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राख के ढेर पर ऊर्जाधानी की चमक, हजारों टन राख के बीच सांस ले रहे लोग , बिजली उत्पादन की कीमत चुका रहा कोरबा

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कोरबा, छत्तीसगढ़

By ACGN 7647981711, 9303948009

एनटीपीसी, बालको और सीएसईबी के संयंत्रों से निकल रही राख, सिलिका युक्त धूल से बढ़ रहा स्वास्थ्य संकट, सवालों के घेरे में राख प्रबंधन

कोरबा ACGN :- कोरबा को देश की ऊर्जाधानी कहा जाता है। यहां से निकलने वाली बिजली कई राज्यों को रोशन करती है, लेकिन इसी विकास की तस्वीर का दूसरा पहलू अब आम जनता के सामने बड़ी चिंता बनकर खड़ा है। कोयले से बिजली उत्पादन के बाद निकलने वाली राख अब हवा के साथ लोगों की सांसों तक पहुंच रही है।
कोरबा जिले में एनटीपीसी, बालको, सीएसईबी सहित बड़े ताप विद्युत संयंत्रों से प्रतिदिन हजारों टन राख का उत्सर्जन होता है। अनुमान के अनुसार जिले के विभिन्न प्लांटों से प्रतिदिन लगभग 50 हजार टन से अधिक राख निकलती है। इतनी बड़ी मात्रा में निकलने वाली राख के सुरक्षित प्रबंधन की व्यवस्था कितनी मजबूत है, यह आज सबसे बड़ा सवाल बन चुका है।
यह राख राखड़ डैमों में जमा की जाती है, लेकिन गर्मी के दिनों में जब राख सूख जाती है और हवा चलती है तो यही राख महीन धूल बनकर आसपास के क्षेत्रों में फैलने लगती है।


एनटीपीसी के धनरास क्षेत्र स्थित राखड़ डैम, सीएसईबी के झाबू सहित अन्य राखड़ डैम और बालको के राखड़ डैम से उड़ने वाली राख ने कई क्षेत्रों के लोगों की परेशानी बढ़ा दी है।
थोड़ी सी हवा चलते ही वातावरण में राख का गुबार दिखाई देने लगता है। घरों की छतों, आंगनों, दुकानों, वाहनों और खेतों पर राख की परत जमना कई लोगों की रोज की समस्या बन गई है।
सवाल यह है कि जिस बिजली उत्पादन पर पूरे देश को गर्व है, क्या उसी उत्पादन का बोझ स्थानीय जनता के स्वास्थ्य पर डाला जाएगा?
राख में मौजूद महीन कण और सिलिका युक्त धूल सांस के माध्यम से शरीर के अंदर पहुंच सकती है। लगातार संपर्क में रहने से सांस फूलना, लगातार खांसी, गले में जलन, आंखों में जलन, एलर्जी, अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, सीओपीडी और फेफड़ों से जुड़ी गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है।


बच्चों, बुजुर्गों और पहले से सांस संबंधी समस्या वाले लोगों के लिए यह वातावरण ज्यादा नुकसानदायक साबित हो सकता है।
गर्मी के मौसम में राखड़ डैमों पर पानी का छिड़काव सबसे जरूरी उपायों में से एक है। राख की सतह को नम रखना, धूल उड़ने से रोकना, हरित पट्टी विकसित करना और वैज्ञानिक तरीके से राख का उपयोग करना आवश्यक है।
लेकिन सवाल उठता है—
क्या राखड़ डैमों में गर्मी के दिनों में नियमित पानी का छिड़काव पर्याप्त मात्रा में किया जा रहा है?
क्या राख उड़ने से रोकने के लिए जमीन पर प्रभावी व्यवस्था दिखाई दे रही है या केवल कागजों में ही व्यवस्थाएं पूरी हो रही हैं?
जब प्रतिदिन हजारों टन राख निकल रही है तो उसके स्थायी उपयोग और निपटारे की ठोस योजना क्या है?
क्या उद्योगों से निकलने वाली राख के कारण प्रभावित क्षेत्रों में स्वास्थ्य सर्वे कराया जा रहा है?
क्या आम लोगों को स्वच्छ हवा और सुरक्षित वातावरण देने की जिम्मेदारी तय की जाएगी?
विशेषज्ञों का मानना है कि राख को समस्या नहीं बल्कि संसाधन के रूप में उपयोग करना होगा। इसका उपयोग सड़क निर्माण, सीमेंट उद्योग, निर्माण कार्य और खदानों की बैकफिलिंग जैसे कार्यों में किया जा सकता है।
राख परिवहन के दौरान भी सावधानी जरूरी है। खुले में राख का परिवहन या सड़कों पर राख का फैलाव दोबारा प्रदूषण बढ़ा सकता है।
ऊर्जाधानी कोरबा की पहचान केवल बिजली उत्पादन से नहीं होनी चाहिए, बल्कि यहां रहने वाले लोगों के स्वस्थ जीवन से भी होनी चाहिए। विकास जरूरी है, लेकिन ऐसा विकास जो जनता की सांसों पर भारी पड़े, उस पर मंथन जरूरी है।
अब देखना होगा कि प्रशासन और उद्योग प्रबंधन राख के इस बढ़ते संकट को कितनी गंभीरता से लेते हैं, क्योंकि सवाल केवल राख का नहीं, बल्कि हजारों लोगों के भविष्य और स्वास्थ्य का है।

प्रदीप मिश्रा
निष्पक्ष निर्भीक और सच्ची खबर, हर खबर पर तिरछी नजर और जनहित के प्रति समर्पित पत्रकारिता के साथ देश में तेजी से बढ़ता विश्वसनीय वेब पोर्टल अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़

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