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“झाड़ू कैमरे के लिए या देश के लिए? गांधी-शास्त्री जयंती पर बड़ा सवाल”: जयंती नहीं, जिम्मेदारी समझे!

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गांधी एवं शास्त्री जी की जयंती पर विशेष संपादकीय

By ACGN 7647981711, 9303948009 

एक ने आजादी के लिए लाठियां खाईं, दूसरे ने देश के स्वाभिमान के लिए इतिहास रच दिया… क्या हम उनकी जयंती पर सिर्फ तस्वीरों पर फूल चढ़ाने आए हैं?
गांधी का सत्य, अहिंसा और स्वच्छता –  शास्त्री की सादगी, ईमानदारी और राष्ट्रभक्ति! दो अक्टूबर हमें याद दिलाता है कि देश केवल नारों से नहीं, चरित्र और कर्म से बनता है।


लेख : प्रदीप मिश्रा, स्वतंत्र पत्रकार

2 अक्टूबर की सुबह जब देश जागता है तो कैलेंडर की एक तारीख हमें दो ऐसे महान व्यक्तित्वों की याद दिलाती है, जिनका जीवन भारत के इतिहास में हमेशा अमर रहेगा। एक ने अंग्रेजों की हुकूमत के सामने सत्य और अहिंसा का ऐसा हथियार उठाया कि दुनिया ने उसकी ताकत देखी। दूसरे ने गरीबी में जन्म लेकर अपनी ईमानदारी, सादगी और राष्ट्रभक्ति से देश के सर्वोच्च पद तक पहुंचकर यह साबित कर दिया कि महानता कुर्सी से नहीं, इंसान के चरित्र से पैदा होती है।
एक थे मोहनदास करमचंद गांधी, जिन्हें दुनिया महात्मा गांधी और भारत बापू के नाम से जानता है। दूसरे थे लाल बहादुर शास्त्री, जिनका कद भले ही छोटा था, लेकिन उनके विचार, साहस और संकल्प का कद हिमालय से भी ऊंचा था।
दोनों का जन्म एक ही तारीख, 2 अक्टूबर को हुआ। एक का जन्म 1869 में और दूसरे का 1904 में। दोनों के बीच उम्र का अंतर था, जीवन की परिस्थितियां अलग थीं, लेकिन दोनों के दिल में एक ही धड़कन थी – मेरा देश, मेरा भारत!
आज हम दोनों महापुरुषों की जयंती मना रहे हैं। माल्यार्पण होगा, भाषण होंगे, सोशल मीडिया पर शुभकामनाओं की बाढ़ आएगी। सरकारी कार्यालयों में कार्यक्रम होंगे, स्कूलों में बच्चे गांधी और शास्त्री बनकर मंच पर दिखाई देंगे। लेकिन एक सवाल है, जो हर भारतीय को अपने सीने पर हाथ रखकर खुद से पूछना चाहिए, क्या हम सच में उन महापुरुषों के विचारों पर चल रहे हैं, या केवल उनकी तस्वीरों को सजाकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर रहे हैं?
क्योंकि महापुरुषों को याद करना आसान है, उनके जैसा बनने का प्रयास करना बहुत कठिन है।

पोरबंदर की धरती पर जन्मा वह बालक, जिसने पूरी दुनिया को अहिंसा की ताकत दिखाई

2 अक्टूबर 1869 को गुजरात के पोरबंदर में करमचंद गांधी और पुतलीबाई के घर एक बालक ने जन्म लिया। नाम रखा गया मोहनदास करमचंद गांधी। किसी ने उस समय कल्पना भी नहीं की होगी कि यह साधारण परिवार में जन्मा बालक आगे चलकर भारत की आजादी की लड़ाई का एक प्रमुख चेहरा बनेगा और दुनिया के इतिहास में अहिंसा का पर्याय बन जाएगा।
बचपन में गांधी जी सामान्य बच्चों की तरह पढ़ाई करते थे। उनका परिवार धार्मिक संस्कारों वाला था। माता पुतलीबाई के जीवन में व्रत, संयम और धार्मिक आस्था का विशेष स्थान था। इन संस्कारों का प्रभाव गांधी जी के व्यक्तित्व पर भी पड़ा।
सन् 1883 में उनका विवाह कस्तूरबा गांधी से हुआ। आगे की पढ़ाई के लिए वे 1888 में इंग्लैंड गए और कानून की पढ़ाई पूरी की। 1891 में भारत लौटकर वकालत शुरू की, लेकिन वकालत में शुरुआती सफलता उन्हें आसानी से नहीं मिली।
सन् 1893 में एक कानूनी काम के सिलसिले में वे दक्षिण अफ्रीका पहुंचे। यहीं उनके जीवन ने ऐसी करवट ली, जिसने मोहनदास को महात्मा गांधी बनाने की दिशा तय कर दी।
दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के साथ नस्लीय भेदभाव होता था। एक बार प्रथम श्रेणी का टिकट होने के बावजूद उन्हें पीटरमैरिट्जबर्ग रेलवे स्टेशन पर ट्रेन से बाहर कर दिया गया। ठंड की उस रात ने उनके मन में एक सवाल खड़ा किया क्या किसी इंसान की इज्जत उसके रंग और नस्ल से तय होगी?
उन्होंने अन्याय के सामने झुकने के बजाय उसके खिलाफ आवाज उठाने का फैसला किया। दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के अधिकारों के लिए संघर्ष करते हुए उन्होंने सत्याग्रह और अहिंसक प्रतिरोध को अपने आंदोलन का आधार बनाया।
सन् 1915 में गांधी जी भारत लौटे। अब उनका संघर्ष केवल व्यक्तिगत अधिकारों तक सीमित नहीं था। उनकी नजर देश के किसानों, मजदूरों, गरीबों और उन लोगों पर थी, जिनकी आवाज अंग्रेजी शासन में दबा दी गई थी।

चंपारण से दांडी तक अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती देने वाला सत्याग्रह

सन् 1917 में बिहार के चंपारण में किसानों की पीड़ा ने गांधी जी को संघर्ष का एक नया रास्ता दिखाया। अंग्रेज नील की खेती के लिए किसानों पर दबाव डालते थे। गांधी जी किसानों के बीच पहुंचे और उनकी समस्याओं को समझकर उनके अधिकारों के लिए सत्याग्रह शुरू किया। इसके बाद 1918 में अहमदाबाद के मिल मजदूरों और खेड़ा के किसानों के लिए भी उन्होंने संघर्ष किया।
सन् 1920 में असहयोग आंदोलन के माध्यम से उन्होंने देशवासियों से अंग्रेजी शासन के साथ सहयोग बंद करने की अपील की। विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार, स्वदेशी का प्रचार और चरखे को आत्मनिर्भरता का प्रतीक बनाना उनके आंदोलन का हिस्सा बना।
सन् 1930 में उन्होंने अंग्रेजों के नमक कानून के खिलाफ ऐतिहासिक दांडी यात्रा शुरू की। साबरमती आश्रम से समुद्र तट तक लगभग 240 मील की यात्रा ने देशभर में अंग्रेजी शासन के खिलाफ नागरिक अवज्ञा की भावना को नई ताकत दी।
फिर आया 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन। गांधी जी ने अंग्रेजों को स्पष्ट संदेश दिया -भारत छोड़ो।
उनका नारा था – करो या मरो।
गांधी जी को कई बार जेल जाना पड़ा। उनका जीवन संघर्ष, उपवास, सत्याग्रह और समाज सुधार के प्रयासों में बीता। वे केवल राजनीतिक आजादी नहीं चाहते थे, बल्कि सामाजिक बुराइयों से मुक्त भारत का सपना देखते थे।
वे छुआछूत के खिलाफ खड़े हुए, गांवों की आत्मनिर्भरता की बात की, महिलाओं की भागीदारी को प्रोत्साहित किया और हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए लगातार प्रयास किए।
उनका मानना था कि भारत की असली ताकत उसके गांवों में बसती है। गांव मजबूत होंगे तो देश मजबूत होगा।

गांधी को बापू क्यों कहा गया?

बापू शब्द का अर्थ है पिता या स्नेह देने वाला अभिभावक। गांधी जी को यह संबोधन इसलिए मिला क्योंकि वे आम जनता के बीच एक ऐसे मार्गदर्शक के रूप में पहचाने गए, जो गरीब, किसान, मजदूर और कमजोर वर्ग के दुख-दर्द को अपना समझते थे।
वे केवल मंच से भाषण देने वाले नेता नहीं थे। वे लोगों के बीच बैठते थे, उनके साथ रहते थे और उनके जीवन की समस्याओं को समझने का प्रयास करते थे। वे सादगी से रहते थे। साधारण कपड़े पहनते थे। चरखा चलाते थे और स्वदेशी का संदेश देते थे।
उनका जीवन ही उनका संदेश बन गया। उन्हें राष्ट्रपिता के रूप में सम्मान दिया जाता है। हालांकि यह एक सम्मानसूचक संबोधन है, कोई संवैधानिक पदवी नहीं।
30 जनवरी 1948 को नाथूराम गोडसे ने नई दिल्ली में प्रार्थना सभा के लिए जाते समय गांधी जी की हत्या कर दी। देश ने अपना एक महान नेता खो दिया। लेकिन उनके विचारों की यात्रा समाप्त नहीं हुई। आज भी दुनिया के अनेक हिस्सों में सत्य, अहिंसा और नागरिक अधिकारों की बात होती है तो गांधी जी का नाम लिया जाता है।

एक तरफ गांधी, दूसरी तरफ गरीबी से उठकर देश का नेतृत्व करने वाला शास्त्री

अब बात उस महापुरुष की, जिनका जीवन हमें सिखाता है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, इंसान अपने संकल्प और मेहनत से इतिहास रच सकता है।
2 अक्टूबर 1904 को उत्तर प्रदेश के मुगलसराय में लाल बहादुर का जन्म हुआ। उनके पिता शारदा प्रसाद श्रीवास्तव एक स्कूल शिक्षक थे। जब वे लगभग डेढ़ वर्ष के थे, तभी उनके पिता का निधन हो गया।
मां रामदुलारी देवी ने कठिन परिस्थितियों में बच्चों का पालन-पोषण किया। गरीबी ऐसी थी कि बचपन में लाल बहादुर को कई बार नंगे पैर स्कूल जाना पड़ता था। गर्मी में तपती सड़कें हों या जीवन की कठिनाइयां, उनके कदम कभी नहीं रुके।
वे पढ़ाई में आगे बढ़े। काशी विद्यापीठ से शिक्षा प्राप्त की और वहां से उन्हें ‘शास्त्री’ की उपाधि मिली। आगे चलकर उन्होंने अपने नाम के साथ जातिसूचक उपनाम श्रीवास्तव का प्रयोग छोड़ दिया और लाल बहादुर शास्त्री के नाम से पहचाने जाने लगे।
उनका जीवन गांधी जी के विचारों से प्रभावित था। जब गांधी जी ने असहयोग आंदोलन का आह्वान किया तो शास्त्री जी ने भी पढ़ाई छोड़कर स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने का निर्णय लिया।
वे भारत सेवक संघ से जुड़े और देश की आजादी के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया।
असहयोग आंदोलन, नमक सत्याग्रह और भारत छोड़ो आंदोलन सहित स्वतंत्रता संघर्ष के विभिन्न चरणों में उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई। अंग्रेजी शासन ने उन्हें कई बार जेल में डाला। उन्होंने अपने जीवन के लगभग सात वर्ष जेल में बिताए। लेकिन जेल की दीवारें भी उनके संकल्प को नहीं रोक सकीं।

आजादी मिली, लेकिन शास्त्री जी का संघर्ष समाप्त नहीं हुआ

15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ। लाखों स्वतंत्रता सेनानियों के सपने का भारत सामने था। लेकिन आजादी के बाद देश के सामने गरीबी, बेरोजगारी, खाद्यान्न संकट और विकास की अनेक चुनौतियां थीं।
लाल बहादुर शास्त्री ने आजादी के बाद भी सार्वजनिक जीवन में अपनी भूमिका जारी रखी।
उत्तर प्रदेश में संसदीय सचिव और मंत्री के रूप में काम किया। बाद में केंद्र सरकार में रेलवे एवं परिवहन, वाणिज्य एवं उद्योग और गृह मंत्रालय जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं।
उनका काम करने का तरीका अलग था। वे पद को अधिकार नहीं, जिम्मेदारी मानते थे। रेलवे मंत्री रहते हुए 1956 में एक बड़ी रेल दुर्घटना के बाद उन्होंने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दे दिया। प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उनका इस्तीफा स्वीकार किया। यह घटना भारतीय सार्वजनिक जीवन में जवाबदेही के उदाहरण के रूप में याद की जाती है।
जरा सोचिए, आज जब किसी विभाग में कोई बड़ी लापरवाही होती है तो जिम्मेदारी लेने की बात कितनी बार सुनाई देती है? शास्त्री जी ने दिखाया था कि मंत्री होना केवल सुविधा और सम्मान का विषय नहीं, जिम्मेदारी का भी विषय है।

प्रधानमंत्री बने तो सामने खड़ी थीं देश की बड़ी चुनौतियां

9 जून 1964 को लाल बहादुर शास्त्री भारत के प्रधानमंत्री बने। देश आर्थिक कठिनाइयों से गुजर रहा था। खाद्यान्न की कमी थी। किसानों की उत्पादकता बढ़ाना जरूरी था। दूसरी ओर राष्ट्रीय सुरक्षा भी एक बड़ी चुनौती थी।
1965 में पाकिस्तान के साथ युद्ध की स्थिति बनी। उस समय शास्त्री जी ने देश का नेतृत्व किया और भारतीय सेना तथा देशवासियों का मनोबल मजबूत किया।
इसी दौर में उन्होंने वह नारा दिया, जो आज भी भारत की आत्मा में गूंजता है – जय जवान, जय किसान!
इस नारे में देश की दो सबसे बड़ी ताकतों को सम्मान दिया गया। जवान सीमा पर खड़ा होकर देश की रक्षा करता है और किसान खेत में मेहनत करके देश का पेट भरता है। शास्त्री जी ने दोनों को भारत की मजबूती का आधार माना।
खाद्यान्न संकट के समय उन्होंने देशवासियों से अनाज बचाने और संयम बरतने की अपील की। उन्होंने स्वयं भी सादगी और त्याग का उदाहरण प्रस्तुत किया। उनके आह्वान पर कई परिवारों ने सप्ताह में एक दिन भोजन में कटौती और उपवास जैसे प्रयास किए।
उन्होंने कृषि उत्पादन बढ़ाने और दूध उत्पादन को प्रोत्साहित करने वाली पहलों को भी समर्थन दिया। हरित क्रांति और श्वेत क्रांति की दिशा में आगे बढ़ रहे प्रयासों को उनके कार्यकाल में राजनीतिक प्रोत्साहन मिला।
यह केवल एक प्रधानमंत्री का काम नहीं था, यह उस व्यक्ति का संकल्प था जो जानता था कि भूखे पेट देश मजबूत नहीं बन सकता।

ताशकंद की धरती पर थम गई एक सादगी भरी जिंदगी

जनवरी 1966 में भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध के बाद शांति समझौते के लिए शास्त्री जी ताशकंद पहुंचे। 10 जनवरी 1966 को उन्होंने पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान के साथ ताशकंद घोषणा पर हस्ताक्षर किए। लेकिन इसके अगले ही दिन, 11 जनवरी 1966 को ताशकंद में उनका निधन हो गया। देश को इस खबर से गहरा सदमा लगा।
एक ऐसा प्रधानमंत्री, जिसने जीवनभर सादगी अपनाई, जिसने देश की जिम्मेदारी को सर्वोपरि रखा, जिसने पद से ज्यादा कर्तव्य को महत्व दिया, वह दुनिया से विदा हो गया।
उनके निधन के कारण को लेकर समय-समय पर अलग-अलग चर्चाएं होती रही हैं, लेकिन आधिकारिक रूप से उनका निधन ताशकंद में हुआ। बिना प्रमाण किसी दावे को तथ्य मानना उचित नहीं है। 1966 में उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

आज भी जब कोई व्यक्ति ईमानदारी, सादगी और जवाबदेही की बात करता है तो लाल बहादुर शास्त्री का जीवन सामने आ जाता है।

गांधी की स्वच्छता और शास्त्री का कर्तव्य क्या हम दोनों को समझ पाए?

गांधी जी स्वच्छता को केवल सफाई कर्मचारी या नगर पालिका का काम नहीं मानते थे। उनका मानना था कि स्वच्छता इंसान के जीवन, स्वास्थ्य और समाज की गरिमा से जुड़ी हुई है। वे स्वयं सफाई के काम में भाग लेते थे। आश्रम में साफ-सफाई को महत्व देते थे। गांवों में स्वच्छता और शौचालय की व्यवस्था पर जोर देते थे। उनके लिए स्वच्छता का अर्थ था,अपने आसपास गंदगी न फैलाना, समाज को साफ रखना और सफाई के काम को छोटा न समझना।
दूसरी तरफ शास्त्री जी का जीवन हमें बताता है कि अपने कर्तव्य से मुंह मोड़ना राष्ट्रसेवा नहीं है।
गांधी जी ने समाज को सत्य और स्वच्छता का रास्ता दिखाया। शास्त्री जी ने जिम्मेदारी और ईमानदारी का उदाहरण दिया।
आज अगर हम इन दोनों के विचारों को जोड़ें तो एक ऐसा भारत बन सकता है जहां सड़कें साफ हों, नदियां स्वच्छ हों, गांव आत्मनिर्भर हों, किसान खुशहाल हों, जवान सम्मानित हों और सरकारी व्यवस्था जवाबदेह हो।

लेकिन सवाल यह है कि क्या हम उस दिशा में चल रहे हैं?

स्वच्छ भारत मिशन से स्वच्छता पखवाड़ा और स्वच्छता ही सेवा तक का सफर

गांधी जी का सपना था कि भारत स्वच्छ हो। लेकिन स्वच्छता का सवाल केवल गांधी जयंती पर याद करने का विषय नहीं है।
देश में स्वच्छता के प्रयास पहले भी होते रहे थे। स्वतंत्रता के बाद ग्रामीण स्वच्छता और सफाई से जुड़े कार्यक्रम चलाए गए। वर्ष 1986 में केंद्रीय ग्रामीण स्वच्छता कार्यक्रम भी शुरू किया गया था।
लेकिन 2014 में स्वच्छता को राष्ट्रीय जनभागीदारी के बड़े अभियान के रूप में आगे बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया गया।
15 अगस्त 2014 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले से स्वच्छ भारत का आह्वान किया और 2 अक्टूबर 2014 को गांधी जयंती के अवसर पर स्वच्छ भारत मिशन की शुरुआत की गई।
इसके बाद अप्रैल 2016 में स्वच्छता पखवाड़ा की संस्थागत शुरुआत हुई। इसके तहत केंद्र सरकार के विभिन्न मंत्रालयों और विभागों को 15 दिनों तक स्वच्छता पर विशेष ध्यान देने के लिए जोड़ा गया। इसका उद्देश्य था कि सफाई केवल सफाई विभाग का विषय बनकर न रह जाए, बल्कि हर विभाग अपनी जिम्मेदारी समझे।
फिर 15 सितंबर 2017 को तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने कानपुर के ईश्वरगंज गांव से राष्ट्रव्यापी ‘स्वच्छता ही सेवा’ अभियान की शुरुआत की। इसका उद्देश्य स्वच्छता को जनआंदोलन बनाना और श्रमदान के माध्यम से लोगों को जोड़ना था।
इस तरह 2014 में स्वच्छ भारत मिशन, 2016 में स्वच्छता पखवाड़ा और 2017 में स्वच्छता ही सेवा अभियान के माध्यम से स्वच्छता की मुहिम को अलग-अलग स्तरों पर आगे बढ़ाया गया।
आज स्वच्छता को केवल एक सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी के रूप में देखने की आवश्यकता है।

गांधी का चश्मा प्रतीक बन गया, लेकिन क्या हमारी नजर बदली?

आज जगह-जगह स्वच्छ भारत के पोस्टर दिखाई देते हैं। सरकारी कार्यालयों में स्वच्छता के नारे लिखे हैं। स्कूलों में बच्चों को सफाई का महत्व बताया जाता है। नगर निगम, नगर पालिका और ग्राम पंचायतों में सफाई अभियान चलाए जाते हैं।

लेकिन क्या केवल पोस्टर लगाने से देश साफ होगा?
क्या केवल एक दिन झाड़ू पकड़ने से गंदगी खत्म हो जाएगी?!
क्या केवल गांधी जी के चश्मे का प्रतीक लगा देने से हमारी सोच साफ हो जाएगी?

गांधी जी का सपना ऐसा भारत था, जहां इंसान इंसान का सम्मान करे, कोई गंदगी में जीने को मजबूर न हो, सफाई कर्मचारियों को सम्मान मिले और हर नागरिक अपनी जिम्मेदारी समझे।
आज भी कई शहरों में नालियां जाम हैं। नदियों में कचरा डाला जाता है। सड़कों के किनारे प्लास्टिक फेंकी जाती है। बाजारों में दुकानों के सामने कचरे के ढेर लग जाते हैं। सार्वजनिक स्थानों को लोग अपना घर नहीं समझते।
हम अपने घर को साफ रखते हैं, लेकिन घर से बाहर निकलते ही सड़क को कूड़ेदान बना देते हैं।
आखिर यह कैसी मानसिकता है?
जिस सड़क पर हम चलते हैं, वह किसी एक व्यक्ति की नहीं, पूरे समाज की है। जिस नदी का पानी हम पीते हैं, उसे गंदा करने का अधिकार हमें किसने दिया?
जिस सार्वजनिक जगह का उपयोग हम सब करते हैं, उसकी सफाई की जिम्मेदारी भी हम सबकी है।

अब एक सवाल नेताओं और समाज के जिम्मेदार लोगों से भी

स्वच्छता अभियान में जनप्रतिनिधियों, अधिकारियों, सामाजिक संगठनों और आम नागरिकों की भागीदारी जरूरी है। लेकिन भागीदारी का मतलब केवल कार्यक्रम में पहुंच जाना नहीं है।
नेता हों, अधिकारी हों, जनप्रतिनिधि हों या सामाजिक कार्यकर्ता सभी को अपने आचरण से उदाहरण पेश करना चाहिए।
अगर कोई जनप्रतिनिधि झाड़ू उठाता है तो अच्छी बात है। अगर अधिकारी अपने कार्यालय की सफाई में भाग लेता है तो स्वागत योग्य है। अगर आम नागरिक श्रमदान करता है तो यह समाज के लिए प्रेरणा है।
लेकिन कार्यक्रम समाप्त होने के बाद क्या होता है, असली सवाल यह है।
क्या सफाई जारी रहती है?
क्या कचरे का नियमित उठाव होता है?
क्या नालियों की सफाई होती है?
क्या सार्वजनिक शौचालयों की देखरेख होती है?
क्या गांवों में कचरा प्रबंधन की व्यवस्था बनती है?
क्या सफाई कर्मचारियों को जरूरी उपकरण, सुरक्षा और सम्मान मिलता है?
अगर इन सवालों के जवाब नहीं हैं तो हमें केवल कार्यक्रम की सफलता के दावे करने के बजाय जमीन पर काम करने की जरूरत है।
आजादी दिलाने वालों की तस्वीरें लगाने से पहले उनके विचारों को अपने जीवन में उतारिए
गांधी जी ने हमें सत्य का रास्ता दिखाया। शास्त्री जी ने हमें ईमानदारी का अर्थ समझाया, गांधी जी ने कहा कि बदलाव की शुरुआत स्वयं से होनी चाहिए। शास्त्री जी ने अपने जीवन से बताया कि पद से बड़ा कर्तव्य होता है।
आज देश को दोनों की जरूरत है।
हमें ऐसा नागरिक बनना होगा जो सड़क पर कचरा न फेंके। ऐसा अधिकारी बनना होगा जो अपनी जिम्मेदारी ईमानदारी से निभाए। ऐसा जनप्रतिनिधि बनना होगा जो चुनाव के समय ही नहीं, पूरे पांच साल जनता के बीच रहे। ऐसा व्यापारी बनना होगा जो अपने आसपास सफाई रखे। ऐसा युवा बनना होगा जो सोशल मीडिया पर केवल संदेश न लिखे, बल्कि जमीन पर कुछ करके दिखाए।
और सबसे जरूरी बात, हमें सफाई करने वाले व्यक्ति को सम्मान देना सीखना होगा। जो हाथ हमारे शहरों को साफ रखते हैं, उन हाथों को सम्मान और सुरक्षा मिलनी चाहिए।
क्योंकि स्वच्छ भारत केवल साफ सड़क का नाम नहीं, बल्कि साफ सोच और सम्मानजनक समाज का नाम भी है।

अंत में एक बात झाड़ू पकड़कर फोटो खिंचवाना आसान है, सालभर सफाई करना असली सेवा है!
आज गांधी जयंती और शास्त्री जयंती के अवसर पर एक दृश्य फिर देखने को मिलेगा।
कहीं नेता जी झाड़ू लेकर पहुंचेंगे। कहीं अधिकारी फोटो खिंचवाएंगे। कहीं सामाजिक संगठन के लोग एक साथ झाड़ू पकड़कर तस्वीर बनवाएंगे। कैमरे चमकेंगे, मोबाइल बाहर निकलेंगे, सेल्फी ली जाएगी और कुछ ही देर में तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हो जाएगी। लोग लिखेंगे आज हमने स्वच्छता अभियान में भाग लिया। गांधी जी को श्रद्धांजलि दी। स्वच्छ भारत का संकल्प लिया।


लेकिन जरा सोचिए, क्या दस मिनट झाड़ू लगाने से स्वच्छता आ जाएगी?
क्या फोटो खिंचवाने के बाद सड़क हमेशा साफ रहेगी?
क्या सेल्फी वायरल होने के बाद नालियां अपने आप साफ हो जाएंगी?
क्या एक दिन की सफाई से महीनों की गंदगी खत्म हो जाएगी?
नहीं,बिल्कुल नहीं
स्वच्छता कोई दस मिनट का कार्यक्रम नहीं है। यह जीवनभर निभाने वाला संस्कार है। यह एक दिन का दिखावा नहीं, हर दिन की जिम्मेदारी है।
आज झाड़ू पकड़कर फोटो खिंचवाने से पहले अपने मन में यह सवाल जरूर उठाइए कि क्या मैं कल भी इसी जगह सफाई का ध्यान रखूंगा? क्या मैं अपने घर के बाहर कचरा नहीं फेंकूंगा? क्या मैं दूसरों को भी ऐसा करने से रोकूंगा? क्या मैं सार्वजनिक स्थानों को अपनी संपत्ति की तरह साफ रखूंगा?
आज अगर आप सच में जनता की सेवा करना चाहते हैं, तो केवल एक दिन नहीं, पूरे वर्ष स्वच्छता का संकल्प लीजिए।
नेता हैं तो अपने क्षेत्र में नियमित सफाई व्यवस्था की निगरानी कीजिए। अधिकारी हैं तो अपने विभाग में स्वच्छता को नियमित जिम्मेदारी बनाइए। सामाजिक संगठन से जुड़े हैं तो हर महीने किसी सार्वजनिक स्थल की सफाई और देखरेख की जिम्मेदारी उठाइए। आम नागरिक हैं तो कम से कम अपने आसपास गंदगी न फैलाने का संकल्प लीजिए।
आज सेल्फी डालने की होड़ से बाहर निकलकर सेवा की शुरुआत कीजिए।
फोटो खिंचवाना गलत नहीं है, लेकिन फोटो ही उद्देश्य बन जाए तो अभियान का असली मकसद पीछे छूट जाता है। तस्वीर से प्रेरणा मिलनी चाहिए, दिखावा नहीं होना चाहिए।
आज एक संकल्प लीजिए – गांधी जयंती पर उठाई गई झाड़ू केवल कैमरे के सामने नहीं, पूरे साल हमारी जिम्मेदारी का प्रतीक बनेगी।
जिस दिन स्वच्छता अभियान की तस्वीरें सोशल मीडिया पर कम और साफ-सुथरी सड़कें, गांव, शहर और नदियां जमीन पर ज्यादा दिखाई देंगी, उस दिन समझिएगा कि गांधी जी का सपना सच होने की दिशा में हम वास्तव में आगे बढ़ रहे हैं।
जिस दिन पद पर बैठे लोग शास्त्री जी की तरह जिम्मेदारी स्वीकार करना सीख जाएंगे, उस दिन समझिएगा कि हमने उनके जीवन से कुछ सीखा है।
आज हमें गांधी जी की मूर्ति पर फूल चढ़ाने के साथ अपने भीतर के अहंकार, झूठ और गंदगी को भी साफ करना है। शास्त्री जी को नमन करने के साथ अपने भीतर ईमानदारी, सादगी और कर्तव्य का दीपक भी जलाना है।
क्योंकि देश केवल नेताओं से नहीं बनता, देश नागरिकों के चरित्र से बनता है।
गांधी जी ने आजादी के लिए अपना जीवन लगा दिया। शास्त्री जी ने देश के सम्मान और मजबूती के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया।
अब हमारी बारी है।
क्या हम अपने देश को साफ, ईमानदार, जिम्मेदार और मजबूत बनाने के लिए साल के 365 दिन में से कुछ समय भी नहीं दे सकते?
अगर दे सकते हैं, तो आज से शुरुआत कीजिए।
न कोई दिखावा, न कोई झूठा संकल्प, न केवल कैमरे के लिए झाड़ू।
बस एक सच्चा संकल्प – मेरा घर साफ, मेरी गली साफ, मेरा गांव साफ, मेरा शहर साफ और मेरा भारत स्वच्छ।

महात्मा गांधी और भारत रत्न लाल बहादुर शास्त्री को शत-शत नमन जय हिंद! जय भारत!


प्रदीप मिश्रा
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