नियुक्तियों में देरी से बढ़ रहा असंतोष! क्या पंचायत चुनाव से पहले भाजपा के लिए बज रही है खतरे की घंटी?
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ओड़िशा, भुवनेश्वर
By ACGN 7647981711, 9303948009
ओड़िशा में निगमों और बोर्डों के अध्यक्ष पद अब तक खाली, राजनीतिक गलियारों में तेज हुई चर्चाएं और अटकलें।
संवाददाता :- स्वामी बिजयानंद जी महाराज (ओड़िशा ब्यूरो)
भुवनेश्वर ACGN:- ओड़िशा में भाजपा सरकार बनने के करीब ढाई वर्ष बाद भी राज्य के विभिन्न निगमों, बोर्डों और विकास परिषदों में अध्यक्षों की नियुक्ति नहीं होने से राजनीतिक हलकों में चर्चाओं का दौर तेज हो गया है। लंबे समय से इन पदों पर नियुक्ति का इंतजार कर रहे पार्टी के कई दावेदारों और कार्यकर्ताओं के बीच असंतोष की चर्चाएं सामने आ रही हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि नियुक्तियों में और अधिक विलंब हुआ तो इसका असर आगामी पंचायत एवं नगर निकाय चुनावों की तैयारियों पर पड़ सकता है।
राजनीतिक जानकारों के अनुसार राज्य में लगभग 82 निगमों, कई बोर्डों तथा विभिन्न विकास परिषदों के अध्यक्ष पद लंबे समय से रिक्त हैं। इन संस्थाओं के माध्यम से शासन की अनेक योजनाओं के क्रियान्वयन, जनसंपर्क और संगठनात्मक समन्वय को गति मिलती है। ऐसे में इन पदों पर नियुक्ति नहीं होने से प्रशासनिक एवं संगठनात्मक गतिविधियों पर भी प्रभाव पड़ने की बात कही जा रही है।

हाल ही में केन्दुझर जिला योजना बोर्ड के चुनाव परिणामों ने भी राजनीतिक चर्चा को और तेज कर दिया है। चुनाव में बीजू जनता दल ने सभी 14 सीटों पर जीत दर्ज की, जबकि भाजपा एक भी सीट हासिल नहीं कर सकी। कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह परिणाम संगठनात्मक तैयारियों और स्थानीय स्तर पर नेतृत्व के समन्वय से भी जुड़ा हो सकता है। हालांकि इस संबंध में भाजपा की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
सूत्रों के अनुसार कई भाजपा नेता चुनाव के बाद निगमों और बोर्डों में जिम्मेदारी मिलने की उम्मीद लगाए हुए थे। लेकिन अब तक किसी प्रकार की आधिकारिक घोषणा नहीं होने से दावेदारों के बीच प्रतीक्षा और असमंजस की स्थिति बनी हुई है। हालांकि प्रदेश भाजपा अध्यक्ष मनमोहन सामल सहित पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने समय-समय पर नियुक्तियां जल्द होने की बात कही है, लेकिन अभी तक अंतिम निर्णय सामने नहीं आया है।
राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि नियुक्तियों को लेकर विभिन्न स्तरों पर विचार-विमर्श जारी है। हालांकि मुख्यमंत्री, संगठन अथवा अन्य नेताओं के बीच मतभेद जैसी चर्चाओं की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए इन्हें केवल राजनीतिक चर्चाओं के रूप में ही देखा जा रहा है।

विश्लेषकों का कहना है कि निगमों और बोर्डों में नियुक्तियां केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं होतीं, बल्कि संगठन को सक्रिय रखने और कार्यकर्ताओं के मनोबल को मजबूत करने का भी महत्वपूर्ण माध्यम होती हैं। यदि समय रहते इन पदों पर नियुक्तियां हो जाती हैं तो आगामी पंचायत और नगर निकाय चुनावों की तैयारियों को नई गति मिल सकती है।
अब राजनीतिक हलकों की निगाहें राज्य सरकार और भाजपा संगठन पर टिकी हैं कि निगमों, बोर्डों और परिषदों के अध्यक्ष पदों पर नियुक्तियों की घोषणा कब तक होती है। आने वाले दिनों में लिया जाने वाला निर्णय संगठनात्मक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
प्रदीप मिश्रा
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