छत्तीसगढ़ की गौरव गाथा : भाग–3 – “सत्ता के बदलते दौर में छत्तीसगढ़ : संघर्ष, संस्कृति और स्वाभिमान की कहानी”
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संपादकीय
अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ का साप्ताहिक विशेषांक
✍️ ‘कलम की धार’ ✍️
By ACGN 7647981711, 9303948009
छत्तीसगढ़ की गौरव गाथा : भाग-3
“कलम की धार” अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ की विशेष साप्ताहिक श्रृंखला है, जो हर रविवार इतिहास, संस्कृति, विरासत, जनजीवन, पर्यावरण और जनहित के मुद्दों को निष्पक्ष, निर्भीक और शोधपरक पत्रकारिता के साथ प्रस्तुत करती है। यह केवल शब्दों की श्रृंखला नहीं, बल्कि समाज की उन सच्चाइयों को सामने लाने का प्रयास है, जो अक्सर अनदेखी रह जाती हैं।
आज की इस विशेष प्रस्तुति में हम निकलेंगे छत्तीसगढ़ की उस गौरवशाली यात्रा पर, जहां इतिहास, सभ्यता, संघर्ष, प्रकृति और संस्कृति की हजारों वर्षों पुरानी कहानी छिपी है। इस श्रृंखला में हम उन अनछुए पहलुओं को भी सामने लाएंगे, जो छत्तीसगढ़ की असली पहचान को दुनिया के सामने रखते हैं।
आज का विषय – मराठों के आगमन से ब्रिटिश शासन तक इतिहास के अनदेखे पन्ने
जब इतिहास ने करवट ली और बदलने लगी छत्तीसगढ़ की तस्वीर
किसी भी प्रदेश का इतिहास केवल राजाओं की विजय और पराजय की कहानी नहीं होता, बल्कि वह उन लोगों की कहानी भी होता है जो उस मिट्टी में जन्म लेते हैं, वहीं अपना जीवन बिताते हैं और हर बदलते समय के साथ अपने अस्तित्व को बचाने का संघर्ष करते हैं।
छत्तीसगढ़ की धरती भी ऐसे ही अनेक उतार-चढ़ावों की साक्षी रही है। यह वह भूमि है जहां प्राचीन काल में दक्षिण कोसल की सभ्यता फली-फूली, जहां लोक परंपराओं में प्रभु श्रीराम का ननिहाल और माता कौशल्या की जन्मभूमि होने की मान्यता आज भी जीवित है। इसी धरती पर सिरपुर जैसे नगरों ने ज्ञान, कला और संस्कृति का ऐसा अध्याय लिखा, जिसकी गूंज इतिहास के पन्नों में आज भी सुनाई देती है।
जैसे जैसे समय आगे बढ़ा और छत्तीसगढ़ ने कलचुरी राजवंश का वैभव देखा। रतनपुर से शासन करने वाले कलचुरी राजाओं ने इस क्षेत्र को राजनीतिक पहचान दी। 36 गढ़ों की व्यवस्था केवल शासन प्रणाली नहीं थी, बल्कि यह उस समय की सामाजिक और प्रशासनिक मजबूती का प्रतीक थी।
लेकिन इतिहास की धारा हमेशा एक जैसी नहीं रहती। जैसे महान नदियां समय के साथ अपना मार्ग बदलती हैं, वैसे ही सत्ता की धाराएं भी बदलती रहीं।
जब कलचुरी सत्ता कमजोर होने लगी। तब इस विशाल राज्य को संभालना कठिन होता गया और नए राजनीतिक समीकरण बनने लगे। इसी बदलते दौर में अठारहवीं शताब्दी का छत्तीसगढ़ एक नए अध्याय में प्रवेश करता है।
जब नागपुर के भोंसले मराठा शासकों का प्रभाव बढ़ा और छत्तीसगढ़ की सत्ता व्यवस्था में परिवर्तन आया। इसके बाद अंग्रेजी शासन का दौर आया, जिसने छत्तीसगढ़ के समाज, प्रशासन और अर्थव्यवस्था पर गहरा प्रभाव डाला।
अंग्रेज अपने साथ नई व्यवस्था, सड़क, रेल और प्रशासन लेकर आए, लेकिन इसके पीछे उनका उद्देश्य केवल विकास नहीं था। उनकी नजर इस भूमि के जंगलों, खनिजों और प्राकृतिक संपदा पर भी थी।
यहीं से शुरू होती है एक ऐसी कहानी जिसमें एक तरफ सत्ता की मजबूती थी और दूसरी तरफ अपनी जमीन, जंगल और संस्कृति को बचाने वाले लोगों का संघर्ष।
मराठा शासन : बदलते राजसिंहासन के बीच जनता का जीवन
जब कलचुरी सत्ता का प्रभाव कम होने लगा, तब छत्तीसगढ़ में राजनीतिक परिवर्तन की शुरुआत हुई। नागपुर के भोंसले मराठा शासकों ने इस क्षेत्र में अपना प्रभाव स्थापित किया।
1741 ईस्वी के आसपास मराठा शासन का प्रभाव बढ़ना छत्तीसगढ़ के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जाता है।
यह दौर केवल राजा बदलने का नहीं था। इसके साथ शासन की सोच बदली, कर व्यवस्था बदली और प्रशासन का तरीका बदल गया।
गांवों में रहने वाला किसान उस समय छत्तीसगढ़ की अर्थव्यवस्था की सबसे मजबूत कड़ी था। खेतों में धान की हरियाली, तालाबों का पानी और जंगलों से मिलने वाली वस्तुएं ही ग्रामीण जीवन का आधार थीं।
किसान सुबह सूरज निकलने से पहले खेतों की ओर निकलता था। उसकी मेहनत केवल अपने परिवार के लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज के जीवन को चलाने के लिए थी।
लेकिन नई राजस्व व्यवस्था ने कई जगहों पर ग्रामीणों के सामने कठिन परिस्थितियां खड़ी कर दीं। भूमि से कर वसूली शासन की प्राथमिकता बनी। अच्छी फसल के समय तो व्यवस्था चल जाती थी, लेकिन सूखा, बीमारी या प्राकृतिक संकट आने पर किसान परेशान होते थे।
फिर भी इस काल में व्यापारिक गतिविधियों को बढ़ावा मिला। स्थानीय बाजारों का विस्तार हुआ। अलग-अलग क्षेत्रों के बीच संपर्क बढ़ा।
मराठा काल को छत्तीसगढ़ के इतिहास में एक संक्रमण काल कहा जा सकता है। पुरानी व्यवस्था पीछे हट रही थी और नई राजनीतिक शक्ति अपना स्थान बना रही थी।
लेकिन आने वाले समय में इससे भी बड़ा परिवर्तन आने वाला था, जब अंग्रेजी शासन की छाया इस धरती पर पड़ने लगी।
ब्रिटिश शासन का आगमन : जब शासन के साथ बदली जीवन की दिशा
जब मराठा शक्ति के कमजोर होने के बाद अंग्रेजों ने मध्य भारत में अपना प्रभाव बढ़ाना शुरू किया।
ईस्ट इंडिया कंपनी जो कभी व्यापार के उद्देश्य से भारत आई थी, धीरे-धीरे राजनीतिक शक्ति बन चुकी थी।
1818 के बाद अंग्रेजों का प्रभाव बढ़ा और 1854 में नागपुर राज्य के विलय के बाद छत्तीसगढ़ सीधे ब्रिटिश शासन के अधीन आ गया। अंग्रेजों ने यहां प्रशासनिक ढांचा बदला। नए अधिकारी आए, नए नियम बने और राजस्व व्यवस्था को नियंत्रित किया गया। लेकिन अंग्रेजों की नजर केवल शासन पर नहीं थी। वे जानते थे कि छत्तीसगढ़ प्राकृतिक संपदा से भरपूर क्षेत्र है। यहां के जंगल, वन उपज और जमीन उनके लिए आर्थिक महत्व रखते थे। उनके लिए जंगल लकड़ी और व्यापार का साधन थे, लेकिन यहां रहने वाले लोगों के लिए जंगल जीवन था।
यही अंतर आगे चलकर सबसे बड़े संघर्षों की वजह बना।
जंगल : छत्तीसगढ़ की आत्मा और हजारों वर्षों की संस्कृति
छत्तीसगढ़ के जंगलों को समझे बिना छत्तीसगढ़ को समझना अधूरा है। यहां के जंगल केवल पेड़ों की कतार नहीं थे, बल्कि एक पूरी सभ्यता के पालक थे। साल, सागौन, बीजा, महुआ, तेंदू, चार, हर्रा, बहेरा और बांस जैसे पेड़ यहां के जीवन का हिस्सा थे। महुआ का पेड़ गांव के जीवन में केवल एक वृक्ष नहीं था, बल्कि परिवार के सदस्य की तरह था। उसकी छाया, उसके फूल और उससे मिलने वाले संसाधन लोगों की जरूरतों से जुड़े थे।
आदिवासी समाज का प्रकृति से रिश्ता बहुत गहरा रहा है। वे प्रकृति को केवल उपयोग की वस्तु नहीं मानते, बल्कि उसे सम्मान देते हैं। उनकी मान्यता रही कि पेड़, पहाड़, नदी और धरती में जीवन की शक्ति होती है। आदिवासी समाज प्रकृति को ही अपना सबसे बड़ा देव मानता है। कई समुदायों में बड़ा देव की पूजा की जाती है, जो प्रकृति और जीवन शक्ति के प्रतीक माने जाते हैं।
गोंड, बैगा, मुरिया, मारिया, हल्बा, भतरा, उरांव, कंवर, पहाड़ी कोरवा, कमार और अबूझमाड़िया जैसे समुदायों ने जंगलों के साथ पीढ़ियों का रिश्ता बनाया। उनके गीतों, नृत्यों और त्योहारों में जंगलों की छाप दिखाई देती है।
जंगल : प्रकृति का विशाल औषधालय
छत्तीसगढ़ के जंगलों में केवल लकड़ी और वन उपज नहीं थी, बल्कि प्रकृति ने यहां उपचार की भी व्यवस्था कर रखी थी। हर्रा, बहेरा, आंवला, नीम, अर्जुन, बेल, गिलोय, शतावर और अनेक औषधीय पौधों का उपयोग पारंपरिक चिकित्सा में होता रहा।
गांवों के जानकार लोग जानते थे कि कौन सी जड़, कौन सी छाल और कौन सी पत्ती किस काम आती है। यह ज्ञान पीढ़ियों से चलता आया था। आज भी कई औषधीय पौधों पर शोध किया जाता है और उनके गुणों को समझा जा रहा है।
अंग्रेजों की वन नीति और बढ़ता संघर्ष
जब अंग्रेजों ने जंगलों पर सरकारी अधिकार बढ़ाना शुरू किया, तब सबसे अधिक असर उन लोगों पर पड़ा जिनका जीवन जंगलों से जुड़ा था। वन कानूनों ने लोगों के पारंपरिक अधिकार सीमित कर दिए।
जिस जंगल से लोग पीढ़ियों से जीवन चला रहे थे, उसी जंगल में अब उन्हें नियमों और अनुमति का सामना करना पड़ा। यह केवल जमीन का विवाद नहीं था, बल्कि संस्कृति और जीवन पद्धति का प्रश्न था। यहीं से जल, जंगल और जमीन की भावना मजबूत हुई। लोगों के भीतर यह विचार जन्म लेने लगा कि अपनी मिट्टी और अपनी पहचान की रक्षा जरूरी है।
संघर्षों के बीच जीवित रही छत्तीसगढ़ की पहचान
मराठा शासन से लेकर ब्रिटिश काल तक का दौर छत्तीसगढ़ के इतिहास में केवल सत्ता परिवर्तन का समय नहीं था, बल्कि यह समाज, संस्कृति और जनजीवन में बड़े बदलावों का दौर था। नए शासक आए, नई व्यवस्थाएं बनीं, सड़कें और रेल का विस्तार हुआ, लेकिन इसी के साथ जंगलों, जमीन और प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण की कहानी भी शुरू हुई।
छत्तीसगढ़ के लोगों के लिए जंगल केवल पेड़-पौधे नहीं थे, बल्कि उनकी आस्था, संस्कृति और जीवन का आधार थे। आदिवासी समाज ने प्रकृति को देव मानकर उसकी रक्षा की और पीढ़ियों से अपनी परंपराओं को जीवित रखा। जब इन परंपरागत अधिकारों पर संकट आया, तो लोगों के भीतर अपने अस्तित्व और अधिकारों की रक्षा की भावना जागी।
यही भावना आगे चलकर संघर्ष और जनजागरण का आधार बनी। छत्तीसगढ़ की धरती ने ऐसे वीरों को जन्म दिया, जिन्होंने अन्याय के सामने झुकने के बजाय अपनी आवाज उठाई।
क्रमशः
अगले अंक में पढ़ें — जल, जंगल, जमीन की रक्षा और छत्तीसगढ़ के वीर संघर्षों की गौरव गाथा।
“जल, जंगल, जमीन का संघर्ष और बदलता छत्तीसगढ़ : वीर नारायण सिंह से स्वतंत्रता आंदोलन तक की अमर गाथा”
(जारी…)
प्रदीप मिश्रा
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