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जमीन गई, मुआवजा अटका… अब जनसुनवाई की जल्दी क्यों?

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       मानिकपुर खदान विस्तार पर भू-विस्थापितों का दर्द

कोरबा, छत्तीसगढ़

By ACGN – 7647981711, 9303948009


मानिकपुर विस्तार के खिलाफ छह दिन से धरना, भिलाई खुर्द, दर्रीपारा सहित प्रभावित गांवों की आवाजपहले हमारा हक, फिर विस्तार


कोरबा ACGN:- जिस जमीन पर कभी खेत लहलहाते थे, जहां परिवारों ने पीढ़ियां गुजारीं, आज वही जमीन खदान विस्तार की प्रक्रिया में है और प्रभावित परिवार अपने अधिकारों के लिए धरने पर बैठे हैं। मानिकपुर खदान विस्तार को लेकर 18 सितंबर से भू-विस्थापितों का अनिश्चितकालीन धरना जारी है। 23 सितंबर को प्रेस क्लब में पत्रकार वार्ता कर संगठन ने SECL और शासन-प्रशासन से कई गंभीर सवाल पूछे हैं। सबसे बड़ा सवाल है जब पुराने मुआवजे और पुनर्वास का दर्द अभी बाकी है, तो 25 सितंबर की जनसुनवाई कराने की इतनी जल्दी क्यों?

भू-विस्थापितों ने 25 सितंबर की प्रस्तावित जनसुनवाई निरस्त करने की मांग की है। प्रभावित क्षेत्र में भिलाई खुर्द, दर्रीपारा तथा कोरबा-चांपा मुख्य मार्ग के आसपास के प्रभावित क्षेत्र शामिल बताए गए हैं। ग्रामीणों का कहना है कि खदान विस्तार का असर केवल जमीन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि घर, खेती, रोजगार, सामाजिक परिवेश और बच्चों के भविष्य तक पहुंचेगा।

संगठन के अनुसार मानिकपुर क्षेत्र में 1963-64 में हुए भूमि अधिग्रहण से जुड़े कई मामले आज भी लंबित हैं। किसी परिवार को मुआवजे का इंतजार है, किसी के रोजगार का सवाल है तो किसी के पुनर्वास का। ग्रामीणों का आरोप है कि वर्षों तक अपनी समस्या लेकर कार्यालयों के चक्कर लगाने के बाद भी उन्हें स्पष्ट और अंतिम समाधान नहीं मिल पाया। ऐसे में नई परियोजना के लिए जनसुनवाई उन्हें पुराने जख्म पर नया बोझ जैसी महसूस हो रही है।
भू-विस्थापितों के 17 बिंदुओं की मांगों को देखें तो उनकी चिंता साफ दिखाई देती है। वे पुराने लंबित मुआवजे का पारदर्शी और समयबद्ध भुगतान, पात्र परिवारों को रोजगार, वास्तविक पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन, छूटे हुए मकानों और परिवारों का दोबारा सर्वे, प्रभावित युवाओं को प्राथमिकता रोजगार, ठेका कंपनियों में भर्ती की पारदर्शिता और वाहन कार्य से जुड़ी आर्थिक शर्तों की निष्पक्ष जांच चाहते हैं। साथ ही प्रभावित बस्तियों में स्कूल, आंगनबाड़ी, स्वास्थ्य केंद्र, सामुदायिक भवन, सड़क और अन्य मूलभूत सुविधाओं की व्यवस्था की मांग भी रखी गई है।
ग्रामीणों का कहना है कि अगर विकास के लिए उनकी जमीन ली जा रही है तो उनके बच्चों के भविष्य की जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए। उनका दर्द यह है कि जमीन चली गई तो खेती का सहारा गया, विस्थापन हुआ तो सामाजिक जड़ें कमजोर हुईं और रोजगार की अनिश्चितता ने परिवारों के सामने नया संकट खड़ा कर दिया। ऐसे में केवल कागजों पर पुनर्वास की प्रक्रिया पूरी करना उनके लिए पर्याप्त नहीं है।


ठेका रोजगार को लेकर भी ग्रामीणों ने सवाल उठाए हैं। संगठन का आरोप है कि प्रभावित लोगों को काम तो दिया जा रहा है, लेकिन कई मामलों में नियुक्ति पत्र और रोजगार की स्थायी स्थिति स्पष्ट नहीं है। वाहन चालकों और युवाओं से जुड़ी आर्थिक शर्तों को लेकर भी उन्होंने निष्पक्ष जांच की मांग की है। ग्रामीण चाहते हैं कि रोजगार के नाम पर प्रभावित परिवार आर्थिक जोखिम में न डालें जाएं।
पूर्व मंत्री जयसिंह अग्रवाल द्वारा प्रभावित ग्रामीणों से मुलाकात कर उनके मुआवजा, रोजगार और पुनर्वास संबंधी मुद्दों को उठाए जाने की बात भी संगठन ने कही है। वहीं ग्रामीणों के अनुसार वर्तमान उद्योग मंत्री लखन लाल देवांगन की ओर से भी प्रभावितों की समस्याओं का समाधान होने के बाद ही जनसुनवाई आगे बढ़ाने की बात कही गई थी। इन बयानों और निर्देशों की वर्तमान स्थिति प्रशासन तथा SECL के आधिकारिक पक्ष से और स्पष्ट हो सकती है।
पर्यावरण को लेकर भी ग्रामीणों की चिंता कम नहीं है। संगठन का आरोप है कि बंद मानिकपुर खदान क्षेत्र में फ्लाई ऐश के बड़े ढेर और हवा-बारिश के कारण राख फैलने की स्थिति से आसपास के खेत, सड़क और जनस्वास्थ्य प्रभावित होने की आशंका है। ग्रामीण इसकी वैज्ञानिक जांच और जिम्मेदारी तय करने की मांग कर रहे हैं।
सबसे तीखा सवाल ग्रामीणों ने शासन-प्रशासन से यही पूछा है—जब हमारी पुरानी जमीन का हिसाब पूरा नहीं हुआ, हमारे रोजगार और पुनर्वास का भरोसा पूरा नहीं हुआ, तो हमारी सहमति और भविष्य से जुड़ी नई प्रक्रिया कैसे आगे बढ़ सकती है? उनका कहना है कि वे विकास के विरोधी नहीं हैं, लेकिन विकास ऐसा नहीं होना चाहिए जिसमें प्रभावित परिवारों को केवल विस्थापन मिले और उनके हिस्से का अधिकार वर्षों तक फाइलों में अटका रहे।
ग्रामीणों की मांग है कि 25 सितंबर की जनसुनवाई निरस्त की जाए, पहले SECL, जिला प्रशासन और प्रभावित परिवारों के बीच त्रिपक्षीय बैठक हो, प्रत्येक परिवार के मामले की स्थिति सार्वजनिक की जाए, लंबित मुआवजा एवं रोजगार का समयबद्ध समाधान हो और पुनर्वास की ठोस योजना लिखित रूप में सामने रखी जाए।
अब मानिकपुर में सवाल सिर्फ खदान विस्तार का नहीं है। सवाल उन परिवारों का है जिन्होंने कभी विकास के लिए अपनी जमीन दी थी और आज अपने ही भविष्य के लिए आवाज उठा रहे हैं। क्या इस बार फाइलों से बाहर निकलकर शासन-प्रशासन उनके घरों की पीड़ा सुनेगा? क्या SECL विस्तार से पहले उन परिवारों का अधूरा हिसाब पूरा करेगा? या 25 सितंबर की जनसुनवाई एक बार फिर उन आवाजों के बीच होगी, जो वर्षों से अपने हक का इंतजार कर रही हैं?

भू-विस्थापित संगठन द्वारा आयोजित प्रेस वार्ता में अमन पटेल, आलोक पटेल, रमेलाल दीवार, अरुण यादव, कलीराम दीवार एवं मनोज पटेल विशेष रूप से उपस्थित रहे। इनके साथ बड़ी संख्या में प्रभावित ग्रामीण, युवा एवं क्षेत्रवासी भी मौजूद रहे। ग्रामीणों ने अपनी समस्याएं और पीड़ा खुलकर सामने रखते हुए अपनी मांगों को रखा तथा 25 सितंबर को प्रस्तावित जनसुनवाई को निरस्त करने की मांग की।


प्रदीप मिश्रा
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