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गन्ना-शुगरबीट अंतरफसली खेती से बढ़ेगी किसानों की आय, गोढ़ी में किसान सम्मेलन आयोजित

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दुर्ग, छत्तीसगढ़

By ACGN 7647981711, 9303948009


CBDA और NSI के संयुक्त प्रयास से जैव ऊर्जा और फसल विविधीकरण को मिला बढ़ावा

दुर्ग ACGN:- छत्तीसगढ़ बायोफ्यूल विकास प्राधिकरण रायपुर द्वारा राष्ट्रीय शर्करा संस्थान कानपुर के सहयोग से ग्राम गोढ़ी में किसान सम्मेलन का आयोजन किया गया, जिसमें दुर्ग, बेमेतरा और कवर्धा जिले के गन्ना उत्पादक किसानों के साथ कृषि विभाग के अधिकारी बड़ी संख्या में शामिल हुए। इस सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य गन्ना आधारित खेती में सफेद चुकंदर यानी शुगरबीट को अंतरफसली के रूप में अपनाकर किसानों की आय बढ़ाने और भूमि उपयोग को अधिक प्रभावी बनाना रहा।

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में एनएसआई की निदेशक डॉ. सीमा परोहा, सहायक प्राध्यापक डॉ. लोकेश बाबर और सीबीडीए के मुख्य कार्यपालन अधिकारी सुमित सरकार उपस्थित रहे। इस दौरान किसानों को शुगरबीट की खेती का प्रत्यक्ष प्रदर्शन कराया गया और फसल की खुदाई कराई गई, जिसमें औसतन 3.7 किलोग्राम वजन के चुकंदर पाए गए, जो इसकी सफल खेती की संभावनाओं को दर्शाता है।
किसानों ने शुगरबीट के लिए शीघ्र मूल्य निर्धारण और बेहतर विपणन व्यवस्था की मांग की, वहीं विशेषज्ञों ने गन्ना फसल के नमूनों का परीक्षण कर रोग प्रबंधन के लिए आवश्यक तकनीकी मार्गदर्शन भी दिया।

श्री सुमित सरकार , मुख्य कार्यपालन अधिकारी , सीबीडीए

इस कार्यक्रम में सुमित सरकार ने बताया कि छत्तीसगढ़ में बायोडीजल, बायोएथेनॉल, कंप्रेस्ड बायोगैस और ग्रीन हाइड्रोजन जैसे वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा देने के लिए लगातार कार्य किया जा रहा है और इसी कड़ी में गन्ना और शुगरबीट की अंतरफसली खेती पर पहली बार अनुसंधान शुरू किया गया है।
उन्होंने बताया कि गन्ना लंबी अवधि की फसल होने के कारण शुरुआती समय में भूमि का पूरा उपयोग नहीं हो पाता, ऐसे में शुगरबीट जैसी अल्पकालीन फसल को साथ में उगाने से अतिरिक्त उत्पादन और आय दोनों संभव है। शुगरबीट 5 से 6 महीने में तैयार हो जाती है, जिससे बायोएथेनॉल उत्पादन के लिए भी अतिरिक्त कच्चा माल उपलब्ध होगा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी।

डॉ सीमा परोहा, निदेशक , राष्ट्रीय शर्करा संस्थान कानपुर 

डॉ. सीमा परोहा ने अपने संबोधन में कहा कि गन्ना और शुगरबीट की अंतरफसली खेती किसानों के लिए आय बढ़ाने का व्यवहारिक और सफल विकल्प है, जिसका परीक्षण देश के कई राज्यों में हो चुका है और छत्तीसगढ़ में भी इसके सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं। उन्होंने भविष्य में शुगरबीट के लिए उचित समर्थन मूल्य तय करने की दिशा में पहल की बात कही।
सहायक परियोजना अधिकारी संतोष कुमार मैत्री ने बताया कि ग्राम गोढ़ी में पहली बार इस प्रकार का अनुसंधान शुरू किया गया है, जिसमें एनएसआई की एलएस-6 किस्म के अच्छे परिणाम मिले हैं, खासकर मुरुम मिट्टी में इसकी सफलता ने किसानों के लिए नई संभावनाएं खोली हैं। वहीं डॉ. लोकेश बाबर ने किसानों को इस तकनीक को अपनाने के लिए प्रेरित करते हुए बताया कि यह कम लागत में अधिक लाभ देने वाली खेती है और एनएसआई द्वारा बीज और प्रशिक्षण की सुविधा भी उपलब्ध कराई जाएगी।


कार्यक्रम के दौरान अतिथियों ने सीबीडीए परिसर के हर्बेरियम और आर्बोरेटम का भ्रमण किया तथा ऊर्जा फसल नेपियर घास के क्षेत्र का अवलोकन किया, जहां कंप्रेस्ड बायोगैस उत्पादन की संभावनाएं मौजूद हैं। किसानों को विश्वास दिलाया गया कि यह पहल उन्हें केवल अन्नदाता ही नहीं बल्कि ऊर्जा दाता के रूप में भी स्थापित करेगी और राज्य को जैव ऊर्जा के क्षेत्र में नई पहचान दिलाएगी। अंत में किसानों और अधिकारियों को गमछा और टोपी देकर सम्मानित किया गया।

प्रदीप मिश्रा
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