स्वास्थ्य का सच : आयुर्वेद, होम्योपैथी और एलोपैथी — आखिर आदमी बीमार क्यों पड़ता है? (भाग–3) मीठी गोली का भरोसा या चिकित्सा का विकल्प?
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संपादकीय
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आलेख : प्रदीप मिश्रा
स्वास्थ्य का सच :आयुर्वेद, होम्योपैथी और एलोपैथी,आखिर आदमी बीमार क्यों पड़ता है? (भाग–3)
‘कलम की धार’ अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ का साप्ताहिक विशेष स्तंभ है, जो प्रत्येक रविवार प्रकाशित होता है। इसका उद्देश्य जनहित, जनजागरूकता और समाज से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों की तथ्यपरक, निष्पक्ष एवं विश्लेषणात्मक प्रस्तुति करना है।
इस स्तंभ में समय-समय पर राजनीतिक, सामाजिक, स्वास्थ्य, शिक्षा, पर्यावरण, संस्कृति, पर्व-त्योहार और समसामयिक विषयों पर आलोचनात्मक एवं विश्लेषणात्मक विशेष लेख प्रकाशित किए जाते हैं, ताकि पाठकों तक सच्चाई और संतुलित दृष्टिकोण पहुंच सके।
आज का विषय – मीठी गोली का भरोसा या विज्ञान की बहस? होम्योपैथी के 200 वर्षों का सफर और स्वास्थ्य का सच
कम खर्च, व्यक्ति-केंद्रित उपचार और करोड़ों लोगों का विश्वास, लेकिन क्या होम्योपैथी हर बीमारी का समाधान है? आइए जानते हैं तथ्य, इतिहास और वर्तमान की पूरी कहानी।
आज जब चिकित्सा के अनेक विकल्प हमारे सामने मौजूद हैं, तब आम व्यक्ति के मन में सबसे बड़ा प्रश्न यही उठता है कि आखिर कौन-सी चिकित्सा पद्धति उसके लिए सबसे बेहतर है। कोई आयुर्वेद पर भरोसा करता है, कोई एलोपैथी पर और लाखों लोग होम्योपैथी को भी अपनी पहली पसंद मानते हैं। छोटी-सी मीठी गोली, कम मात्रा में दवा और रोगी की पूरी जीवनशैली को समझकर उपचार करने का दावा इन्हीं विशेषताओं ने होम्योपैथी को दुनिया की सबसे चर्चित वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों में शामिल कर दिया है।
लगभग दो सौ वर्ष पहले जब चिकित्सा विज्ञान आज जितना विकसित नहीं था, तब कई उपचार कठोर, कष्टदायक और जोखिम भरे हुआ करते थे। ऐसे समय में जर्मनी के चिकित्सक डॉ. सैमुअल हैनिमैन ने चिकित्सा का एक नया दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। अठारहवीं शताब्दी के अंत में उन्होंने जिस पद्धति की शुरुआत की, वही आगे चलकर होम्योपैथी के नाम से प्रसिद्ध हुई। आज भारत सहित अनेक देशों में करोड़ों लोग इस पद्धति का उपयोग करते हैं।
होम्योपैथी की मूल सोच क्या है?
होम्योपैथी का प्रमुख सिद्धांत है “समरूपता द्वारा उपचार” (Like Cures Like)। इसका अर्थ यह है कि जिस पदार्थ से किसी स्वस्थ व्यक्ति में कुछ लक्षण उत्पन्न हो सकते हैं, उसी पदार्थ की अत्यंत सूक्ष्म मात्रा का उपयोग कुछ परिस्थितियों में उन जैसे लक्षणों वाले रोगी के उपचार के लिए किया जाता है।
इस चिकित्सा पद्धति की सबसे बड़ी विशेषता यह मानी जाती है कि यहां केवल बीमारी का नाम देखकर दवा नहीं दी जाती। चिकित्सक रोगी की पूरी प्रकृति को समझने का प्रयास करता है। उसकी मानसिक स्थिति, स्वभाव, खान-पान, नींद, पसंद-नापसंद, मौसम के प्रति प्रतिक्रिया तथा अन्य लक्षणों का भी अध्ययन किया जाता है। यही कारण है कि एक ही बीमारी से पीड़ित दो व्यक्तियों को अलग-अलग दवाएं दी जा सकती हैं।
क्या होम्योपैथी केवल जड़ी-बूटियों पर आधारित है?
यह धारणा काफी प्रचलित है, लेकिन पूरी तरह सही नहीं है। होम्योपैथिक दवाएं केवल जड़ी-बूटियों से तैयार नहीं होतीं। इनमें पौधों, खनिजों तथा कुछ अन्य प्राकृतिक स्रोतों से प्राप्त पदार्थों का भी उपयोग किया जाता है। इन पदार्थों को विशेष वैज्ञानिक प्रक्रिया के माध्यम से अत्यंत सूक्ष्म मात्रा में तैयार किया जाता है। यही कारण है कि इनकी गोलियां आकार में छोटी होती हैं और दवा की मात्रा भी बहुत कम होती है।
भारत में होम्योपैथी इतनी लोकप्रिय क्यों है?
भारत में होम्योपैथी को व्यापक स्वीकार्यता मिली है। ग्रामीण क्षेत्रों से लेकर महानगरों तक लाखों लोग इस पद्धति से उपचार कराते हैं। अपेक्षाकृत कम खर्च, रोगी-केंद्रित दृष्टिकोण और लंबे समय से चली आ रही सामाजिक स्वीकार्यता इसके प्रमुख कारण माने जाते हैं।
एलर्जी, त्वचा संबंधी समस्याएं, बार-बार होने वाला सर्दी-जुकाम, माइग्रेन तथा कुछ अन्य दीर्घकालिक स्वास्थ्य समस्याओं में अनेक लोग होम्योपैथिक उपचार का सहारा लेते हैं। हालांकि किसी भी गंभीर बीमारी में स्वयं उपचार शुरू करने के बजाय योग्य एवं पंजीकृत चिकित्सक की सलाह लेना आवश्यक है।
क्या होम्योपैथी हमेशा धीरे-धीरे असर करती है?
अक्सर यह कहा जाता है कि होम्योपैथी का असर बहुत धीमा होता है। लेकिन यह हर स्थिति में सही नहीं माना जा सकता। कुछ रोगियों के अनुभव में लंबे समय से चली आ रही समस्याओं में सुधार धीरे-धीरे दिखाई देता है, जबकि कुछ अन्य स्थितियों में लोग अपेक्षाकृत जल्दी लाभ मिलने की भी बात करते हैं। उपचार का परिणाम रोग, रोगी की स्थिति और चिकित्सकीय मूल्यांकन पर निर्भर करता है।
इसलिए यह कहना कि होम्योपैथी हमेशा धीमी या हमेशा तेज़ असर करती है, दोनों ही बातें सामान्यीकृत निष्कर्ष होंगी।
क्या हर बीमारी का इलाज होम्योपैथी से संभव है?
इस प्रश्न का उत्तर संतुलित दृष्टिकोण से समझना आवश्यक है। यह कहना उचित नहीं होगा कि होम्योपैथी हर बीमारी का निश्चित इलाज कर सकती है।
गंभीर संक्रमण, हृदयाघात, मस्तिष्काघात (ब्रेन स्ट्रोक), सड़क दुर्घटनाएं, अधिक रक्तस्राव, गंभीर जलन, जटिल शल्यक्रिया तथा अन्य आपातकालीन स्थितियों में आधुनिक चिकित्सा की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण और जीवनरक्षक होती है।
वहीं दूसरी ओर, कुछ दीर्घकालिक स्वास्थ्य समस्याओं में अनेक लोग होम्योपैथी का उपयोग करते हैं। इसकी प्रभावशीलता को लेकर वैज्ञानिक समुदाय में अलग-अलग मत मौजूद हैं। इसलिए किसी भी गंभीर बीमारी में उपचार का निर्णय केवल विज्ञापनों या सुनी-सुनाई बातों के आधार पर नहीं, बल्कि योग्य चिकित्सक की सलाह और उपलब्ध वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर करना चाहिए।
क्या रोग से अधिक महत्वपूर्ण रोगी होता है?
होम्योपैथी की सबसे चर्चित विशेषताओं में से एक यह है कि इसमें केवल रोग का नहीं, बल्कि रोगी का भी अध्ययन किया जाता है। माना जाता है कि दो व्यक्तियों की मानसिक स्थिति, जीवनशैली, स्वभाव और शारीरिक प्रतिक्रियाएं अलग हो सकती हैं। इसलिए उपचार भी अलग हो सकता है। इसी कारण अनेक लोग होम्योपैथी को व्यक्ति-केंद्रित चिकित्सा पद्धति मानते हैं।
कम खर्च, लेकिन धैर्य भी आवश्यक
आज चिकित्सा का खर्च लगातार बढ़ रहा है। ऐसे समय में कम लागत वाले उपचार विकल्पों की चर्चा स्वाभाविक है। होम्योपैथी के समर्थकों का मानना है कि यह अपेक्षाकृत कम खर्च में उपचार उपलब्ध कराती है। हालांकि किसी भी चिकित्सा पद्धति का चुनाव केवल खर्च को देखकर नहीं किया जाना चाहिए। रोग की गंभीरता, वैज्ञानिक प्रमाण, चिकित्सकीय आवश्यकता और विशेषज्ञ की सलाह सबसे महत्वपूर्ण आधार होने चाहिए।
क्या मन का इलाज भी जरूरी है?
होम्योपैथी मानसिक और भावनात्मक स्थिति को भी महत्व देती है। यदि कोई व्यक्ति लगातार तनाव, भय, चिंता या अवसाद जैसी परिस्थितियों में रहता है, तो उसका प्रभाव उसके शारीरिक स्वास्थ्य पर भी पड़ सकता है। आधुनिक चिकित्सा और मनोविज्ञान भी मानसिक तथा शारीरिक स्वास्थ्य के गहरे संबंध को स्वीकार करते हैं।
इसलिए स्वस्थ जीवन केवल दवाओं से नहीं बनता। संतुलित भोजन, नियमित व्यायाम, पर्याप्त नींद, तनाव नियंत्रण और सकारात्मक जीवनशैली भी अच्छे स्वास्थ्य की मजबूत नींव हैं।
भारत में होम्योपैथी की वर्तमान स्थिति
भारत उन देशों में शामिल है जहां होम्योपैथी का व्यापक उपयोग किया जाता है। देश में इसके लिए शिक्षण संस्थान, पंजीकृत चिकित्सक तथा सरकारी स्तर पर भी व्यवस्थाएं उपलब्ध हैं। इससे स्पष्ट होता है कि भारत में इसे एक मान्यता प्राप्त चिकित्सा पद्धति के रूप में स्थान प्राप्त है। हालांकि किसी भी उपचार के लिए प्रशिक्षित और पंजीकृत चिकित्सक से ही सलाह लेना सुरक्षित माना जाता है।
स्वास्थ्य की दुनिया में कोई भी चिकित्सा पद्धति केवल विश्वास या केवल बहस से नहीं चलती। सबसे महत्वपूर्ण है रोगी का हित। होम्योपैथी ने दो सौ वर्षों में करोड़ों लोगों का विश्वास अर्जित किया है, वहीं आधुनिक चिकित्सा ने आपातकालीन परिस्थितियों में अनगिनत जीवन बचाए हैं। आयुर्वेद ने जीवनशैली और संतुलन का संदेश दिया है।
सच्चाई यह है कि बीमारी किसी एक कारण से नहीं आती और न ही हर व्यक्ति का उपचार एक जैसा हो सकता है। इसलिए समझदारी इसी में है कि समय पर योग्य चिकित्सक से परामर्श लिया जाए, प्रमाण-आधारित उपचार अपनाया जाए और अपनी जीवनशैली को स्वस्थ बनाया जाए। आखिरकार सबसे बड़ी दवा केवल गोली नहीं, बल्कि सही समय पर लिया गया सही निर्णय है।
“कलम की धार” का उद्देश्य किसी चिकित्सा पद्धति को श्रेष्ठ या कमतर सिद्ध करना नहीं, बल्कि पाठकों तक तथ्यपरक, संतुलित और जनहितकारी जानकारी पहुंचाना है। जागरूक नागरिक ही स्वस्थ समाज की नींव होते हैं और सही जानकारी ही स्वस्थ जीवन की पहली सीढ़ी है।
क्रमशः… भाग–4 में पढ़िए
“एलोपैथी : आधुनिक चिकित्सा की क्रांति, जीवन बचाने वाली तकनीक, ऑपरेशन और आईसीयू की दुनिया, कोरोना महामारी से मिले सबक, बढ़ता इलाज का खर्च, निजी अस्पतालों की चुनौतियां, सरकारी अस्पतालों की वास्तविकता और आम आदमी की आर्थिक जंग।”
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