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क्या आप रावण जलाने जा रहे हैं, पहले अपने भीतर झांकिए! कहीं आप ही तो रावण नहीं बन रहे?

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20 अक्टूबर विजयादशमी विशेष आलेख

By ACGN – 7647981711, 9303948009

एक सवाल, जो दशहरे की खुशियों के बीच आपको अपने भीतर झांकने पर मजबूर कर देगा!दशहरा भगवान श्रीराम के आदर्श, रावण का अहंकार और इंसान के भीतर छिपी दस बुराइयों पर एक झकझोर देने वाला आत्ममंथन।

आज विजयादशमी है। देशभर में रावण के विशाल पुतले तैयार हैं। कहीं आतिशबाजी होगी, कहीं भगवान श्रीराम के जयकारे गूंजेंगे, तो कहीं हजारों लोग अपने परिवार के साथ रावण दहन देखने पहुंचेंगे। हर ओर बुराई पर अच्छाई की विजय का संदेश सुनाई देगा। लेकिन इस उत्सव के बीच एक सवाल ऐसा भी है, जिसका जवाब हमें अपने भीतर खोजना चाहिए।
क्या हम सचमुच बुराई पर विजय प्राप्त कर रहे हैं, या केवल रावण का पुतला जलाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर रहे हैं?
जिस रावण को जलाने के लिए हम घर से निकलते हैं, कहीं वही रावण हमारे भीतर अहंकार, क्रोध, लोभ, ईर्ष्या और घमंड के रूप में तो नहीं बैठा है? आज सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि रावण का पुतला कितना ऊंचा होगा, बल्कि यह है कि हमारे भीतर का रावण कितना ऊंचा हो चुका है!

रावण दहन देखने जाएंगे, लेकिन रास्ते में क्या करेंगे?

जरा उस दृश्य की कल्पना कीजिए। हजारों लोग रावण दहन देखने के लिए निकले हैं। सड़कों पर वाहनों की भीड़ है। किसी की गाड़ी आगे निकल गई, किसी से धक्का लग गया, किसी ने रास्ता नहीं दिया या किसी की बात बुरी लग गई। देखते ही देखते कहासुनी शुरू हो जाती है। आवाजें ऊंची होने लगती हैं, गाली-गलौज होती है और कभी-कभी मामूली विवाद हाथापाई तक पहुंच जाता है।
अब सोचिए, जिस दिन हमें बुराई पर अच्छाई की विजय का संदेश अपनाना चाहिए, उसी दिन हम अपने क्रोध और अहंकार का प्रदर्शन कर रहे हैं। जिस रावण को जलाकर हम प्रसन्न होने वाले हैं, कहीं उसी का अहंकार हमारे व्यवहार में दिखाई नहीं दे रहा?
जिस मैदान में भगवान श्रीराम की मर्यादा और आदर्शों की चर्चा होनी चाहिए, यदि वहां जाने वाले लोग ही एक-दूसरे से लड़ने लगें, तो हमें अपने व्यवहार पर विचार करना चाहिए।
यदि रावण दहन के मैदान तक पहुंचने से पहले ही हम अपने विवेक को जला दें, तो फिर उस पुतले को जलाने का अर्थ क्या रह जाएगा?

रावण विद्वान था, फिर भी उसका पतन क्यों हुआ?

रावण को केवल दस सिर वाले राक्षस के रूप में देखना उसकी कथा से मिलने वाली सीख को अधूरा समझना होगा। रामायण की परंपराओं में रावण को महान विद्वान, शिवभक्त, शक्तिशाली राजा और अनेक विद्याओं का ज्ञाता बताया गया है। उसके पास ज्ञान था, सामर्थ्य था, सोने की लंका थी और अपार वैभव था। फिर भी उसका पतन हुआ। क्यों?
क्योंकि ज्ञान के साथ विवेक, शक्ति के साथ मर्यादा और सफलता के साथ विनम्रता होना आवश्यक है। जब मनुष्य अपने ज्ञान पर घमंड करने लगे, अपनी शक्ति को दूसरों को दबाने का साधन बना ले और अपनी इच्छाओं के सामने मर्यादा भूल जाए, तो उसका अहंकार ही उसके पतन का कारण बन सकता है।
रावण की कथा हमें सिखाती है कि केवल विद्वान होना पर्याप्त नहीं, अपने ज्ञान का सही उपयोग करना भी जरूरी है। केवल शक्तिशाली होना महानता नहीं, अपनी शक्ति से निर्बल की रक्षा करना महानता है। केवल धनवान होना सफलता नहीं, अपने धन से किसी जरूरतमंद के आंसू पोंछना भी सफलता है।
रावण के पास सब कुछ था, लेकिन अहंकार ने उसे वह भी खोने पर मजबूर कर दिया, जिसे वह अपना सबसे बड़ा सामर्थ्य समझता था।

श्रीराम की सबसे बड़ी सीख, विजय के बाद भी अहंकार नहीं!

भगवान श्रीराम और रावण की कथा केवल युद्ध में जीत और हार की कहानी नहीं है। यह मर्यादा, विनम्रता, ज्ञान और मानवीय मूल्यों की भी शिक्षा देती है। रामायण की प्रसिद्ध परंपरा में एक प्रसंग मिलता है कि रावण के अंतिम समय में श्रीराम ने लक्ष्मण को उससे ज्ञान प्राप्त करने के लिए भेजा। इस प्रसंग का भाव यह है कि शत्रु में भी यदि कोई ज्ञान या गुण हो, तो उसे ग्रहण करने में संकोच नहीं करना चाहिए। अलग-अलग रामायणों में इस प्रसंग का विवरण भिन्न हो सकता है, लेकिन इससे मिलने वाली सीख अत्यंत महत्वपूर्ण है।

जिस रावण को युद्ध में पराजित किया गया, उसके ज्ञान का सम्मान करने का भाव श्रीराम के चरित्र की महानता को दर्शाता है। विजय के बाद भी अहंकार नहीं, बल्कि मर्यादा और विवेक का महत्व सामने आता है।
अब अपने जीवन में झांकिए। हमसे कोई छोटा कर्मचारी गलती कर दे, तो हम उसे सबके सामने अपमानित कर देते हैं। कोई गरीब व्यक्ति हमारी बात से असहमत हो जाए, तो हम उसे तुच्छ समझने लगते हैं। कोई विरोध कर दे, तो हम बदला लेने की सोचने लगते हैं।
लेकिन भगवान श्रीराम का आदर्श हमें याद दिलाता है कि बड़ा वह नहीं जो दूसरों को छोटा दिखाए, बड़ा वह है जो अपनी महानता के बावजूद दूसरों का सम्मान करना जानता हो।
यदि विजय मिलने के बाद हमारा व्यवहार और अधिक विनम्र नहीं होता, तो हमें अपनी जीत के अर्थ पर विचार करना चाहिए।

पद मिला है तो सेवा कीजिए, घमंड नहीं!

यदि आप किसी बड़े पद पर हैं, अधिकारी हैं, कर्मचारी हैं, जनप्रतिनिधि हैं या किसी संस्था के जिम्मेदार व्यक्ति हैं, तो याद रखिए कि आपका पद आपकी पहचान जरूर है, लेकिन आपका व्यवहार आपके व्यक्तित्व की असली पहचान है।
किसी वरिष्ठ अधिकारी को अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को अपमानित नहीं करना चाहिए। पद का अर्थ यह नहीं कि आपके सामने हर व्यक्ति की आवाज दबा दी जाए। आपका दायित्व है कि आप अपने से छोटे पद पर काम करने वाले व्यक्ति की परेशानी सुनें, उसकी मेहनत का सम्मान करें और जरूरत पड़ने पर उसका सहयोग करें।
कुर्सी आज आपके पास है, कल किसी और के पास हो सकती है। पद स्थायी नहीं होता, लेकिन आपके व्यवहार से लोगों के मन में बनी छवि लंबे समय तक बनी रहती है।
इसी तरह यदि आप जनप्रतिनिधि या राजनेता हैं, तो याद रखिए कि आपको जनता ने अपनी समस्याओं के समाधान और क्षेत्र के विकास की उम्मीद से चुना है। जनता का विश्वास आपका अधिकार नहीं, आपकी जिम्मेदारी है। लोगों की समस्याएं सुनना, जरूरतमंदों की मदद करना और बिना भेदभाव के सेवा करना ही जनप्रतिनिधि होने का वास्तविक अर्थ है। और यदि आप किसी नेता, अधिकारी या प्रभावशाली व्यक्ति के रिश्तेदार हैं, तो उनके पद और पहचान का अहंकार अपने भीतर मत पालिए। किसी दूसरे के पद के कारण आपको सम्मान मिल सकता है, लेकिन वास्तविक सम्मान आपके अपने आचरण से मिलता है।
कुर्सी पर बैठकर बड़ा बनना आसान है, लेकिन कुर्सी से उतरकर भी लोगों के दिलों में सम्मान बनाए रखना ही सच्ची महानता है।

धन है तो जरूरतमंद का सहारा बनिए, घमंड का कारण नहीं!

यदि आपके पास धन है, बड़ा मकान है, महंगी गाड़ी है, कारोबार है या समाज में प्रतिष्ठा है, तो यह आपके परिश्रम और परिस्थितियों का परिणाम हो सकता है। इसका सम्मान कीजिए, लेकिन इसे दूसरों को छोटा समझने का आधार मत बनाइए।
आज आपके पास संपत्ति है, कल परिस्थितियां बदल सकती हैं। जीवन में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। जो व्यक्ति आज आपके दरवाजे पर मदद मांगने आया है, संभव है कल वही किसी दूसरे जरूरतमंद का सहारा बने। इसलिए किसी गरीब को उसके कपड़ों से, किसी मजदूर को उसके काम से और किसी कमजोर व्यक्ति को उसकी परिस्थिति से मत आंकिए।
आपके धन का सबसे सुंदर उपयोग तब होता है, जब उससे किसी बच्चे की पढ़ाई हो जाए, किसी बीमार को सहायता मिल जाए, किसी भूखे को भोजन मिल जाए या किसी निराश परिवार के जीवन में उम्मीद लौट आए।

याद रखिए, धन से सुविधाएं खरीदी जा सकती हैं, लेकिन सच्चा प्रेम, विश्वास और सम्मान नहीं। इन्हें पाने के लिए मनुष्य को अपने व्यवहार में विनम्रता रखनी पड़ती है।
दौलत का घमंड मत कीजिए; ऐसा दिल रखिए कि आपकी मौजूदगी से किसी जरूरतमंद को हिम्मत मिले।

सड़क पर आगे निकलना है या सुरक्षित घर लौटना है?

आज सड़क पर छोटी-सी बात को लेकर गुस्सा करना आम होता जा रहा है। कोई आगे निकल गया तो हम भी उसे पीछे छोड़ने की कोशिश करते हैं। कोई हॉर्न बजा दे तो हमें अपमान महसूस होने लगता है। कोई रास्ता मांग ले तो हम अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लेते हैं।
लेकिन जरा सोचिए, सड़क पर आपकी सबसे बड़ी जीत क्या है? किसी दूसरे वाहन से आगे निकल जाना, या सुरक्षित अपने घर पहुंचकर अपने परिवार के बीच बैठना?
तेज रफ्तार, गलत दिशा में वाहन चलाना, खतरनाक तरीके से ओवरटेक करना, हेलमेट या सीट बेल्ट की अनदेखी करना और गुस्से में वाहन चलाना केवल आपकी जिंदगी को नहीं, दूसरों के जीवन को भी खतरे में डाल सकता है।
आपकी कुछ मिनट की जल्दबाजी किसी परिवार को जीवनभर का दर्द दे सकती है। जिस घर में कोई आपका इंतजार कर रहा है, वहां आपकी सुरक्षित वापसी सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है।

दशहरे पर रावण का पुतला जलाने से पहले अपने भीतर बैठे उस अहंकार को पहचानिए, जो कहता है—मैं किसी से कम नहीं, मुझे कोई रोक नहीं सकता, मुझे कोई नियम मानने की जरूरत नहीं।
सड़क पर समझदारी से चलना कमजोरी नहीं, बल्कि अपने जीवन और दूसरों के जीवन के प्रति जिम्मेदारी है।

तनाव आपका है, लेकिन उसका दर्द पूरा परिवार क्यों सहे?

जीवन में तनाव हर किसी को होता है। किसी को काम की चिंता है, किसी को कारोबार की, किसी को आर्थिक परेशानी है, किसी को रिश्तों की उलझन है। कठिन परिस्थितियों से गुजरना जीवन का हिस्सा है। लेकिन समस्या तब बढ़ती है, जब हम अपने तनाव का गुस्सा अपने परिवार पर निकालने लगते हैं।
किसी ने बाहर अपमान सहा, तो घर आकर बच्चों पर चिल्लाने लगा। किसी का काम नहीं बना, तो जीवनसाथी से झगड़ने लगा। किसी को आर्थिक परेशानी हुई, तो परिवार के सदस्यों को दोष देने लगा। कोई अपनी तकलीफ भूलने के लिए नशे का सहारा लेने लगा, लेकिन इससे समस्या कम होने के बजाय कई बार बढ़ जाती है।
नशा तनाव का स्थायी समाधान नहीं है। इससे स्वास्थ्य, आर्थिक स्थिति, पारिवारिक संबंध और मानसिक शांति प्रभावित हो सकते हैं। जिस व्यक्ति को परिवार से सहारा लेना चाहिए, वही कभी-कभी अपने व्यवहार से परिवार को भय और दुख में डाल देता है।
जरा उन बच्चों के बारे में सोचिए, जो घर में रोज झगड़ा देखकर बड़े होते हैं। उस जीवनसाथी के बारे में सोचिए, जो हर दिन आपके गुस्से से डरता है। उन माता-पिता के बारे में सोचिए, जिनकी आंखें अपने बच्चों की चिंता में नम हो जाती हैं।
अपनी परेशानी को स्वीकार कीजिए। परिवार से बात कीजिए, भरोसेमंद व्यक्ति की मदद लीजिए और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ से सलाह लीजिए। तनाव के कारण किसी अपने का मन मत तोड़िए।
घर वह स्थान होना चाहिए, जहां बाहर की दुनिया की थकान मिटे; ऐसा स्थान नहीं, जहां अपने ही लोग आपके गुस्से से डरकर जीने लगें।

दो पक्षों की लड़ाई में जीतता कौन है?

कभी-कभी दो लोगों, दो परिवारों या दो पक्षों के बीच छोटी-सी बात को लेकर विवाद शुरू होता है। पहले शब्दों से हमला होता है, फिर पुराने हिसाब खुलते हैं, उसके बाद रिश्तेदार और परिचित भी बीच में आ जाते हैं। बात सुलझाने के बजाय लोग उसे और उलझाने लगते हैं, हर पक्ष को लगता है कि गलती दूसरे की है। कोई झुकना नहीं चाहता, कोई माफी नहीं मांगना चाहता। दोनों अपनी-अपनी प्रतिष्ठा बचाने में लगे रहते हैं। लेकिन अंत में रिश्ते टूटते हैं, समय बर्बाद होता है, मन अशांत होता है और कई बार कानूनी परेशानियां भी खड़ी हो जाती हैं।
जरा ठहरकर सोचिए-यदि दोनों पक्ष केवल जीतना चाहते हैं, तो रिश्ते को बचाएगा कौन? यदि दोनों को केवल अपनी बात सही साबित करनी है, तो समाधान तक पहुंचेगा कौन?
हर बार चुप रहना कमजोरी नहीं होता और हर बार अपनी बात मनवा लेना जीत नहीं होता। कभी-कभी एक कदम पीछे हटना बड़े नुकसान से बचा सकता है। जहां गलती हो, उसे स्वीकार करना चाहिए; जहां अन्याय हो, वहां उचित और शांतिपूर्ण तरीके से आवाज उठानी चाहिए। हिंसा, धमकी और बदले की भावना किसी विवाद का स्थायी समाधान नहीं हैं।
जिस जीत के बाद अपने ही लोग पराए हो जाएं, उस जीत पर भी एक बार विचार करना चाहिए।

अपने भीतर के दस रावणों को पहचानिए!

दशहरे पर रावण के दस सिरों की चर्चा होती है। इस प्रतीक को अपने जीवन से जोड़कर देखें। हमारे भीतर भी ऐसी अनेक बुराइयां हो सकती हैं, जो धीरे-धीरे हमारे विवेक, रिश्तों और इंसानियत को कमजोर करती हैं।
अहंकार – स्वयं को सबसे बड़ा और दूसरों को छोटा समझना।
क्रोध – छोटी-छोटी बातों पर अपना विवेक खो देना।
लोभ – जरूरत से अधिक पाने की लालसा में गलत रास्ता अपनाना।
ईर्ष्या – दूसरों की सफलता देखकर दुखी होना।
द्वेष – किसी के प्रति लंबे समय तक नफरत पालकर रखना।
छल-कपट – अपने लाभ के लिए दूसरों को धोखा देना।
अनियंत्रित इच्छाएं – अपनी चाहतों के लिए मर्यादा और जिम्मेदारी भूल जाना।
मोह में विवेक खो देना – अपने लगाव के कारण सही और गलत में अंतर न कर पाना।
प्रतिशोध की भावना – किसी की गलती का जवाब देने के लिए बदला लेने पर उतर आना।
संयम की कमी – अपनी वाणी, व्यवहार, इच्छाओं और क्रोध पर नियंत्रण न रख पाना।
ये दस बुराइयां किसी एक व्यक्ति में ही हों, ऐसा जरूरी नहीं। हम सभी में कभी न कभी इनका कोई न कोई रूप दिखाई दे सकता है। महत्वपूर्ण यह है कि हम दूसरों की कमियां गिनाने से पहले अपनी कमियों को पहचानने का साहस रखें।
आज केवल रावण के दस सिर मत गिनिए, अपने भीतर छिपी दस बुराइयों को पहचानने की कोशिश कीजिए।

राम बनिए, रावण बनकर स्वयं को बड़ा मत दिखाइए!

यदि आप किसी से प्रेम करते हैं, तो उसके सम्मान का भी ध्यान रखिए। यदि आप किसी से असहमत हैं, तो उसे अपमानित किए बिना अपनी बात कहिए। यदि आपके पास शक्ति है, तो उसका उपयोग किसी कमजोर को दबाने में नहीं, बल्कि उसकी सहायता करने में कीजिए।
यदि कोई आपसे छोटा है, तो उसके साथ प्रेम से पेश आइए। यदि कोई गरीब है, तो उसे सम्मान दीजिए। यदि कोई आपसे गलती कर बैठा है, तो परिस्थिति के अनुसार उसे सुधारने का अवसर दीजिए। यदि कोई आपसे मदद मांग रहा है, तो अपनी क्षमता के अनुसार उसका हाथ थामिए।
हर व्यक्ति की जिंदगी में ऐसे क्षण आते हैं, जब वह गुस्से में कुछ गलत कह देता है या अहंकार में किसी का दिल दुखा देता है। लेकिन महानता गलती कभी न करने में नहीं, बल्कि अपनी गलती पहचानकर उसे सुधारने में है।
प्रेम, सहयोग, दया, क्षमा और विनम्रता मनुष्य की सबसे बड़ी ताकत हैं। इन गुणों के लिए बहुत धन या बड़ा पद नहीं चाहिए। बस मन में संवेदना और व्यवहार में मर्यादा होनी चाहिए।
राम बनिए, रावण बनकर स्वयं को बड़ा मत दिखाइए। दूसरों को झुकाकर नहीं, उनका सम्मान करके बड़े बनिए।

रिश्तों में प्रेम रखिए, व्यवहार में मर्यादा रखिए!

कभी-कभी हम अनजान लोगों के सामने बहुत विनम्र रहते हैं, लेकिन अपने ही परिवार के सदस्यों से कठोर व्यवहार करते हैं। बाहर वालों से मुस्कुराकर बात करते हैं, मगर घर में अपनों की बात सुनने का धैर्य नहीं रखते। दूसरों की भावनाओं का ध्यान रखते हैं, लेकिन अपने माता-पिता, जीवनसाथी, भाई-बहन या बच्चों की भावनाओं को अनदेखा कर देते हैं।
जरा विचार कीजिए, यदि हमारी अच्छाई केवल समाज को दिखाने के लिए है और घर के भीतर हमारे व्यवहार से अपने ही लोग दुखी हैं, तो उस अच्छाई का क्या मूल्य है?
धार्मिक आयोजन में दान देना अच्छी बात है, लेकिन घर में किसी जरूरतमंद सदस्य की सहायता करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। मंदिर जाकर सिर झुकाना श्रद्धा है, लेकिन अपने व्यवहार से किसी का अपमान न करना भी धर्म का हिस्सा है। भगवान का नाम लेना अच्छी बात है, लेकिन उनके आदर्शों को अपने जीवन में उतारना उससे भी अधिक आवश्यक है।
पूजा में हाथ जोड़ने के साथ-साथ अपने व्यवहार में भी विनम्रता जोड़िए। यही संस्कार जीवन को सुंदर बनाते हैं।

असली विजय तब होगी, जब मनुष्य अपने भीतर झांकेगा!

दशहरा हमें केवल अतीत की एक घटना याद दिलाने के लिए नहीं, बल्कि वर्तमान में अपने आचरण को बेहतर बनाने की प्रेरणा देने के लिए भी है। बुराई पर अच्छाई की विजय का संदेश तभी सार्थक होगा, जब हम उसे अपने जीवन में उतारने का प्रयास करेंगे।
यदि हम सच में विजयादशमी मनाना चाहते हैं, तो आज एक संकल्प लें, हम अपने अहंकार को कम करेंगे, क्रोध पर नियंत्रण रखने का प्रयास करेंगे, गलत तरीके से धन कमाने से बचेंगे, नशे से दूरी बनाएंगे, सड़क पर नियमों का पालन करेंगे, महिलाओं और बुजुर्गों का सम्मान करेंगे, गरीबों और जरूरतमंदों की मदद करेंगे और अपने परिवार के साथ प्रेमपूर्वक व्यवहार करेंगे।
हम किसी के पद, धन, जाति, स्थिति या कमजोरी के आधार पर उसका अपमान नहीं करेंगे। विवाद होने पर हिंसा और बदले का रास्ता नहीं चुनेंगे। गलती होने पर उसे स्वीकार करेंगे और किसी का दिल दुखाने पर क्षमा मांगने में संकोच नहीं करेंगे।
इन संकल्पों के लिए किसी बड़े मंच की आवश्यकता नहीं है। इन्हें निभाने की शुरुआत अपने घर, अपने परिवार, अपने कार्यस्थल और अपने व्यवहार से की जा सकती है।

आज रावण जलेगा, लेकिन क्या आपका अहंकार भी जलेगा?

शाम को जब रावण का पुतला आग की लपटों में घिर जाएगा, तब एक बार अपने मन से भी पूछिएगा, क्या मैंने अपनी किसी बुराई को छोड़ने का निर्णय लिया है? क्या मैं किसी ऐसे व्यक्ति से माफी मांगूंगा, जिसका दिल मैंने दुखाया है? क्या मैं किसी जरूरतमंद की सहायता करूंगा? क्या मैं अपने पद, धन, ज्ञान या शक्ति का उपयोग दूसरों को दबाने के बजाय उनकी मदद करने में करूंगा?
रावण का पुतला कुछ ही समय में जलकर राख हो जाएगा। आतिशबाजी की आवाजें भी शांत हो जाएंगी। भीड़ अपने घर लौट जाएगी। लेकिन यदि हमारे भीतर का अहंकार, क्रोध, लालच और नफरत वैसे ही बने रहे, तो हमारे जीवन में वास्तविक बदलाव कहां आया?
दशहरे का अर्थ केवल एक पुतले का दहन नहीं, बल्कि अपने भीतर की बुराइयों को पहचानने और उन्हें दूर करने का निरंतर प्रयास भी है।
आज रावण की राख हवा में उड़ जाएगी, लेकिन आपके व्यवहार में छिपा रावण तभी समाप्त होगा, जब आप उसे पहचानकर बदलने का साहस करेंगे।

एक दिन ऐसा दशहरा भी मनाइए, जिसकी शुरुआत आपके भीतर से हो!

इस बार ऐसा दशहरा मनाइए, जिसमें किसी नाराज व्यक्ति से रिश्ते सुधारने की पहल हो। किसी गरीब बच्चे की पढ़ाई में सहायता करने का संकल्प हो। किसी बुजुर्ग की बात धैर्य से सुनने का समय हो। किसी कर्मचारी की मेहनत को सम्मान देने का भाव हो। किसी विवाद को बढ़ाने के बजाय सुलझाने की कोशिश हो। किसी परेशान व्यक्ति को नशे या गुस्से के रास्ते से हटाकर मदद और सही सलाह की ओर ले जाने का प्रयास हो।
इस बार रावण दहन देखकर लौटते समय केवल यह मत कहिए कि बुराई पर अच्छाई की जीत हुई। अपने जीवन में भी अच्छाई की जीत के लिए एक छोटा कदम उठाइए, हो सकता है, आपका एक विनम्र शब्द किसी टूटते रिश्ते को बचा ले। आपकी थोड़ी-सी सहायता किसी जरूरतमंद के चेहरे पर मुस्कान लौटा दे। आपका संयम किसी बड़े विवाद को रोक दे। आपका प्रेम किसी निराश व्यक्ति को फिर से जीने की उम्मीद दे दे।
यही वह बदलाव है, जिसकी शुरुआत एक व्यक्ति से होकर परिवार, समाज और पूरे देश तक पहुंच सकती है।

अंतिम सवाल जवाब आपको अपने मन से देना है!

जब आप रावण के दस सिरों को जलते हुए देखें, तो अपने भीतर के अहंकार, क्रोध, लोभ, ईर्ष्या, द्वेष, छल, लालच, प्रतिशोध और असंयम को भी याद कीजिएगा। अपने मन से पूछिएगा कि मैं दूसरों को बदलने की बात तो करता हूं, लेकिन क्या स्वयं को बदलने के लिए तैयार हूं?
क्योंकि दूसरों की बुराई पहचान लेना आसान है, अपनी बुराई स्वीकार करना कठिन। दूसरों को उपदेश देना आसान है, उन उपदेशों पर स्वयं चलना कठिन। दुनिया को राम का आदर्श बताना आसान है, लेकिन अपने व्यवहार में राम की मर्यादा उतारना ही असली परीक्षा है।
याद रखिए, भगवान श्रीराम का आदर्श हमें विनम्रता, मर्यादा, कर्तव्य और सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। रावण की कथा हमें चेतावनी देती है कि ज्ञान, शक्ति, धन और प्रतिष्ठा होने के बावजूद अहंकार मनुष्य के पतन का कारण बन सकता है।
इसलिए इस विजयादशमी पर केवल रावण का पुतला मत जलाइए, अपने भीतर की बुराइयों को पहचानिए, उन्हें छोड़ने का संकल्प लीजिए और अपने आचरण से अच्छाई की विजय का प्रमाण दीजिए।
क्योंकि असली दशहरा उस दिन होगा, जब रावण का पुतला ही नहीं, हमारे भीतर का अहंकार भी जलेगा; जब हम दूसरों को हराने के बजाय अपनी बुराइयों को हराना सीखेंगे; और जब हम रावण बनकर स्वयं को बड़ा दिखाने के बजाय श्रीराम की तरह मर्यादा, प्रेम और विनम्रता के मार्ग पर चलने का प्रयास करेंगे।

आप सभी को विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाएं।

आइए, इस दशहरे पर संकल्प लें, बुराई को केवल जलते हुए नहीं देखेंगे, बल्कि अपने भीतर से मिटाने का प्रयास भी करेंगे।

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