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गुरु पूर्णिमा : भारतीय संस्कृति, संस्कार और ज्ञान परंपरा का अमर पर्व

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संपादकीय

गुरु पूर्णिमा पर विशेष लेख

✍️ प्रदीप मिश्रा

भारत को विश्व की सबसे प्राचीन और समृद्ध सभ्यताओं में इसलिए नहीं गिना जाता कि यहाँ केवल महान मंदिर, प्राचीन ग्रंथ या विशाल साम्राज्य रहे हैं, बल्कि इसलिए कि इस भूमि ने संसार को गुरु-शिष्य परंपरा जैसी अद्भुत संस्कृति दी। यही वह परंपरा है जिसने मनुष्य को केवल शिक्षा नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला, चरित्र, अनुशासन, सेवा, करुणा और आत्मज्ञान का मार्ग दिखाया।
इसी महान परंपरा के सम्मान में प्रतिवर्ष आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा का पर्व मनाया जाता है। यह केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति का ऐसा पर्व है जो हमें अपने गुरु, माता-पिता, शिक्षकों, संतों और जीवन में सही दिशा देने वाले प्रत्येक व्यक्ति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने की प्रेरणा देता है।
गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है। मान्यता है कि इसी दिन महर्षि वेदव्यास का जन्म हुआ था। वेदव्यास ने चारों वेदों का संकलन किया, महाभारत की रचना की तथा अठारह पुराणों सहित अनेक ग्रंथों के माध्यम से भारतीय ज्ञान परंपरा को व्यवस्थित रूप दिया। इसलिए उन्हें आदिगुरु के रूप में सम्मान दिया जाता है।
भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान अत्यंत ऊँचा माना गया है। प्रसिद्ध श्लोक – “गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
                    गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥”
केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि यह बताता है कि गुरु सृजन, पालन और परिवर्तन की प्रेरणा का स्रोत है। गुरु वह है जो अज्ञान के अंधकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश फैलाता है। संस्कृत में ‘गु’ का अर्थ अंधकार और ‘रु’ का अर्थ उसे दूर करने वाला बताया गया है। यही कारण है कि गुरु को जीवन का प्रकाश कहा गया है।

गुरु और शिक्षक में अंतर

आज के समय में गुरु और शिक्षक शब्दों का प्रयोग अक्सर एक समान कर दिया जाता है, जबकि भारतीय दर्शन में दोनों की भूमिका अलग-अलग मानी गई है। शिक्षक ज्ञान देता है, विषय समझाता है और जीवनयापन के लिए आवश्यक शिक्षा प्रदान करता है। गुरु केवल ज्ञान नहीं देता, बल्कि विवेक जगाता है। गुरु मनुष्य को स्वयं से परिचित कराता है, उसके भीतर छिपे अहंकार, भय और भ्रम को दूर कर उसे सत्य, सेवा और सदाचार के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।
यही कारण है कि भारतीय इतिहास में भगवान श्रीराम को महर्षि वशिष्ठ और विश्वामित्र का मार्गदर्शन मिला, भगवान श्रीकृष्ण ने सांदीपनि ऋषि से शिक्षा प्राप्त की, चंद्रगुप्त मौर्य को आचार्य चाणक्य ने तैयार किया और स्वामी विवेकानंद के व्यक्तित्व को रामकृष्ण परमहंस ने दिशा दी। इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब भी योग्य गुरु और समर्पित शिष्य का मिलन हुआ, तब समाज और राष्ट्र को नई दिशा मिली।

आधुनिक युग में गुरु की आवश्यकता

आज का युग विज्ञान, तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता का युग है। मोबाइल फोन और इंटरनेट ने जानकारी प्राप्त करना अत्यंत सरल बना दिया है। कुछ ही क्षणों में दुनिया की किसी भी विषय की जानकारी उपलब्ध हो जाती है। लेकिन क्या जानकारी ही ज्ञान है?उत्तर स्पष्ट है नहीं। जानकारी बुद्धि को बढ़ा सकती है, लेकिन सही और गलत का निर्णय करने की क्षमता विवेक से आती है। विवेक संस्कारों से आता है और संस्कार गुरु, माता-पिता तथा परिवार से प्राप्त होते हैं।
आज समाज में भौतिक सुविधाएँ बढ़ी हैं, लेकिन मानसिक शांति कम हुई है। परिवार साथ रहते हुए भी संवाद कम हो गया है। बच्चे माता-पिता से अधिक समय मोबाइल के साथ बिताते हैं। सोशल मीडिया ने संपर्क बढ़ाया है, लेकिन संबंधों की गहराई कम कर दी है। प्रतियोगिता ने सफलता की दौड़ तो तेज कर दी, परंतु धैर्य, संतोष और संवेदनशीलता जैसी मानवीय विशेषताओं को कमजोर भी किया है।
ऐसे समय में गुरु पूर्णिमा केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि समाज को यह याद दिलाने का अवसर है कि जीवन में तकनीक आवश्यक है, लेकिन उससे भी अधिक आवश्यक है संस्कार, नैतिकता और मानवीय मूल्य।

भारतीय संस्कृति और गुरु परंपरा

भारतीय संस्कृति का मूल आधार परिवार, संस्कार और गुरु रहे हैं। पहले गुरुकुलों में शिक्षा केवल पढ़ने-लिखने तक सीमित नहीं होती थी। वहाँ विद्यार्थियों को अनुशासन, आत्मसंयम, श्रम, प्रकृति प्रेम, सेवा, राष्ट्रभक्ति और समाज के प्रति उत्तरदायित्व भी सिखाया जाता था।
आज शिक्षा का स्वरूप बदल गया है, लेकिन गुरु का महत्व समाप्त नहीं हुआ। आज भी विद्यालय का शिक्षक, विश्वविद्यालय का प्राध्यापक, आध्यात्मिक मार्गदर्शक, माता-पिता और जीवन में सही दिशा देने वाला प्रत्येक व्यक्ति गुरु के समान सम्मान का अधिकारी है।
गुरु पूर्णिमा हमें यह भी सिखाती है कि केवल अपने आध्यात्मिक गुरु ही नहीं, बल्कि उन सभी व्यक्तियों का सम्मान करना चाहिए जिनसे हमें जीवन में कुछ सीखने का अवसर मिला है।

गायत्री परिवार का संदेश

परमपूज्य गुरुदेव स्व.पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य ने गुरु को व्यक्ति-पूजा का माध्यम नहीं, बल्कि विचार-क्रांति का आधार माना। उन्होंने स्पष्ट कहा कि गुरु की सच्ची पूजा उनके आदर्शों को जीवन में उतारने से होती है। युग निर्माण आंदोलन के माध्यम से उन्होंने नैतिक जागरण, नारी सम्मान, शिक्षा, व्यसनमुक्ति, पर्यावरण संरक्षण और समाज निर्माण का व्यापक अभियान चलाया।  पूजनीय पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य ने अपने जीवन से यह संदेश दिया कि गुरु का सम्मान तभी पूर्ण होता है जब शिष्य अपने विचार, व्यवहार और चरित्र को श्रेष्ठ बनाए। उन्होंने युग निर्माण आंदोलन के माध्यम से समाज में नैतिकता, शिक्षा, नारी सम्मान, व्यसनमुक्ति और राष्ट्र निर्माण की अलख जगाई।

परमपूजनीय गुरुमाता भगवती देवी शर्मा ने मातृशक्ति, परिवार निर्माण और संस्कारों की स्थापना को अपने जीवन का उद्देश्य बनाया। आज भी देश और विदेश के हजारों गायत्री शक्तिपीठों में गुरु पूर्णिमा के अवसर पर यज्ञ, सामूहिक साधना, दीपयज्ञ, वृक्षारोपण, रक्तदान, स्वच्छता अभियान और समाज सेवा के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। भगवती देवी शर्मा ने परिवार, संस्कार और मातृशक्ति को समाज की सबसे बड़ी शक्ति माना। उनके विचारों से प्रेरित होकर आज भी हजारों परिवार अपने बच्चों को भारतीय संस्कृति और नैतिक मूल्यों से जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं।
गायत्री परिवार में गुरु पूर्णिमा के अवसर पर यज्ञ, मंत्रजप, सामूहिक साधना और सेवा कार्यों के साथ यह संकल्प दोहराया जाता है कि समाज को बेहतर बनाने का कार्य स्वयं से शुरू होगा।
इन आयोजनों का उद्देश्य केवल धार्मिक अनुष्ठान करना नहीं, बल्कि समाज में जागरूकता, सद्भाव और सेवा की भावना को मजबूत करना है।

स्वामी अड़गड़ानंद जी की प्रेरणा

स्वामी अड़गड़ानंद की शिक्षाओं का मूल भाव आत्मचिंतन, संयम और सत्य के मार्ग पर चलना है। उनके अनुयायी गुरु पूर्णिमा के दिन सत्संग, साधना और सेवा के माध्यम से अपने जीवन को अनुशासित बनाने का संकल्प लेते हैं। उनकी वाणी का सार यही है कि धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं, बल्कि भीतर का परिवर्तन है। जब मनुष्य स्वयं बदलता है, तभी परिवार, समाज और राष्ट्र में सकारात्मक परिवर्तन आता है।

भारत की आध्यात्मिक परंपरा का मूल संदेश हमेशा यही रहा है कि गुरु का सम्मान केवल शब्दों से नहीं, बल्कि जीवन के आचरण से होना चाहिए। गुरु पूर्णिमा का पर्व हमें यह स्मरण कराता है कि यदि हम अपने गुरु के बताए मार्ग पर नहीं चलते, तो केवल पूजा-अर्चना, माल्यार्पण और औपचारिक सम्मान का कोई वास्तविक अर्थ नहीं रह जाता।

गुरु पूर्णिमा कैसे मनाई जाती है?

आषाढ़ पूर्णिमा के दिन देशभर के मंदिरों, आश्रमों, गुरुकुलों, विद्यालयों और आध्यात्मिक संस्थाओं में विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। श्रद्धालु प्रातः स्नान कर अपने गुरु, माता-पिता और शिक्षकों का सम्मान करते हैं। यज्ञ, हवन, भजन, सत्संग, प्रवचन, ध्यान, योग, भंडारे और सेवा कार्य आयोजित किए जाते हैं। अनेक स्थानों पर रक्तदान शिविर, वृक्षारोपण, स्वच्छता अभियान तथा गरीब और जरूरतमंद लोगों की सहायता जैसे कार्यक्रम भी किए जाते हैं।
यह पर्व हमें सिखाता है कि पूजा तभी सार्थक है जब उसके साथ सेवा, सदाचार और समाज के प्रति उत्तरदायित्व भी जुड़ा हो।

देशभर में उमड़ती है श्रद्धा

गुरु पूर्णिमा के अवसर पर उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक देश के प्रमुख आश्रमों और आध्यात्मिक केंद्रों में लाखों श्रद्धालु पहुँचते हैं। हरिद्वार, ऋषिकेश, वाराणसी, प्रयागराज, उज्जैन, नासिक, चित्रकूट, बोधगया सहित अनेक धार्मिक स्थलों पर विशेष आयोजन होते हैं। गायत्री शक्तिपीठों, गुरुकुलों और विभिन्न संत परंपराओं के आश्रमों में दिनभर आध्यात्मिक कार्यक्रम चलते हैं।
श्रद्धालु अपने गुरु का आशीर्वाद प्राप्त करने के साथ-साथ आत्मचिंतन भी करते हैं। अनेक लोग इस दिन नशामुक्ति, पर्यावरण संरक्षण, शिक्षा प्रसार और समाज सेवा का संकल्प लेते हैं। यही इस पर्व की सबसे बड़ी विशेषता है कि यह केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना का भी पर्व है।
संस्कृति और संस्कार क्यों बचाना आवश्यक है?
आज का समय अभूतपूर्व परिवर्तन का समय है। तकनीक ने जीवन को सरल बनाया है, लेकिन अनेक चुनौतियाँ भी सामने रखी हैं। मोबाइल और इंटरनेट उपयोगी साधन हैं, परंतु उनका अति प्रयोग बच्चों और युवाओं को परिवार, पुस्तकों, प्रकृति और सामाजिक जीवन से दूर कर सकता है। ऐसे में भारतीय संस्कृति के मूल मूल्य,सत्य, सेवा, संयम, करुणा, परिवार का सम्मान और बड़ों के प्रति आदर पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
गुरु पूर्णिमा हमें यही याद दिलाती है कि आधुनिकता को अपनाना गलत नहीं है, लेकिन अपनी जड़ों से कट जाना समाज के लिए हानिकारक हो सकता है। यदि आने वाली पीढ़ियों को केवल तकनीक मिले और संस्कार न मिलें, तो प्रगति अधूरी रह जाएगी।

युवाओं के लिए संदेश

आज के युवाओं के सामने अवसर भी हैं और चुनौतियाँ भी। प्रतिस्पर्धा, करियर और आधुनिक जीवन की दौड़ में उन्हें ऐसे मार्गदर्शन की आवश्यकता है जो केवल सफलता नहीं, बल्कि संतुलित जीवन जीना भी सिखाए।
युवाओं को चाहिए कि वे अपने माता-पिता, शिक्षकों और गुरुजनों का सम्मान करें, नियमित अध्ययन करें, समाज सेवा में भाग लें, नशे और हिंसा से दूर रहें तथा अपने समय का सदुपयोग करें। यही गुरु पूर्णिमा का वास्तविक संदेश है।
हमें क्या संकल्प लेना चाहिए?
इस पावन पर्व पर प्रत्येक व्यक्ति कुछ सरल लेकिन महत्वपूर्ण संकल्प ले सकता है, माता-पिता और गुरुजनों का सम्मान करूँगा।
सत्य, ईमानदारी और अनुशासन का पालन करूँगा।
समाज में सद्भाव और सेवा की भावना बढ़ाने का प्रयास करूँगा।
पर्यावरण संरक्षण और स्वच्छता में अपना योगदान दूँगा।
बच्चों को भारतीय संस्कृति, भाषा और संस्कारों से जोड़ने का प्रयास करूँगा।
किसी भी प्रकार के नशे, हिंसा और सामाजिक बुराइयों से दूर रहूँगा।
यदि हर व्यक्ति ऐसे संकल्पों का पालन करे, तो गुरु पूर्णिमा केवल एक पर्व नहीं रहेगी, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का आधार बन जाएगी।

गुरु पूर्णिमा भारतीय संस्कृति की उस अमूल्य धरोहर का उत्सव है जिसने सदियों से इस राष्ट्र को ज्ञान, संस्कार और आध्यात्मिक चेतना प्रदान की है। यह पर्व हमें बताता है कि गुरु का सम्मान केवल परंपरा नहीं, बल्कि जीवन को सही दिशा देने वाली संस्कृति है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने बच्चों को केवल आधुनिक शिक्षा ही नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, नैतिक मूल्यों और गुरु-शिष्य परंपरा का महत्व भी समझाएँ। क्योंकि जिस समाज में गुरु का सम्मान, माता-पिता का आदर और संस्कारों का पालन होता है, वही समाज दीर्घकाल तक समृद्ध, शांतिपूर्ण और सशक्त बना रहता है।
आइए, इस गुरु पूर्णिमा पर हम सब मिलकर यह संकल्प लें कि ज्ञान के साथ चरित्र, प्रगति के साथ संस्कार और आधुनिकता के साथ भारतीय संस्कृति को भी समान महत्व देंगे। यही हमारे गुरुओं के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी और यही आने वाली पीढ़ियों के लिए हमारी सबसे बड़ी विरासत होगी।

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