हाथियों से जंग नहीं, समझदारी से संग! कोरबा बना देश का नया ‘एलिफेंट मैनेजमेंट मॉडल’
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कोरबा, छत्तीसगढ़
By ACGN | 7647981711, 9303948009
तकनीक, जनभागीदारी और संवेदनशील प्रशासन के दम पर मानव-हाथी संघर्ष में आई उल्लेखनीय कमी, देश के लिए बना अनुकरणीय मॉडल
कोरबा, 30 जुलाई 2026। कभी मानव-हाथी संघर्ष की घटनाओं के कारण चर्चा में रहने वाला कोरबा जिला अब इस चुनौती से निपटने के अपने अभिनव मॉडल के कारण पूरे देश में नई पहचान बना रहा है। आधुनिक तकनीक, वैज्ञानिक योजना, जनसहभागिता और संवेदनशील प्रशासन के समन्वित प्रयासों से कोरबा ने ऐसा मॉडल विकसित किया है, जो वन्यजीव संरक्षण और जनसुरक्षा के बीच संतुलन स्थापित करने की दिशा में मिसाल बनता जा रहा है।

कलेक्टर श्री कुणाल दुदावत के मार्गदर्शन तथा कटघोरा वनमंडल के डीएफओ श्री कुमार निशांत के नेतृत्व में जिला प्रशासन और वन विभाग ने मानव-हाथी द्वंद को कम करने के लिए कई प्रभावी पहलें की हैं। इन प्रयासों का उद्देश्य केवल हाथियों को जंगलों में सुरक्षित रखना नहीं, बल्कि ग्रामीणों की जान-माल की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी है।

कोरबा जिले का लेमरू हाथी रिजर्व लगभग 1 लाख 99 हजार 548 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला हुआ है। इसमें कटघोरा, कोरबा, धरमजयगढ़ और सरगुजा वनमंडल के 11 वन परिक्षेत्र शामिल हैं। यहां हाथियों के प्राकृतिक आवास और पारंपरिक विचरण मार्गों का वैज्ञानिक अध्ययन कर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), जीआईएस आधारित मैपिंग और डिजिटल मॉनिटरिंग के माध्यम से लगातार निगरानी की जा रही है।

कोरबा मॉडल की सबसे बड़ी ताकत तकनीक आधारित निगरानी है। 24×7 हाथी नियंत्रण केंद्र, गजसंकेत मोबाइल ऐप, थर्मल ड्रोन, सीसीटीवी निगरानी, टोल-फ्री हेल्पलाइन और प्रशिक्षित हाथी मित्र दल लगातार हाथियों की गतिविधियों पर नजर रखते हैं। हाथियों की वास्तविक समय की जानकारी प्रभावित गांवों तक तुरंत पहुंचाई जाती है, जिससे ग्रामीण समय रहते सुरक्षित स्थानों पर पहुंच सकें।
इन प्रयासों के सकारात्मक परिणाम भी सामने आए हैं। सितंबर 2023 से जून 2026 के बीच गजसंकेत ऐप पर 1,097 हाथी मूवमेंट दर्ज किए गए, जबकि 2 लाख 68 हजार 782 से अधिक रियल टाइम अलर्ट ग्रामीणों तक भेजे गए। इससे संभावित दुर्घटनाओं को रोकने में उल्लेखनीय सफलता मिली है।

मानव-हाथी संघर्ष के आंकड़े भी सुधार की कहानी बयां कर रहे हैं। वर्ष 2020-21 में जहां 9 लोगों की जान गई थी, वहीं 2025-26 में यह संख्या घटकर केवल 3 रह गई। इसी तरह वर्ष 2024-25 और 2025-26 में मानव घायल होने का एक भी मामला दर्ज नहीं हुआ।

संपत्ति और फसल नुकसान में भी उल्लेखनीय कमी आई है। वर्ष 2020-21 में 513 मकानों को नुकसान पहुंचा था, जबकि 2025-26 में यह संख्या घटकर केवल 33 रह गई। यह समय पर सूचना, बेहतर निगरानी और प्रभावी प्रबंधन का परिणाम माना जा रहा है।

वन विभाग केवल सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रभावित ग्रामीणों की आजीविका मजबूत करने पर भी काम कर रहा है। किसान वृक्ष मित्र योजना, लाख उत्पादन, दोना-पत्तल निर्माण, महुआ एवं कोदो प्रसंस्करण, अगरबत्ती निर्माण, सिलाई कार्य और इको-टूरिज्म जैसी गतिविधियों के माध्यम से ग्रामीणों को आय के नए अवसर उपलब्ध कराए जा रहे हैं।

प्रभावित परिवारों को शीघ्र राहत देने के लिए ऑनलाइन मुआवजा प्रबंधन प्रणाली भी विकसित की जा रही है। इसके माध्यम से जनहानि, पशुहानि, फसल एवं संपत्ति नुकसान के मामलों का ऑनलाइन पंजीयन, डिजिटल सत्यापन, ट्रैकिंग और समयबद्ध भुगतान संभव होगा। इससे मुआवजा प्रक्रिया पहले की तुलना में अधिक पारदर्शी और तेज होगी।

कोरबा का यह मॉडल यह साबित करता है कि यदि प्रशासनिक इच्छाशक्ति, आधुनिक तकनीक और जनसहभागिता एक साथ काम करें, तो मानव-वन्यजीव संघर्ष जैसी जटिल चुनौती का भी प्रभावी समाधान संभव है। यही कारण है कि आज कोरबा का मानव-हाथी प्रबंधन मॉडल देश के अन्य हाथी प्रभावित क्षेत्रों के लिए भी प्रेरणा बनकर उभर रहा है।
प्रदीप मिश्रा
संपादक – अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़
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