नमस्कार 🙏 हमारे न्यूज पोर्टल - मे आपका स्वागत हैं ,यहाँ आपको हमेशा ताजा खबरों से रूबरू कराया जाएगा , खबर ओर विज्ञापन के लिए संपर्क करे +91 7647981711 ,हमारे यूट्यूब चैनल को सबस्क्राइब करें, साथ मे हमारे फेसबुक को लाइक जरूर करें , गुरु पूर्णिमा विशेष -मानव जीवन की प्रथम गुरु – माँ,जिसने जन्म दिया, बोलना सिखाया, चलना सिखाया और जीवन जीना सिखाया – Anjor Chhattisgarh News

Anjor Chhattisgarh News

सच की तह तक

गुरु पूर्णिमा विशेष -मानव जीवन की प्रथम गुरु – माँ,जिसने जन्म दिया, बोलना सिखाया, चलना सिखाया और जीवन जीना सिखाया

😊 कृपया इस न्यूज को शेयर करें😊

संपादकीय

✍️ प्रदीप मिश्रा

जब भी गुरु पूर्णिमा का पावन पर्व आता है, हम अपने गुरुओं, संतों और शिक्षकों को श्रद्धापूर्वक नमन करते हैं। महर्षि वेदव्यास, ऋषि-मुनियों और महान संतों का स्मरण करते हैं, लेकिन इस पावन अवसर पर एक गुरु ऐसी भी हैं, जिनका ऋण कोई मनुष्य जीवनभर नहीं चुका सकता। वह हैं – माँ
मनुष्य के जीवन की पहली गुरु माँ होती है। संसार में आने से पहले नौ महीने तक वह अपने गर्भ में हमें पालती है। हमारे जन्म से पहले ही वह हमारे सुख-दुःख को अपने भीतर महसूस करती है। अपने आराम, अपनी इच्छाओं और अपने सुखों का त्याग कर वह एक नए जीवन को जन्म देती है। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में माँ को केवल जन्मदात्री नहीं, बल्कि प्रथम गुरु का स्थान दिया गया है।
जब एक शिशु इस संसार में आता है, तब उसे न बोलना आता है, न चलना, न पहचानना और न ही जीवन का कोई ज्ञान होता है। उस समय कोई विद्यालय, कोई पुस्तक और कोई शिक्षक उसके साथ नहीं होता। सबसे पहले माँ ही उसे अपनी गोद में लेकर जीवन का पहला पाठ पढ़ाती है।
बच्चा सबसे पहले जिस शब्द का उच्चारण करता है, वह होता है “माँ।” यह केवल एक शब्द नहीं, बल्कि प्रेम, सुरक्षा, त्याग और विश्वास का सबसे बड़ा प्रतीक है। बच्चे की पहली मुस्कान माँ के लिए होती है, पहला स्पर्श माँ का होता है और पहला संस्कार भी माँ से ही मिलता है।
माँ ही बच्चे को बोलना सिखाती है, चलना सिखाती है, अच्छे और बुरे का अंतर समझाती है। वह उसे दूसरों का सम्मान करना, सच बोलना, भोजन का आदर करना, बड़ों के चरण स्पर्श करना, करुणा, सेवा और मानवता का पाठ पढ़ाती है। यही संस्कार आगे चलकर उसके व्यक्तित्व की पहचान बनते हैं।
भारतीय संस्कृति में कहा गया है “जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।” अर्थात माता और मातृभूमि स्वर्ग से भी श्रेष्ठ हैं। यह कोई साधारण कथन नहीं, बल्कि भारतीय जीवन-दर्शन का आधार है।
आज का समय तेज़ी से बदल रहा है। आधुनिकता और तकनीक ने जीवन को सरल बनाया है, लेकिन इसके साथ परिवारों में संवाद कम होता जा रहा है। बच्चे मोबाइल और इंटरनेट के अधिक निकट हैं, जबकि माता-पिता से बातचीत कम होती जा रही है। बुजुर्ग माता-पिता अनेक घरों में अकेलेपन का जीवन जीने को विवश हैं। यह स्थिति केवल एक परिवार की नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए चिंता का विषय है।
गुरु पूर्णिमा हमें केवल संतों और गुरुओं को प्रणाम करना ही नहीं सिखाती, बल्कि यह भी याद दिलाती है कि जिस माँ ने हमें जीवन दिया, जिसने अपने हाथों से भोजन खिलाया, जिसने हमारी रातों की नींद त्यागकर हमें सुलाया, जिसने हमारे आँसू देखकर स्वयं रोई और हमारी मुस्कान देखकर मुस्कुराई, उस माँ का सम्मान सबसे पहले होना चाहिए।
यदि कोई व्यक्ति मंदिर में जाकर भगवान की पूजा करे, गुरु के चरणों में फूल चढ़ाए, लेकिन घर लौटकर अपनी माँ की उपेक्षा करे या अपने पिता का अपमान करे, तो उसकी पूजा अधूरी है। भारतीय संस्कृति स्पष्ट कहती है “मातृ देवो भव, पितृ देवो भव, आचार्य देवो भव।” अर्थात पहले माता का सम्मान, फिर पिता का सम्मान और उसके बाद आचार्य का सम्मान। यही हमारी संस्कृति का क्रम है।
पिता भी जीवन के महान गुरु हैं। वे अपने परिश्रम, संघर्ष, अनुशासन और त्याग से परिवार का भविष्य बनाते हैं। स्वयं कठिनाइयाँ सहकर भी बच्चों को शिक्षा, सुरक्षा और सम्मानजनक जीवन देने का प्रयास करते हैं। इसलिए माता और पिता दोनों ही जीवन के प्रथम गुरु हैं।
गुरु पूर्णिमा का वास्तविक संदेश यही है कि हम अपने जीवन में उन सभी गुरुओं का सम्मान करें, जिन्होंने हमें कुछ न कुछ सिखाया है। विद्यालय के शिक्षक, समाज के मार्गदर्शक, आध्यात्मिक गुरु और हमारे माता-पिता सभी हमारे जीवन को दिशा देने वाले दीपक हैं।
महर्षि वेदव्यास ने ज्ञान की परंपरा को अमर बनाया। पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य ने जीवन निर्माण और युग निर्माण का संदेश दिया। भगवती देवी शर्मा ने परिवार, संस्कार और मातृशक्ति के महत्व को समाज के सामने रखा। स्वामी अड़गड़ानंद ने आत्मचिंतन, सत्य और साधना के माध्यम से जीवन को श्रेष्ठ बनाने की प्रेरणा दी। इन सभी महापुरुषों और संतों की शिक्षाओं का सार भी यही है कि चरित्र, सेवा, विनम्रता और संस्कार ही मनुष्य की सबसे बड़ी संपत्ति हैं।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने बच्चों को केवल अच्छी शिक्षा ही नहीं, बल्कि अच्छे संस्कार भी दें। उन्हें यह सिखाएँ कि सफलता का पहला कदम अपने माता-पिता का सम्मान करना है। जिस घर में माँ की मुस्कान सुरक्षित रहती है, पिता का सम्मान होता है और गुरु का आदर किया जाता है, उस घर में सुख, शांति और समृद्धि स्वयं निवास करती है।
आइए, इस गुरु पूर्णिमा पर हम सब एक संकल्प लें,
हम अपनी माँ को केवल एक दिन नहीं, जीवनभर सम्मान देंगे।
अपने पिता के संघर्ष को समझेंगे।
अपने गुरुजनों का आदर करेंगे।
भारतीय संस्कृति और संस्कारों को आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाने का प्रयास करेंगे।
यही गुरु पूर्णिमा का सच्चा संदेश है। यही हमारे गुरुओं के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है। और यही वह मार्ग है, जिस पर चलकर भारत अपनी महान गुरु-शिष्य परंपरा, पारिवारिक संस्कृति और नैतिक मूल्यों को आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुँचा सकता है।
माँ केवल जन्म नहीं देती, वह जीवन देती है।
पिता केवल पालन नहीं करते, वे भविष्य बनाते हैं।
और गुरु केवल शिक्षा नहीं देते, वे मनुष्य का चरित्र गढ़ते हैं।
इन्हीं तीनों के चरणों में भारत की संस्कृति, संस्कार और सभ्यता सुरक्षित है।

Whatsapp बटन दबा कर इस न्यूज को शेयर जरूर करें 

Advertising Space


स्वतंत्र और सच्ची पत्रकारिता के लिए ज़रूरी है कि वो कॉरपोरेट और राजनैतिक नियंत्रण से मुक्त हो। ऐसा तभी संभव है जब जनता आगे आए और सहयोग करे.

Donate Now