बदलती दुनिया का बेचैन सच
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संपादकीय
अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ साप्ताहिक विशेषांक
✍️ ‘कलम की धार’ ✍️
By ACGN 7647981711, 9303948009
“कलम की धार” अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ का साप्ताहिक विशेषांक है, जो जनहित के मुद्दों को निष्पक्ष, निर्भीक और सच्चाई के साथ उठाता है, व्यवस्था को आईना दिखाता है और उन सवालों को सामने लाता है जिन पर अक्सर चुप्पी साध ली जाती है। “कलम की धार” हर सप्ताह समाज, व्यवस्था, पर्यावरण, शिक्षा, स्वास्थ्य, संस्कृति, बदलती जीवनशैली और आम जनजीवन से जुड़े उन विषयों को सामने लाने का प्रयास करता है जिन पर अक्सर लोग सोचते तो हैं, लेकिन खुलकर चर्चा कम हो पाती है। यह स्तंभ किसी व्यक्ति, संस्था, सत्ता, संगठन या समाज विशेष पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने के उद्देश्य से नहीं लिखा जाता, बल्कि वर्तमान समय की सच्चाइयों, परिस्थितियों, चुनौतियों और बदलते सामाजिक परिवेश का आलोचनात्मक, विश्लेषणात्मक और जागरूकता से भरा आईना प्रस्तुत करता है।
कलम की धार का उद्देश्य केवल समाचार देना नहीं, बल्कि समाज को सोचने, समझने और जागरूक करने का प्रयास करना है। क्योंकि जब समाज सवाल पूछना बंद कर देता है, तब सच्चाइयां धीरे-धीरे दबने लगती हैं।
आज का विषय – सोचें क्या हम विकास कर रहे या अपने भविष्य को बर्बाद?
कंक्रीट के जंगल, जहरीला भोजन, टूटते रिश्ते, खत्म होते संस्कार और आधुनिकता के बीच दम तोड़ती इंसानियत की सच्ची तस्वीर
आलेख प्रदीप मिश्रा
आज दुनिया इतनी तेजी से बदल रही है कि इंसान खुद भी समझ नहीं पा रहा कि वह आखिर किस दिशा में जा रहा है। हर तरफ विकास की बातें हो रही हैं। सड़कें चौड़ी हो रही हैं, शहर फैल रहे हैं, ऊंची-ऊंची इमारतें बन रही हैं, तकनीक हर हाथ में पहुंच चुकी है और इंसान खुद को पहले से ज्यादा आधुनिक और विकसित मानने लगा है। लेकिन इसी चमक-दमक के बीच एक ऐसा खालीपन भी बढ़ रहा है जिसे न पैसा भर पा रहा है और न मशीनें।
आज इंसान के पास सुविधाएं हैं, लेकिन सुकून नहीं। बड़े घर हैं, लेकिन उनमें बैठकर बात करने वाले लोग कम हो गए हैं। मोबाइल स्मार्ट हो गए हैं, लेकिन रिश्ते कमजोर होते जा रहे हैं। लोग सोशल मीडिया पर हजारों लोगों से जुड़े हैं, लेकिन अपने ही परिवार से दूर होते जा रहे हैं।
आखिर क्या यही आधुनिकता है जिसके लिए इंसान अपनी जड़ों और संवेदनाओं को पीछे छोड़ता जा रहा है?
गांवों की मिट्टी से दूर होती जिंदगी
एक समय था जब गांव केवल रहने की जगह नहीं, बल्कि जीवन की पहचान हुआ करते थे। गर्मियों की छुट्टियों में बच्चे अपने नाना-नानी और दादा-दादी के गांव जाया करते थे। वहां खुला आसमान होता था, खेतों की हरियाली होती थी, तालाबों का साफ पानी होता था और रिश्तों में अपनापन होता था। रात में लोग खुले आंगन या छत पर चारपाई डालकर सोते थे। ऊपर आसमान में चमकते तारे दिखाई देते थे और सुबह पक्षियों की आवाज से आंख खुलती थी।
गाय का ताजा दूध, घर का दही, छाछ, घी और खेतों की ताजी सब्जियां केवल शरीर को नहीं, बल्कि मन को भी स्वस्थ रखती थीं। तब लोग कम साधनों में भी खुश रहते थे। न दिखावे की होड़ थी और न कृत्रिम जीवन का दबाव। लेकिन आज गांवों की मिट्टी की खुशबू धीरे-धीरे कंक्रीट में दबती जा रही है। खेतों की जगह प्लॉट बन रहे हैं, पेड़ों की जगह टावर खड़े हो रहे हैं और बच्चे मिट्टी से दूर होकर मोबाइल की दुनिया में खोते जा रहे हैं।
क्या आने वाली पीढ़ियां कभी वह सुकून महसूस कर पाएंगी जो कभी गांवों की जिंदगी में हुआ करता था?
भोजन में स्वाद बचा, शुद्धता खो गई
पहले हर मौसम का अपना स्वाद और अपना महत्व होता था। गर्मियों में आम, तरबूज और खीरा शरीर को ठंडक देते थे। सर्दियों में गाजर, मटर और सरसों का साग ताकत देते थे। प्रकृति हर मौसम में वही चीज देती थी जिसकी शरीर को जरूरत होती थी।
लेकिन आज बाजार ने प्रकृति को भी व्यापार बना दिया है। अब हर फल बारह महीने मिलता है और हर सब्जी हर मौसम में उपलब्ध है। लेकिन क्या वह उतनी ही शुद्ध भी है? आज सब्जियों को जल्दी बड़ा करने के लिए रसायनों और इंजेक्शनों का उपयोग हो रहा है। फलों को कृत्रिम तरीके से पकाया जा रहा है। दूध बढ़ाने के लिए पशुओं को दवाइयां दी जा रही हैं। भोजन देखने में चमकदार है, लेकिन भीतर से धीरे-धीरे जहरीला होता जा रहा है। पहले भोजन दवा का काम करता था, लेकिन आज दवाइयां भोजन के बाद जीवन का हिस्सा बनती जा रही हैं।
क्या इंसान पैसे कमाने की दौड़ में अपने ही शरीर के साथ खिलवाड़ नहीं कर रहा?
बढ़ती बीमारियां और घटती उम्र
एक समय था जब लोग 90 और 100 साल तक स्वस्थ जीवन जी लेते थे। वे मेहनत करते थे, शुद्ध भोजन खाते थे, समय पर सोते-जागते थे और मानसिक तनाव कम होता था। गांवों की जिंदगी में शरीर श्रम करता था और मन शांत रहता था।
आज 30-40 साल की उम्र में ही डायबिटीज, ब्लड प्रेशर, हार्ट की बीमारी और तनाव आम हो चुके हैं। छोटे बच्चे चश्मा पहन रहे हैं। युवा अवसाद में हैं। लोग दवाइयों पर निर्भर होते जा रहे हैं। इंसान के पास पैसे कमाने का समय है, लेकिन अपने स्वास्थ्य के लिए समय नहीं। देर रात तक मोबाइल और स्क्रीन के सामने बैठना, फास्ट फूड खाना और भागदौड़ भरी जिंदगी जीना अब सामान्य हो गया है।
सवाल यह है कि यदि आधुनिक जीवनशैली इंसान को भीतर से बीमार बना रही है, तो फिर क्या यह सचमुच विकास कहलाने योग्य है?
आयुर्वेद से मशीनों तक का सफर
एक समय था जब गांवों में वैद्य हुआ करते थे। वे नब्ज देखकर शरीर की स्थिति समझ लेते थे। जड़ी-बूटियों और आयुर्वेदिक पद्धति से इलाज किया जाता था। उपचार केवल बीमारी खत्म करने के लिए नहीं, बल्कि शरीर को संतुलित रखने के लिए होता था।
आज चिकित्सा विज्ञान ने अद्भुत प्रगति की है। मशीनें कुछ ही मिनटों में बीमारी बता देती हैं। बड़े ऑपरेशन संभव हो गए हैं। यह आधुनिकता जरूरी और सराहनीय है। लेकिन दूसरी ओर दवाइयों पर निर्भरता भी तेजी से बढ़ी है। छोटी-सी समस्या में भी लोग गोलियां खाने लगे हैं। स्वास्थ्य सेवा धीरे-धीरे व्यापार का रूप लेती जा रही है।
आज इंसान इलाज तो करा रहा है, लेकिन क्या वह बीमारी पैदा करने वाली जीवनशैली को बदलने के बारे में सोच रहा है?
विकास या विनाश का रास्ता?
आज हर तरफ विकास की बातें हो रही हैं। सड़कें बन रही हैं, उद्योग बढ़ रहे हैं, खदानें फैल रही हैं और ऊंची-ऊंची इमारतें आधुनिकता की पहचान बन चुकी हैं। लेकिन इसी विकास के लिए जंगल काटे जा रहे हैं, पहाड़ तोड़े जा रहे हैं और नदियों का रास्ता बदला जा रहा है। फिर कुछ पौधे जिसकी ना तो जड़े मजबूत, न फल, न ही राहगीरों को पर्याप्त छाव,और न ही उनमें कोई औषधियों के गुण जिसे लगाकर पर्यावरण बचाने की बातें की जाती हैं।
क्या सदियों पुराने जंगलों जो औषधियों से भरपूर, बड़े और घने,जड़े धरती के समाई, मौसम में बदलाव लाने में सक्षम, थे क्या उनकी भरपाई कुछ पौधे कर सकते हैं?
आज गर्मी लगातार बढ़ रही है। बारिश का संतुलन बिगड़ रहा है। कहीं सूखा है तो कहीं बाढ़। जल संकट गहराता जा रहा है। प्रकृति लगातार चेतावनी दे रही है, लेकिन इंसान अभी भी मुनाफे की दौड़ में व्यस्त है।
क्या आने वाली पीढ़ियों को शुद्ध हवा और पानी भी नसीब होगा?
पैसा बढ़ा, इंसानियत घट गई
आज इंसान की सबसे बड़ी पहचान पैसा बन चुकी है। हर व्यक्ति ज्यादा कमाना चाहता है, ज्यादा जमीन खरीदना चाहता है और बड़ी-बड़ी इमारतें बनाना चाहता है। लेकिन अंत में साथ क्या जाएगा? न जमीन, न बैंक बैलेंस और न आलीशान मकान।
फिर भी पूरी जिंदगी इंसान इन्हीं चीजों को जमा करने में लगा रहता है। रिश्ते कमजोर हो रहे हैं। भाई-भाई जमीन के लिए लड़ रहे हैं। बुजुर्ग अकेले हो रहे हैं। सफलता की पहचान अब इंसानियत नहीं, बल्कि संपत्ति बन गई है।
क्या इंसान ने पैसे कमाने की दौड़ में इंसान बनकर जीना ही भूल दिया है?
भ्रष्टाचार की दीमक
आज कई विकास कार्य जनता की जरूरत से ज्यादा कमीशन का साधन बन गए हैं। सड़कें बनती हैं और कुछ महीनों में टूट जाती हैं। करोड़ों की इमारतें कुछ वर्षों में कमजोर पड़ जाती हैं। जनता टैक्स देती है, लेकिन बदले में कई बार अधूरा विकास मिलता है।
सबसे खतरनाक बात यह है कि अब भ्रष्टाचार धीरे-धीरे सामान्य मान लिया गया है। लोग कहते हैं — “बिना पैसे कुछ नहीं होता।” जब समाज गलत को सामान्य मानने लगे, तब पतन शुरू हो जाता है।
क्या ईमानदारी अब केवल किताबों और भाषणों तक सीमित रह गई है?
शिक्षा बढ़ी, संस्कार घटे
आज बड़े-बड़े स्कूल और कॉलेज खुल रहे हैं। स्मार्ट क्लास और चमकदार बिल्डिंगें शिक्षा की पहचान बन चुकी हैं। लेकिन यदि पढ़ाई के बाद भी युवा बेरोजगार हों, यदि बच्चों में संस्कार कम होते जाएं और यदि शिक्षित लोग भी समाज और प्रकृति के प्रति संवेदनशील न हों, तो फिर ऐसी शिक्षा का उद्देश्य क्या है?
आज बच्चों को प्रतियोगिता सिखाई जा रही है, लेकिन जीवन नहीं। डिग्रियां बढ़ रही हैं, लेकिन धैर्य और नैतिकता घटती जा रही है। माता-पिता बच्चों को सफल बनाना चाहते हैं, लेकिन क्या उन्हें अच्छा इंसान बनाना भी उतना ही जरूरी नहीं?
तकनीक ने जोड़ा भी, तोड़ा भी
मोबाइल और इंटरनेट ने दुनिया को जोड़ दिया है, लेकिन परिवारों की बातचीत कम कर दी है। बच्चे मैदानों से गायब हो रहे हैं। त्योहार दिखावे में बदलते जा रहे हैं। रिश्तों में समय कम होता जा रहा है।
तकनीक गलत नहीं है, लेकिन तकनीक पर अत्यधिक निर्भरता इंसान को भीतर से अकेला बना रही है। लोग ऑनलाइन ज्यादा जुड़े हैं, लेकिन वास्तविक जीवन में भावनात्मक रूप से दूर होते जा रहे हैं।
क्या इंसान मशीनों से जुड़ते-जुड़ते इंसानों से दूर होता जा रहा है?
हमे अब क्या करना होगा?
समय अभी भी है। जरूरत संतुलन की है। प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देना होगा। पेड़ लगाने के साथ उन्हें बचाना होगा। बच्चों को संस्कार और प्रकृति से जोड़ना होगा। मोबाइल से ज्यादा रिश्तों को समय देना होगा। भ्रष्टाचार के खिलाफ समाज को आवाज उठानी होगी।
विकास ऐसा होना चाहिए जो प्रकृति और इंसानियत दोनों को साथ लेकर चले। क्योंकि यदि विकास के बाद भी इंसान मानसिक रूप से परेशान, शारीरिक रूप से बीमार और सामाजिक रूप से अकेला हो जाए, तो फिर ऐसे विकास का क्या अर्थ रह जाता है?
आज इंसान चांद तक पहुंच गया है, लेकिन धरती को बचाने की चिंता पीछे छूटती जा रही है। बड़ी-बड़ी इमारतें बन रही हैं, लेकिन रिश्तों की नींव कमजोर हो रही है। अस्पताल बढ़ रहे हैं, लेकिन स्वास्थ्य घट रहा है। डिग्रियां बढ़ रही हैं, लेकिन जीवन का ज्ञान कम होता जा रहा है।
यह समय केवल विकास का जश्न मनाने का नहीं, बल्कि आत्ममंथन करने का है। हमें तय करना होगा कि आने वाली पीढ़ियों को कैसी दुनिया देनी है शुद्ध हवा और सच्चे रिश्तों वाली दुनिया या कंक्रीट, प्रदूषण और अकेलेपन से भरी दुनिया।
क्या अभी भी समय रहते इंसान अपनी गलतियों से सीखकर संतुलित और संवेदनशील समाज की ओर लौट पाएगा?
अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ की आमजन से अपील
अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ समाज, शासन, प्रशासन और आम जनता से अपील करता है कि विकास और प्रकृति के बीच संतुलन बनाएं। पेड़ लगाएं और उन्हें बचाएं। शुद्ध भोजन और स्वस्थ जीवनशैली को अपनाएं। बच्चों को केवल डिग्री नहीं, संस्कार भी दें। रिश्तों को समय दें और समाज में इंसानियत को जिंदा रखें।
यह लेख किसी व्यक्ति, समाज, संस्था, सत्ता या संगठन पर आरोप-प्रत्यारोप नहीं करता। यह केवल वर्तमान समय की उन सच्चाइयों को सामने लाने का प्रयास है जिन्हें हर व्यक्ति अपने जीवन में कहीं न कहीं महसूस कर रहा है।
यदि आपके मन में भी समाज, व्यवस्था, बदलती जीवनशैली, पर्यावरण, शिक्षा, संस्कृति या जनहित से जुड़ा कोई विचार, अनुभव या सच्चाई हो, तो आप हमें अपने नाम सहित भेज सकते हैं। चयनित विचारों को अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ द्वारा निशुल्क प्रकाशित किया जाएगा।
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