क्या यह बदलाव की आहट है? या सत्ता के लिए नई चुनौती?
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विशेष आलेख
By ACGN 7647981711, 9303948009
आलेख : राजेंद्र शर्मा
नई दिल्ली ACGN :- देश की राजनीति में कुछ घटनाएं केवल विरोध-प्रदर्शन बनकर नहीं रह जातीं, बल्कि वे आने वाले समय के राजनीतिक और सामाजिक बदलाव की दिशा भी तय करती हैं। संसद के मानसून सत्र के पहले दिन आयोजित 20 जुलाई के “संसद मार्च” को लेखक राजेंद्र शर्मा इसी दृष्टि से देखते हैं। उनके अनुसार यह प्रदर्शन केवल छात्रों का आंदोलन नहीं था, बल्कि शिक्षा, रोजगार और युवाओं के भविष्य को लेकर बढ़ती राष्ट्रीय चिंता का प्रतीक बनकर सामने आया।
लेख के अनुसार जंतर-मंतर पर पिछले एक महीने से चल रहे धरने, शिक्षाविद सोनम वांगचुक के समर्थन और विभिन्न छात्र संगठनों की सक्रिय भागीदारी ने इस आंदोलन को व्यापक स्वरूप दिया। संसद मार्च के दौरान बड़ी संख्या में छात्र-युवा दिल्ली की सड़कों पर पहुंचे। लेखक का दावा है कि प्रदर्शनकारियों की संख्या अपेक्षा से कहीं अधिक थी, जिसके कारण कई स्थानों पर भारी भीड़ देखी गई।
लेख में कहा गया है कि प्रदर्शन के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव हुआ। लेखक के अनुसार पुलिस ने प्रदर्शन को रोकने के लिए बल प्रयोग किया, जबकि प्रदर्शनकारी इसे शांतिपूर्ण आंदोलन बता रहे थे। इस कार्रवाई के बाद कई लोगों के घायल होने की खबरें सामने आईं और यह घटना राष्ट्रीय राजनीति का प्रमुख विषय बन गई।
लेखक का मानना है कि इस आंदोलन की जड़ केवल एक परीक्षा या एक पेपर लीक तक सीमित नहीं है। उनका कहना है कि नीट परीक्षा विवाद, परीक्षा प्रणाली में कथित अनियमितताएं, भर्ती प्रक्रियाओं में देरी और बढ़ती बेरोजगारी ने युवाओं के भीतर गहरा असंतोष पैदा किया है। शिक्षा और रोजगार आज देश के करोड़ों युवाओं के लिए सबसे बड़ा मुद्दा बन चुके हैं और यही कारण है कि यह आंदोलन तेजी से राष्ट्रीय स्वरूप ग्रहण करता दिखाई दिया।
आलेख में संसद के मानसून सत्र का भी उल्लेख किया गया है। लेखक के अनुसार विपक्षी दलों ने छात्रों की मांगों और पुलिस कार्रवाई का मुद्दा संसद में उठाने का प्रयास किया, जबकि सरकार की ओर से तत्काल चर्चा नहीं कराए जाने पर सदन में हंगामा भी हुआ। लेखक इसे लोकतांत्रिक विमर्श का महत्वपूर्ण विषय मानते हैं।
राजेंद्र शर्मा का यह भी मत है कि डिजिटल माध्यमों और सोशल मीडिया ने इस आंदोलन को देशभर में पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभाई। उनके अनुसार इंटरनेट और सोशल मीडिया के जरिए युवाओं ने अपनी बात व्यापक स्तर पर रखी, जिससे यह आंदोलन राष्ट्रीय बहस का केंद्र बन गया। लेखक का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय मीडिया और कुछ मानवाधिकार संगठनों ने भी इस घटनाक्रम पर ध्यान दिया।
लेख में आगे कहा गया है कि शिक्षा और रोजगार के साथ-साथ किसानों, मजदूरों और अन्य वर्गों की समस्याएं भी लगातार सामने आ रही हैं। लेखक का मानना है कि यदि इन मुद्दों का समय रहते प्रभावी समाधान नहीं निकाला गया तो आने वाले समय में इसका असर देश की राजनीति पर भी दिखाई दे सकता है।
आलेख के अंत में लेखक एक महत्वपूर्ण राजनीतिक प्रश्न उठाते हैं। उनके अनुसार जब युवा, किसान और श्रमिक जैसे विभिन्न वर्ग अपनी-अपनी समस्याओं को लेकर लगातार आवाज उठा रहे हैं, तब यह स्थिति सत्ता के लिए गंभीर चुनौती बन सकती है। इसी संदर्भ में लेखक प्रश्न करते हैं— “क्या यह मोदी राज के अंत की शुरुआत है?” यह लेखक का व्यक्तिगत राजनीतिक विश्लेषण है, जिसे उन्होंने वर्तमान परिस्थितियों के आधार पर प्रस्तुत किया है।
*(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और साप्ताहिक पत्रिका ‘लोकलहर’ के संपादक हैं।)*
(यह एक विचार/विश्लेषणात्मक आलेख है। इसमें व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ इन विचारों से आवश्यक रूप से सहमत हो, यह आवश्यक नहीं है।)
प्रदीप मिश्रा
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