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आवारा कुत्तों के बढ़ते हमलों पर चिंता, हर ब्लॉक में नसबंदी केंद्र खोलने की उठी मांग

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गंजाम, ओडिशा

By ACGN 7647981711, 9303948009
संवाददाता :- अनिल कुमार चौधरी

बच्चों और बुजुर्गों की सुरक्षा के लिए एबीसी कार्यक्रम को ग्रामीण क्षेत्रों तक विस्तार देने की मांग, पशु प्रेमियों ने सरकार से बनाई दीर्घकालिक कार्ययोजना की अपील

गंजाम ACGN:- ओडिशा के विभिन्न शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में आवारा कुत्तों के हमलों की बढ़ती घटनाओं ने आम नागरिकों की चिंता बढ़ा दी है। गंजाम जिले के महानाल गांव में हाल ही में एक छह वर्षीय बच्चे पर आवारा कुत्ते के हमले की घटना ने पूरे क्षेत्र को झकझोर दिया। इससे पहले भी इसी गांव में एक अन्य बच्चे पर इसी तरह का हमला हो चुका है। लगातार सामने आ रही ऐसी घटनाओं ने ग्रामीण क्षेत्रों में आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या और उनके नियंत्रण की आवश्यकता को फिर से प्रमुख मुद्दा बना दिया है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि हर घटना के बाद केवल घायलों का उपचार या आर्थिक सहायता पर्याप्त नहीं है। समस्या के स्थायी समाधान के लिए वैज्ञानिक और व्यवस्थित कार्ययोजना अपनाई जानी चाहिए। विशेषज्ञों के अनुसार एनिमल बर्थ कंट्रोल (एबीसी) कार्यक्रम आवारा कुत्तों की संख्या नियंत्रित करने का सबसे प्रभावी और मानवीय तरीका माना जाता है। बरहामपुर नगर निगम क्षेत्र में इस योजना के सफल संचालन को एक उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है।
हालांकि यह सुविधा अभी मुख्य रूप से शहरी क्षेत्रों तक सीमित है, जबकि ग्रामीण इलाकों में नियमित नसबंदी और रेबीज टीकाकरण कार्यक्रम नहीं होने से आवारा कुत्तों की संख्या लगातार बढ़ रही है। इसका सीधा असर बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों की सुरक्षा पर पड़ रहा है। साथ ही सड़क दुर्घटनाओं और रेबीज संक्रमण का खतरा भी बढ़ता जा रहा है।
पशु प्रेमी ललातेंदू चौधरी ने मांग की है कि बरहामपुर नगर निगम के सफल एबीसी मॉडल को पूरे गंजाम जिले के प्रत्येक विकासखंड में लागू किया जाए। उन्होंने कहा कि प्रत्येक ब्लॉक में नसबंदी एवं रेबीज टीकाकरण केंद्र स्थापित किए जाएं, ताकि आवारा कुत्तों की संख्या नियंत्रित हो सके और आम लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
उन्होंने राज्य सरकार और जिला प्रशासन से आग्रह किया कि इस दिशा में अलग बजट, प्रशिक्षित पशु चिकित्सक, आवश्यक आधारभूत सुविधाएं तथा पर्याप्त मानव संसाधन उपलब्ध कराया जाए। साथ ही पंचायतों, स्वयंसेवी संस्थाओं और स्थानीय नागरिकों की भागीदारी से व्यापक जनजागरूकता अभियान भी चलाया जाए।
स्थानीय नागरिकों का मानना है कि आवारा कुत्तों की समस्या का समाधान केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया से नहीं, बल्कि वैज्ञानिक, मानवीय और दीर्घकालिक नीति के माध्यम से ही संभव है। यदि समय रहते प्रभावी कदम उठाए जाते हैं तो भविष्य में ऐसी घटनाओं पर काफी हद तक नियंत्रण पाया जा सकता है और इंसानों तथा पशुओं के बीच संतुलित सह-अस्तित्व की दिशा में सकारात्मक पहल होगी।

प्रदीप मिश्रा
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