभावित होता है तो उपभोक्ता को समान दूरी तय करने के लिए अधिक ईंधन खरीदना पड़ सकता है। यही वह जगह है जहां सरकारी आंकड़ों और आम आदमी की जेब का हिसाब अलग-अलग दिखाई दे सकता है। कागज पर एक लीटर की कीमत कुछ और हो सकती है, लेकिन महीने के अंत में वाहन चलाने पर निकलने वाला वास्तविक खर्च कुछ और। इसलिए ईंधन नीति की सफलता का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि कितने प्रतिशत इथेनॉल मिलाया गया, बल्कि इस आधार पर भी होना चाहिए कि उसका वास्तविक आर्थिक असर उपभोक्ता पर कितना पड़ा।

तीसरा सवाल : वाहन के टैंक से निकलकर कहानी खेत तक क्यों पहुंच रही है?

इथेनॉल की कहानी पेट्रोल की टंकी में समाप्त नहीं होती। उसके पीछे खेत है, किसान है, गन्ना है, मक्का है और सबसे महत्वपूर्ण पानी है। यदि जैव ईंधन की मांग लगातार बढ़ती है तो कृषि भूमि पर फसलों के चयन का प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है। गन्ने की खेती में पानी की अधिक आवश्यकता होती है और ऐसे में भूजल पर पड़ने वाला दबाव भी चर्चा का विषय बनता है। दूसरी ओर मक्का की मांग बढ़ने से फसल चक्र और कृषि बाजार प्रभावित हो सकते हैं। इसीलिए ऊर्जा नीति को कृषि नीति से अलग करके देखने की बजाय दोनों के बीच संबंध को समझना जरूरी है। आज पेट्रोल की टंकी में भरा ईंधन कल किसान के खेत और देश की खाद्य सुरक्षा से जुड़ा सवाल बन सकता है।

चौथा सवाल : ईंधन बढ़ा तो मुनाफा किसका बढ़ा?

जहां मांग बढ़ती है, वहां बाजार बढ़ता है। जहां बाजार बढ़ता है, वहां निवेश आता है। और जहां निवेश आता है, वहां मुनाफे का सवाल भी उठता है। इथेनॉल उत्पादन में बढ़ते निवेश और आपूर्ति के आंकड़े इसी बदलती अर्थव्यवस्था की ओर संकेत करते हैं। संजय पराते के राजनीतिक लेखन में सवाल उठता है कि इस बढ़ते बाजार का वास्तविक लाभ किन वर्गों और कारोबारी समूहों तक पहुंच रहा है। इथेनॉल उत्पादकों, बड़ी चीनी मिलों और संबंधित उद्योगों को संभावित लाभ को लेकर सवाल उठाना इस बहस का महत्वपूर्ण हिस्सा है। लेकिन यहां यह अंतर भी समझना जरूरी है कि किसी उद्योग का विस्तार अपने आप में गलत नीति का प्रमाण नहीं होता। असली सवाल यह है कि नीति का लाभ और उसकी लागत किसके हिस्से में जा रही है।

पांचवां सवाल : सरकार की नीति, उपभोक्ता की कीमत और पारदर्शिता का हिसाब

ऊर्जा सुरक्षा जरूरी है। पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता कम करना भी जरूरी है। वैकल्पिक ईंधन की तलाश भी समय की आवश्यकता है। लेकिन इन सभी लक्ष्यों के साथ उपभोक्ता हित की रक्षा भी उतनी ही जरूरी है। यदि ईंधन की गुणवत्ता, वाहन पर संभावित प्रभाव, माइलेज और वास्तविक लागत को लेकर कोई चिंता है तो उसकी जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए। वाहन उद्योग की ओर से इथेनॉल-मिश्रित ईंधन को लेकर उठाई गई चिंताओं पर भी स्वतंत्र तकनीकी अध्ययन और सार्वजनिक चर्चा जरूरी है। किसी पत्र के वापस लिए जाने से प्रश्न अपने आप समाप्त नहीं हो जाते और किसी राजनीतिक आरोप से कोई तथ्य अपने आप सिद्ध भी नहीं हो जाता। लोकतंत्र का रास्ता जांच, प्रमाण और पारदर्शिता से होकर गुजरता है।

छठा सवाल : मक्का खेत में उगेगा या ईंधन के बाजार में जाएगा?

इथेनॉल उत्पादन के लिए मक्का के बढ़ते उपयोग और आयात का प्रश्न इस बहस को खाद्य सुरक्षा तक ले जाता है। ऊर्जा के लिए कृषि संसाधनों का कितना उपयोग होना चाहिए? खाद्यान्न और जैव ईंधन के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए? आयातित मक्के की गुणवत्ता और उसके वास्तविक उपयोग की निगरानी कैसे हो? इन सवालों का जवाब भावनात्मक राजनीति से नहीं, वैज्ञानिक अध्ययन और प्रमाणित आंकड़ों से दिया जाना चाहिए। लेकिन सवाल पूछना जरूरी है, क्योंकि खेती केवल बाजार की मांग से नहीं चलती। उसके साथ जमीन, पानी, भोजन और आने वाली पीढ़ियों की जरूरतें भी जुड़ी होती हैं।

सातवां सवाल : क्या पेट्रोल की कहानी अब जनता की थाली तक पहुंच रही है?

जब ऊर्जा नीति कृषि भूमि को प्रभावित करती है, कृषि पानी को प्रभावित करती है और फसल चयन खाद्य बाजार को प्रभावित करता है, तब पेट्रोल की कीमत और भोजन की कीमत के बीच एक अदृश्य रिश्ता बन जाता है। आज उपभोक्ता पेट्रोल भरवा रहा है, लेकिन कल वही उपभोक्ता बाजार में अनाज, सब्जी और दूसरी आवश्यक वस्तुओं की कीमत चुका रहा होगा। इसलिए ऊर्जा नीति की समीक्षा केवल तेल कंपनियों और पेट्रोल पंपों के आंकड़ों से नहीं हो सकती। उसके साथ किसान, जल संसाधन और खाद्य सुरक्षा का पूरा गणित देखना होगा।

छात्र आंदोलन आखिर क्यों सड़कों पर उतरा?

यहां से कहानी एक नए मोड़ पर आती है। हाथों में किताबें, आंखों में भविष्य के सपने और मन में व्यवस्था से जवाब मांगता युवा भारत सड़कों पर दिखाई देता है। प्रतियोगी परीक्षाओं, नीट और शिक्षा व्यवस्था से जुड़े सवालों ने छात्रों के भीतर बढ़ती बेचैनी को आंदोलन का रूप दिया। एक विद्यार्थी के लिए परीक्षा सिर्फ प्रश्नपत्र नहीं, उसके भविष्य का दरवाजा होती है। इसलिए परीक्षा की पारदर्शिता पर उठने वाला हर सवाल उसके भरोसे को सीधे प्रभावित करता है।

आठवां सवाल : फिर अचानक जंतर-मंतर क्यों दिखाई देता है?

यहीं से कहानी पेट्रोल पंप से निकलकर जंतर-मंतर पहुंचती है। वहां पेट्रोल खरीदने वाला उपभोक्ता नहीं, बल्कि किताबें लेकर अपने भविष्य की तलाश में निकला युवा दिखाई देता है। प्रतियोगी परीक्षाओं, नीट और शिक्षा व्यवस्था से जुड़े सवालों ने देश के युवाओं में जिस बेचैनी को जन्म दिया, वह केवल परीक्षा तक सीमित नहीं है। एक विद्यार्थी वर्षों तक तैयारी करता है, परिवार अपनी कमाई खर्च करता है और एक परीक्षा को अपने भविष्य की सीढ़ी मानता है। ऐसे में परीक्षा व्यवस्था पर उठने वाला सवाल उसके लिए केवल प्रशासनिक समस्या नहीं होता। वह उसके भविष्य और व्यवस्था पर भरोसे का सवाल बन जाता है।

सवाल : क्या आंदोलन खत्म होने से सवाल भी खत्म हो जाते हैं?
धरना खत्म हो सकता है, भीड़ लौट सकती है और सड़क फिर खाली हो सकती है, लेकिन अगर मूल सवाल अनुत्तरित रह जाएं तो बेचैनी खत्म नहीं होती। छात्रों की मांगों, पुलिस कार्रवाई, गिरफ्तारियों और दर्ज मुकदमों को लेकर उठे सवालों का जवाब राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि निष्पक्ष जांच और प्रमाणों से मिलना चाहिए। आखिर लोकतंत्र में सवाल पूछने वाले युवा को जवाब मिलेगा या सिर्फ कार्रवाई का सामना करना पड़ेगा?

नौवां सवाल : आंदोलन सड़क पर आया तो असली परीक्षा किसकी हुई?

जब छात्र सड़क पर आता है तो उसकी परीक्षा खत्म नहीं होती, बल्कि लोकतंत्र की परीक्षा शुरू होती है। सरकार के सामने कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी है, लेकिन आंदोलनकारियों के लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। पुलिस कार्रवाई, बल प्रयोग, गिरफ्तारी और मुकदमों से जुड़े आरोपों की स्वतंत्र जांच इसलिए जरूरी है कि किसी भी पक्ष के दावे को अंतिम सत्य मानने के बजाय प्रमाण सामने आएं। किस परिस्थिति में कार्रवाई हुई, किसके आदेश पर हुई और क्या वह कानून के अनुरूप थी, इन सवालों का उत्तर राजनीति नहीं, निष्पक्ष जांच दे सकती है।

दसवां सवाल : पत्थरों से भरा ट्रक… और कहानी में आया नया मोड़

आंदोलन के दौरान पत्थरों से भरे एक ट्रक को लेकर उठे सवालों ने पूरे घटनाक्रम को और रहस्यमय बना दिया। न्यूज़लॉन्ड्री की कथित खोजी रिपोर्ट का हवाला देते हुए पुलिस के दावों पर सवाल उठाए गए हैं। यदि जांच और उपलब्ध दस्तावेजों में पुलिस के दावे से अलग तथ्य सामने आते हैं तो निष्पक्ष जांच की आवश्यकता और बढ़ जाती है। लेकिन यहां भी पत्रकारिता का धर्म यही है कि आरोप को आरोप की तरह, दावा को दावा की तरह और प्रमाण को प्रमाण की तरह रखा जाए। सच किस तरफ है, इसका फैसला जांच के दस्तावेजों से होना चाहिए।

ग्यारहवां सवाल : आंदोलन खत्म हुआ, लेकिन क्या बेचैनी भी खत्म हो गई?

धरना समाप्त हो सकता है। भीड़ अपने घर लौट सकती है। सड़क खाली हो सकती है। लेकिन यदि मूल सवालों का समाधान नहीं होता तो आंदोलन की जमीन खत्म नहीं होती। छात्रों के खिलाफ दर्ज मामलों, गिरफ्तारियों और किसी संभावित समझौते के बाद की कार्रवाई को लेकर उठे सवाल भी इसी कारण महत्वपूर्ण हैं। यदि किसी पक्ष के साथ कोई समझौता हुआ है तो उसकी शर्तों और पालन की स्थिति सार्वजनिक होनी चाहिए। लोकतंत्र में समझौता केवल भीड़ हटाने का माध्यम नहीं होता, वह सरकार और नागरिकों के बीच विश्वास का दस्तावेज भी होता है।

बारहवां सवाल : असली लड़ाई सड़क पर है या मोबाइल की स्क्रीन पर?

आज आंदोलन का एक मैदान सड़क है और दूसरा मोबाइल फोन की स्क्रीन। सोशल मीडिया पर कुछ ही घंटों में किसी आंदोलन की पूरी तस्वीर बदल दी जाती है। कोई उसे जनआंदोलन बताता है, कोई देशविरोधी अभियान। कोई युवाओं को भविष्य की आवाज कहता है, कोई उन्हें राजनीतिक साजिश का हिस्सा बताता है। इस डिजिटल युद्ध में सबसे बड़ा खतरा यह है कि तथ्य पीछे छूट जाते हैं और प्रचार आगे निकल जाता है। इसलिए किसी भी वायरल दावे को सच मानने से पहले उसकी पुष्टि आवश्यक है। लोकतंत्र में सूचना की स्वतंत्रता जितनी जरूरी है, उतनी ही जरूरी सूचना की विश्वसनीयता भी है।

तेरहवां सवाल : युवा आखिर चाहता क्या है?

युवा कोई असंभव मांग नहीं कर रहा। वह चाहता है कि उसकी पढ़ाई का मूल्य हो, परीक्षा निष्पक्ष हो, मेहनत का परिणाम भरोसेमंद हो और रोजगार की संभावना दिखाई दे। वह चाहता है कि उसके भविष्य को राजनीतिक नारों से नहीं, ठोस नीतियों से दिशा मिले। यदि नई पीढ़ी लगातार सवाल पूछ रही है तो उसे केवल विरोध की राजनीति के रूप में देखना शायद आसान रास्ता हो सकता है, लेकिन समाधान नहीं। उसकी बेचैनी को समझना होगा, क्योंकि यही पीढ़ी आने वाले भारत की अर्थव्यवस्था, राजनीति और समाज का नेतृत्व करेगी।

चौदहवां सवाल : पेट्रोल खरीदने वाला और परीक्षा देने वाला आखिर एक ही सवाल क्यों पूछ रहे हैं?

एक आदमी पेट्रोल पंप पर खड़ा है और अपनी जेब का हिसाब मांग रहा है। एक किसान खेत में खड़ा है और पानी तथा फसल का हिसाब मांग रहा है। एक छात्र परीक्षा केंद्र के बाहर खड़ा है और अपनी मेहनत तथा भविष्य का हिसाब मांग रहा है। तीनों की समस्याएं अलग हैं, लेकिन तीनों के सवाल का केंद्र एक है—व्यवस्था कितनी जवाबदेह है? यही वह बिंदु है जहां पेट्रोल और छात्र आंदोलन की अलग-अलग कहानियां एक-दूसरे से जुड़ती हैं।

पंद्रहवां सवाल : सरकार की हर नीति गलत है क्या?

नहीं। किसी भी नीति का विरोध करना अपने आप में यह प्रमाण नहीं कि नीति गलत है। वैकल्पिक ईंधन की जरूरत है, ऊर्जा सुरक्षा जरूरी है और आयात पर निर्भरता कम करने के प्रयास भी जरूरी हैं। इसी तरह कानून-व्यवस्था बनाए रखना सरकार की जिम्मेदारी है। लेकिन इन उद्देश्यों के साथ जनता के हित, पारदर्शिता और जवाबदेही भी जरूरी हैं। सवाल नीति बनाने का नहीं, नीति के प्रभाव का है। सवाल कार्रवाई करने का नहीं, कार्रवाई के तरीके और उसकी वैधानिकता का है। यही लोकतांत्रिक बहस का मूल है।

सोलहवां सवाल : जनता केवल कीमत नहीं, पूरा हिसाब मांग रही है

जनता अब केवल यह नहीं पूछती कि पेट्रोल कितने रुपये का है। वह पूछती है कि उसकी वास्तविक लागत कितनी है। किसान केवल यह नहीं पूछता कि उसकी फसल बिकेगी या नहीं। वह पूछता है कि उसके पानी और जमीन का भविष्य क्या है। छात्र केवल परीक्षा नहीं पूछता। वह पूछता है कि उसकी मेहनत सुरक्षित है या नहीं। यही बदलता हुआ नागरिक सवाल राजनीति के सामने सबसे बड़ी चुनौती है।

सत्रहवां सवाल : अब नागरिक परिक्रमा किस मोड़ पर पहुंचेगी?

पेट्रोल की टंकी से शुरू हुई यात्रा खेत तक गई। खेत से बाजार तक पहुंची। बाजार से उपभोक्ता की जेब तक आई। वहां से सवाल सड़क पर निकला और जंतर-मंतर तक पहुंच गया। फिर वही सवाल संसद की दीवारों से टकराया। यह परिक्रमा अभी खत्म नहीं हुई है। क्योंकि सवाल खत्म तभी होंगे जब जवाब मिलेंगे। और जवाब केवल भाषणों से नहीं, नीतियों के परिणाम से मिलेंगे।

अंतिम सवाल : क्या अगली परिक्रमा इससे भी बड़ा सवाल लेकर आएगी?

यही इस पूरे विमर्श का सबसे बेचैन कर देने वाला प्रश्न है। जनता जब एक सवाल पूछती है तो उसे टाला जा सकता है। हजार लोग पूछें तो उसे राजनीतिक विरोध कहा जा सकता है। लेकिन जब करोड़ों नागरिक अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में उसी व्यवस्था से अलग-अलग रूपों में जवाब मांगने लगें, तब वह केवल विरोध नहीं रहता। वह लोकतंत्र का दबाव बन जाता है। पेट्रोल की कीमत, किसान की फसल, पानी की चिंता, युवा की परीक्षा, रोजगार का भविष्य और सरकार की जवाबदेही, ये सभी सवाल अंततः उसी जगह जाकर मिलते हैं जहां लोकतंत्र की असली ताकत बसती है।
जनता के पास सवाल हैं। सत्ता के पास जवाब होने चाहिए।
यही “नागरिक परिक्रमा” का सार है।
और शायद कहानी का सबसे बड़ा रहस्य भी यही है, सवालों की यह परिक्रमा आखिर किस जवाब पर जाकर रुकेगी?


संजय पराते लेखक : लेखक परिचय


संजय पराते अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। किसान, मजदूर, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, कृषि नीति, खाद्य सुरक्षा, सार्वजनिक क्षेत्र, शिक्षा, रोजगार और जनआंदोलनों से जुड़े विषयों पर वे लंबे समय से अपनी राजनीतिक टिप्पणियां और विचार सार्वजनिक रूप से रखते रहे हैं। समसामयिक राजनीतिक घटनाओं को जनसरोकारों, किसान हित, युवा प्रश्नों और आम नागरिक की समस्याओं के संदर्भ में देखने की उनकी विशिष्ट दृष्टि है।
“नागरिक परिक्रमा” संजय पराते के राजनीतिक विचारों और समसामयिक घटनाओं पर आधारित नियमित टिप्पणी स्तंभ है, जिसमें सत्ता, समाज, किसान, युवा, श्रमिक और आम नागरिक से जुड़े मुद्दों को आलोचनात्मक राजनीतिक दृष्टिकोण से सामने रखा जाता है।


संपादकीय टिप्पणी : इस स्तंभ में व्यक्त विचार, विश्लेषण और राजनीतिक निष्कर्ष लेखक संजय पराते के हैं। लेख में उल्लिखित आरोपों अथवा दावों को राजनीतिक टिप्पणी के संदर्भ में प्रस्तुत किया गया है। संबंधित पक्षों का आधिकारिक पक्ष तथा स्वतंत्र रूप से सत्यापित तथ्य उपलब्ध होने पर उन्हें भी पाठकों के समक्ष रखना पत्रकारिता की जिम्मेदारी का हिस्सा है।

प्रदीप मिश्रा
निष्पक्ष, निर्भीक और सच्ची खबर, हर खबर पर तिरछी नजर और जनहित के प्रति समर्पित पत्रकारिता के साथ देश में तेजी से बढ़ता विश्वसनीय वेब पोर्टल अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़।
अपने क्षेत्र के छोटे-बड़े समाचार, घटना, दुर्घटना, भ्रष्टाचार एवं अपनी संस्था के विज्ञापन प्रसारण हेतु संपर्क करें: 7647981711, 9303948009

Whatsapp बटन दबा कर इस न्यूज को शेयर जरूर करें 

Advertising Space


स्वतंत्र और सच्ची पत्रकारिता के लिए ज़रूरी है कि वो कॉरपोरेट और राजनैतिक नियंत्रण से मुक्त हो। ऐसा तभी संभव है जब जनता आगे आए और सहयोग करे.

Donate Now