रेत पर रेड… मगर असली चेहरे अब भी पर्दे में?
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रायगढ़, छत्तीसगढ़
By ACGN – 7647981711, 9303948009
संवाददाता :- अनीता गर्ग,
बरभौना में कार्रवाई के बाद उठे कई सवाल, ग्रामीण बोले—कानून का डंडा सबके लिए बराबर कब होगा?
रायगढ़ ACGN :- रायगढ़ जिले के खरसिया तहसील के ग्राम बरभौना स्थित कुरकुट नदी में अवैध रेत उत्खनन के खिलाफ खनिज विभाग और राजस्व विभाग की संयुक्त कार्रवाई के बाद अब कार्रवाई से ज्यादा उसकी निष्पक्षता चर्चा का विषय बन गई है। मौके से कई ट्रैक्टर जब्त किए गए, लेकिन ग्रामीणों का दावा है कि उत्खनन में लगी बड़ी मशीनों और भारी वाहनों पर तत्काल वैसी कार्रवाई नहीं हुई जैसी छोटे वाहनों पर दिखाई दी। इसके बाद पूरे क्षेत्र में एक ही सवाल गूंज रहा है, क्या कानून की नजर केवल छोटे लोगों तक ही सीमित है, या फिर बड़े चेहरों तक भी पहुंचेगी?
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार कार्रवाई के दौरान लगभग 10 ट्रैक्टर, एक ट्रैक्टर लोडर, रेत से भरा हाइवा तथा उत्खनन में प्रयुक्त जेसीबी मशीन मौके पर मौजूद थी। कार्रवाई के बाद गांव की चौपालों से लेकर बाजार तक चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है। लोगों का कहना है कि यदि नदी से बड़े पैमाने पर अवैध उत्खनन हो रहा था, तो यह किसी एक दिन की घटना नहीं हो सकती। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि इतने लंबे समय तक जिम्मेदार विभागों की निगाह आखिर कहां थी?
खनिज विभाग पर उठ रहे हैं गंभीर सवाल

खनिज विभाग का दायित्व केवल छापेमारी करना नहीं, बल्कि अवैध उत्खनन को रोकना भी है। यदि किसी नदी से लगातार रेत का दोहन होता रहा तो नियमित निरीक्षण, निगरानी और रोकथाम की व्यवस्था कितनी प्रभावी रही? यदि विभाग को जानकारी नहीं थी तो यह व्यवस्था की कमजोरी है, और यदि जानकारी थी तो समय पर कठोर कार्रवाई क्यों नहीं हुई? जनता अब यह जानना चाहती है कि क्या जांच केवल जब्त ट्रैक्टरों तक सीमित रहेगी या उस पूरे नेटवर्क तक पहुंचेगी, जिसके कारण नदियों का अस्तित्व लगातार संकट में पड़ता जा रहा है।
क्या कार्रवाई का तराजू बराबर है?

ग्रामीणों के बीच सबसे अधिक चर्चा इसी बात की है कि कार्रवाई के दौरान अक्सर वे लोग सबसे पहले कानून के शिकंजे में आते हैं, जिन्होंने बैंक से कर्ज लेकर या किस्तों पर ट्रैक्टर खरीदकर अपने परिवार की रोजी-रोटी का साधन बनाया है। वहीं लोगों का आरोप है कि जिनके पास बड़े संसाधन, भारी मशीनें और संगठित नेटवर्क होने की चर्चा होती है, वे कई बार कार्रवाई के केंद्र में दिखाई नहीं देते। यदि यह धारणा सही नहीं है, तो प्रशासन को पारदर्शी कार्रवाई के माध्यम से इसे स्पष्ट करना चाहिए।

बरभौना अकेला नहीं, पूरा प्रदेश पूछ रहा है सवाल
बरभौना की यह कहानी कोई अपवाद नहीं मानी जा रही। छत्तीसगढ़ के अनेक जिलों से समय-समय पर अवैध रेत उत्खनन, भारी मशीनों के उपयोग और कार्रवाई में कथित असमानता की शिकायतें सामने आती रही हैं। करोड़ों रुपये की प्राकृतिक संपदा नदियों से बाहर निकलती रहती है, सैकड़ों वाहन सड़कों पर दौड़ते हैं, लेकिन बड़ी कार्रवाई अक्सर तब दिखाई देती है जब मामला सार्वजनिक चर्चा का विषय बन जाता है। इससे लोगों के मन में यह सवाल गहराता जा रहा है कि क्या अवैध कारोबार का नेटवर्क व्यवस्था से ज्यादा मजबूत हो चुका है, या फिर कार्रवाई की गति अभी भी पर्याप्त नहीं है?
नदी का दर्द कौन सुनेगा?
रेत केवल एक खनिज नहीं, बल्कि नदियों के अस्तित्व का आधार है। अनियंत्रित उत्खनन से नदी का प्राकृतिक प्रवाह प्रभावित होता है, भू-जल स्तर गिरता है, खेती पर असर पड़ता है और पर्यावरण को दीर्घकालीन नुकसान पहुंचता है। विशेषज्ञ भी लगातार चेतावनी देते रहे हैं कि यदि अवैध उत्खनन पर प्रभावी नियंत्रण नहीं हुआ तो आने वाले वर्षों में इसके गंभीर परिणाम सामने आ सकते हैं।
पत्रकारों पर भी उठ चुके हैं हाथ
अवैध उत्खनन और खनिज तस्करी जैसे मामलों को उजागर करने वाले पत्रकारों पर प्रदेश के विभिन्न राज्यों में समय-समय पर हमले, धमकियां और उत्पीड़न की घटनाएं सामने आती रही हैं। ऐसे मामलों ने यह चिंता भी बढ़ाई है कि जनहित से जुड़े मुद्दों को उजागर करने वालों की सुरक्षा भी सुनिश्चित होनी चाहिए। लोकतंत्र में सवाल पूछना अपराध नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करने का माध्यम है।
आखिर किसका मिल रहा संरक्षण?
बरभौना की कार्रवाई के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि यदि अवैध रेत उत्खनन लंबे समय से चल रहा था, तो आखिर इसे संरक्षण किसका मिल रहा था? यह सवाल केवल ग्रामीण ही नहीं, बल्कि आम नागरिक भी पूछ रहे हैं। नदी में बड़ी मशीनें उतरना, भारी वाहनों का लगातार आना-जाना और बड़े पैमाने पर रेत का परिवहन ऐसी गतिविधियां हैं जिन्हें लंबे समय तक छिपाना आसान नहीं होता। ऐसे में लोगों की अपेक्षा है कि जांच केवल मजदूरों या छोटे वाहन चालकों तक सीमित न रहकर पूरे तंत्र की निष्पक्ष पड़ताल करे। यदि किसी भी स्तर पर नियमों की अनदेखी, मिलीभगत या लापरवाही हुई है, तो उसकी भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और दोषियों के विरुद्ध कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए।
जनता अब केवल यह नहीं जानना चाहती कि कितने ट्रैक्टर जब्त हुए। जनता यह भी जानना चाहती है कि आखिर नदी का सीना चीरने का साहस किन ताकतों के भरोसे मिलता है? यदि संरक्षण किसी का नहीं था, तो इतना बड़ा अवैध कारोबार कैसे चलता रहा? और यदि कहीं कोई चूक या मिलीभगत हुई है, तो उसकी जवाबदेही कौन तय करेगा? यही वे सवाल हैं जिनका जवाब प्रशासन, खनिज विभाग और संबंधित एजेंसियों को पारदर्शी जांच के माध्यम से देना होगा।
रेत नदी से कम, व्यवस्था की दरारों से ज्यादा बहती दिखाई दे रही है। बुलडोजर जब चलता है तो तस्वीरें बनती हैं, लेकिन जनता अब तस्वीर नहीं, पूरा सच देखना चाहती है। छोटे ट्रैक्टर पकड़ लेने से यदि अवैध कारोबार खत्म हो जाता, तो शायद नदियां आज भी मुस्कुरा रही होतीं। असली परीक्षा तब होगी, जब कानून छोटे पहियों से आगे बढ़कर उन बड़े पहियों तक भी पहुंचेगा, जिनकी चर्चा वर्षों से गांव की चौपालों में होती रही है।
(क्रमशः…)
अगली कड़ी में: दस्तावेजों, स्थानीय दावों और संबंधित पक्षों के जवाब के आधार पर अवैध रेत कारोबार की पूरी पड़ताल—कौन हैं इसके पीछे, कैसे चलता है नेटवर्क और किसकी क्या जिम्मेदारी है?
प्रदीप मिश्रा
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