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लोकजतन सम्मान से सम्मानित हुए वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र शर्मा, बोले , मीडिया के लिए सबसे संकटमय और चुनौतीपूर्ण दौर

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भोपाल, मध्य प्रदेश

By ACGN 7647981711, 9303948009


लोकजतन सम्मान समारोह के साथ शैली स्मृति व्याख्यानमाला का हुआ शुभारंभ, पत्रकारिता, मीडिया और फिल्मों की बदलती भूमिका पर हुई गंभीर चर्चा


भोपाल ACGN:- राजधानी भोपाल स्थित दुष्यंत कुमार स्मारक पांडुलिपि संग्रहालय में 24 जुलाई की शाम आयोजित गरिमामय समारोह में देश के वरिष्ठ पत्रकार, लेखक और विचारक राजेंद्र शर्मा को वर्ष 2026 का ‘लोकजतन सम्मान’ प्रदान किया गया। यह सम्मान उन्हें परिवर्तनकामी, जनपक्षधर और प्रतिबद्ध पत्रकारिता में चार दशक से अधिक समय से दिए जा रहे उल्लेखनीय योगदान के लिए दिया गया। कार्यक्रम में साहित्य, पत्रकारिता, संस्कृति और सामाजिक आंदोलनों से जुड़े अनेक वरिष्ठ व्यक्तित्वों की उपस्थिति रही, जिससे पूरा आयोजन विचार-विमर्श और संवाद का महत्वपूर्ण मंच बन गया।


समारोह की अध्यक्षता वरिष्ठ व्यंग्यकार एवं कवि वीरेन्द्र जैन ने की, जबकि प्रदेश के वरिष्ठतम संपादकों में शामिल डॉ. राम विद्रोही ने राजेंद्र शर्मा को सम्मान-पत्र भेंट कर सम्मानित किया। राजेंद्र शर्मा वर्ष 1979 में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से शिक्षा पूरी करने के बाद से लगातार वैचारिक और जनपक्षधर पत्रकारिता से जुड़े रहे हैं। वे अनेक पुस्तकों के लेखक, राष्ट्रीय समाचार पत्रों के स्तंभकार, कई प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं के संपादक तथा वर्तमान में ‘लोकलहर’ के संपादक हैं। उन्होंने अपने पत्रकारिता जीवन की शुरुआत भी इसी वैचारिक धारा से जुड़े समाचार पत्र से की थी।


सम्मान ग्रहण करने के बाद अपने विस्तृत संबोधन में राजेंद्र शर्मा ने वर्तमान समय में मीडिया की स्थिति पर गंभीर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि यह भारतीय मीडिया के इतिहास का सबसे कठिन और चुनौतीपूर्ण समय है। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भारतीय पत्रकारिता केवल समाचार देने का माध्यम नहीं थी, बल्कि वह राष्ट्रीय चेतना और जनआंदोलन की सबसे बड़ी ताकत थी। उस समय देश के लगभग सभी बड़े नेता स्वयं समाचार पत्र निकालते थे, संपादक की भूमिका निभाते थे और पत्रकारिता को जनसेवा का माध्यम मानते थे।
उन्होंने कहा कि आज स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। जिस मीडिया ने आजादी की लड़ाई में जनता की आवाज़ बुलंद की थी, वही मीडिया आज जनता के अविश्वास और विरोध का सामना कर रहा है। उन्होंने कहा कि राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर जैसे स्थानों पर मीडिया के खिलाफ जनता का रोष खुलकर दिखाई देता है। विशेष रूप से देश का युवा वर्ग मुख्यधारा के मीडिया का बहिष्कार करते हुए उसे अपनी अभिव्यक्ति के योग्य नहीं मान रहा है। उन्होंने कहा कि यह स्थिति अचानक नहीं बनी, बल्कि पिछले कई वर्षों से लगातार विकसित हुई है और किसान आंदोलन जैसे बड़े जनआंदोलनों के दौरान मीडिया की भूमिका को लेकर जनता में गहरी नाराजगी देखने को मिली।
राजेंद्र शर्मा ने कहा कि मीडिया के इस संकट के पीछे सबसे बड़ा कारण बड़े कॉरपोरेट घरानों का बढ़ता प्रभाव है। उन्होंने कहा कि जब से मीडिया पर बड़ी पूंजी का व्यापक नियंत्रण स्थापित हुआ और उसका सत्ता तथा सांप्रदायिक शक्तियों के साथ गठजोड़ मजबूत हुआ, तब से पत्रकारिता के मूल उद्देश्य प्रभावित हुए हैं। उन्होंने कहा कि विगत एक दशक से परिस्थितियां और तेजी से बदलीं तथा मीडिया का एक बड़ा हिस्सा सत्ता के प्रचार का माध्यम बनता चला गया। इसका परिणाम यह हुआ कि आम लोग धीरे-धीरे मुख्यधारा के मीडिया से दूरी बनाने लगे।
हालांकि उन्होंने इस चुनौतीपूर्ण दौर में उम्मीद की किरण भी दिखाई। उन्होंने कहा कि अनेक स्वतंत्र समाचार माध्यम, यूट्यूब चैनल, डिजिटल प्लेटफॉर्म और युवा पत्रकार आज भी निष्पक्ष और जनहित की पत्रकारिता कर रहे हैं। कई पत्रकार सच सामने लाने के कारण शासन और पुलिस की कार्रवाई का सामना कर रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद वे लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए संघर्षरत हैं।


समारोह में कोरोना लॉकडाउन के दौरान वर्ष 2020 के लोकजतन सम्मान से सम्मानित छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ जनपक्षधर पत्रकार कमल शुक्ला को भी सम्मान-पत्र प्रदान किया गया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि पत्रकारिता केवल समाचार लिखने या प्रकाशित करने का कार्य नहीं है। पत्रकार का सबसे बड़ा दायित्व जनता के बीच रहना, उनकी समस्याओं को समझना और उनकी आवाज़ को समाज तथा शासन तक पहुंचाना है। उन्होंने कहा कि सच्ची पत्रकारिता हमेशा जनपक्षधर, निष्पक्ष और प्रतिबद्ध होती है।
लोकजतन के संपादक बादल सरोज ने सम्मान की परंपरा की जानकारी देते हुए बताया कि यह सम्मान हर वर्ष लोकजतन के संस्थापक-संपादक शैलेन्द्र शैली की स्मृति में उनके जन्मदिवस 24 जुलाई को प्रदान किया जाता है। इसका उद्देश्य उन पत्रकारों का सम्मान करना है, जो कठिन परिस्थितियों में भी सच लिखने और निर्भीक पत्रकारिता करने का साहस रखते हैं। उन्होंने बताया कि अब तक इस सम्मान से डॉ. राम विद्रोही, कमल शुक्ला, लज्जा शंकर हरदेनिया, अनुराग द्वारी, राकेश अचल, पलाश सुरजन तथा शहीद पत्रकार मुकेश चंद्राकर सहित अनेक प्रतिष्ठित पत्रकार सम्मानित हो चुके हैं।


इसी अवसर पर शैलेन्द्र शैली स्मृति व्याख्यानमाला का भी औपचारिक शुभारंभ हुआ। वर्ष 2026 की इस व्याख्यान श्रृंखला का पहला व्याख्यान प्रख्यात फिल्म समीक्षक, साहित्यकार एवं कला-संस्कृति के अध्येता जवरीमल्ल पारख ने दिया। उन्होंने अपने व्याख्यान में कहा कि फिल्मों में समाज की सोच को प्रभावित करने की अद्भुत क्षमता होती है, लेकिन वर्तमान समय में इस शक्ति का बड़े पैमाने पर दुरुपयोग किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि कई फिल्मों के माध्यम से इतिहास की मनचाही व्याख्या प्रस्तुत की जा रही है और झूठ को सच तथा अयथार्थ को यथार्थ के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि कुछ फिल्मों में मध्यकालीन इतिहास को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत करते हुए समाज के एक बड़े वर्ग को विदेशी शत्रु के रूप में चित्रित किया जा रहा है, जिससे सामाजिक सद्भाव और भाईचारे को नुकसान पहुंच रहा है। उन्होंने कहा कि आजादी के आंदोलन के वास्तविक नायकों को पीछे धकेलकर इतिहास की नई व्याख्याएं गढ़ी जा रही हैं तथा योजनाबद्ध तरीके से प्रचार आधारित फिल्मों का निर्माण किया जा रहा है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि अनेक फिल्मकार आज भी अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए ऐसी फिल्में बना रहे हैं जो समाज में संवाद, संवेदनशीलता और लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करती हैं।
व्याख्यान की शुरुआत भोपाल के वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता एवं सीटू के प्रदेश अध्यक्ष पूषण भट्टाचार्य के परिचयात्मक वक्तव्य से हुई। कार्यक्रम में सुश्री वंदना शर्मा भी मंचासीन रहीं। समारोह का संचालन वरिष्ठ कहानीकार एवं संस्कृतिकर्मी मनोज कुलकर्णी ने किया, जबकि संध्या शैली ने आभार व्यक्त किया।
इस अवसर पर प्रदेश के विभिन्न जिलों से आए पत्रकारों, साहित्यकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों, सांस्कृतिक कर्मियों तथा विभिन्न जनआंदोलनों से जुड़े बड़ी संख्या में नागरिकों ने सहभागिता की। आयोजन के दौरान पत्रकारिता, लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संस्कृति से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण विषयों पर गंभीर चर्चा हुई।
आयोजकों ने बताया कि शैली स्मृति व्याख्यानमाला की यह श्रृंखला 24 जुलाई से प्रारंभ होकर 7 अगस्त तक चलेगी। इस दौरान मध्यप्रदेश के तीन दर्जन से अधिक शहरों और कस्बों में सेमिनार, संवाद और व्याख्यान आयोजित किए जाएंगे, जिनमें पत्रकारिता, लोकतंत्र, संस्कृति और समाज से जुड़े समकालीन विषयों पर विशेषज्ञ अपने विचार साझा करेंगे।

प्रदीप मिश्रा
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