खोता बचपन, भटकता युवा और गिरती शिक्षा… आखिर जिम्मेदार कौन?
|
😊 कृपया इस न्यूज को शेयर करें😊
|
संपादकीय
By ACGN 7647981711, 9303948009
अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ का साप्ताहिक विशेषांक
✍️”कलम की धार”✍️
अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ का साप्ताहिक विशेषांक “कलम की धार” में हर सप्ताह रविवार को समाज, शिक्षा, युवा, प्रशासन, राजनीति और जनसरोकार से जुड़े ज्वलंत विषयों पर तथ्यों, तर्कों और जनहित के दृष्टिकोण से किया गया निष्पक्ष, विश्लेषणात्मक और जागरूकता आधारित विशेष लेख प्रसारित किया जाता है हमारा उद्देश्य केवल समाचार देना नहीं, बल्कि समाज को सोचने, समझने और सकारात्मक बदलाव की दिशा में प्रेरित करना है।
इस सप्ताह “कलम की धार” में बच्चों और युवाओं में बढ़ती मोबाइल की लत, सोशल मीडिया का बढ़ता प्रभाव, गिरता अनुशासन, बदलती शिक्षा व्यवस्था और युवाओं के सामने खड़ी चुनौतियों पर एक गहन, विश्लेषणात्मक और जन-जागरूकता आधारित विशेष लेख पढ़िए अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ का साप्ताहिक विशेषांक “कलम की धार” में
आज का विषय – बचपन, शिक्षा और युवा – क्या हमारा भविष्य सही दिशा में बढ़ रहा है?
मोबाइल की कैद में बचपन: खोते संस्कार, बिखरता भविष्य
लेखक : प्रदीप मिश्रा
“जब शिक्षा संस्कार छोड़कर केवल अंक देने लगे, जब विद्यालय चरित्र निर्माण की जगह केवल परीक्षा केंद्र बन जाएं और जब मोबाइल बच्चों का शिक्षक बन बैठे, तब समाज का भविष्य खतरे में पड़ जाता है।”
आज देश की सबसे बड़ी चिंता यदि कोई है तो वह केवल बेरोजगारी या महंगाई नहीं, बल्कि शिक्षा, युवा और बचपन का तेजी से बदलता स्वरूप है। विद्यालयों में विद्यार्थियों की संख्या बढ़ रही है, लेकिन ज्ञान, अनुशासन, संस्कार और जिम्मेदारी का स्तर लगातार गिरता दिखाई दे रहा है। “जिस हाथ में कभी किताब, पेंसिल और खेल के खिलौने होते थे, आज उसी हाथ में घंटों मोबाइल फोन है। जिस आंगन में बच्चों की किलकारियां गूंजती थीं, वहां अब मोबाइल स्क्रीन की नीली रोशनी चमकती है।” आज गांव हो या शहर, गरीब हो या अमीर, हर घर में एक नई समस्या तेजी से जन्म ले रही है, मोबाइल की लत, यह केवल एक दृश्य नहीं, बल्कि पूरे समाज की बदलती तस्वीर है। यह बदलाव आधुनिकता का प्रतीक कम और आने वाले संकट का संकेत अधिक दिखाई देने लगा है। सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि इसकी गिरफ्त में सबसे तेजी से हमारे बच्चे और युवा आ रहे हैं। तकनीक ने सुविधाएं तो दी हैं, लेकिन उसी तकनीक ने बच्चों और युवाओं के जीवन में ऐसा बदलाव भी ला दिया है, मोबाइल कभी जानकारी का साधन था, लेकिन अब वह समय, स्वास्थ्य, संस्कार और भविष्य निगलने वाली आदत बनता जा रहा है, जिसने परिवार, समाज और शिक्षा व्यवस्था को कठघरे में खड़ा कर दिया है।
आज आवश्यकता केवल नई शिक्षा नीति बनाने की नहीं, बल्कि नई सोच, नई जिम्मेदारी और नई सामाजिक चेतना विकसित करने की है।
मोबाइल बना गुरु, शिक्षक रह गए दर्शक
कुछ वर्ष पहले तक विद्यालय में शिक्षक ज्ञान का सबसे बड़ा स्रोत होते थे। विद्यार्थी अपने गुरु से सीखते थे, प्रश्न पूछते थे और जीवन के मूल्य समझते थे। आज स्थिति तेजी से बदल चुकी है।
मोबाइल फोन और सोशल मीडिया ने बच्चों के जीवन में इतनी गहरी जगह बना ली है कि पढ़ाई का समय रील, गेम और ऑनलाइन मनोरंजन में बीतने लगा है। पांच मिनट पढ़ाई और पांच घंटे मोबाइल अब सामान्य बात बन गई है। ज्ञान की जगह वायरल वीडियो और प्रेरणा की जगह तथाकथित सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर बच्चों के आदर्श बनते जा रहे हैं।
मोबाइल स्वयं समस्या नहीं है, लेकिन उसका अनियंत्रित उपयोग निश्चित रूप से समस्या बन चुका है। माता-पिता स्वयं बच्चों के हाथ में मोबाइल देकर उन्हें शांत रखने का प्रयास करते हैं और बाद में उसी मोबाइल की लत पर चिंता जताते हैं।
बचपन अब मैदान में नहीं, मोबाइल की स्क्रीन पर
कुछ वर्ष पहले तक शाम होते ही मोहल्लों में क्रिकेट, कबड्डी, खो-खो, गिल्ली-डंडा और फुटबॉल खेलते बच्चे दिखाई देते थे, आज वही सड़कें खाली हैं, बच्चे घरों में हैं, लेकिन परिवार के साथ नहीं… मोबाइल के साथ, दो-दो, तीन-तीन घंटे तक लगातार गेम खेलना, रील देखना, वीडियो स्क्रॉल करना, चैट करना अब सामान्य बात हो गई है।
परिणाम सामने हैं, आंखों की रोशनी कमजोर हो रही है, मोटापा बढ़ रहा है, मानसिक तनाव बढ़ रहा है, एकाग्रता खत्म हो रही है, पढ़ाई में रुचि घट रही है, चिड़चिड़ापन बढ़ रहा है,
सोशल मीडिया का नशा युवाओं को बना रहा दिखावे का कैदी
आज अधिकांश युवा वास्तविक जीवन से अधिक आभासी दुनिया में जी रहे हैं। महंगे कपड़े, स्टंट, बाइक राइड, सेल्फी, रील, फॉलोअर्स और लाइक्स की दौड़ ने मेहनत, अध्ययन और व्यक्तित्व विकास को पीछे छोड़ दिया है, आज कई युवा सफलता को डिग्री या ज्ञान से नहीं, बल्कि सोशल मीडिया पर मिलने वाले व्यूज़ से मापने लगे हैं।
कई बार वायरल होने की चाह में युवा अपनी जान तक जोखिम में डाल देते हैं। रेलवे ट्रैक, ऊंची इमारतें, झरने, पहाड़, तेज रफ्तार बाइक और खतरनाक स्टंट अब मनोरंजन नहीं बल्कि मौत को खुला निमंत्रण बनते जा रहे हैं।
रील का नशा, वास्तविक जीवन से दूरी
आज लाखों युवा सुबह उठते ही भगवान का नहीं बल्कि मोबाइल का दर्शन करते हैं, दिन की शुरुआत नोटिफिकेशन से होती है और रात मोबाइल हाथ में लेकर समाप्त होती है, रील बनाना अब शौक नहीं, जुनून बन चुका है, रेलवे ट्रैक…, हाईवे… पहाड़… झरने…नदी…चलती बाइक…चलती ट्रेन… हर जगह वीडियो बनाने की होड़ लगी है, कुछ सेकंड की लोकप्रियता के लिए कई लोग अपनी जान तक जोखिम में डाल रहे हैं।
बढ़ता बाइक कल्चर: रोमांच या सामाजिक खतरा?
हाल के समय में पर्यटन स्थलों, विशेषकर पहाड़ी क्षेत्रों में बड़ी संख्या में युवा बाइक राइड के नाम पर सड़कों पर स्टंट करते, तेज रफ्तार से वाहन चलाते, तेज आवाज वाले साइलेंसर लगाते और सार्वजनिक स्थानों पर हुड़दंग करते दिखाई देते हैं, सोशल मीडिया पर वायरल होने की होड़ में कई समूह सड़क को प्रदर्शन का मंच बना देते हैं। इससे केवल उनकी जान ही खतरे में नहीं पड़ती बल्कि अन्य पर्यटक, स्थानीय ग्रामीण, महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग भी असुरक्षित महसूस करते हैं।
सड़कें रोमांच दिखाने के लिए नहीं, सुरक्षित आवागमन के लिए बनी हैं। कानून तोड़कर मिलने वाली प्रसिद्धि कभी सम्मान नहीं बन सकती।
सोशल मीडिया की झूठी दुनिया
आज बच्चों और युवाओं के सामने सफलता की नई परिभाषा बना दी गई है, जिसके ज्यादा फॉलोअर्स, ज्यादा लाइक्स, ज्यादा रील वायरल… वही सफल।
लेकिन क्या वास्तव में यही सफलता है? सोशल मीडिया की चमक के पीछे अवसाद, अकेलापन, तनाव और असुरक्षा का अंधेरा भी तेजी से बढ़ रहा है।
शिक्षा केवल ऑनलाइन नहीं हो सकती
कोरोना काल में ऑनलाइन पढ़ाई मजबूरी थी, लेकिन अब मोबाइल पढ़ाई से अधिक मनोरंजन का साधन बन चुका है, ऑनलाइन क्लास के नाम पर बच्चे गेम खेलते हैं, वीडियो देखते हैं, सोशल मीडिया चलाते हैं, माता-पिता समझते हैं कि बच्चा पढ़ रहा है, वास्तविकता बिल्कुल अलग होती है।
मोबाइल से बढ़ते साइबर अपराध
कम उम्र के बच्चे साइबर ठगी के शिकार हो रहे हैं, ऑनलाइन गेम में पैसे गंवा रहे हैं, फर्जी लिंक पर क्लिक कर रहे हैं, अनजान लोगों से दोस्ती कर रहे हैं। ब्लैकमेलिंग… फर्जी आईडी… अश्लील सामग्री… इन सबका सबसे आसान शिकार किशोर बन रहे हैं।
युवा और सड़क हादसे
आज बाइक चलाते समय वीडियो बनाना फैशन बन चुका है, एक हाथ से बाइक दूसरे हाथ में मोबाइल, तेज रफ्तार,स्टंट..लाइव वीडियो…रील…यह केवल नियमों का उल्लंघन नहीं बल्कि मौत को खुला निमंत्रण है, हर साल हजारों सड़क दुर्घटनाओं में मोबाइल का उपयोग भी एक महत्वपूर्ण कारण बन रहा है।
नशे से भी खतरनाक डिजिटल नशा
शराब की लत दिखाई देती है, सिगरेट की लत भी पहचान में आ जाती है, लेकिन मोबाइल का नशा धीरे-धीरे इंसान की सोच बदल देता है, समय का पता नहीं चलता, रिश्ते कमजोर हो जाते हैं, पढ़ाई प्रभावित होती है, काम प्रभावित होता है और व्यक्ति स्वयं को अकेला महसूस करने लगता है।
संस्कारों का सबसे बड़ा संकट
पहले बच्चे दादा-दादी से कहानियां सुनते थे, आज यूट्यूब सुनते हैं, पहले परिवार साथ बैठकर भोजन करता था,आज हर व्यक्ति मोबाइल देखते हुए खाना खाता है,बातचीत कम हो गई है,संवाद समाप्त हो रहा है,यही सबसे बड़ा खतरा है।
क्या केवल सरकार जिम्मेदार है?
नहीं, सरकार नियम बना सकती है, स्कूल जागरूकता फैला सकते हैं, पुलिस कार्रवाई कर सकती है, लेकिन बच्चों का भविष्य सबसे पहले परिवार तय करता है,अगर माता-पिता स्वयं मोबाइल में व्यस्त रहेंगे तो बच्चे भी वही सीखेंगे
परिवार भी है जिम्मेदार
हर गलती केवल बच्चों की नहीं होती, आज माता-पिता स्वयं बच्चों को व्यस्त रखने के लिए मोबाइल थमा देते हैं। बच्चा रोया.मोबाइल दे दो, खाना नहीं खाया, मोबाइल लगा दो, शांत नहीं बैठ रहा, कार्टून चला दो, धीरे-धीरे मोबाइल ही उसका सबसे बड़ा दोस्त बन जाता है, बाद में यही आदत लत बन जाती है।
समस्या बड़ी है लेकिन समाधान भी संभव है,घर में मोबाइल उपयोग का समय तय हो, भोजन के समय मोबाइल पूरी तरह बंद रहे, बच्चों को खेल मैदान से जोड़ा जाए, पुस्तक पढ़ने की आदत विकसित की जाए, स्कूलों में डिजिटल संतुलन पर नियमित कार्यशालाएं हों, साइबर सुरक्षा की शिक्षा दी जाए, माता-पिता स्वयं उदाहरण प्रस्तुत करें।
सप्ताह में एक दिन “मोबाइल मुक्त परिवार दिवस” मनाया जाए।
मोबाइल दुश्मन नहीं है, लेकिन मोबाइल का असीमित उपयोग निश्चित रूप से भविष्य का दुश्मन बन सकता है, तकनीक का उपयोग आवश्यक है, लेकिन तकनीक पर निर्भरता खतरनाक है।
यदि आज हमने अपने बच्चों को मोबाइल की कैद से बाहर निकालकर पुस्तक, खेल, संस्कार और परिवार की ओर नहीं लौटाया, तो आने वाली पीढ़ी डिजिटल रूप से सक्षम जरूर होगी, लेकिन सामाजिक और मानवीय मूल्यों से दूर होती चली जाएगी।
बचपन केवल उम्र का नाम नहीं, बल्कि जीवन की सबसे सुंदर पूंजी है। यदि यह पूंजी स्क्रीन की चमक में खो गई, तो भविष्य का समाज ज्ञान से नहीं, बल्कि अकेलेपन, तनाव और संवेदनहीनता से भरा होगा।
विद्यालयों में क्यों कमजोर पड़ रहा अनुशासन ?
आज शिक्षक केवल पढ़ाने तक सीमित होते जा रहे हैं। अनुशासन लागू करने में अनेक प्रकार की प्रशासनिक और कानूनी जटिलताएं सामने आती हैं। दूसरी ओर अभिभावक भी कई बार अपने बच्चों की गलती स्वीकार करने के बजाय विद्यालय को ही दोषी ठहराने लगते हैं।
फलस्वरूप विद्यार्थी यह समझने लगते हैं कि उनके किसी भी व्यवहार का कोई परिणाम नहीं होगा।
अनुशासन केवल डंडे से नहीं आता। अनुशासन घर, विद्यालय और समाज तीनों की संयुक्त जिम्मेदारी से विकसित होता है।
प्रतिस्पर्धा बढ़ी, मानसिक दबाव भी बढ़ा
आज का विद्यार्थी केवल पढ़ नहीं रहा, बल्कि लगातार प्रतियोगिता में दौड़ रहा है, उच्च अंक लाना, प्रतियोगी परीक्षाएं पास करना, करियर बनाना, परिवार की अपेक्षाएं पूरी करना, इन सबके बीच अनेक बच्चे मानसिक तनाव, अवसाद और आत्मविश्वास की कमी का सामना कर रहे हैं।
मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर चर्चा आज भी बहुत कम होती है। विद्यालयों में नियमित काउंसलिंग, प्रेरक सत्र और भावनात्मक सहयोग की व्यवस्था अभी भी सीमित है।
नशे की गिरफ्त में फंसता युवा वर्ग
शराब, गुटखा, सिगरेट, नशीले पदार्थ और अब ऑनलाइन गेमिंग व डिजिटल लत ये सभी युवाओं को धीरे-धीरे कमजोर बना रहे हैं, नशा केवल स्वास्थ्य नहीं बिगाड़ता, बल्कि परिवार, शिक्षा, रोजगार और सामाजिक जीवन को भी प्रभावित करता है कई अपराधों की शुरुआत नशे से होती है और कई सड़क दुर्घटनाओं का सबसे बड़ा कारण भी यही है।
विद्यालय स्तर से ही नशा विरोधी अभियान को नियमित और प्रभावी बनाया जाना चाहिए।
सरकारी विद्यालयों की चुनौती
सरकार ने भवन बनाए, स्मार्ट क्लास शुरू किए, नि:शुल्क पुस्तकें, गणवेश, मध्यान्ह भोजन और अनेक योजनाएं लागू कीं। यह स्वागतयोग्य है।
लेकिन केवल भवन बनने से शिक्षा अच्छी नहीं होती।
आज भी अनेक विद्यालयों में नियमित शिक्षकों की कमी, प्रयोगशालाओं का अभाव, खेल सुविधाओं की कमी, पुस्तकालयों का सीमित उपयोग और गुणवत्तापूर्ण शिक्षण जैसी समस्याएं मौजूद हैं।
सबसे बड़ी आवश्यकता है कि हर विद्यालय केवल परीक्षा परिणाम नहीं बल्कि चरित्र निर्माण का केंद्र बने।
निजी शिक्षा और बढ़ता आर्थिक बोझ
दूसरी ओर निजी विद्यालयों की बढ़ती फीस मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए गंभीर चुनौती बनती जा रही है।
अच्छी शिक्षा अब कई परिवारों के लिए आर्थिक संघर्ष का विषय बन चुकी है।
शिक्षा सेवा है या व्यवसाय यह प्रश्न समाज के सामने गंभीर रूप से खड़ा है।
अभिभावकों की बदलती भूमिका
आज अधिकांश माता-पिता बच्चों को समय कम और सुविधाएं अधिक दे रहे हैं। महंगे मोबाइल, बाइक और खर्च देने से जिम्मेदारी पूरी नहीं होती।
बच्चों के साथ बैठना, उनकी समस्याएं सुनना, पढ़ाई में रुचि लेना, मित्रों की जानकारी रखना और अच्छे संस्कार देना सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है, बच्चे वही सीखते हैं जो घर में देखते हैं।
शिक्षा केवल नौकरी नहीं, जीवन जीना सिखाए
आज शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं होना चाहिए, विद्यालयों में नैतिक शिक्षा, संविधान की समझ, पर्यावरण संरक्षण, सड़क सुरक्षा, साइबर सुरक्षा, महिला सम्मान, वित्तीय साक्षरता, डिजिटल अनुशासन और सामाजिक उत्तरदायित्व जैसे विषयों पर नियमित व्यवहारिक शिक्षा आवश्यक है, ज्ञान तभी सार्थक है जब वह समाज के लिए उपयोगी बने।
युवा शक्ति ही राष्ट्र शक्ति है
भारत दुनिया का सबसे युवा देश है। यदि यही युवा अनुशासित, शिक्षित, कुशल और जिम्मेदार बनता है तो भारत विश्व का नेतृत्व करेगा।
लेकिन यदि यही युवा मोबाइल, नशा, हिंसा, दिखावा और गैर-जिम्मेदार जीवनशैली में उलझ गया तो यही सबसे बड़ी चुनौती भी बन सकता है।
युवा केवल देश का भविष्य नहीं, वर्तमान की सबसे बड़ी शक्ति हैं।
क्या है समाधान?
समस्या बड़ी है लेकिन समाधान भी संभव है,घर में मोबाइल उपयोग का समय तय हो, भोजन के समय मोबाइल पूरी तरह बंद रहे, बच्चों को खेल मैदान से जोड़ा जाए, पुस्तक पढ़ने की आदत विकसित की जाए, स्कूलों में डिजिटल संतुलन पर नियमित कार्यशालाएं हों, साइबर सुरक्षा की शिक्षा दी जाए, माता-पिता स्वयं उदाहरण प्रस्तुत करें।
सप्ताह में एक दिन “मोबाइल मुक्त परिवार दिवस” मनाया जाए।
मोबाइल दुश्मन नहीं है, लेकिन मोबाइल का असीमित उपयोग निश्चित रूप से भविष्य का दुश्मन बन सकता है, तकनीक का उपयोग आवश्यक है, लेकिन तकनीक पर निर्भरता खतरनाक है, यदि आज हमने अपने बच्चों को मोबाइल की कैद से बाहर निकालकर पुस्तक, खेल, संस्कार और परिवार की ओर नहीं लौटाया, तो आने वाली पीढ़ी डिजिटल रूप से सक्षम जरूर होगी, लेकिन सामाजिक और मानवीय मूल्यों से दूर होती चली जाएगी।
बचपन केवल उम्र का नाम नहीं, बल्कि जीवन की सबसे सुंदर पूंजी है। यदि यह पूंजी स्क्रीन की चमक में खो गई, तो भविष्य का समाज ज्ञान से नहीं, बल्कि अकेलेपन, तनाव और संवेदनहीनता से भरा होगा।
समस्या जितनी बड़ी है, समाधान भी उतने ही स्पष्ट हैं परिवार बच्चों को समय और संस्कार दे,विद्यालय चरित्र निर्माण को प्राथमिकता दें, शिक्षक प्रेरक की भूमिका निभाएं, सरकार शिक्षा की गुणवत्ता पर अधिक निवेश करे, सोशल मीडिया का जिम्मेदारी से उपयोग हो, विद्यालयों में नियमित काउंसलिंग और कैरियर मार्गदर्शन हो, नशा मुक्ति और सड़क सुरक्षा अभियान विद्यालय स्तर से चलें, खेल, पुस्तकालय, विज्ञान, कला और नवाचार को बढ़ावा मिले, अभिभावक और शिक्षक नियमित संवाद बनाए रखें, बच्चों को अंक नहीं, व्यक्तित्व के आधार पर भी प्रोत्साहित किया जाए।
एक राष्ट्र की असली ताकत उसकी सेना, सड़कें या इमारतें नहीं, बल्कि उसके शिक्षित, संस्कारित और जिम्मेदार नागरिक होते हैं। आज यदि हम अपने बच्चों और युवाओं को सही दिशा नहीं देंगे तो आने वाला समय केवल विकास के आंकड़ों से नहीं, बल्कि सामाजिक चुनौतियों से भी पहचाना जाएगा।
आज जरूरत नई पीढ़ी को दोष देने की नहीं, बल्कि उसे सही मार्गदर्शन देने की है। शिक्षा को फिर से जीवन का प्रकाश बनाना होगा, तभी बचपन सुरक्षित होगा, युवा सशक्त होंगे और भारत का भविष्य वास्तव में उज्ज्वल बनेगा।
समय अभी भी हमारे हाथ में है। फैसला हमें करना है, बच्चों को मोबाइल का गुलाम बनाना है या भविष्य का जिम्मेदार नागरिक
“कलम की धार” का उद्देश्य किसी व्यक्ति, संस्था या व्यवस्था की आलोचना करना नहीं, बल्कि समाज की वास्तविक चुनौतियों को सामने लाकर सकारात्मक समाधान की दिशा में जनजागरण करना है। जब समाज जागरूक होगा, तभी शिक्षा सशक्त होगी, युवा सही दिशा पाएंगे और भविष्य सुरक्षित होगा। यही अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ की प्रतिबद्धता है
प्रदीप मिश्रा (प्रधान संपादक)
अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ का साप्ताहिक विशेष स्तंभ
“कलम की धार”
हम लाते हैं निष्पक्ष, निर्भीक और सच्ची खबरें
|
Whatsapp बटन दबा कर इस न्यूज को शेयर जरूर करें |
Advertising Space


